चीन में जारी है सत्ता संघर्ष

    दिनांक 24-जून-2020   
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ऐसा माना जा रहा है कि गलवान के संघर्ष के पीछे चीन का अंदरूनी सत्ता संघर्ष है। प्रधानमंत्री ली केकियांग और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच आर्थिक नीतियों को लेकर काफी मतभेद हैं। इससे जनता का ध्यान हटाने के लिए गलवान विवाद शुरू किया गया है

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चीन में सत्ता के दो बड़े चेहरे (बाएं से) राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली केकियांग


गलवान घाटी में चीनी सेना की उकसावापूर्ण कार्रवाई से चीन के मोहल्लों की छोटी दुकानों का सीधा संबंध हो सकता है? ऊपरी तौर पर भले ही यह बात अटपटी लगे, लेकिन चीनी सेना की खूनी कार्रवाई के महज दो हफ्ते पहले से ही चीन के सर्वोच्च सत्ता शिखर पर मोहल्ले की दुकानों के मुद्दे को लेकर राजनीतिक विवाद चल रहा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग ने एक जून को शैंडोंग प्रांत के तटीय शहर यांताई में ‘स्ट्रीट स्टाल्स’ के नाम से प्रचलित मोहल्ले की कुछ दुकानों का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने इन दुकानों को रोजगार का न सिर्फ महत्वपूर्ण स्रोत बताया, बल्कि चीन का प्राण भी कहा था। यांताई की ही एक किराना दुकान पर केकियांग ने कहा, ‘‘यदि हर व्यक्ति कड़ी मेहनत करेगा तो कारोबार न सिर्फ जिंदा रहेगा, बल्कि मजबूत भी होगा और वह देश के विकास में और ज्यादा योगदान देगा।’’

देखने में यह बेहद सामान्य बात लगती है। लेकिन जिन्हें चीन की अंदरूनी राजनीति की समझ है, उन्हें पता है कि केकियांग का यह बयान सामान्य नहीं है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष पर पहुंचने के बाद से लागू आर्थिक सुधारों ने ‘स्ट्रीट स्टाल’ को खत्म कर दिया। चीन ने निर्यात आधारित उत्पादन पर जोर देकर अपनी अर्थव्यवस्था को वैश्विक ताकत बनाने की कोशिश की है। लेकिन कोरोना संकट के वक्त में चीन की अर्थव्यवस्था को भी गहरा झटका लगा है। चूंकि जापानी, दक्षिण कोरियायी और कई अमेरिकी कंपनियों ने अपने उत्पादन और कारोबार को कोरोना संकट के बाद समेटना शुरू कर दिया है, इसलिए केकियांग को अपनी आर्थिक नीतियों को बढ़ावा देने का मौका हाथ लग गया है।

केकियांग, शी जिनपिंग से सिर्फ एक साल छोटे हैं। दो साल पहले मार्च में राष्ट्रपति पद के लिए दो कार्यकाल की वैधता को खत्म करने वाले संवैधानिक सुधार को चीन की सर्वोच्च संसद ‘नेशनल पीपुल्स कांग्रेस’ ने दो तिहाई बहुमत से मंजूरी दी थी। इस संशोधन को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सात सदस्यीय शीर्ष स्थायी समिति ने पहले ही मंजूरी दे दी थी। तब से ली केकियांग के मन में एक बात खटक रही है कि वे सर्वोच्च पद हासिल नहीं कर सकते। तब केकियांग भले ही चुप रह गए हों, लेकिन कोरोना संकट ने उन्हें मुखर होने का मौका दे दिया है। इसकी वजह यह है कि चीन में बेरोजगारी दर बढ़ कर 20 प्रतिशत को पार कर गई है। इससे देश में अफरातफरी का माहौल है। चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के मुताबिक चीन में करीब एक अरब चालीस करोड़ कार्यबल है। लेकिन इनमें से ज्यादातर हिस्सा सूक्ष्म, छोटे और मझोले उद्योगों या कारोबार में काम करते हैं। ब्यूरो के मुताबिक इनमें से करीब साठ करोड़ लोगों की कमाई राष्ट्रीय औसत से भी कम है।

ली केकियांग की लोकप्रियता बढ़ रही है। खासकर ग्रामीण, निम्न और मध्य वर्गीय चीनी समाज में उन्हें नायक की तरह देखा जाने लगा है। यहीं से शी जिनपिंग खेमे की चिंता बढ़ी है। इसलिए ‘स्ट्रीट स्टाल’ यानी मोहल्ले की दुकान आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के उनके विचार का विरोध शुरू हो गया है। कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो, उसकी प्रचार टीम आदि ने अपने ही प्रधानमंत्री के बयान की परोक्ष रूप से काट शुरू की है। इस विरोध के पीछे राष्ट्रपति शी जिनपिंग की शह मानी जा रही है।

चीन की चमकती अर्थव्यवस्था की कहानियां पूरी दुनिया में गाई जाती रही हैं। लेकिन यह भी सच है कि वहां संपत्ति का असमान वितरण हुआ है। दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था में करीब साठ करोड़ लोगों की मासिक आमदनी एक हजार युआन या उससे भी कम है। यह रकम अमेरिकी मुद्रा में करीब 142 डॉलर बैठती है। यहां यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि चीन की आधी से कुछ ज्यादा ही आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है।

कोरोना संकट काल में उत्पादन में कमी आई है, कारोबार समेटा जाने लगा है, विदेशी निवेश में गिरावट तय है। लिहाजा केकियांग ने ‘स्ट्रीट स्टाल’ अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का सूत्र दिया है। यह सूत्र कुछ वैसा ही है, जैसे अपने देश में खेती-किसानी और मनरेगा के जरिए आर्थिक कहानी बदलने की कोशिश हो रही है। ली केकियांग के आर्थिक गुरु ली यीनिंग भी मानते हैं कि ‘स्ट्रीट स्टाल’ देश की अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकता है।

अब सवाल उठता है कि ली केकियांग के इस प्रस्ताव पर विवाद क्यों हो रहा है? बेशक चीन अब भी वामपंथी लौह आवरण में बंद है, लेकिन तकनीकी विस्तार ने लोगों को नई-नई राह भी दे दी है। चीन के लोग भी दुनिया के बदलावों को जानने-समझने लगे हैं। इसलिए वहां भी जागरूकता तो आई ही है। ली केकियांग की लोकप्रियता भी बढ़ रही है। खासकर ग्रामीण, निम्न और मध्य वर्गीय चीनी समाज में उन्हें नायक की तरह देखा जाने लगा है। यहीं से शी जिनपिंग खेमे की चिंता बढ़ी है। इसलिए ‘स्ट्रीट स्टाल’ यानी मोहल्ले की दुकान आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के उनके विचार का विरोध शुरू हो गया है। इसके खिलाफ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बीजिंग म्यूनिसिपल कमेटि के मुख पत्र ‘बीजिंग डेली’ ने पहल की है। उसने छह जून को  मोहल्ले की दुकानों को ‘अस्वच्छ और असभ्य’ तो कहा ही, उन्हें राजधानी बीजिंग के लिए अनुपयुक्त भी बताया। इसे लेकर बयानबाजी का दौर बढ़ गया है। कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो, उसकी प्रचार टीम आदि ने अपने ही प्रधानमंत्री के बयान की परोक्ष रूप से काट शुरू की है। इस विरोध के पीछे राष्ट्रपति शी जिनपिंग की शह मानी जा रही है। यहां यह बताना जरूरी है कि जिनपिंग बीजिंग से ही प्राथमिक सदस्य हैं।

शी जिनपिंग ने नए सुधारों का जो नारा दिया, बेशक वह कुछ साल पहले तक लोकप्रिय रहा। इन्हीं सुधारों में वे ताइवान और हांगकांग के चीन में एकीकरण की भी वकालत करते हैं। लेकिन हांगकांग के लोग कम्युनिस्ट चीन में पूर्ण एकीकरण के विरोध में हैं। उसे वैश्विक जनमत का भी साथ मिल रहा है। कोरोना संकट के लिए दुनिया का बड़ा हिस्सा चीन को जिम्मेदार मान ही चुका है। इसलिए माना जा रहा है कि चीनी लोगों का ध्यान भटकाने के लिए चीन ने सीमा पर तनाव बढ़ाने में योगदान दिया। गलवान घाटी के दंगल में चीन के कितने सैनिक हताहत हुए हैं, इसकी आधिकारिक जानकारी चीन ने अभी तक नहीं दी है। इसलिए एक मान्यता यह भी है कि चीन को जानी नुकसान ज्यादा हुआ है। बहरहाल, भारत में जिस तरह चीनी उत्पादों के बहिष्कार का आंदोलन बढ़ने लगा है, उससे चीन की जनता परेशान हो सकती है। उसे अपना रोजगार एक बार फिर छीनता हुआ दिख सकता है। शायद यही वजह है कि चीन सरकार तथ्यों को जाहिर नहीं कर रही है। तीन साल पहले डोकलाम में भले ही चीनी सेना के साथ खूनी संघर्ष नहीं हुआ था, लेकिन उस तनाव को भी शी जिनपिंग की अगली ताजपोशी की रणनीति के तौर पर देखा गया था। इसके बाद ही जिनपिंग न सिर्फ दोबारा राष्ट्रपति चुने गए, बल्कि उनके आजीवन राष्ट्रपति रहने के लिए संवैधानिक सुधार को मंजूरी भी मिली।

अब सवाल यह उठ सकता है कि क्या भारत सरकार को इन तथ्यों की जानकारी नहीं थी? हालांकि कोई कारण नहीं है कि उसे इन तथ्यों की जानकारी न हो। बहरहाल, भारत को इन तथ्यों के आलोक में अपनी अगली रणनीति तय करनी होगी। इस मोर्चे पर सेना और रणनीतिकार फैसले लेंगे ही, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर चीन की नस को दबाना ज्यादा आसान है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)