चीनी एजेंडे पर भारतीय मीडिया

    दिनांक 24-जून-2020
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चीन के साथ सीमा विवाद को  लेकर  मीडिया का  एक  वर्ग लगातार भारत विरोधी  खबरें  परोस रहा है

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पिछले लगभग दो दशक में चीन ने भारतीय मीडिया के अंदर जो पैठ बनाई है, उसके परिणाम सामने आने लगे हैं। इस संवेदनशील समय में कई मीडिया संस्थान चीन की बोली बोल रहे हैं। वे चीन की तरफ से झूठी खबरें फैलाने से भी बाज नहीं आ रहे। पहले चाइनीज वायरस को लेकर रिपोर्टिंग में इसके लक्षण दिखाई दिए थे, अब लद्दाख में हुई झड़प के बाद तो मानो कुछ छिपाने को ही नहीं बचा है। सबको पता है कि कौन-कौन चीन के लिए काम कर रहा है। ‘एनडीटीवी’, ‘द वायर’ और ‘टेलीग्राफ’ का रवैया तो हमेशा से संदिग्ध रहा है, लेकिन कई और मीडिया संस्थानों ने बड़ी सफाई के साथ चीन का एजेंडा आगे बढ़ाया है। न्यूज18 ने तथाकथित सरकारी सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में बताया कि कैसे 15 और 16 जून की रात को विवाद शुरू हुआ था। इस एकतरफा रिपोर्ट को पढ़कर यही लगता है कि सूत्र भारत के नहीं, बल्कि चीन सरकार के हैं। इसमें बताया गया है कि चीन ने किस तरह से भारतीय सैनिकों को पीछे हटने को मजबूर कर दिया। लेकिन पूरी रिपोर्ट में आपको यह नहीं पता चलेगा कि जब भारतीय सैनिक हारकर पीछे हट रहे थे तो चीन को अधिक नुकसान आखिर कैसे हुआ? मीडिया का एक पूरा वर्ग यह झूठ फैला रहा था कि चीन के सैनिकों ने भारत का बड़ा इलाका अपने कब्जे में ले लिया है।

जमीन की लड़ाई के अलावा यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक युद्ध भी है, जिसमें लोगों के अंदर डर बिठाने और उन्हें भ्रमित करने का खेल खेला जाता है। अपनी सेना के नुकसान को खूब प्रचारित किया जाता है और दुश्मन को हुए नुकसान की बात भी नहीं की जाती। इससे जनता के मन में सरकार और सेना के प्रति अविश्वास पनपता है। दूसरी तरफ, कुछ चैनल हैं जो इस समय टीआरपी के लिए जनभावनाओं की फसल काटने में जुटे हैं। जब भी ऐसी स्थिति होती है, लोगों की भावनाएं उफान पर होती हैं। ऐसे में यह मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह उन्हें सही सूचनाएं दे, न कि इस मामले में अनर्गल प्रलाप करता रहे। ऐसा करके ही कुछ चैनल और कुछ पत्रकार अक्सर हंसी का पात्र बनते रहते हैं। इस प्रकरण में वामपंथी प्रभाव वाला विदेशी मीडिया भी चीन के पक्ष में ही माहौल बना रहा है। लेकिन ताइवान के अखबार ने ड्रैगन पर तीर चलाते भगवान राम की तस्वीर छापकर यह जता दिया कि पूरे पूर्वी एशियाई देशों में चीन के लिए किस हद तक नाराजगी है।

चाइनीज वायरस को लेकर भी मीडिया का अधकचरा व्यवहार जारी है। दिल्ली और मुंबई में बुरी स्थिति के बाद भी अखबार सरकार के समर्थन में प्रायोजित समाचारों से भरे पड़े हैं। दिल्ली में तो केंद्र सरकार को नियंत्रण अपने हाथ में लेना पड़ा। लेकिन दिल्ली के अखबारों और चैनलों से इस स्थिति का अंदाजा नहीं लग सकता। जिस दिन यह सब हुआ, उसी दिन टाइम्स आॅफ इंडिया ने दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री का साक्षात्कार छापा, जिसमें वह दावा कर रहे थे कि अब तक केंद्र सरकार उन्हें ज्यादा जांच नहीं करने दे रही थी। उधर ‘द प्रिंट’ नाम की प्रोपेगेंडा वेबसाइट ने अपने कोरोना संक्रमित रिपोर्टर को असम भेजा। बीमारी का पता चलने पर उसे पृथकवास में भेज दिया गया। गलती मानने के बजाय संपादक शेखर गुप्ता ने शोर मचाना शुरू कर दिया कि असम सरकार ने उनके रिपोर्टर को गिरफ्तार कर लिया है।

दिल्ली दंगों में पुलिस की जांच तेजी से आगे बढ़ रही है और अदालत में आरोपपत्र दाखिल हो रहे हैं। लेकिन मुख्यधारा मीडिया जानबूझकर इस समाचार पर पर्दा डाले हुए है, क्योंकि यह सब दिखाने पर उन झूठों की पोल खुलेगी जो दंगों के दौरान उन्होंने गढ़े थे। दंगों के आरोपियों और उनकी करतूत छिपाने का यह तरीका बताता है कि भारतीय मुख्यधारा मीडिया किस हद तक सांप्रदायिक और वैचारिक पूर्वाग्रहों से भरा हुआ है। उसकी रुचि दोषियों को सजा दिलाने में नहीं, बल्कि उन्हें बचाने में है।

 अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के समाचार पर भी खासतौर पर टीवी चैनलों ने वही किया जिसके लिए वे बदनाम हैं। उनके घर में घुसकर माता-पिता और रिश्तेदारों से तरह-तरह के सवाल पूछने से लेकर बिना कारण के षड्यंत्र की नई-नई कहानियां गढ़ने तक टीआरपी के लिए पतन के ढेरों कीर्तिमान बनाए गए। लेकिन जैसे ही यह बात सामने आने लगी कि आत्महत्या के पीछे फिल्मों के कुछ बड़े दिग्गज जिम्मेदार हैं, इस समाचार को उतरते देरी नहीं लगी। किसी कलाकार को उठाने और किसी को गिराने के खेल में मीडिया भी शामिल रहता है, इसलिए उसकी दिलचस्पी सुशांत सिंह राजपूत से हटते देरी नहीं लगी।