चीन को महंगा पड़ा टकराव

    दिनांक 24-जून-2020
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पाञ्चजन्य ब्यूरो

चीन बार-बार भारत को उकसा रहा है। पहले डोकलाम और अब गलवान घाटी, पैंगोंग त्सो और नाकु-ला में घुसपैठ की कोशिश और भारतीय सैनिकों पर अंधरे में धोखे से घातक हमला। एलएसी पर चीन के भारत से कई गुना अधिक सैनिक थे, इसके बावजूद उन्हें मुंह की खानी पड़ी। भारत के जहां 20 सैनिक बलिदान हुए, वहीं चीन के 45 सैनिक मारे गए। दरअसल, हिमाकत चीन की आदत बन गई है, इसलिए अब उसे सबक सिखाना जरूरी हो गया है। उसे मालूम होना चाहिए कि यह 1962 का भारत नहीं है
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गलवान घाटी में चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच 6 घंटे तक हिंसक झड़प हुई। 

2020: लद्दाख में तनातनी
17 जून: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, भारत शांति चाहता है, लेकिन उकसाया गया जवाब देने में सक्षम है।

16 जून: पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के पश्चिमी कमान के प्रवक्ता कर्नल झांग शुइली ने आरोप लगाया कि भारतीय सेना ने द्विपक्षीय आम सहमति का उल्लंघन किया है। साथ ही, पूरी गलवान घाटी क्षेत्र पर चीनी संप्रभुता का दावा किया।

15 जून: गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच 6 घंटे तक झड़प चली। चीनी सैनिकों ने कंटीले तार लिपटे डंडों और कील लगे सरियों का इस्तेमाल किया। इसमें बिहार रेजीमेंट के 20 सैनिक बलिदान हो गए।

13 जून: सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे बोले, भारत-चीन के बीच लद्दाख में जारी गतिरोध सुलझने की ओर बढ़ रहा है। सीमा पर स्थिति नियंत्रण में है।

12 जून: डी-एस्केलेशन योजना पर चर्चा करने और तनाव कम करने के लिए मेजर जनरल-रैंक के अधिकारियों की 5वीं बार बैठक हुई।

9 जून: सैन्य अधिकारियों ने कहा कि चीन गलवान घाटी, पेट्रोलिंग प्वाइंट 15 और हॉट स्प्रिंग से अपने सैनिक हटा रहा है। जवाब में भारत ने भी अपने सैनिक हटाने की बात कही।

6 जून: लेह स्थित 14 कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह और पीएलए के दक्षिण शिनजियांग क्षेत्र के आर्मी कमांडर मेजर जनरल लियू लिन ने डी-एस्केलेशन योजना पर चर्चा की।

2 जून: पहली बार ले.जन. हरिंदर सिंह ने अधिकृत रूप से एलएसी पर चीनी सैनिकों के जमावड़े की बात कही।

25 मई: चीन ने लद्दाख क्षेत्र में एलएसी के पास 5,000 सैनिक तैनात किए। भारत ने भी इसी अनुपात में सैनिकों की तैनात की बात कही।

21 मई: भारत ने चीन के आरोप का खंडन किया कि लद्दाख और सिक्किम में तनाव भारतीय सैनिकों ने शुरू किया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत एलएसी पर अपने क्षेत्र में गतिविधियां चला रहा है, लेकिन चीन सामान्य गश्त में बाधा डाल रहा है।

19 मई: पैंगोंग त्सो, गलवान घाटी और हॉट स्प्रिंग में बढ़ते तनाव के बीच चीन के विदेश मंत्रालय ने भारतीय सैनिकों पर एलएसी पार करने का आरोप लगाते हुए कहा कि बीजिंग ‘आवश्यक प्रतिवाद’ करेगा।

10 मई: सेना ने नाकु-ला में चीनी सैनिकों से झड़प की पुष्टि की। कहा कि चीनी सैनिकों के उग्र रवैये के कारण दोनों पक्षों के सैनिक घायल हुए। पैंगोंग त्सो में भी झड़प की पुष्टि की।

9 मई: पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर तनाव बढ़ा। उत्तर सिक्किम के नकु-ला क्षेत्र में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प। भारत के चार और चीन के सात सैनिक घायल।

