उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से लगी भारत—नेपाल सीमा के नोमेन्स लैंड पर जमे हैं कब्जे

    दिनांक 03-जून-2020   
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उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से लगी नेपाल सीमा के नोमेन्स लैंड पर नेपाली नागरिकों द्वारा अतिक्रमण कर उस पर कब्जा जमाने का क्रम पिछले कई सालों से चल रहा है। दोनों देशों के सीमावर्ती जिलों के अधिकरियों की हर छह माह में होने वाली मीटिंग में भी यह मुदृदा उठता रहा है लेकिन पुनः सर्वे करने की बात कह कर इसे टाला जाता रहा है।
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ब्रह्मदेव मंडी का नोमेन्स लैंड इलाका जहां जमा हुआ अतिक्रमण

उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से लगी नेपाल सीमा के नोमेन्स लैंड पर नेपाली नागरिकों द्वारा अतिक्रमण कर उस पर कब्जा जमाने का क्रम पिछले कई सालों से चल रहा है। दोनों देशों के सीमावर्ती जिलों के अधिकरियों की हर छह माह में होने वाली मीटिंग में भी यह मुदृदा उठता रहा है लेकिन पुनः सर्वे करने की बात कह कर इसे टाला जाता रहा है।

गौरतलब है कि नेपाल और भारत के बीच सीमा पिलर बने हुए हैं। इन सीमा पिलर्स के दोनों तरफ अंतरराष्ट्रीय संधि के मुताबिक 50—50 मीटर तक नोमेन्स लैंड बनी रहे ऐसा प्रावधान किया गया है, किंतु नेपाल की तरफ से नोमेन्स लैंड पर नेपाली लोगों के कब्जे हो रहे हैं। उत्तराखंड के चंपावत जिले में बनबसा सीमा भारत पिलर संख्या 805 (1) 8 से लेकर 14 तक नेपाली लोगों ने कब्जा कर लिया है। पिलर संख्या 10 के आसपास नेपाली मदिरा की दुकानें भारत की तरफ मुंह खोले खुली हुई हैं और बराबर में पिलर को दाब दिया गया है। जब भी नेपाली कब्जेदारों से ये पूछा जाता है आप कि नोमेन्स लैंड पर क्यों कब्जा किये हुए हैं तो जवाब मिलता है हमारे पास नेपाल प्रशासन का लाल पुरचा (भूमि पट्टा) है जिसे वे दिखा देते हैं। चूंकि ये कब्जे नेपाल सीमा के नोमेन्स लैंड पर हैं, लिहाजा भारतीय अधिकारी बेबस हो जाते हैं।
 
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 बनबसा गड्ढा चौकी का पिलर

दरअसल टनकपुर में शारदा बैराज पार करके नेपाल की ब्रह्मदेव मंडी है, लेकिन यहां सीमा पिलर ही गायब हो गया है। कुछ साल पहले जब चंपावत और नेपाल के कंचनपुर प्रशासन ने इसे खोजा तो उसे एक झोपड़ी के अंदर पाया गया। इस बारे में चम्पावत जिला प्रशासन द्वारा जब कड़ा ऐतराज भी दर्ज किया गया तो झोपड़ी को हटा दिया गया। किंतु आसपास कब्जे बरकरार रहे है। भारत—नेपाल की खुली सीमा है। कई स्थान तो ऐसे हैं,जहां नदी सीमा विभाजित नहीं है। वहां खेतों की मेड़ से सीमा विभाजित है। उत्तराखंड के उधम सिंह नगर में मेलाघाट सीमा चौकी के आस—पास ये ही ज़मीन विभाजन है, जहां नेपाल की खुली सीमा पर लोग एक कदम पार कर नेपाल आ जा सकते हैं। अक्सर इसी इलाके से अवांछित तत्वों का आना—जाना रहता है। उत्तर प्रदेश में पीलीभीत, लखीमपुर, गोरखपुर और अन्य जिलों में भी यही हालात हैं। खबर ये भी है कि नेपाल ने नोमेन्स लैंड पर ही अपनी सीमा चौकियां बनानी शुरू कर दी है, जबकि इन्हें सीमा पिलर से 50 मीटर दूर बनानी चाहिए। भारत के एसएसबी की सीमा चौकियां भी इतनी ही दूर बनी हुई हैं। नेपाल ने लीपूपास सीमा विवाद पर अपनी संसद में नए नक्शे को लेकर कूटनीति शुरू की हुई है। इसके साथ—साथ उसने सीमा चौकियों पर चीन के सहयोग से कैमरे लगाने शुरू कर दिए हैं।
 
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ब्रह्मदेव मंडी का सीमा पिलर,जहां खड़े हैं प्रहरी

नेपाल को भारत रोजगार से लेकर कई व्यापारिक सुविधाएं देता रहा है। परंपरागत रोटी—बेटी का रिश्ता निभाता रहा है, लेकिन राजशाही की समाप्ति के बाद से नेपाल बदल गया है। वहां सशस्त्र संघर्ष माओवादियों ने चीन के संरक्षण में चलाया। वहां की युवा पीढ़ी में भारत के प्रति जहर घोला जा रहा है। वहां के स्कूलों और विश्वविदृयालयों में में चीनी भाषा पढ़ाई जा रही है और इनके शिक्षकों का वेतन भी चीनी दूतावास देता है। भारत से नेपाल दूर हो रहा है, ऐसा आभास पिछले कई सालों से हो रहा है। नेपाल चीन की सीमा खुली है। वैसे ही भारत नेपाल सीमा खुली हुई है। जिस प्रकार के हालात नेपाल सरकार पैदा कर रही है, जिस तरह से नोमेन्स लैंड पर कब्जे करवाये जा रहे हैं, उसे देखते हुए भारत को भी अपनी सीमा पर चौकसी और मजबूत करनी चाहिए। सीमा खुली रहे किंतु उसके मार्ग निर्धारित हों, बाकी सीमा पर पाकिस्तान, बांग्लादेश सीमा की तरह तारबाड़ लगाई जानी चाहिए। इससे भारत की आंतरिक सुरक्षा भी मजबूत होगी ।