वार करारा है चीन जरूर तिलमिलाएगा

    दिनांक 29-जून-2020
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उमेश्वर कुमार

चीन को सबक सिखाने के लिए सीमा पर जहां हमारे बहादुर सैनिक तैनात हैं, वहीं देश के अंदर चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की शुरुआत हो गई है। सरकार के इशारे पर चीनी कंपनियों के साथ हुए कई करार रद्द कर दिए गए हैं। ग्राहक भी चीनी सामान लेने से परहेज करने लगे हैं। भारत के इस रुख से चीन को जबर्दस्त आर्थिक नुकसान होने वाला है

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चीनी उत्पादों के बहिष्कार की मांग ने भारत में पकड़ा जोर, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पोस्टर देश की राजधानी
और भोपाल जैसे महानगरों की सड़कों पर फूंके गए।
गलवान घाटी में की गई हरकतों का चौतरफा भारी खामियाजा चीन को भुगतना होगा। सैन्य और वैश्विक कूटनीतिक स्तर पर तो उसे करारा जवाब मिल ही रहा है, आर्थिक मोर्चे पर भी इसका बड़ा नुकसान उसे उठाना होगा। अमेरिका खुलकर चीन के विरोध और भारत के समर्थन में है। देश के जनमानस में आरपार की लड़ाई का जज्बा है। जब आम जनता किसी मुद्दे पर उठ खड़ी होती है तब उसकी सफलता में कोई संदेह नहीं रह जाता। चीन के साथ भी कुछ ऐसा ही होने वाला है। देश के हर भाग में आम जनता के बीच चीनी उत्पादों के बहिष्कार का सिलसिला शुरू हो ही गया है, भारत की कंपनियों ने भी चीन से आयात से मुक्ति के कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। मोदी सरकार ने तो चीन से आयात की निर्भरता को कम करने की कवायद काफी पहले ही शुरू कर दी है।

चीन के खिलाफ जंग में हर भारतीय एक सिपाही है और यह लड़ाई सबको मिलकर लड़नी है।
-सोनम वांगचुक, प्रख्यात शिक्षाविद् और नवोन्मेषक


सभी उद्योगों में आयात पर निर्भरता में कमी और आत्मनिर्भरता के प्रयास शुरू हो गए हैं। उद्योग आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं और इसके लिए सरकार और उद्योग को कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा।
- विनी मेहता, महानिदेशक, भारतीय वाहन कलपुर्जा उत्पादक संघ
 

गलवान की घटना के बाद चीन से होने वाले व्यापार, निवेश और ‘प्रोजेक्ट सर्विसेज’ पर लगाम लगाने की व्यापक तैयारी हो रही है। सरकारी ठेकों और ढांचागत परियोजनाओं से चीनी कंपनियों को हटाने का सिलसिला शुरू हो गया है। चीन से आने वाले माल पर पहले से ही ‘हाई टैरिफ’ और ‘एंटी डंपिंग ड्यूटी’ लगाने का कार्य शुरू हो गया है। सामान्य उपयोग के चीनी सामान के आयात पर भी नकेल कसी जा रही है।

चीन को होगा बड़ा नुकसान

चीन के साथ कारोबार को समाप्त करने का जबरदस्त नुकसान चीन को उठाना पड़ेगा। इसका सबसे बड़ा कारण है कि बीते शताब्दी के आखिरी दशक से जो सरकारी नीतियां बनती रहीं उससे देश में चीन का निर्यात बढ़ता रहा। चीन भारत से आज जितने का माल खरीदता है उसके पांच गुना मूल्य का माल वह भारत को बेचता है। 2018-19 में भारत ने चीन को 16.7 अरब डॉलर यानी 1.2 लाख करोड़ रुपए का निर्यात किया, जबकि इस अवधि में 70.3 अरब डॉलर का यानी करीब 5.32 लाख करोड़ रुपए का आयात किया। यानी भारत को 4.1 लाख करोड़ रुपए  का व्यापार घाटा हुआ। इस तरह से अगर भारत चीन के साथ कारोबार खत्म करता है तो इसका सीधा और बड़ा घाटा चीन को होगा। वह अपने माल खपाने का एक बहुत बड़ा बाजार खो देगा।