5-6 मई: लद्दाख के पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे भारतीय और चीनी गश्ती दल के बीच हिंसक झड़प। दोनों तरफ से पथराव। चीनी सैनिकों ने कील लगे सरिए से हमला किया।

 2017 : डोकलाम में आमने-सामने

 28 अगस्त: भारत ने कहा कि चीन विवादित डोकलाम क्षेत्र से अपने सैनिक जल्द पीछे हटाने को तैयार हो गया है, लेकिन बीजिंग ने कहा कि उसकी सेना विवादित क्षेत्र में गश्त जारी रखेगी।

20 अगस्त: डोकलाम में गतिरोध के बीच चीनी सेना ने देश के पश्चिमी भाग में सैन्य अभ्यास किया।

17 अगस्त: जापान ने भारत को सांकेतिक समर्थन देते हुए कहा कि किसी भी देश को डोकलाम की स्थिति को बदलने के लिए एकतरफा शक्ति का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

15 अगस्त: भारतीय सैनिकों ने लद्दाख क्षेत्र में दो चीनी घुसपैठियों को पकड़ा। झड़प हुई, जिसमें में दोनों देशों के सैनिक घायल हुए। हालांकि चीन ने घटना की जानकारी से इनकार किया, पर भारत ने झड़प की पुष्टि की।

8 अगस्त: चीन ने डोकलाम गतिरोध समाप्त करने के लिए एक साथ सैनिकों की वापसी के भारत के सुझाव को ठुकराया। पूछा कि अगर उत्तराखंड के कालापानी क्षेत्र या कश्मीर में वह प्रवेश करता है तो नई दिल्ली क्या करेगी?

24 जुलाई: चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने भारत पर डोकलाम में सैन्य गतिरोध बढ़ाने का आरोप लगाया। संकट हल करने के लिए भारत से अपने सैनिक हटाने को कहा।

5 जुलाई: भूटान ने चीनी दूत के लिए आपत्तिपत्र जारी कर बीजिंग से डोकलाम में यथास्थिति बहाल करने को कहा।

28 जून: चीनी सेना ने सिक्किम खंड को चीन का ‘संप्रभु क्षेत्र’ बताते हुए भारतीय सेना पर सड़क निर्माण रोकने का आरोप लगाया। 1890 के चीन-ब्रिटिश संधि का हवाला देते हुए बीजिंग द्वारा किए जा रहे निर्माण को सही ठहराया।

16 जून: पीएलए ने ‘चिकन नेक’ में सड़क बनाने का प्रयास किया।

अक्तूबर 2013: भारत-चीन ने गैर-निर्धारित सीमा पर शांति व सद्भावना बनाए रखने के लिए सीमा रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।

जनवरी 2012: भारत-चीन ने एलएसी के साथ किसी भी अपराध के मामले में वास्तविक समय के आधार पर गलतफहमी को दूर करने के लिए एक संयुक्त सीमा तंत्र पर हस्ताक्षर किए।


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गलवान डोकलाम में भी चीन ने पहले आक्रामकता दिखाई फिर पीछे हटा।

 शुरू से ही नीयत में खोट
1963: चीन ने जम्मू-कश्मीर में 38,000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर कब्जा किया। 1963 के चीन-पाकिस्तान समझौते के तहत पीओके का 5,180 किमी भारतीय क्षेत्र भी कब्जाया।

दिसंबर 1962: भारत ने झोउ एनलाई के तीन-बिंदु युद्ध विराम के फामूर्ले पर सहमति जताई।

नवंबर 1962: चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की। अपने सैनिक एलएसी से 20 किमी पीछे हटाए।

अप्रैल 1962: पश्चिमी क्षेत्र में भारत के पूर्वी मोर्चे, तवांग और वालोंग पर बड़े पैमाने पर चीन का हमला। नेफा (एनईएफए) में बोमडिला पर कब्जा किया।

24 अक्तूबर, 1962: इस दिन तक पीएलए भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ कर चुकी थी। संघर्ष से पहले अधिकांश चीनी सेना नियंत्रण रेखा के दक्षिण में 16 किमी तक आगे बढ़ आई थी।

