25 जून जब आतंकवादियों ने स्वयंसेवकों पर बरसा दी थीं गोलियां, 25 स्वयंसेवक हुए थे बलिदान

    दिनांक 25-जून-2020
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25 जून, 1989, मोगा के नेहरू पार्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा पर आतंकियों ने हमला कर दिया था। इस दौरान 25 स्वयंसेवकों का बलिदान हो गया था, लेकिन अगले ही दिन स्वयंसेवकों ने वहां फिर से शाखा लगाई और सबको दिखा दिया कि संघ के स्वयंसेवक अलग ही मिट्टी के बने होते हैं

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मोगा शहर के इतिहास में 25 जून, 1989 का दिन एक ऐसा दिन आया जिसने दुनिया को दिखा दिया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी ओर ही मिट्टी का बना है। इस दिन नेहरू पार्क (अब शहीदी पार्क) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा पर आतंकियों ने हमला कर 25 स्वयंसेवकों व नागरिकों को शहीद कर दिया। सुबह के समय चहल-पहल के दौरान हुई इस घटना के बाद एक दम हर तरफ मातम पसर गया, जिसने आंखों से यह मंजर देखा वह उसे आज तक नहीं भुला सका। यदि उक्त घटना का इतिहास पढ़ा जाये तो पढऩे वाला भी कांप उठता है।
इस घटना के बारे में शहीद स्मार्क से जुड़े पदाधिकारी डॉ. राजेश पुरी बताते हैं कि आतंकवादियों ने संघ का ध्वज उतारने के लिए कहा था, पर स्वयंसेवकों ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया और उनको रोकने का यत्न किया था, पर किसी की बात न सुनते हुए आतंकवादियों ने अंधाधुंध फायरिंग करनी शुरू कर दी थी, जिसमें 25 कीमती जानें गई थीं। इस घटना ने न केवल पंजाब में हिंदू-सिख एकता को नवजीवन दिया बल्कि आतंकवाद पर भी गहरी चोट की क्योंकि घटना के अगले ही दिन उस जगह दोबारा शाखा लगी जिससे आतंकियों के हौसले पस्त हो गए और हिंदू-सिख एकता जीत गई।
25 जून, 1989 को अब शहीदी पार्क में रोजाना ही भारी तदाद में शहर निवासी सैर सपाटे के लिए आये थे। रोजाना की तरह उस दिन भी जहां शहरी पार्क में सैर का आनंद ले रहे थे, वहीं दूसरी तरफ शाखा भी लगी हुई थी। इस दिन शहर की सभी शाखाएं नेहरू पार्क में एक जगह पर लगी थीं और संघ का एकत्रीकरण था। सुबह 6 बजे संघ का विचार शुरू हुआ तो अचानक 6.25 पर सभा को संबोधित कर रहे स्वयंसेवकों पर आतंकवादियों ने आकर हमला कर दिया, हर तरफ भगदड़ मच गई। गोलियों की बरसात रुकने के बाद हर तरफ खून का तालाब दिखाई दे रहा था। घायल स्वयंसेवक तड़प रहे थे। गोलियां लगने कारण कई सेवकों का शरीर भी बेजान हो गये और कईयों ने अस्पताल में जाकर अंतिम सांस ली। इस गोली कांड दौरान जहां 25 लोग शहीद हो गए, वहीं शाखा में शामिल लोगों के साथ कई आसपास के 31 के करीब लोग घायल भी हो गए थे। इस गोली कांड ने पूरे शहर को हिलाकर रख दिया था लेकिन फिर भी आरएसएस सेवकों ने हिम्मत नहीं छोड़ी और अगले ही दिन 26 जून, 1989 को फिर से शाखा लगाई। बाद में नेहरू पार्क का नाम बदल कर शहीदी पार्क कर दिया गया, जो आज देशभक्तों के लिए तीर्थस्थान बना हुआ है।
जो शहीद हुए
इस गोली कांड में शहीद होने वालों में सर्वश्री लेखराज धवन, बाबू राम, भगवान दास, शिव दयाल, मदन गोयल, मदन मोहन, भगवान सिंह, गजानंद, अमन कुमार, ओमप्रकाश, सतीश कुमार, केसो राम, प्रभजोत सिंह, नीरज, मुनीश चौहान, जगदीश भगत, वेद प्रकाश पुरी, ओम प्रकाश और छिंदर कौर (पति-पत्नी), डिंपल, भगवान दास, पंडित दुर्गा दत्त, प्रह्लाद राय, जगतार राय सिंह, कुलवंत सिंह शामिल हैं। गोली कांड में प्रेम भूषण, राम लाल आहूजा, राम प्रकाश कांसल, बलवीर कोहली, राज कुमार, संजीव सिंगल, दीना नाथ, हंस राज, गुरबख्श राय गोयल, डॉ. विजय सिंगल, अमृत लाल बांसल, कृष्ण देव अग्रवाल, अजय गुप्ता, विनोद धमीजा, भजन सिंह, विद्या भूषण नागेश्वर राव, पवन गर्ग, गगन बेरी, राम प्रकाश, सतपाल सिंह कालड़ा, करमचंद औेर कुछ अन्य स्वयं सेवक घायल हुए थे।

