चीन का विरोध चरम पर

    दिनांक 24-जून-2020
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उमेश्वर कुमार
कोरोना संक्रमण फैलाने को लेकर चीन के प्रति गुस्सा तो पहले से ही था। अब लद्दाख सीमा पर उसने जो हरकत की है, उसके कारण जनभावनाएं उबाल पर हैं। आम उपभोक्ता से लेकर कारोबारी और सरकार ने भी चीनी सामान के बहिष्कार का फैसला कर लिया है

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कोलकाता में चीनी उत्पादों के बहिष्कार की मांग को लेकर प्रदर्शन करते लोग
 

दुनियाभर में चौतरफा घिरने के बाद चीन अपनी बौखलाहट भारत के समक्ष दिखा रहा है। उसने न केवल वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का उल्लंघन किया, बल्कि धोखे से भारतीय सैनिकों पर हमला किया, जिससे हमारे जवान वीरगति को प्राप्त हुए। इस घटना के बाद से भारत में चीन और चीनी उत्पादों के प्रति लोगों का विरोध मुखर होता जा रहा है। आम उपभोक्ता के साथ कारोबारी भी इसके विरोध में उतर आए हैं। वहीं, सरकार ने भी कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। बीएसएनएल के पुनर्जीवन में चीनी उपकरणों का उपयोग प्रतिबंधित कर दिया गया है। साथ ही, सरकार ने निजी क्षेत्र की टेलीकॉम कंपनियों से भी चीनी उपकरणों के प्रयोग से परहेज करने को कहा है।

दुनियाभर के देश कोविड-19 के फैलाव के लिए चीन को दोषी मान रहे हैं। इससे समूची दुनिया में न सिर्फ चीन के प्रति आक्रोश है, बल्कि लोग अब चीनी सामान से नफरत भी करने लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन के बहिष्कार की कवायद तेज हो गई है और चीन दुनिया में अगल-थलग पड़ता जा रहा है। आॅस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त बैरी ओ फेरेल ने एक कार्यक्रम में कहा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद नियम और तकाजे को लेकर स्थापित व्यवस्था का भारत और आॅस्ट्रेलिया पालन कर रहे हैं, लेकिन चीन ऐसा नहीं कर रहा। भारत में भी चीन विरोधी मुहिम जोर पकड़ रही है। सोशल मीडिया से लेकर बाजार तक में चीनी उत्पादों के खिलाफ माहौल है। आजादी के आंदोलन में जिस प्रकार विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई थी, गुजरात से वायरल वीडियो में ऐसा ही कुछ दिखा। लोग अपने घरों से चीन निर्मित टीवी सड़क पर नष्ट कर रहे हैं। इस तरह की खबरें देश के कोने-कोने से आ रही हैं। बड़ी संख्या में लोग गूगल पर यह पता लगा रहे हैं कि कौन सा सामान चीन में बना है, जिन्हें नहीं खरीदना है। चीनी उत्पाद के प्रति लोगों की सोच में आए बदलाव को लेकर देश में लगातार सर्वेक्षण भी हो रहे हैं।


चीन का विरोध

91 प्रतिशत भारतीय चाहते हैं चीनी माल का बहिष्कार हो

85 प्रतिशत लोग नहीं चाहते चीन से और निवेश

85 तिशत लोग नहीं चाहते भारत में चीनी कंपनी बनाए 5जी इंफ्रास्ट्रक्चर

83 प्रतिशत लोग रखते हैं चीन के बारे में प्रतिकूल सोच
(स्रोत - न्यूज18 ‘पब्लिक सेंटीमेंट्स आॅन चाइना’ सर्वे में देश की 13 भाषाएं बोलने वाले 31,000 लोग शामिल रहे)
 
चाइनीज माल के बहिष्कार से क्या होगा!
1905 में पूना के फर्ग्यूसन कॉलेज में वीर सावरकर ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी। उसके बाद उन्होंने पूरे जीवन स्वदेशी मोटा सूती कपड़ा पहना। उन दिनों कांग्रेसी उनका मजाक उड़ाया करते थे कि कपड़े जलाने से अंग्रेज भाग जाएगा क्या?  लेकिन 15 साल बाद 1920 में सावरकर से ही प्रेरणा लेकर गांधीजी ने विदेशी कपड़ों की होली जलाने का आह्वान किया था। उस आंदोलन से अंग्रेजी राज हिल गया, क्योंकि गुलामों ने पहली बार आत्मसम्मान के लक्षण दिखाए थे। इतिहास फिर से खुद को दोहरा रहा है। तब अंग्रेजी माल था, अब चाइनीज माल है। दुश्मन को सबक सिखाने का यह एक अहिंसक और असहयोगवादी तरीका हमारे पास है। जो सामान बहुत जरूरी है उसे लेने से कोई मना नहीं कर रहा, लेकिन जहां विकल्प है वहां स्वदेशी या किसी मित्र देश की कंपनी का उत्पाद चुनें। -चंद्रप्रकाश


