गिलगित बाल्टिस्तान और कठपुतली पाकिस्तान

    दिनांक 03-जून-2020
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डॉ. शिव पाठक
चीन के इशारे पर पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान सहित पूरे पीओजेके यानी पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर पर अपना शिकंजा कसने के गलत तरीके अपनाने शुरू कर दिए हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी के वहां चुनाव कराने के आदेश को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना होगा 
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पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर में चीन की अनेक आर्थिक परियोजनाओं में से एक है यह सात किमी. लंबी सुरंग     (फाइल चित्र)

17 मई, 2020 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव करवाने का आदेश पारित किया है, जिसका लक्ष्य गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव की तैयारी के लिए वहां अंतरिम सरकार बनाना व पाकिस्तान के चुनाव अधिनियम 2017 को इस क्षेत्र में लागू करवाना है। इसके पहले 30 अप्रैल, 2020 को पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसी प्रकार का निर्देश पाकिस्तान सरकार को दिया था ।

इसकी प्रतिक्रिया में भारत सरकार ने पाकिस्तान के राजनयिक को बुलाकर सीधे व सख्त शब्दों में कहा कि पाकिस्तान सरकार व उसके न्यायालय को इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार के ‘भौतिक बदलाव’ का अधिकार ही नहीं है। इसके आगे बढ़ते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय की विज्ञप्ति में पाकिस्तान से इस क्षेत्र से सेना हटाने के लिए भी कहा गया। यह सख्त संकेत अब भारत के इस क्षेत्र में बदले रुख को स्पष्ट करता है।

उल्लेखनीय है कि 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद के दोनों सदनों ने एक मत से गिलगित-बाल्टिस्तान सहित पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत के अभिन्न के रूप में स्वीकार किया था। इस अधिकृत भाग को वापस लेने का संकल्प पारित हुआ था।
गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान  ने 1947 से अवैध रूप से कब्जा कर रखा है, जबकि यह क्षेत्र उसी समय भारत का अभिन्न अंग हो गया था जब महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्तूूबर 1947 को  जम्मू-कश्मीर का भारत में अधिमिलन किया था; क्योंकि जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान, मीरपुर व मुज्जफराबाद उनकी रियासत के अंग थे। महाराज हरीसिंह द्वारा भारत में अपनी रियासत का वह अधिमिलन पूर्ण, वैधानिक व अटल है। 1947 से पाकिस्तान के उस पर अवैध कब्जे के बावजूद भारत ने कभी भी इस क्षेत्र से न तो अपने वैधानिकता के दावे को छोड़ा, न ही अपने सांस्कृतिक सूत्र को।

कोविड 19 के दौरान पाकिस्तान द्वारा गिलगित-बाल्टिस्तान का शोषण किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, अभी अपनी जनंसख्या के अनुपात में सर्वाधिक कोविड संक्रमित मामले गिलगित-बाल्टिस्तान में पाए गए हैं। वहां जांच नहीं हो रही है, क्योंकि वहां न तो जांच की प्रयोगशाला है, न कोई मेडिकल कॉलेज, न ही कोई नर्सिंग कालेज। पाकिस्तान सरकार इस क्षेत्र के पूरे आर्थिक व जल संसाधनों का अपने अन्य राज्यों के लिए उपयोग तो कर रही है लेकिन इस क्षेत्र के लिए न तो फंड दे रही है, न अन्य कोई मदद। 72,971 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल वाले इस इलाके में मात्र 15 वेंटिलेटर हैं। साथ ही, पाकिस्तान अपने अन्य प्रान्तों के मरीजों को गिलगित-बाल्टिस्तान के होटलों व अन्य जगहों में रख कर स्थानीय लोगों की जान जोखिम में डाल रहा है। ईरान से आए संक्रमितों को पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान में ही क्वारंटाइन किया हुआ है।

बढेगा राजनीतिक-आर्थिक शोषण
पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान को कभी वैधानिक रूप से अपना हिस्सा नहीं माना। उसके संविधान में इस प्रान्त का जिक्र नहीं है। पाकिस्तान का अनुच्छेद 1 उसके चारों प्रान्तों को तो दिखाता है, पर इसमें न तो गिलगित-बाल्टिस्तान है, न ही मीरपुर-मुज्जफराबाद, न ही यहां के व्यक्ति पाकिस्तानी संसदीय चुनावों में मतदाता होते हैं।
 
गिलगित-बाल्टिस्तान में चीन की अर्थिक गतिविधियों के बढ़ने के कारण चीन पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है कि वह यहां शान्ति व सुरक्षा सुनिश्चित करे। इस्लामाबाद गिलगित-बाल्टिस्तान से अपने वैधानिक रिश्ते को सही से परिभाषित करे, जिससे चीन के निवेश में श्रम, संसाधन व जमीन जैसे विषयों में एक स्पष्टता रहे। चीन का महत्वाकांक्षी आर्थिक गलियारा यहीं पर बन रहा है।