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जब निहत्थे दंपति ने आतंकियों को ललकारा
इस कांड की मिली जानकारी अनुसार गोली कांड बाद छोटे गेट से भाग रहे आतंकवादियों को वहां मौजूद एक साहसी पति-पत्नी ओम प्रकाश और छिंदर कौर ने बड़े जोश से ललकारा और पकडऩे की कोशिश की पर एके-47 से हुई गोलीबारी ने उनको भी मौत की नींद सुला दिया और साथ ही आतंकवादियों को पकड़ते समय पास के घरों के पास खेल रहे 2-3 बच्चों में से डेढ़ साल की डिंपल को भी मौत ने अपनी तरफ खींच लिया।
मौत का मंजर सामने होने के बावजूद भी डटे स्यवंसेवक
इस कांड को देखने वाले एक और अन्य स्वयंसेवक बताते हैं कि कि जब सभा हो रही थी तो अचानक पिछले गेट से भागदौड़ की आवाज सुनाई दी पता चला कि हां से आतंकी अंदर घुस आए हैं बावजूद इसके कोई भागा नहीं और उनका डटकर सामना किया।
ध्वज न उतारने पर आतंकवादियों ने किया था फायर
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आतंकवादियों ने आते ही सभा में स्वयंसेवकों से ध्वज उतारने के लिए कहा लेकिन स्वयंसेवकों से साफ मना कर दिया। इस पर आतंकवादियों ने अंधाधुंध फायरिंग करनी शुरू कर दी।
10 साल की उम्र में देखा मौत का मंजर
10 साल की उम्र में गोलीकांड आंखों से देखने वाले एक नौजवान नितिन जैन ने बताया कि उनका घर शहीदी पार्क के बिल्कुल सामने था तथा रविवार का दिन होने के कारण वह सुबह पार्क में चला गया तथा जैसे ही आतंकवादियों ने धावा बोलकर गोलियां चलानी शुरू कीं तो वह धरती पर लेट गया तथा जब आतंकवादी भाग रहे थे तो सभी ने उनको पकडऩे की कोशिश की तथा मैं भी इसको खेल समझकर भागने लगा, तो एक व्यक्ति ने उसको पकडक़र घर भेजा।
दंगा चाहने वाले भी हुए निराश
ये दिन वे थे जब अभी दिल्ली सहित देश के सिख विरोधी दंगों की आग में अभी तपिश जारी थी। आतंकियों ने तो संघ पर हमला कर हिंदू-सिख एकता में दरार डालने का प्रयास किया ही साथ में कुछ दंगा संतोषियों ने भी कहना शुरू कर दिया कि सिखों ने अब लगाया है शेर की पूंछ को हाथ। संघ ने न तो देश में सांप्रदायिक माहौल खराब होने दिया और अगले ही दिन शाखा लगा कर आतंकियों व देशविरोधी ताकतों को संदेश दिया कि हिंदुओं-सिख एकता को कोई तोड़ नहीं सकता और न ही सिख पंथ के नाम पर चलने वाला आतंकवाद पंजाबी एकता को तोड़ सकता।
25 जून के अगले दिन संघ के स्वयंसेवक गीत गा रहे थे कि कौन कहंदा हिंदू-सिख वक्ख ने, ए भारत मां दी सज्जी-खब्बी अक्ख ने’ अर्थात कौन कहता है कि हिंदू-सिख अलग-अलग हैं, ये तो भारत माता की बाईं और दाईं आंख के समान हैं। संघ के इस गीत को सुन कर आतंकियों ने भी माथा पीट लिया था।
नेहरू पार्क से शहीदी पार्क की हुई स्थापना
अगली ही सुबह जब स्वयंसेवकों की ओर से शाखा का आयोजन किया तो उस दौरान शहीदों की याद को जीवित रखने के लिए शहीदी स्मारक बनाने का संकल्प लिया गया। इस कार्य अधीन मोगा पीड़ित मदद और स्मारक समिति का गठन हुआ। शहीदी स्मारक का नींवपत्थर 9 जुलाई को माननीय भाऊराव देवरस द्वारा रखा गया। इस स्मारक का उद्घाटन 24 जून, 1990 को रज्जू भैया द्वारा किया गया। आज भी हर साल शहीदों की याद में श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जाता है। आज भी मोगा पीड़ि़त मदद और स्मारक समिति के प्रधान डॉ. राजेश पुरी और अन्य अधिकारियों के सहयोग से अपनी, सेवाएंं निभा रहे हैं।