20 अक्तूबर, 1962: पीएलए ने लद्दाख में हमला कर चिप चैप घाटी, गलवान घाटी और पैंगोंग झील पर कब्जा किया। चीनियों ने अगस्त में ही गलवान चौकी को घेर लिया था, पर भारतीय सैनिकों तक मदद नहीं पहुंचाई गई।

दिसम्बर 1961: भारत ने अग्रिम सीमा रेखा पर चीनी सेना को रोकने के लिए अग्रिम नीति अपनाई और अपना क्षेत्र दोबारा हासिल करने तथा भविष्य में अतिक्रमण रोकने के लिए लद्दाख में प्रतीकात्मक चौकियां स्थापना कीं।

अक्तूबर 1961: चीन ने सीमा पर आक्रामक गश्त शुरू की। भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण कर सैन्य ढांचे बनाए।

फरवरी 1961: भूटान और चीन-सिक्किम सीमा विवाद पर वार्ता से चीन का इनकार। पश्चिमी चीन-भारत सीमा में 12,000 वर्ग मील पर कब्जा किया।

अप्रैल 1960: नई दिल्ली में झोउ एनलाई और जवाहरलाल नेहरू के बीच सीमा मुद्दे पर बैठक बेनतीजा रही। चीन ने भारत द्वारा प्रकाशित आधिकारिक रिपोर्ट, मानचित्र और सीमा से जुड़े दस्तावेजों को खारिज किया।

सितंबर 1959: चीन ने मैकमोहन रेखा को नहीं माना। झोउ ने कहा कि चीन ब्रिटिश भारत और इंग्लैंड के बीच 1842 की शांति संधि का हस्ताक्षरकर्ता नहीं था। सिक्किम व भूटान में करीब 50,000 वर्ग मील क्षेत्र पर दावा किया।

अप्रैल 1959: दलाई लामा ल्हासा से भारत भाग आए। उन्हें शरण देने पर चीन ने आपत्ति जताई।

जनवरी 1959: लद्दाख व एनईएफए (अब अरुणाचल प्रदेश) के करीब 40,000 वर्ग मील क्षेत्र पर झोउ का दावा।

मार्च 1955: भारत की उत्तरी सीमा के एक हिस्से को चीन ने आधिकारिक नक्शे में अपना बताया।

जुलाई 1954: नेहरू ने भारत के नक्शे में संशोधन का निर्देश देते हुए एक नोट लिखा कि सभी सीमाओं को निश्चित घेरे से दर्शाया जाए। हालांकि चीन ने अपने नक्शे में लगभग 1,20,000 वर्ग किमी भारतीय क्षेत्र को अपना दिखाया।

मई 1954: भारत-चीन पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर करने को तैयार हुए। भारत ने तिब्बत में चीनी शासन को स्वीकार किया। इसी समय नेहरू ने ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे को बढ़ावा दिया।

दिसंबर 1949: बर्मा के बाद पीपुल्स रिपब्लिक आॅफ चाइना को मान्यता देने वाला भारत दूसरा गैर-साम्यवादी देश।

1948-1950: सरदार वल्लभभाई पटेल के मंत्रालय ने भारतीय राज्यों के लिए दो श्वेत पत्र प्रकाशित किए। पहला श्वेत पत्र जुलाई 1948 में प्रकाशित हुआ, जिसमें दो नक्शे थे। पहले पत्र में पश्चिमी क्षेत्र में कोई सीमा नहीं थी। दूसरे में पूरे जम्मू-कश्मीर राज्य को पीले रंग में दिखाया गया, लेकिन ‘सीमा अपरिभाषित’ बताया गया। दूसरा श्वेत पत्र फरवरी 1950 में भारत के गणतंत्र बनने के बाद प्रकाशित हुआ। इसमें भी नक्?शे में सीमाएं अपरिभाषित थीं।

लद्दाख में दावा विवादास्पद क्यों?
आजादी के बाद अंग्रेजों ने संधियां भारत को हस्तांतरित कीं। मैकमोहन रेखा पर शिमला समझौते में ब्रिटिश भारत ने हस्ताक्षर किया। उस समय जम्मू-कश्मीर रियासत के लद्दाख प्रांत का अक्साई चिन ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं था, पर ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था। इस प्रकार, 1914 में पूर्वी सीमा अच्छी तरह से परिभाषित थी, पर पश्चिम में लद्दाख नहीं। जुलाई 1954 में नेहरू ने निर्देश जारी किया कि ‘इस सीमा से जुड़े सभी पुराने मानचित्रों की सावधानीपूर्वक जांच की जाए और जहां आवश्यक हो, इसे वापस लिया जाए।’ नए मानचित्र में उत्तरी व उत्तर-पूर्वी सीमाओं को बिना किसी संदर्भ ‘रेखा’ के दर्शाते हुए मुद्रित किया जाए। साथ ही, इन्हें विदेशों में स्थित अपने दूतावासों को भेजा जाए और जनता के समक्ष भी प्रस्तुत किया जाए और स्कूलों, कॉलेजों आदि में भी प्रयोग किया जाए। आधिकारिक रूप से आज तक यही मानचित्र इस्तेमाल किया जाता है। यही 1962 के युद्ध का कारण बना।

एलएसी और एलओसी से अलग कैसे है?
कश्मीर युद्ध के बाद 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से संघर्ष विराम हुआ। शिमला समझौते के आधार पर 1972 में इसे एलओसी नाम दिया गया। भारत-पाकिस्तान की सेनाओं के डीजीएमओ द्वारा हस्ताक्षरित एक नक्शे पर इसे अंकित किया गया है। कानूनी समझौते के तौर पर इसकी अपनी अंतरराष्ट्रीय शुचिता है। इसके विपरीत, एलएसी एक अवधारणा है। इस पर दोनों देशों के बीच सहमति नहीं है। न इसे मानचित्र पर अंकित किया गया है और न ही जमीन पर सीमांकन।

 गलवान नदी घाटी
अक्साई चिन के पास स्थित इस घाटी की खोज गुलाम रसूल गलवान के कश्मीरी मूल के लद्दाखी व्यक्ति ने की थी। 1899 में रसूल एक ब्रिटिश अभियान दल का हिस्सा था जो चांग चेनमो घाटी के उत्तरी क्षेत्रों में खोज कर रहा था। गलवान नदी सबसे ऊंची रिज लाइन है। इसी के पास श्योक दर्रा है। चीन को डर है कि भारत इस घाटी का उपयोग करके अक्साई चिन पर कब्जा न कर ले। भारत दोरबुक-श्योक गांव और दौलत बेग ओल्डी से होते हुए सड़क बना रहा है। श्योक नदी के किनारे से गुजरने वाली यह सड़क एलएसी के करीब सबसे महत्वपूर्ण संचार लाइन है, जो पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 के अंतर्गत आता है।   

वास्तविक नियंत्रण रेखा 
वास्तविक नियंत्रण रेखा एक सीमांकन है, जो भारतीय-नियंत्रित क्षेत्र को चीनी-नियंत्रित क्षेत्र से अलग करता है। भारत इसे 3,488 किमी लंबा, जबकि चीन करीब 2,000 किमी मानता है। इसे तीन क्षेत्रों में बंटा है- पूर्वी क्षेत्र में अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम, मध्य क्षेत्र में उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश तथा पश्चिमी क्षेत्र में लद्दाख आता है।

