फिर शरारत पर उतरा ड्रेगन

    दिनांक 03-जून-2020
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प्रो. हर्ष वी. पंत
 
लद्दाख में चीन के बढ़ते आक्रामक पैंतरों के बीच कोविड-19 से जूझ रहे भारत के सामने एक दोहरी चुनौती आन खड़ी हुई है। लेकिन भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का सीमा पर ढांचागत आवश्यकताओं को तेजी से पूरा करने के निर्देश और भारत की सुरक्षात्मक तैयारी के बीच रणनीतिकारों को निरोधात्मक उपायों पर गहनता से विचार करना होगा 
 
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पिछले दिनों भारत और चीन के सैन्य अधिकारियों के बीच फ्लैग वार्ता तो हुई पर चीन के आक्रामक रुख में कोई बदलाव नहीं आया      (फाइल चित्र)

गत 26 मई को बीजिंग से खबर आई कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिन ने अपनी सेना से युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा है। इधर उसी शाम भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल और सीडीएस बिपिन रावत व अन्य अधिकारियों के साथ देर शाम तक खास बैठक की। इसी दिन लद्दाख के उपराज्यपाल राधाकृष्ण माथुर ने भी प्रधानमंत्री से भेंट कर केंद्र्र शासित लद्दाख के ताजा हालात पर बात की। बीते कुछ दिनों से लदृाख में सटी भारत-चीन सीमा पर आपसी झड़पों और सैनिकों की आम से ज्यादा तैनाती से माहौल एक बार फिर गर्मा गया है। ऐसे में लद्दाख के संदर्भ में वहां पैदा हुए ताजा हालात और रणनीतिक स्थिति की समीक्षा करना समीचीन होगा।

 लगता है, भारत और चीन एक बार फिर पुरानी स्थिति में लौट आए हैं-सीमा पर सैनिकों के बीच झड़पें, सीमारेखा का बढ़ता उल्लंघन, कूटनीतिकों के बीच कठोर भाषा में बातचीत और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सेनाओं की उपस्थिति बढ़ना। भारत-चीन सीमा तनाव ठीक उस समय लौटकर अपने होने का अहसास दिला रहा है, जब उसकी कोई जरूरत नहीं है। दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही है। दुनिया भर की सरकारें अपना ध्यान पूरी शक्ति से स्वास्थ्य तथा आर्थिक संकट से निपटने के तरीके ढूंढने में लगी हैं। भारत में भी हालात इससे अलग नहीं हैं। लगातार बढ़ता आर्थिक संकट नीति-निर्माताओं के लिए चुनौती पेश कर रहा है। आम समझ है कि लगातार बढ़ते मानवीय संकट से निपटना ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। ऐसे समय में व्यापक संदर्भों के रणनीतिक मुद्दों को पीछे छोड़ा जा सकता है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और चीन जैसे देश हैं, जो हमें इस वैश्विक संकट से ठीक तरह से निपटने देने में बाधाएं खड़ी करते आ रहे हैं। पाकिस्तान से तो निपटा भी जा सकता है, लेकिन जब चीन उठ खड़ा होता है तो सारा खेल बदल जाता है।

चरम पर तनाव
इसी क्रम में महामारी से लड़ाई के बीच ही चीन के साथ 3,488-किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव एक बार फिर खदबदाने लगा है जिसमें भारत और चीन की सेनाओं के बीच सीमा पर झड़पें 2015 के बाद से अपने चरम पर हैं। चीन ने लद्दाख क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पैगांग त्सो झील और गलवान घाटी के आसपास के क्षेत्रों में सैनिकों की मौजूदगी बढ़ा दी है, जिन्हें भारतीय सेना पीछे धकेल रही है। चीन ने भारतीय सेना पर अपने क्षेत्र में घुसपैठ का आरोप लगाते हुए दावा किया है कि यह प्रयास सिक्किम और लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर ‘एकतरफा तरीके से स्थिति बदलने’ के उद्देश्य से किया गया। दूसरी ओर, नई दिल्ली का दावा है कि भारत ने सीमा प्रबंधन के बारे में हमेशा बेहद जिम्मेदार रवैया अपनाया है जबकि चीनी सेना भारतीय सैनिकों द्वारा क्षेत्र की गश्त में बाधा डाल रही है। पिछले कुछ दिनों में स्थानीय कमांडरों के स्तर पर हुई बैठकें इन तनावों को दूर करने में असफल रही हैं।

