पाकिस्तान में फिर भड़का सिंधुदेश का शोला

    दिनांक 25-जून-2020   
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सिंधुदेश की मांग को पाकिस्तान छोड़कर भारत सहित दुनिया के विभिन्न हिस्से में बसे सिंधियों का भी भरपूर समर्थन प्राप्त है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत की अपनी विशिष्ट संस्कृति और सूफीवाद के लिए वैश्विक स्तर पर अलग पहचान है।

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पाकिस्तान में ‘सिंधुदेश’ का लावा फिर शोला बनकर धधक उठा है। इसके चलते अलगाववादियों एवं सेना के बीच सीधा संघर्ष शुरू हो गया है। इमरान खान सरकार से कोरोना संक्रमण और इससे उपजी बदहाली नहीं संभल पा रही। बीस करोड़ की आबादी वाले इस छोटे से देश में संक्रमितों की संख्या दो लाख के पार पहुंच गई है। इस बीच पृथक सिंधुदेश की मांग करने वालों के अचानक सक्रिय हो जाने से प्रधानमंत्री इमरान खान के हाथ-पांव फूल गए हैं। स्थिति है कि हाल में सिंधुदेश के लिए संघर्षरत आंदोलनकारी संगठन सिंधुदेश लिब्रेशन आर्मी ने सिंध के कारोबारी शहर कराची, घोटकी और लरकाना में ताबड़ तोड़ तीन धमाके कर सरकार को अहसास करा दिया कि यह सिलसिला अब थमने वाला नहीं। इन धमाकों में सेना के तीन जवान सहित कुल चार लोग मारे तथा करीब 20 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।


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इन धमाकों के बाद से पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा एजेंसियां लगातार इस कोशिश में हैं कि किसी तरह अलगाव वादियों को ठंडा किया जाए। इसके लिए सिंध प्रांत में भी बलूचिस्तान की तरह दमनकारी नीति अपनाई जा रही है। रोजाना सिंध प्रांत के विभिन्न हिस्से से सेना द्वारा युवाओं को उठाने की खबरें आ रही हैं। मानवाधिकार संगठन ‘साथ फोरम’ की मानें तो सप्ताहभर में सिंध के अलग-अलग हिस्से से सिंधुदेश के लिए सक्रिय कार्यकर्ता अयातुल्लाह जरवर,मुख्तियार बुजदार, जब्बार सरकी, सईद मांगी, बाबर सोलांगी और किफायत जटाई को सुरक्षा एजेेंसियों ने उठाकर न जाने कहां गायब कर दिया। यह सिलसिा अभी भी जारी है। इस क्रम में सिंध के अलगाववादी नेता नियाज हुसैन लशारी की कराची की सडकों पर गोलियों से गुदी लाश बरामद की हुई। उन्हें तकरीबन 18 महीने पहले पाकिस्तानी सेना हैदराबाद से उठा ले गई थी। बावजूद इसके लगाववादी शांत पड़ते नहीं दिखते। उनके तेवर बताते हैं कि इस बार लड़ाई आर या पार वाली है। पाकिस्तानी फौजियों एवं सुरक्षा एजेंसियों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए आंदोलन से जुड़े लोगों ने लरकाना प्रेस क्लब पर प्रदर्शन किया था। इस्लामाबाद के एक जज क मुताबिक, पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसी आईएसआई की कार्यप्रणाली अब गंभीर सवाल खड़े करने लगी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपना बयान जारी करते हुए यहां तक कहा कि एजेंसी के लोग न्यायिक प्रणाली को भी अपने हिसाब से प्रभावित करने लगे हैं। दबाव डालकर जिसे चाहते हैं जेल के अंदर करा देते हैं।--
 