असहमति के बिंदु
  • पूर्वी क्षेत्र में एलएसी का संरेखण 1914 मैकमोहन रेखा के साथ है। उच्च हिमालयी जल-विभाजक सिद्धांत के अनुसार इसकी जमीनी स्थिति को लेकर मामूली विवाद हैं। इसका सरोकार भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा से भी है, लेकिन लोंग्जू और आसफिला जैसे कुछ क्षेत्रों के लिए। मध्य क्षेत्र में इस रेखा को लेकर सबसे कम विवाद है, लेकिन बाराहोती मैदानों में सटीक संरेखण का अनुपालन करना पड़ता है।
  •  सबसे अधिक असहमति पश्चिमी क्षेत्र में है। 1959 में चीनी प्रधानमंत्री झोउ एनलाई ने नेहरू दो पत्र लिखा, जिसमें एलएसी का उल्लेख किया। इसमें झोउ ने लिखा था कि एलएसी में ‘पूर्व में तथाकथित मैकमोहन रेखा और पश्चिम में जहां तक प्रत्येक पक्ष वास्तविक नियंत्रण रेखा का प्रयोग करता है’ शामिल है।
  • 1962 के युद्ध के बाद चीन ने दावा किया कि नवंबर 1959 में वह एलएसी से 20 किमी पीछे हट गया था।
  •  युद्ध के बाद नेहरू को लिखे एक अन्य पत्र में झोउ ने फिर एलएसी को स्पष्ट किया, ‘ठोस तौर पर कहें तो पूर्वी क्षेत्र में यह मुख्य रूप से कथित मैकमोहन रेखा के साथ मिलता है और पश्चिमी व मध्य क्षेत्रों में पारंपरिक व्यावहारिक रेखा के साथ मिलता है, जिसे चीन द्वारा लगातार इंगित किया गया है।’
  • 2017 में डोकलाम संकट के दौरान चीनी विदेश मंत्रालय ने भारत से ‘1959 एलएसी’ का पालन करने को कहा था।
एलएसी पर भारत की प्रतिक्रिया
भारत ने 1959 और 1962 में चीन की एलएसी की अवधारणा को नामंजूर कर दिया। युद्ध के समय भी नेहरू ने स्पष्ट कहा कि चीन जिसे ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ कहता है, उससे 20 किमी पीछे हटने के प्रस्ताव का कोई मतलब या अर्थ ही नहीं है। ‘नियंत्रण रेखा’ क्या है? क्या यह रेखा उन्होंने सितंबर की शुरूआत में आक्रामकता से बनाई है?

भारत ने कब स्वीकार किया?
चीनी प्रधानमंत्री ली पेंग 1991 में भारत यात्रा पर आए तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव के साथ एलएसी पर शांति व सद्भाव बरकरार रखने पर दोनों पक्ष सहमत हुए। भारत ने औपचारिक रूप से एलएसी की अवधारणा को स्वीकार किया, पर 1993 में राव के चीन दौरे के दौरान दोनों पक्षों ने एलएसी पर शांति और सद्भाव बरकरार रखने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। हालांकि एलएसी के संदर्भ को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया गया कि इसमें 1959 और 1962 के एलएसी का नहीं, बल्कि उस समय के एलएसी का उल्लेख है, जब समझौता हुआ था। कुछ क्षेत्रों पर मतभेद खत्म करने के लिए दोनों देश इस पर सहमत हुए कि सीमा मुद्दे पर संयुक्त कार्यदल एलएसी के संरेखण को स्पष्ट करेगा।

मैकमोहन रेखा
मैकमोहन रेखा चीन-भारत के बीच एक प्रभावी सीमा है। 3 जुलाई, 1914 को शिमला सम्मेलन में भारत-तिब्बत के हस्ताक्षर के बाद मैकमोहन रेखा अस्तित्व में आई। यह 550 मील यानी 890 किमी तक फैली हुई है, जिसमें पश्चिम में भूटान से 160 मील (260 किमी) पूर्व यानी ब्रह्मपुत्र नदी के कुछ हिस्से आते हैं। शुरू में भारत सरकार ने 1907 में एंग्लो-रूसी सम्मेलन के साथ शिमला (मैकमोहन रेखा के साथ) को असंगत करार देते हुए अस्वीकार कर दिया था।

यह भी जानें
  • मैकमोहन रेखा भारत और तिब्बत के बीच एक समझौता था, जिसमें चीन शामिल नहीं था।
  • मैकमोहन रेखा वार्ता के दौरान चीनी प्रतिनिधि इवान चान अधिकृत सदस्य नहीं थे।
  • अंतिम भारतीय गाँव बिशिंग, मैकमोहन रेखा के सबसे करीब है। यह चीन के तिब्बत क्षेत्र और अरुणाचल प्रदेश के बीच सीमा का निर्धारण करता है।
  • सीमांकन से पहले अरुणाचल प्रदेश का तवांग क्षेत्र दक्षिण तिब्बत के रूप में जाना जाता था।