सरकार के अन्य महत्वपूर्ण कदम
  • भारत आरसीईपी (रीजनल कॉम्प्रीहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप) से बाहर निकला। इसमें चीन समेत सभी आशियान देश शामिल थे। इससे भारतीय उद्योग चीन का सामान खरीदने के लिए बाध्य नहीं होंगे।

  • गैर जरूरी आयात पर सीमा शुल्क बढ़ाया गया। 2020 के बजट मे 89 चीजों पर सीमा शुल्क बढ़ाया गया। इसमें जूता, खिलौने, फर्नीचर और प्रेशर वाले बर्तन शामिल हैं।

  • पिछले साल ही सरकार ने 13 वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाया था, जिसमें चीन से आयात होने वाली कई वस्तुएं शामिल थीं। इस साल 12 जून को टायर के खुले आयात पर रोक लगा दी। अब बिना डीजीएफटी की इजाजत के इनका भारत में आयात नहीं हो पाएगा।

  • डीजीएफटी ने 31 अगस्त, 2019 को अगरबत्ती के आयात पर भी रोक लगा दी थी। अगरबत्ती के लिए जरूरी सामान यानी बांस के आयात पर 10 से 25 फीसदी सीमा शुल्क बढ़ाया गया।

  • चीन से आयात होने वाले दूध और दूध के उत्पादों पर 23 अप्रैल, 2019 को ही रोक लगा दी गयी थी।

  • 17 अप्रैल, 2020 को विदेशी पूंजी निवेश करने वाले उद्योगों के लिए नियम तय कर दिए। चीन को लक्ष्य में रखते हुए कुछ विदेशी निवेशों के लिए सरकार की अनुमति अनिवार्य कर दी गयी। भारत के साथ लगी जमीनी सीमा वाले सभी देशों पर यह नियम लागू है।

  • डीजीएफटी अब तक ‘एंटी डंपिंग’ की जांच शुरू करने में 43 दिन लेता था, लेकिन इस साल यह जांच 33 दिन में शुरू हो रही है और जांच भी जल्दी पूरी की जा रही है।

  • 2020 में चीन से आयात होने वाली कई वस्तुओं पर ‘एंटी डंपिंग ड्यूटी’ लगा दी गयी है। ये वस्तुएं हैं- स्टेनलेस स्टील, नाइलॉन टायर कोर्ड फैब्रिक, इलेक्ट्रॉनिक कैल्कुलेटर, सोडियम साइट्रेट, शीट ग्लास, सोडियम नाइट्रेट, पाइराजोलोन, सीपीसीआर और डिजिटल आॅफसेट प्रिंटिंग प्रेस आदि।

  • पहचान की गई 371 वस्तुओं के आयात पर शिकंजा कसने के लिए नियमों में तकनीकी पेंचों की तलाश की गई। आयात होने वाली लगभग 150 वस्तुओं पर सवाल-जवाब होने के बाद रोक लगी तो माना जा रहा है कि इससे 47 अरब डॉलर के आयात पर असर पड़ा है।

  • पिछले एक साल में 50 से ज्यादा सामान में ‘क्वालिटी कंट्रोल आर्डर’ और दूसरे तकनीकी नियम जो जारी हुए हैं, उनमें इलेक्टॉनिक गुड्स, खिलौने, एसी, साइकिल के पुर्जे, केमिकल्स, प्रेशर कुकर, स्टील से बनी चीजें और केबल जैसे इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं शामिल हैं। इससे इनका आयात हतोत्साहित हुआ।
  •  संचार मंत्रालय ने टेलीकॉम क्षेत्र में 4जी और उसके ऊपर की तकनीकी बिडिंग से चीनी कंपनियों को बाहर रखने का फैसला ले लिया है। साथ ही निजी टेलीकॉम कंपनियों को निर्देश दिए हैं कि वे चीन के सामान पर अपनी निर्भरता धीरे-धीरे कम करें।



