45 वर्ष पूर्व आज ही के दिन देश को आपातकाल की आग में झोंक दिया गया था

    दिनांक 25-जून-2020   
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आपातकाल को 45 वर्ष पूरे हो गए. आज भी लोग आपातकाल की उस भयावहता को भूला नहीं पाए हैं. आपातकाल  लागू कर संविधान का गला घोंटने का प्रयास किया गया था. प्रेस की आजादी पर भी हमला किया गया था. आपातकाल की पृष्ठभूमि समाजवादी नेता राज नारायण की चुनाव याचिका से जुड़ी है.

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आपातकाल को 45 वर्ष पूरे हो गए. आज भी लोग आपातकाल की उस भयावहता को भूला नहीं पाए हैं. आपातकाल  लागू कर संविधान का गला घोंटने का प्रयास किया गया था. प्रेस की आजादी पर भी हमला किया गया था. आपातकाल की पृष्ठभूमि समाजवादी नेता राज नारायण की चुनाव याचिका से जुड़ी है. राज नारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा गांधी के निर्वाचन के खिलाफ चुनाव याचिका दाखिल की थी. 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द कर दिया था. 24 जून को इंदिरा गांधी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. मगर सुप्रीम कोर्ट से उन्हें कुछ ख़ास राहत नहीं मिल पाई थी. इसके बाद इंदिरा गांधी ने त्याग पत्र देने के बजाय पूरे देश को आपातकाल की आग में झोंक दिया था.  

 

विधान सभा अध्यक्ष उत्तर प्रदेश,  हृदय नारायण दीक्षित आपातकाल को आज भी नहीं भूल पाए हैं. वे बताते हैं कि “तत्कालीन प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी  द्वारा अपनी सत्ता को बचाये रखने के लिए संविधान का दुरूपयोग किया गया था. श्रीमती गांधी को यह प्रेरणा हिटलर द्वारा 1933 में जर्मनी में लगाई गई इमरजेंसी से प्राप्त हुई थी. भारत में लगाये गये आपातकाल के समय विचार स्वतंत्रता का गला घोंट दिया गया था. प्रेस के साथ उत्पीड़न हुआ था. समूचे देश में पुलिस राज था. हजारों लोग जेल में डाल दिये गये थे.  लगभग पौने दो साल तक तानाशाही अपने चरम पर थी.”


मैं डेढ़ घंटे के अन्दर ही मान्यवर हो गया था -- हृदय नारायण दीक्षित

 अध्यक्ष विधान सभा श्री दीक्षित अपना  रोचक अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि “ वह पूरे आपातकाल के दौरान उन्नाव जेल में रहे. इसी अवधि में लोकसभा के चुनाव हुए. चुनाव नतीजे आकाशवाणी पर सुनने के लिए उनके पास एक छोटा ट्रांजिस्टर था. रात के 3 बजे जेलर आया उसने मुझे डांटा, अपशब्द कहे. करीब साढ़े 5 बजे भोर में प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने इस्तीफा दिया. साढ़े 6 बजे जेलर फिर आया उसने कहा कि सबको बधाई हो. आपकी सरकार बनने जा रही है. मैं डेढ़ घण्टे के भीतर ही  मान्यवर हो गया था.”


उल्लेखनीय है कि वर्ष 1971 में रायबरेली लोकसभा सीट पर राज नारायण , इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़े थे.  इंदिरा गांधी से चुनाव हारने के बाद राज नारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की थी. याचिका में कहा गया था कि इंदिरा गांधी ने सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया. इनका चुनाव रद्द किया जाना चाहिए.  इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस मुकदमे की सुनवाई जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने की. जस्टिस सिन्हा ने 12 जून 1975 को चुनाव याचिका को स्वीकार कर लिया और इंदिरा गांधी का निर्वाचन  रद्द कर दिया.  जब फैसला इंदिरा गांधी के खिलाफ में आया तब उन्होंने नैतिकता के आधार पर त्याग पत्र देने के बजाय  यह तय किया कि किसी भी तरह वह सत्ता में बनीं रहेंगी. इसके लिए  आनन - फानन में इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. इंदिरा गांधी चाहती थीं कि सुप्रीम कोर्ट उस फैसले पर तुरंत स्थगन आदेश पारित कर दे मगर ऐसा हो ना सका. सुप्रीम कोर्ट ने स्थगन आदेश तो दिया मगर वह आंशिक स्थगन आदेश था. 24  जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि "इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के तौर पर सदन में जा सकती हैं मगर उन्हें लोकसभा सांसद के तौर पर वोट देने का अधिकार नहीं होगा.”


इंदिरा गांधी जो चाह रहीं थीं. वह नहीं हो पाया. सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिल पाई.  इसके बाद इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को दिन में करीब साढ़े तीन बजे सिदार्थ शंकर रे  समेत कई अन्य कानून के जानकारों के साथ विचार - विमर्श किया. विमर्श के बाद इंदिरा गांधी ने  आपातकाल लागू करने का फैसला कर लिया.  25 जून की रात तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली के हस्ताक्षर के साथ ही आपातकाल लागू हो गया. अगले दिन 26 जून 1975 को रेडियो पर इसकी औपचारिक घोषणा कर दी गई. 
 

एक तरीके से देखा जाय तो आपातकाल ने इस देश की राजनीति को दो हिस्से में बाँट दिया. पहला हिस्सा आपातकाल के पहले का है और दूसरा हिस्सा आपातकाल के बाद का.   आपातकाल लागू हो जाने के बाद इंदिरा गांधी लगातार दमन चक्र चला रहीं थीं. लोक नायक जय प्रकाश नारायण , अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी सरीखे नेताओं को जेल  में डाल दिया गया था.  मगर आपातकाल के बाद यह सभी लोग भारतीय राजनीति के पटल पर बड़े नेता के तौर पर उभरे. आपातकाल ने कांग्रेस एवं अन्य दलों के बीच एक ऐसी पत्थर की लकीर खींच दी जो आज तक मिट नहीं पाई.


तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दर कुमार गुजराल को कांग्रेस बाहर से समर्थन दे रही थी. गुजराल ने प्रकाश सिंह बादल से बातचीत करके उन्हें अपने साथ मिलाने की कोशिश की थी. इन्दर कुमार गुजराल ने लोकसभा में कहा था कि "मैं चाहता था कि प्रकाश सिंह बादल हम लोगों के साथ आयें मगर उन्होंने कहा कि हम लोग इमरजेंसी के खिलाफ लड़ कर आये हैं और आप कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रहे हैं इसलिए हम आपके साथ नहीं आ सकते.” गौर करने लायक बात यह है कि इतना समय बीत जाने के बाद भी अन्य राजनीतिक दलों के नेता कांग्रेस के उस कृत्य को भूल नहीं पाए. शायद कभी भूल भी नहीं पाएंगे.