पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल सिंह का खुलासा-असम चीन के हाथों सौंपने जा रहे थे नेहरू!

    दिनांक 29-जून-2020
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‘नेहरू जी ने जवानों से पीछे आने के लिए कह दिया था। इससे पहले ल्हासा के अंदर भारतीय सेना की एक टुकड़ी तैनात हुआ करती थी। भूटान के अंदर भी भारतीय जवानों की एक टुकड़ी तैनात रहती थी।’

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पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह (फाइल चित्र)

भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने नेहरू के ‘चीन—प्रेम’ को लेकर एक बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि, ‘1962 में नेहरू ने युद्ध के बाद कहा था कि असम को खाली कर दो। लेकिन चीन असम तक नहीं घुस पाया।’ उल्लेखनीय है कि भारत-चीन के बीच लदृाख सीमा पर गत 5 मई के बाद से तनाव कायम है। 15 जून को दोनों देशों के जवानों के बीच खूनी झड़प हुई थी, जिसमें भारत की ओर से करारा जवाब दिया गया था, लेकिन इसमें भारत के 20 जवान शहीद हो गए थे। जनरल सिंह ने दावा किया है कि भारतीय जवानों ने चीन के लगभग 40 सैनिकों को मारा है। केंद्रीय मंत्री सिंह ने पिछले दिनों नमो एप पर भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की विस्तार से चर्चा करके उसके बारीक पहलुओं की जानकारी दी है।

तिब्बत पर कब्जा
जनरल सिंह ने बताया कि भारत-चीन का विवाद भारत की आजादी के बाद से ही चला आ रहा है। आजादी के बाद भारत अपने घरेलू हालात से निपट रहा था जबकि दूसरी तरफ चीन मौके की ताक में बैठा था कि कब और कैसे भारत की सीमा में घुसपैठ कर उस पर कब्जा कर ले। उन्होंने बताया,‘भारत की सीमाएं अंग्रेजों ने तय की थीं। उन्होंने जो संधियां की थीं उसी के अनुसार सीमाएं बंटी थीं। जिस दौरान भारत अपनी स्थिति बेहतर करने में व्यस्त था उस बीच चीन ने, 50 के दशक में तिब्बत पर कब्जा कर लिया। नेहरू जी ने जवानों से पीछे आने के लिए कह दिया था। इससे पहले ल्हासा के अंदर भारतीय सेना की एक टुकड़ी तैनात हुआ करती थी। भूटान के अंदर भी भारतीय जवानों की एक टुकड़ी तैनात रहती थी।’/

अक्साई चिन पर कब्जे की चीनी चाल
जनरल सिंह ने आगे बताया, ‘तब रास्ता हुआ करता था भूटान, लातुंग, सिक्किम होकर। जब चीन ने वहां कब्जा करना चाहा तो नेहरू जी ने कहा कि सेना को पीछे ले आओ। तभी दलाई लामा भारत में आ गए और चीनियों ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। इसी तरह चीन ने सिक्यांग पर भी कब्जा किया। ऐसे में चीन के लिए समस्या थी तिब्बत और सिक्यांग को जोड़ने की, क्योंकि उन दोनों के बीच भारत का हिस्सा पड़ता था। जब चीन ने देखा कि भारत से कोई इस इलाके में नहीं आता तो उसने सड़क बनानी शुरू कर दी। पठारी इलाका होने की वजह से वहां सड़क बनाना बहुत आसान था। चीन ने सिक्यांग और तिब्बत को जोड़ने के लिए अक्साई चिन के बीच से एक सड़क बनाई और दोनों को जोड़ दिया।’

पूर्व सेनाध्यक्ष ने कहा कि जब भारत को इस घटना का पता चला तो भारत ने विरोध किया। चीन ने कह दिया, वह इलाका उसका है। फिर 1959 में चीन के सर्वोच्च नेता भारत आए और नेहरू से मिलकर ‘हिंदी-चीनी, भाई-भाई’ की रट लगानी शुरू कर दी। उन्होंने नेहरू जी को एक कागज का छोटा सा टुकड़ा देकर कहा कि ये रहा नक्शा और बीच में एक रेखा खींच दी। ये रेखा कहीं से स्पष्ट नहीं थी। चीन लद्दाख के कराकोरम को भी अपने हिस्से में बता रहा था, जबकि वह भारत में बहुत अंदर था। इन्हीं सब चीजों पर फिर 1962 का युद्ध हुआ था।/

असम देने को राजी थे नेहरू
जनरल सिंह ने भारत-चीन तनाव के तमाम बिन्दुओं के बारे में बताते हुए कहा कि 1962 में नेहरू जी ने युद्ध के बाद असम को खाली करने को कहा। लेकिन चीन असम तक नहीं आ पाया। 1962 के युद्ध की खास बात यह थी कि जहां भी भारतीय जवान तैनात थे वहां पर चीन कब्जा नहीं कर पाया था।

  अगर उस दिन हमारे फौजी असम में सख्ती से नहीं डटे रहते तो नेहरू जी ने असम को खाली करने के लिए भी कह दिया था। उन्होंने कहा कि चीन संघर्षविराम करके मैकमोहन रेखा के पास लौट गया, क्योंकि यहां पर उसका कोई दावा नहीं था। लेकिन लद्दाख में चीन अक्साई चिन पर कब्जा कर चुका था, क्योंकि वह सिक्यांग और तिब्बत का बहुत महत्वपूर्ण जोड़ था जिसे वह हाथ से नहीं जाने दे सकता था।