चीन के साथ सीमा का प्रबंधन भारत की सर्वोच्च रणनीतिक प्राथमिकता है। नई दिल्ली ने बीते सालों में इसे निपटाने के लिए उपलब्ध विभिन्न विकल्प आजमाए भी हैं। सीमा मुद्दे पर वार्ता का एक औपचारिक तंत्र है। 2018 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शीर्ष स्तर पर अनौपचारिक बातचीत की प्रक्रिया भी शुरू की है। अप्रैल 2018 में वुहान में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मोदी की पहली अनौपचारिक शिखर वार्ता का परिणाम ‘विश्वास और आपसी समझ पैदा करने और सीमा मामलों के प्रबंधन में स्पष्टता तथा प्रभावोत्पादकता बढ़ाने के लिए संचार को मजबूत करने के बारे में अपनी-अपनी सेनाओं के रणनीतिक मार्गदर्शन’ के रूप में सामने आया। दोनों नेताओं ने अपनी-अपनी सेनाओं को ‘आपसी विश्वास और समान सुरक्षा के सिद्धांत समेत दोनों पक्षों के बीच सहमति से निर्धारित विश्वास निर्माण के विभिन्न उपायों को ईमानदारी से लागू करने और सीमावर्ती क्षेत्रों में घटनाओं को रोकने के लिए मौजूदा व्यवस्थाओं और सूचनाओं को साझा करने के तंत्र को मजबूत करने’ का भी निर्देश दिया। इससे 2018 में लगातार गर्त में जाते प्रतीत हो रहे चीन-भारत संबंधों में स्थिरता आई, लेकिन सीमा पर किसी तरह की स्थिरता नहीं आ पाई।   
सीमा पर चीन की बढ़ती आक्रामकता का कारण भारत अपनी सीमाओं का बेहतर प्रबंधन कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में सीमाओं पर आधारभूत ढांचे में सुधार किए गए हैं। इससे भारतीय सेना में नया भरोसा पैदा हुआ है और वह अब उन क्षेत्रों में दिखाई दे रही है जहां वह पहले चीनी सेना को नहीं दिखती थी। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना की गश्त भी अधिक प्रभावी हो गई है। एक ऐसे सीमा क्षेत्र में जो सुपरिभाषित और सीमांकित नहीं है, बढ़ती खींचतान से स्थानीय स्तर पर अस्थिरता पैदा हो रही है जिसका सामना भारत को हर दिन करना पड़ रहा है।
 

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लद्दाख सीमा पर चीन के सैनिकों के सामने दीवार बनकर खड़े भारतीय जवान (दाएं)

लेकिन इस अस्थिरता को मुख्य रूप से ‘स्थानीय कारकों’ का प्रभाव मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। ऐसा करना भारत के लिए नीतिगत स्तर पर अपेक्षाकृत खराब हो सकता है। आज भारत के बरक्स चीनी व्यवहार का गंभीर मूल्यांकन करते हुए इससे जुड़े बड़े संरचनात्मक और संस्थागत कारकों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। नई दिल्ली के सामने किसी सामान्य राष्ट्र की चुनौती नहीं है, बल्कि यह चुनौती एक ऐसे राष्ट्र द्वारा दी जा रही है जो समझता है कि वह अमेरिका को पछाड़कर नई वैश्विक महाशक्ति बन चुका है; इसे एक ऐसे राष्ट्र द्वारा चुनौती दी जा रही है जिसका नेतृत्व असुरक्षाबोध से त्रस्त सर्वसत्तावादी कम्युनिस्ट पार्टी कर रही है; जिसकी उच्च आर्थिक वृद्धि दर प्रदान करने की क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं; यह चुनौती एक ऐसे राष्ट्र की ओर से है जो हांगकांग और सिंक्यिांग से ताइवान तक कई आंतरिक चुनौतियों से घिरा होने के साथ ही प्रारंभिक चरणों में कोविड-19 के कुप्रबंधन के लिए जवाब मांग रहे गुस्साए वैश्विक समुदाय का सामना कर रहा है।

अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन की ओर से चीन के साथ व्यापार और प्रौद्योगिकी युद्ध के परिणामस्वरूप चीन को, विशेष रूप से कोविड-19 से प्रभावित वैश्विक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, अपने आर्थिक अनुमानों का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ रहा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) ने 1990 के बाद पहली बार अपने वार्षिक आर्थिक विकास लक्ष्य को भुलाते हुए इस आर्थिक चुनौती की गंभीरता को स्वीकार किया है। बढ़ते सवालों के बीच पूरी दुनिया के सामने कोरोना वायरस महामारी के दौरान चीन के रवैये का पर्दाफाश हुआ है।

सवालों के घेरे में शी
शी जिनपिंग के नेतृत्व को ‘चीनी राष्ट्र के भव्य कायाकल्प’ के रूप में अभिव्यक्त किया जाता रहा है। ऐसे में, उन्हें यह समय काफी कठिन लग रहा होगा जिसमें पूरी दुनिया बीजिंग के खिलाफ एकजुट हो रही है और आंतरिक दबाव बढ़ रहा है। अति महत्वाकांक्षी ‘बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव’ (बीआरआई) से लेकर कोविड-19 संकट के प्रारंभिक कुप्रबंधन तक और हांगकांग संकट को सुलझाने के लिए अनाड़ियों जैसे प्रयास करने से लेकर ताइवान के साथ दुराव बढ़ाने तक के मामलों पर चीन में शी की नेतृत्व शैली के खिलाफ सवाल उठ रहे हैं। और इसीलिए, नेशनल पीपुल्स कांग्रेस के आयोजन के समय उनकी प्रतिष्ठा बचाने के लिए चीनी सेना क्षेत्राधिकार संबंधी मसलों पर राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने की कार्रवाई में लगी है। दक्षिण चीन सागर से लेकर दक्षिण एशियाई महाद्वीपीय सीमाओं तक, चीन की ओर से दबाव बढ़ाये जाने की कोशिशें हो रही हैं। इससे शी के घरेलू समर्थकों को संदेश जाता है कि उन्हें और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को मजबूती से नियंत्रक स्थिति में बने रहना चाहिए। साथ ही, इस प्रयास से दूसरे देशों को भी ‘स्पष्ट संदेश’ जाता है कि उन्हें अपना ‘व्यवहार सुधारना चाहिए’। नई दिल्ली ने बीजिंग को हाल के महीनों में कई मोर्चों पर चुनौती दी है। उसने अपने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कानूनों को कड़ा करने के अलावा कोरोनो वायरस की उत्पत्ति की स्वतंत्र जांच का आह्वान करने वाले राष्ट्रों के समूह का समर्थन भी किया है। इतना ही नहीं, दो भारतीय सांसदों ने ताइवान के राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन के शपथ-ग्रहण समारोह में वेब के जरिए भाग भी लिया था।

सीमा पर तनाव पैदा करना बीजिंग की ओर से नई दिल्ली को यह बताने का एक तरीका है कि ‘वह अपनी महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाए’। भारत के प्रति चीन की आक्रामकता उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं और घरेलू असुरक्षा का फल है। भारत के लिए सबसे सही यही होगा कि वह इस शक्ति-सम्पन्न उत्तरी पड़ोसी के खिलाफ निरोधक क्षमताएं बढ़ाए।
(लेखक नई दिल्ली स्थित आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में अध्ययन के निदेशक और सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के प्रमुख हैं)