चीनी सामान का विज्ञापन बंद हो

‘कैट’ ने कहा है कि दीपिका पादुकोण, रणबीर कपूर, आमिर खान, कैटरीना कैफ, विक्की कौशल, क्रिकेटर विराट कोहली सहित कई अन्य हस्तियां चीनी उत्पादों का विज्ञापन करती हैं। ‘कैट’ इन सभी से भेंट कर उन्हें देश की जनभावना से अवगत कराएगा। साथ ही, उनसे आग्रह करेगा कि वे ओप्पो, श्याओमी और वीवो सहित अन्य चीनी मोबाइल फोन के विज्ञापन न करें। ‘कैट’ का कहना है कि इन हस्तियों को देश की भावना की इज्जत करनी चाहिए। इनको चीन के खिलाफ जनभावना का साथ देना चाहिए।

‘रिमूव चाइना’ एप की धूम

चीनी सामान के खिलाफ जन आक्रोश का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ‘रिमूव चाइना’ एप के बाजार में आने के कुछ ही दिनों के भीतर 50 लाख से अधिक लोगों ने इसे डाउनलोड किया। बाद में नीतिगत नियमों का हवाला देते हुए गूगल ने इसे प्ले स्टोर से हटा दिया। इस एप और भारत में इसके सुपरहिट होने से चीन में खलबली मच गई थी। इस एप की मदद से आसानी से फोन से चीनी एप को हटाया या 'अनइंस्टाल' किया जा सकता था।


मेट्रो रेल में चीनी ठेके पर विरोध

चीन के खिलाफ जनमानस में इतना क्षोभ और विरोध है कि दिल्ली-मेरठ सेमी हाई स्पीड रेल कॉरिडोर का ठेका एक चीनी कंपनी के नाम होने का सोशल मीडिया पर पुरजोर विरोध हो रहा है। दिल्ली-मेरठ रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (आरआरटीएस) परियोजना में भूमिगत मार्ग बनाने के लिए सबसे कम रकम की बोली चीन की शंघाई टनल इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड ने लगाई है। स्वदेशी जागरण मंच ने भी मांग की है कि यह बोली तत्काल रद्द की जाए।


चीन से माल आयात करने वाले व्यापारियों ने भी सीधे तौर पर चीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। भारत सरकार ने भी एक के बाद एक ऐसे कदम उठाए हैं जिससे भारतीय कारोबार की रक्षा हो सके। इस कड़ी में एक फैसला है, टायरों पर 'एंटी डम्पिंग ड्यूटी' लगाना। इससे पहले एफडीआई के नियमों में भी बदलाव किए जा चुके हैं।

टेलीकॉम क्षेत्र से शुरू पाबंदी का सिलसिला
सीमा विवाद पर उपजे खूनी संघर्ष के बीच मोदी सरकार ने तत्काल प्रभाव से आर्थिक मोर्चे पर चीन को चोट देने का फैसला लेना शुरू कर दिया है। इसी के तहत दूरसंचार मंत्रालय के अधीन काम करने वाली कंपनी बीएसएनएल की 4जी तकनीक की स्थापना में चीन की कंपनियों को स्थान नहीं मिलेगा। सूत्रों ने बताया कि संचार मंत्रालय ने बीएसएनएल को इस बाबत निर्देश दे दिया है। साथ ही, इसे लेकर पूर्व में जारी निविदा को भी वापस लेने का फैसला लिया गया है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि बीएसएनएल की 4जी सेवा में चीनी कंपनियों का कोई दखल नहीं होगा। खस्ताहाल बीएसएनएल को पुनर्जीवित करने के किए जा रहे प्रयासों में 4जी की स्थापना भी शामिल है। हालांकि इसके लिए पहले निविदा जारी की जा चुकी थी लेकिन अब इन्हें फिर से जारी करने के निर्देश दिए गए हैं। चीनी उपकरणों पर सरकार के सख्त रवैये को देखते हुए 5जी के परीक्षण से भी चीनी दूरसंचार कंपनियों को बाहर किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि 5जी परीक्षण में चीन की कंपनी हुआवे को शामिल किया गया है, जिस पर अमेरिका में कई तरह की अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, दूरसंचार विभाग मोबाइल सेवा के क्षेत्र में चीन की कंपनियों पर निर्भरता कम करने के लिए गंभीरता से विचार कर रहा है। इसी क्रम में निजी क्षेत्र की दूरसंचार कंपनियों से चीनी उपकरणों पर निर्भरता कम करने को कहा गया है। अभी दूरसंचार कंपनियां धड़ल्ले से चीनी उपकरणों का उपयोग कर रही हैं। पहले भी चीन में बने उपकरणों के उपयोग को लेकर सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि चीन इन उपकरणों के जरिए भारत में जासूसी करता है। इसे लेकर चीनी कंपनी हुआवे और जेटीई कठघरे में है। माना जाता है कि इन कंपनियों में परोक्ष रूप से चीन की सरकार की हिस्सेदारी है। अमेरिका सहित कई अन्य यूरोपीय देशों में तो इन चीनी कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जा रहे हैं।

चीन को डेढ़ लाख करोड़ की चोट!

