भारत की उत्तरी सीमा

    दिनांक 29-जून-2020
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 डॉ. राममनोहर लोहिया
चीन की विस्तारवादी नीति को लेकर समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने
पाञ्चजन्य (19 अक्तूबर,1960) के  लिए एक लेख लिखा था। उसी लेख को पुन: यहां प्रकाशित किया जा रहा है
 
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पार्टी से परे तथा निर्विवाद कुछ सुझाव सामने रखना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि इन सुझावों को, सभी राजनीतिक दलों, प्रचार-एजेंसियों, जैसे रेडियो और सामचार-पत्र आदि अपना लें। हिन्दुस्तान की जनता को आर्य, द्रविड़ और मंगोल में विभाजन के तर्क को हमेशा के लिए और फौरन खत्म कर देना चाहिए। इस तरह के विभाजन आज बिल्कुल नहीं हैं, और न पिछले तीन हजार साल से कभी रहे हैं। मुझको लगता है कि यूरोप के विद्वानों ने इस झूठ को इसलिए पैदा किया है कि हिन्दुस्तानियों को भिन्न-भिन्न कर सके। चीन इस झूठ का उपयोग इसलिए कर रहा है कि यह हिमालयी-हिन्दुस्तान के डेढ़ करोड़ लोगों का हिन्दुस्तान से मानसिक अलगाव कर सके, यह कह कर कि वे दोनों मंगोल नस्ल के और भाई-भाई हैं। थाईलैण्ड तक की जनता के संबंध में जो मेरा निजी अनुभव है और जहां तक मेरा इतिहास का ज्ञान है, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हिन्दुस्तान के पड़ोसी मुल्क जैसे तिब्बत, थाईलैण्ड, कम्बोडिया बिल्कुल मंगोल नस्ल के नहीं हैं, जैसा कि चीनियों का दावा है, बल्कि वे स्पष्टतया मानसिक और नस्ल के लिहाज से हिन्दुस्तान से ज्यादा नजदीक हैं।

तिब्बत का तोहफा
हिन्दुस्तान और आजाद तिब्बत की सीमा मैकमोहन रेखा हो सकती थी, लेकिन हिन्दुस्तान और चीन के बीच की सरहद, कैलास, मानसरोवर और पूर्व प्रवाहिनी ब्रह्मपुत्र, वास्तव में इससे 30 से 40 मील उत्तर, जहां की भूमि का ढलाव है, होनी चाहिए। अब तक मैं भौगोलिक और पौराणिक सबूतों के ऊपर अपनी इस नीति का आधार रखता था, लेकिन अब मैं एक प्रशासनिक सबूत भी दे सकता हूं। मानसरोवर झील के पास स्थिर मानसर गांव की मालगुजारी, चीनी आक्रमण के पूर्व, भारत को मिलती थी। और इस गांव के मौलिक आंकड़े हिन्दुस्तान की जनगणना में शामिल हैं। मालूम पड़ता है कि लद्दाख के किसी राजा ने इस गांव को तिब्बत के लामाओं को तोहफे में दे दिया था, जिसका कि उसको कोई अधिकार नहीं था। अगर यह अधिकार था भी तो यह तोहफा चीनी सरकार को नहीं दिया गया था।

कैलास और मानसरोवर से दूर हो
तिब्बत और हिन्दुस्तानी, लिपि, भाषा, धर्म, रहन-सहन, विचार और तौर-तरीके के लिहाज से मिले-जुले हैं। तिब्बत में 80 फीसदी हिन्दुस्तानी हैं और 20 फीसदी चीनी, दो देशों की सरहद किन-किन आधारों पर तय की जाय? जनता की इच्छा, साधारण संस्कृति, इतिहास, भूगोल और आर्थिक बातें सरहद तय करने का आधार होती हैं। चीनियों को कहना चाहिए कि वे अपने उस्ताद लेनिन से एक पाठ सीखें। लेनिन ने पुरानी साम्राज्यशाही संधियों को फाड़ दिया और कहा कि एक नयी और आजाद दुनिया के लिए इनका कोई महत्व नहीं। अगर संधियों का भी कोई महत्व है, तो फिर मानसर गांव के बारे में जो संधि हुई थी, उन्हें भी सम्मेलन में उपस्थित करना चाहिए। हिन्दुस्तान को यह जरूर कह देना चाहिए कि अगर चीन तिब्बत को आजाद बना देना चाहता है तो हिन्दुस्तान कैलास मानसरोवर और वैसे जो दूसरे इलाके हैं, उन पर कोई अधिकार नहीं जताएगा।

एवरेस्ट को ‘सागरमाथा’ व नेफा को ‘उर्वशीयम्’
माउंट एवरेस्ट और नेफा जैसे अंग्रेजी नामों को तुरंत खत्म कर देना चाहिए और उनकी जगह सागरमाथा या सगरमाथा जैसे नाम जो कि प्राचीन काल से प्रचलित है एवरेस्ट के लिए और उर्वशीयम् जैसा नाम नेफा के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। उर्वशीयम् का प्रशासन विदेश मंत्रालय से निकालकर गृह मंत्रालय को दे देना चाहिए। अगर दिल्ली सरकार ऐसा करने के पक्ष में न हो तो कम से कम एक मंत्रालय हिमालयी विषयक नाम से प्रधानमंत्री के सीधे मातहत बना देना चाहिए। हिमालयी-हिन्दुस्तान के लिए एक संयुक्त आर्थिक एवं आबादी योजना तुरंत कार्यान्वित की जानी चाहिए। इसके लिए भारत का पैसा और आदमी के साधन का इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि खासकर यह पूरा इलाका हरा-भरा रह सके।

भूटान, सिक्किम और उर्वशीयम् में उत्तरदायी सरकार की तुरंत स्थापना की जानी चाहिए। और ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि यहां की जनता हिन्दुस्तान की लोकसभा में अपने प्रतिनिधि भेज सके।

उषस् से एशिया
आज हिन्दुस्तान चाहे जितना गिरा हुआ हो, उसके लोगों और पड़ोसियों को यह मानना होगा कि मनुष्य जाति का सबसे बड़ा भूखंड, जिसको अंग्रेजी में ‘एशिया’ कहते हैं, जर्मन में ‘आजियम’ और फ्रेंच में ‘आसी’ उसका नाम चीन या कोई दूसरे शब्द से नहीं निकला है, बल्कि हिन्दुस्तानी शब्द ऊषा या उषस् (उगता हुआ सूर्य का पूर्वी देश) से निकला है। हमारे पुरखे कभी इतने बड़े लोग थे कि जिन इलाकों में आजकल चीनी या दूसरे लोग बसते हैं, उन इलाकों का नामकरण उन्होंने ही किया था।