सिंधुदेश की मांग का सच
सिंधुदेश की मांग को पाकिस्तान छोड़कर भारत सहित दुनिया के विभिन्न हिस्से में बसे सिंधियां का भी भरपूर समर्थन प्राप्त है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत की अपनी विशिष्ट संस्कृति और सूफीवाद के लिए वैश्विक स्तर पर अलग पहचान है। यह प्रदेश  हिंदू-मुस्लिमों के धार्मिक लिहाज से भी एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। कभी यह शांति और भाईचारे का प्रतीक हुआ करता था। अब यह दंगे, फसाद और कन्वर्जन के लिए जाना जाता है। सिंध की राजधानी कराची, स्वतंत्रता के समय भारत से आए मुहाजिरों का मुख्य केंद्र था।  1947, 1950 और 1960 में सिंधियों के भारी संख्या में पलायन के बाद तो यहां के मूल निवासी अल्पसंख्यक हो गए। परिणामस्वरूप, कराची तथा सिंध के अन्य शहरों में सिंधियों और मुहाजिरों के बीच अब यह तकरार का बड़ा कारण हो गए हैं। अलग सिंधुदेश की मांग करने वालों का दावा है कि सिंधी, एक नृजातीय भाषी समूह है। ये मुख्य रूप से पाकिस्तान और भारत में पाए जाते हैं। उर्दू भाषी मुहाजिरों के यहां हावी हो जाने से उनकी संस्कृति प्रभावित हो रही है। इस लिए सिंधुदेश की मांग में सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों से लेकर राजनैतिक स्वायत्तता तक शामिल हैं। पाकिस्तान सरकार पृथक सिंधुदेश की मांग को देशद्रोही हरकत मानती है।
समस्या की शुरुआत
स्वंत्रता के समय भारत से आए अधिकांश मुसलमान सिंध प्रांत के कराची, हैदराबाद और सुक्कुर जैसे बड़े और प्रमुख शहरों में बसाए गए थे। इसके बाद मुहाजिरों ने धीरे-धीरे सिंध के तमाम शहरों पर कब्जा कर लिया। प्रांत के मूल सिंधियों की तुलना में मुहाजिर आर्थिक और शैक्षणिक रूप से बेहतर स्थिति में हैं, जो उन्हें पसंद नहीं। मुहाजिरों ने सिंधियां को हर स्पर्धा से बाहर कर दिया है। सरकारी नौकरियों और व्यवसाय में भी मुहाजिर ही हावी हैं। विभाजन के समय भारत से आए पंजाबियों ने भी पाकिस्तान के पंजाब की बजाए सिंध में ही बसना बेहतर समझा। इसके चलते भी संधी भाषी लगभग हर जगह अल्पसंख्यक हो गए। इस्लामाबाद में पंजाबी वर्चस्व वाली सरकारें आने के बाद तो सिंध प्रांत में पंजाबियों एवं मुहाजिरों का एक अलग ही गठबंधन उभर आया। राजनीतिक स्तर पर भी सरकारों ने सिंध मंे इस गठबंधन को ही अहमितय दी। 
इस्लामाबाद से सियासत करने वाले सिंध प्रांत में  ग्रामीण स्तर पर सिंधियों और शहरी स्तर पर मुहाजिरों को महत्व देते हैं। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाक़त अली खान मुहाजिरों के प्रमुख नेता थे। उनकी बदौलत ही पाकिस्तान की स्थापना के समय अधिकतर उर्दू बोलने वाले शीर्ष नौकरशाह रहे। उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के कई उच्च पदों पर अपने लोगों को नियुक्त करवा दिया था। बाद में सेना और नौकरशाह मंे पंजाबियों और उर्दू भाषियों का गठबंधन हावी हो गया। इसके बाद तो जैसे सिंधी पूरे सीन से ही बाहर हो गए। 
पाकिस्तान की स्थापना के शुरूआती वर्षोें में बलूच तथा गुजरातियों ने मिलकर इस गठबंधन को तोड़ने की कोशिश की। इसमें उन्हें सिंधियों का भी साथ मिला। मगर बाद में सिंधियों ने महसूस किया कि इस तरह उन्हें कोई विशेष लाभ नहीं होने वाला। उसके बाद से उनमें बगावत के बीज अंकुरित होने लगे। इसके चलते सिंध में जातीय, सामाजिक-आर्थिक संरचना, ग्रामीण बनाम शहरी, सामंती बनाम मध्यम वर्ग और सत्तारूढ़ व  कुलीन वर्गों में संघर्ष शुरू हो गया, जो बाद में सिंधुदेश की मांग में बदल गया। सिधुदेश की मांग सर्वप्रथम प्रमुख सिंधी नेता फ़िरोज़ अहमद ने उठाया था। धीरे-धीरे अलग-अलग संगठन बनाकर इसे आंदोलन का रूप दे दिया गया।
सिंधुदेश की राजनीतिक लड़ाई
सिंधी सिंधुदेश की मांग को लेकर राजनीतिक और हथियारबंद दोनों स्तर से आंदोलन चला रहे हैं। यह आंदोलन केवल पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र तक सीमित है, पर इसे विश्वभर के सिंधियों की हिमायत प्राप्त है। सिंधुदेश की कल्पना सिंधी नेता जीएम सैयद की है। उन्होंने 1967 में पीर अली मोहम्मद रशीदी के साथ इसके लिए सियासी लड़ाई छेड़ी थी। शुरूआत  केंद्र सरकार द्वारा सिंध पर उर्दू थोपने और प्रांत में बड़ी संख्या में मुहाजिर की उपस्थिति का मुददा उठाया गया। अस्सी के दशक के मध्य में आंदोलन में कुछ छापामार संगठन भी शामिल हो गए। जियाउलहक के शासन में सिंध के छापामारों की इस्लामाबाद में सैनिकों के साथ जबरदस्त झड़प हुई थी। तब सरकार ने सेना की बूटों तले आंदोलन को बुरी तरह कुचल दिया था। मगर सिंधुदेश को लेकर  चिंगारी सुलग रही है। जीएम सैयद के प्रयासों से इस आंदोलन से बड़े पैमाने पर युवा और बुद्धिजीवी जुड़े। उन्हें सिंध का करिश्माई नेता माना जाता है। उनकी देख-रेख में जेया सिंध आंदोलन प्रारंभ हुआ था। 80 के दशक के उत्तरार्ध में वह सिंध राष्ट्रीय गठबंधन के निर्विरोध नेता चुने गए थे। लेकिन यह गठबंधन 1988, 1990 और 1993 के चुनावों में कुछ खास नहीं कर पाया। सैयद ने सिंध के पाकिस्तान से अलग होने और सिंधुदेश को लेकर एक पुस्तक भी लिखी है।
बेनजीर की मौत और आंदोलन का जोर
पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की मृत्यु के बाद सिंधुदेश के लिए आंदोलन ने फिर से जोर पकड़ा है। बेनजीर सिंध की ही थीं। इस आंदोलन में कई छापामार संगठन और सियासी पार्टियां शामिल हैं। इनमें मुख्य रूप से सिंध कौमी महाज , विश्व सिंधी कांग्रेस , सिंधुदेश लिबरेशन आर्मी , ज्योति सिंध तर्राकी पासंड पार्टी, जेई सिंध मुत्ताहिदा महाज शामिल हैं। विभिन्न अलगाववादी संगठनों के छात्रसंघ भी सक्रिय हैं, जिनमें सिंध राष्ट्रवादी आंदोलन पार्टी  और जेई सिंध स्टूडेंट्स फेडरेशन प्रमुख हैं। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा सहित कई अन्य क्षेत्रों से पलायन कर भी लोग यहां आकर बसे हैं। सिंधियों को उनको लेकर भी आपत्ति है।