वाहन पुर्जा उद्योग ने कसी कमर
देश में वाहनों के उत्पादन में लगने वाले पुर्जों के लिए हाल के वर्षों में चीन पर निर्भरता बढ़ गई है। लेकिन नई परिस्थितियों में देश के वाहन कलपुर्जा उद्योग ने चीन से आयात पर निर्भरता कम करने को कदम उठा दिए हैं। करीब 57 अरब डॉलर का वाहन कलपुर्जा उद्योग स्थानीयकरण की दिशा में कदम उठा चुका है जिससे चीन पर निर्भरता कम हो सके। भारतीय वाहन कलपुर्जा उत्पादक संघ (एसीएमए, एक्मा) ने यह जानकारी दी। वित्त वर्ष 2018-19 में भारत ने 17.6 अरब डॉलर के वाहन कलपुर्जों का आयात किया था। इसमें से सिर्फ 27 प्रतिशत यानी 4.75 डॉलर का आयात चीन से हुआ था।


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चीनी वस्तुओं को जलाकर चीन का विरोध करते लोग

भारत में है दम
मारुति के भारत में प्रवेश से पहले भारत का वाहन उद्योग बहुत ही संकुचित था। जब सुजुकी के जरिए देश में मारुति आई तब भी देश में पुर्जों का उत्पादन नहीं होता था। शुरुआती दिनों में जापान से पुर्जे आए और बाद में देखते-देखते देश में पुर्जों की हजारों कंपनियां शुरू हो गर्इं। हरियाणा और महाराष्ट्र में पुणे और रंजनगांव इसके केंद्र बन गए। होसुर एक बड़ा आॅटो केंद्र्र बन गया। भारत की कई कंपनियां तो वैश्विक स्तर पर मर्सीडिज के पुर्जे तक की आपूर्ति करती हैं। देश के पुर्जा उत्पादकों को अपनी क्षमता पर विश्वास है कि उनके लिए जल्दी से जल्दी स्थानीयकरण करना कोई मुश्किल का काम नहीं। आॅटो उद्योग का स्थानीयकरण भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुभ होगा। इतिहास गवाह है कि आॅटो उद्योग ने देशों की अर्थव्यवस्था की गति बदल दी है। खुद अमेरिका इसका बहुत बड़ा उदाहरण है।



पीछे छूटा चीनी खेल, आगे बढ़ा ‘सेल’
देश के विकास को गति देने के लिए स्टील अथॉरिटी आफ इंडिया लिमिटेड (सेल) और भारतीय रेलवे की साझेदारी की कहानी पिछले 60 साल से लगातार जारी है। सेल भारतीय रेलवे को अपने पश्चिम बंगाल में स्थित दुर्गापुर इस्पात संयंत्र से व्हील, एक्सल और व्हील-एक्सल सेट की लगातार संतोषजनक आपूर्ति का रहा है, जिसे सेल आगे भी पूरा करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध और समर्पित है। सेल एक्सल की विभिन्न श्रेणियों की आपूर्ति करता है। कंपनी एलएचबी कोचेज के लिए एक्सल विकसित रही है, जबकि हाल ही में सेल ने एलएचबी कोचेज के लिए एलएचबी व्हील की आपूर्ति शुरू कर दी है। सेल भारत का एकमात्र ‘फोर्ज्ड व्हील’ उत्पादक है। सेल भारतीय रेलवे को दुनिया की सबसे लंबी 260 मीटर रेल की भी आपूर्ति कर रही है। 
-अनिल कुमार चौधरी,
अध्यक्ष, सेल




तेज हुई चीन की आर्थिक घेराबंदी
चीन को आर्थिक झटका देने के लिए पूरा देश एकजुट है। कई राज्य सरकारों ने चीनी कंपनियों के ठेके रद्द कर दिए हैं। पूरा का पूरा जनमानस चीन के सामान के विरोध में आंदोलित है। भारत में मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों ने चीन की मोबाइल कंपनियों को टक्कर देने की तैयारी शुरू कर दी है। चीन की कई मोबाइल कंपनियों ने भारत में पहले से तयशुदा ‘मोबाइल लांचिंग’ को रद्द कर दिया है। अब इस बात की तैयारी की जा रही है कि ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बेचे जाने वाले सामान के उत्पादन स्थल के नाम का खुलासा ई कॉमर्स की साइट पर सामान के साथ करना होगा। इस पर जल्दी ही निर्णय आ जाएगा। इस आधार पर ग्राहक स्वदेशी पर अपना निर्णय ले सकेंगे। कई बार उत्पाद के नाम से उसका उत्पादन स्थल स्पष्ट नहीं हो पाता।

चीनी सामान पर नकेल
सरकार देश में चीनी माल को रोकने के लिए तैयार है। चीन सहित तीन देशों से स्टील आयात पर सरकार ने पांच साल के लिए ‘एंटी डंपिंग ड्यूटी’ लगा दी है। इसी तरह, चीन से आने वाले सोलर सामान पर अगस्त से 20 फीसदी का सीमा शुल्क  लगाने की तैयारी की जा रही है। यही नहीं, चीन से आने वाला माल 22 जून से बंदरगाहों पर रोक लिया गया है।
चीन, दक्षिण कोरिया और वियतनाम से आने वाले फ्लैट रोल्ड स्टील उत्पादों, अल्युमिनियम या जिंक के अलॉय से प्लेटेड या कोटेड मेटेरियल पर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाई जाएगी। यह ड्यूटी अगले पांच साल तक रहेगी। यह एंटी डंपिंग ड्यूटी 13.07 डॉलर प्रति मीट्रिक टन से 173.07 डॉलर प्रति मीट्रिक टन तक होगी।


केन्या और सिंगापुर ने भी दिया झटका
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 केन्या ने चीन से छिना रेल पटरी का काम

केवल भारत ही नहीं, केन्या और सिंगापुर में भी चीन को आर्थिक नुकसान होने लगा है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों केन्या की एक अदालत ने केन्या और चीन के बीच हुए एक रेल परियोजना के करार को रद्द कर दिया है। यह करार 2017 में हुआ था। इसके तहत चीन केन्या में रेल पटरी का विस्तार कर रहा था। इसके लिए केन्या ने  ‘एक्सिम बैंक आॅफ चाइना’ से 3.2 बिलियन डॉलर (लगभग 24,315 करोड़ रु.) का ऋण लिया है।
केन्या के सामाजिक कार्यकर्ता ओकीया ओमताह और ‘लॉ सोसाइटी आफ केन्या’ के वकीलों के एक समूह का कहना था कि इस परियोजना के लिए बिना निविदा सीधे एक चीनी कंपनी को ठेका दे दिया गया। यानी इसमें भ्रष्टाचार हुआ है। इसके बाद यह मामला निचली अदालत तक पहुंचा। अदालत ने इन आरोपों को सही पाया और करार को रद्द करने का फैसला सुना दिया। अब केन्या की सरकार इस फैसले के विरुद्ध अपने यहां के उच्चतम न्यायालय में अपील करने की तैयारी कररही है। 
यह भी खबर है कि सिंगापुर ने भी चीन से दूरी बनानी शुरू कर दी है। एक समाचार के अनुसार कुछ दिन पहले ही सिंगापुर ने 5 जी नेटवर्क का ठेका चीन की कंपनी हुआवेई को दिया था, लेकिन अब उससे यह ठेका वापस लेकर नोकिया एरिक्सन को दे दिया गया है।


हरियाणा में चीनी कंपनियों के ठेके रद्द
गलवान की घटना के बाद हरियाणा सरकार ने दो चीनी कंपनियों को मिले ठेके रद्द कर दिए हैं। उल्लेखनीय है कि चीन की कंपनी ‘बीजिंग एसपीसी एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन टेक’ को यमुनानगर स्थित दीनबंधु छोटूराम थर्मल पावर प्लांट के लिए ठेका दिया गया था। इसके अलावा ‘शंघाई इलेक्ट्रिक कॉर्प’ का चयन हिसार के राजीव गांधी थर्मल पावर प्लांट के लिए किया गया था। इन कंपनियों को इन दोनों संयंत्रों में 780 करोड़ रुपए की लागत से प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगाना था। अब राज्य सरकार ने नए सिरे से ठेका देने का फैसला लिया है, लेकिन उसमें सिर्फ भारत में पंजीकृत कंपनियां भाग ले सकेंगी।

महाराष्ट्र में भी विरोध
महाराष्ट्र सरकार और चीनी कंपनियों के साथ हुए समझौता ज्ञापनों का राज्य में पुरजोर विरोध हो रहा है। इस कारण अब उन समझौतों के रद्द होने के आसार बढ़ गए हैं। उल्लेखनीय है कि भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प से ठीक पहले महाराष्ट्र सरकार ने सामूहिक रूप से 5,000 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की तीन चीनी कंपनियों के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया था।
भारतीय रेलवे ने भी चीनी कंपनी से अपना एक करार खत्म कर दिया है। 2016 में डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर (भारतीय रेलवे) और चीनी कंपनी के बीच 471 करोड़ रुपए का करार हुआ था। इसके तहत कंपनी को कानपुर से पं. दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन तक 417 किलोमीटर लंबे रेलवे ट्रैक पर ‘सिग्नल सिस्टम’ लगाना था। अब काम में गति कम होने का हवाला देते हुए रेलवे ने इस ठेके को रद्द कर दिया है। इस परियोजना में चार साल में सिर्फ 20 फीसदी ही काम हुआ है।

रेलवे ने तोड़ा करार
भारतीय रेलवे ने भी चीनी कंपनी से अपना एक करार खत्म कर दिया है। 2016 में डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर (भारतीय रेलवे) और चीनी कंपनी के बीच 471 करोड़ रुपए का करार हुआ था। इसके तहत कंपनी को कानपुर से पं. दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन तक 417 किलोमीटर लंबे रेलवे ट्रैक पर ‘सिग्नल सिस्टम’ लगाना था। अब काम में गति कम होने का हवाला देते हुए रेलवे ने इस ठेके को रद्द कर दिया है। इस परियोजना में चार साल में सिर्फ 20 फीसदी ही काम हुआ है।

रेलवे दे सकता है चीन को झटका
भारत सरकार के स्तर पर बहिष्कार का फैसला लिया गया तो रेलवे से चीनी कंपनियों को खासा नुकसान हो सकता है। उल्लेखनीय है कि पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों में खासा सामान विदेशों का लगा होता है और अधिकांश सामान का आयात चीन से होता है। यूरोपीय देशों के भी कुछ सामान होते हैं पर चीन सबको पीछे छोड़ चुका है। भारत में हर साल 7,000 से 8,000 रेलवे कोच बनते हैं। इन कोचों में लगने वाले एक्सल, एयर स्प्रिंग, ब्रेकिंग सिस्टम, लाइट, पॉली यूरिथेन फोम आदि का आयात किया जाता है। ऐसा नहीं है कि भारत में इनके उत्पादन की तकनीक और क्षमता नहीं है। पहले इन सभी पुर्जों की आपूर्ति स्थानीय आधार पर ही की जाती रही है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी सेल काफी पहले से ही इसका उत्पादन करती रही है।


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दिल्ली में स्वदेशी जागरण मंच के कार्यकर्ता चीनी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए प्रदर्शन करते हुए

राज्यों में बहिष्कार का माहौल
राजस्थान में भी चीन का बहिष्कार करने का माहौल गरमा रहा है। राजधानी जयपुर में व्यापारियों ने फैसला किया है कि अब हर दुकान के बाहर चीनी सामान के बहिष्कार करने वाले बैनर, पोस्टर लगाए जाएंगे। जयपुर व्यापार मंडल ने इसकी शुरुआत भी कर दी है। जयपुर के राजा पार्क में दुकानों के बाहर इस तरह के 15 हजार पोस्टर भी लग गए हैं। दिल्ली के होटल उद्योग ने चीनी सामान के विरोध में अपना झंडा बुलंद कर दिया है। गुजरात, पश्चिम बंगाल से तो विरोध की खबरें लगातार आ रही हैं।

इन सबका निष्कर्ष यही है कि अब भारत और भारत के लोग चीन को सबक सिखाने के लिए तैयार हो गए हैं। वर्तमान माहौल को देखते हुए यह बिल्कुल सही कदम है। जब तक चीन कमजोर नहीं होगा, तब तक भारत शांति से नहीं रह पाएगा। इसलिए चीन के विरुद्ध जो माहौल बना है, उसे और मजबूत करने की आवश्यकता है।     (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)