लद्दाख सीमा पर चीनी सैनिकों के साथ सैन्य टकराव के बाद चीनी सामानों के बहिष्कार को लेकर देश के कारोबारियों का संगठन कंफेडरेशन आॅफ आॅल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) खुलकर सामने आया है। ‘कैट’ ने चीनी उत्पाद के बहिष्कार के लिए ‘भारतीय सामान-हमारा अभिमान’ अभियान शुरू किया है। ‘कैट’ ने पहले चरण में चीन से आयात होने वाले करीब 3 हजार उत्पादों की सूची बनाई है। इसमें रोजमर्रा में काम आने वाली वस्तुओं, खिलौनों से लेकर, कपड़ा, बिल्डर हार्डवेयर, फुटवियर, रसोई के सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स, हैंड बैग, कॉस्मेटिक्स, फैशन के सामान, घड़ियां, फर्नीचर, आॅटो पार्ट्स, दिवाली और होली का सामान, चश्मा आदि वस्तुओं को शामिल किया गया है। फिलहाल, 500 वस्तुओं की सूची जारी की गई है।

इन वस्तुओं के आयात न होने से भारत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह सारी चीजें भारत में पहले से ही बनाई जा रही हैं। कैट का लक्ष्य दिसंबर 2021 तक चीन से होने वाले आयात में लगभग 13 अरब डॉलर यानी 1.5 लाख करोड़ रुपये की कमी लाने का है। ‘कैट’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया और राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि अभी चीन से सालाना करीब 5.25 लाख करोड़ रुपये का आयात होता है। उन्होंने कहा कि हमने पहले चरण में करीब 3 हजार वस्तुओं को शामिल किया है। इससे चीन पर भारत की निर्भरता कम होगी। फिलहाल जिन वस्तुओं में तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है, उन्हें इस सूची में शामिल नहीं किया गया है।

रबर टायर के आयात पर पाबंदी
सरकार ने भी चीन की नकेल कसने के लिए एक के बाद एक कई कड़े निर्णय लिए हैं। इस कड़ी में सबसे पहले एफडीआई नियमों में बदलाव किया गया, जिससे चीन अब स्वचालित मार्ग से भारत में बड़ा निवेश नहीं कर सकेगा। इसी के साथ, सरकार ने रबर टायरों के आयात पर भी पाबंदी लगा दी है। इससे 20 देशों से होने वाले टायर आयात पर असर पड़ेगा, जिनमें थाईलैंड और चीन से आने वाले टायर भी शामिल हैं। पाबंदी के तहत आयातक के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा, इसके बिना वे टायर का आयात नहीं कर पाएंगे। जिन वाहनों के टायरों पर पाबंदी लगी है, उनमें मोटरकार, रेसिंग कार, यात्री कार, बस, मोटरसाइकिल और साइकिल शामिल हैं। हालांकि इसमें ट्रक के टायर शामिल नहीं हैं। टायर बाजार के विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के पास ऐसे कौन से संसाधन हैं जो भारत के पास नहीं हैं। हम चाहते हैं कि भारत में सफलता से इनका उत्पादन हो और हम इतना मजबूत हों कि बाजार में चीनी माल रहने के बाद भी ग्राहक उसे नहीं खरीदे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो फैसला लिया है, उससे हमारे उद्योगों को प्रतियोगी बनने के लिए समय मिलेगा। लाइसेंस नीति बन जाने के बाद अब कोई भी व्यक्ति आसानी से टायरों का आयात नहीं कर सकेगा। बहुत संभव है कि नई व्यवस्था में टायर सस्ते न रहें, लेकिन लेकिन इससे भारतीय उत्पाद को बढ़ावा मिलेगा।

कारोबारियों का मानना है कि नई व्यवस्था में भारतीय कंपनियों को बहुत लाभ मिलेगा। ग्राहकों को भी फायदा होगा, क्योंकि भारतीय टायर की गुणवत्ता चीन से बेहतर है। हालांकि चीनी उत्पाद सस्ते हैं, लेकिन गुणवत्ता के मामले में ये भारतीय उत्पादों के आगे नहीं टिकते। भारतीय उद्योग को बढ़ावा देने के लिए यह बहुत अच्छा अवसर है। ग्राहकों के लिए भी यह अच्छा है, क्योंकि उसे अच्छी गुणवत्ता वाला स्वदेशी माल मिलेगा। भारतीय कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार जो कदम उठा रही है, वह सराहनीय है। ‘मेक इन इंडिया’ से अर्थव्यवस्था को फायदा होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि थाईलैंड या वियतनाम के रास्ते टायर भारत भेजने पर चीनी कंपनियों को नुकसान होगा। (लेखक वरिष्ठ अर्थविश्लेषक हैं)