पाकिस्तान को गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव कराने के परिप्रेक्ष्य को समझना होगा। यह न तो वहां के निवासियों के स्वायत्तता के लिए है, न किसी प्रकार के विकास के लिए। जबकि वास्तविकता में पाकिस्तान सरकार का मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र में अपने राजनीतिक व आर्थिक शोषण को वैधानिकता प्रदान करना है और परोक्ष रूप से इसे पाकिस्तान का पांचवां प्रान्त बनाना है। उस पर इसे ‘पांचवां प्रान्त’ का बनाने का दबाव भी चीन की तरफ से है। गिलगित-बाल्टिस्तान में चीन की अर्थिक गतिविधियों के बढ़ने के कारण चीन पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है कि वह यहां शान्ति व सुरक्षा सुनिश्चित करे। इस्लामाबाद गिलगित-बाल्टिस्तान से अपने वैधानिक रिश्ते को सही से परिभाषित करे, जिससे चीन के निवेश में श्रम, संसाधन व जमीन जैसे विषयों में एक स्पष्टता रहे। चीन का महत्वाकांक्षी आर्थिक गलियारा यहीं पर बन रहा है। काराकोरम हाईवे, वखान गलियारे व सोस्त बंदरगाह के माध्यम से चीन इस क्षेत्र से सीधा जुड़ चुका है। उसका गिलगित—बाल्टिस्तान की बड़ी परियोजनाओं व बहुमूल्य धातु खदानों में सीधा निवेश है ।

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पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी (प्रकोष्ठ में ) द्वारा जारी किया गया गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव कराने संबंधी आदे

14 मई 2020 को ही पाकिस्तान ने चीन के साथ बाषा-डाइमर बांध, जिसकी लागत 442 बिलियन रुपए है, के लिए एक सन्धि की है। 4500 मेगावाट बिजली मिलने से पाकिस्तान तो अंधेरे से मुक्त हो जाएगा पर गिलगित—बाल्टिस्तान का एक बड़ा हिस्सा डूब कर अंधेरे में खो जायेगा। दु:खद बात यह भी है कि इन बांधों से होने वाली पूरी आमदनी पाकिस्तान के प्रांत खैबर पख्तूनख्वा को जाएगी, क्योंकि अधिकांश बांधों के दफ्तर उसी प्रान्त में हैं।

पाकिस्तान वहां इसी तरह कई बड़े बांध बना रहा है, जिसका स्थानीय लोग व्यापक विरोध करते रहे हैं। पाकिस्तान इन चुनावों की आड़ में दुनिया व स्थानीय लोगों के सामने अपनी दमदारी जताने का ढोंग रचना चाहता है।

 जिस 2018 के गिलगित-बाल्टिस्तान आदेश के तहत पाकिस्तान वहां चुनाव करवाना चाहता है, वह और कुछ नहीं बल्कि गिलगित—बाल्टिस्तान के लिए ‘गुलामी पत्र’ है, क्योंकि 2018 के इस आदेश के अनुसार ‘निर्णय लेने की सबसे बड़ी शक्ति’ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की पास है। उसके अनुसार कभी भी पाकिस्तान का प्रधानमंत्री इस क्षेत्र के बारे में कोई भी निर्णय ले सकता है। पाकिस्तान सरकार किसी भी भूमि अधिग्रहित कर सकती है। इसके अलावा इस क्षेत्र का कोई व्यक्ति या राजनीतिक दल पाकिस्तान के खिलाफ कुछ बोल नहीं सकता। पाकिस्तान की सरकार को यहां कर लगाने की छूट मिल गई है। शरीयत कानून यहां भी लागू है। पाकिस्तान में सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार इस पूरे क्षेत्र तक पहुंच गया है। पाकिस्तान का सर्वोच्च न्यायालय 1994 में भी इसी प्रकार के निर्णय के माध्यम से वहां पर पाकिस्तान के कब्जे को वैधानिकता प्रदान करना चाह रहा था। तब भी भारत सरकार ने उसका व्यापक विरोध किया था। इस प्रकार से इस क्षेत्र के वास्तविक विकास, मानवाधिकार या राजनीतिक स्वतंत्रता से इस आदेश का कोई लेना-देना नहीं है। तथाकथित चुनाव सिर्फ वहां पाकिस्तान के उपनिवेशवाद को मजबूत करेगा व वहां शोषण की प्रक्रिया तेज होगी। कितनी विडंबना है कि यहां के लोगों के पास न तो वोट का अधिकार है, न ही अन्य नागरिक अधिकार, लेकिन पाकिस्तान इनसे कर जरूर वसूलता है।

जनसांख्यिक परिवर्तन
हैरान करने वाली एक बात और है। पाकिस्तान एक रणनीति के तहत विभिन्न प्रदेशो से सुन्नी मुसलमानों को लाकर इस प्रान्त में बसा रहा है ताकि इस यहां की शिया आबादी अल्पसंख्यक हो जाए और वह अपने शोषण के खिलाफ आवाज न उठा पाए। राज्य प्रायोजित सुन्नी आतंकवाद से हर वर्ष सैकड़ों शिया मुस्लिम मारे जाते हैं, उनकी स्थानीय भाषाओं की जगह उर्दू थोपी जा रही है। पाकिस्तान अपने दमन से इस क्षेत्र में 1947 से ही 'शान्ति' स्थापित किए हुए हैं।

भारत ने इस भाग में किसी प्रकार में भौतिक परिवर्तन का हमेशा ही विरोध किया है। आज भारत की भरपूर जनसमर्थन प्राप्त सरकार ने अपने इस भू भाग को वापस लेने के लिए गंभीरता से सोचना शुरू किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2015 में लालकिले की प्राचीर से अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में गिलगित—बाल्टिस्तान का जिक्र कर चुके हैं। अब देखना है, दशकों से लंबित यह पुनीत कार्य कब सम्पन्न होता है। (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं)