दिल्ली दंगों में पिंजरा तोड़ संगठन की भूमिका, साजिश और गिरफ्तारी

    दिनांक 03-जून-2020   
Total Views |
दिल्ली दंगा मामले में जैसे जैसे पुलिस की जांच आगे बढ़ती जा रही है नए नए खुलासे होते जा रहे हैं। पिंजरा तोड़ नाम का संगठन चलाने वाली जेएनयू की छ़ात्राओं नताशा और देवांगना की गिरफ्तारी के बाद लिबरल गैंग सक्रिय है और उनके पक्ष में नैरेटिव बनाने की कवायद चल रही है

collage pingra tod _1&nbs
बीते कुछ दिनों से पिंजरा तोड़ नाम का  संगठन चर्चा में है। वामपंथी रुझान वाले वेबसाइट और नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले संगठनों और एनजीओ लगातार इनके संबंध में लिख रहे हैं, इस कथित संगठन की दो कार्यकर्ता नताशा नरवाल और देवांगना कलीता की हुई गिरफ्तारी की वजह से। दोनों कार्यकर्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हैं। टुकड़े—टुकड़े गैंग के तमाम सदस्यों द्वारा इनके पक्ष में बयान आ चुके हैं। ट्वीट किए जा रहे हैं।
तमाम ऐसे एक्टिविस्ट और संस्थाएं जो नक्सलियों से लेकर आतंकवादियों तक से मानवाधिकार की आड़ में छुपकर सहानुभूति दिखाते हैं, इन दोनों के पक्ष में पत्र जारी कर रहे हैं। बयान दे रहे है। जेएनयू में इनके पक्ष में गुप्त बैठक लॉक डाउन के दौरान भी आयोजित हो रही हैं। पूरे देश में नरवाल और कलीता के लिए फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री के शब्दों में 'अर्बन नक्सलियों का समूह' भी न जाने क्यों आवाज उठा रहा है। वास्तव में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भाषा में यही लोग एंटिफा (एंटी फासिस्ट) हैं। जो मानवता के नाम पर तमाम अमानवीय गतिविधियों में शामिल पाए जाते हैं।
अब देखिए मार्च के पहले सप्ताह में दिल्ली हिंसा में मरने वालों का आंकड़ा 50 के पार पहुंच गया था। जिनमें सबसे अधिक 38 लोगों की मौत गुरु तेग बहादुर अस्पताल में हुईं। पुलिस ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा को लेकर अब तक 350 से अधिक एफआईआर दर्ज की हैं। जिनमें 44 मामले आर्म्स एक्ट के थे। कुल 57 लोगों की गिरफ्तारी हुई। इसमें 33 लोगों पर दंगे में शामिल होने और बवाल करने का आरोप है जबकि 24 लोग रविवार को हिंसा की अफवाह उड़ाने के आरोप में पकड़े गए हैं। इसके अलावा 800 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लेकर पुलिस पूछताछ कर रही है। इतनी बड़ी संख्या में हुई गिरफ्तारी में सिर्फ कुछ लोगों के लिए एक खास समूह क्यों बेचैन है? पिंजड़ा तोड़ कोई इतना बड़ा संगठन तो था नहीं।
दरअसल पिंजरा तोड़ सिर्फ चेहरा छुपाने के लिए एक नाम है। इसमें महत्वपूर्ण नाम हैं नरवाल और कलिता के नाम। यह वास्तव में चौंकाने वाली जानकारी है कि साम्प्रदायिक दंगा भड़कने से पहले, क्षेत्र विशेष में पिंजरा तोड़ की कार्यकर्ता घर—घर जाकर जागरूकता फैला रही थीं।
पिंजरा तोड़ बता रहा था कि दंगे की हालत औरतें क्या करें ?
— घर में गरम खौलता हुआ पानी और तेल का इंतजाम रखें
—बिल्डिंग की सीढ़ियों पर तेल—शैंपू या सर्फ डाल दें
— लाल मिर्च पानी गरम करके डालें या लाल मिर्च का पाउडर रखेंं
— तेजाब की बोतल घर में रखें
— बालकनी/ टेरेस पर ईंट और पत्थर रखें
— कार/बाइक से पेट्रोल निकाल कर रखें
— लोहे के दरवाजों में स्विच से करंट का इंतजाम करें।
— एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग में जाने के लिए रास्ते का इंतजाम करें
— बिल्डिंग के सारे मर्द हजरात एक साथ बिल्डिंग न छोड़े, कुछ लोग महिलाओं की सुरक्षा के लिए रूके।
हो सकता है ट्रायल के दौरान न्यायालय में इसे दंगाइयों से बचने के लिए जागरूकता अभियान बताकर दलीलें दी जाएं, लेकिन यह जागरूकता से अधिक दंगे के षडयंत्र का दस्तावेज जान पड़ता है। ऐसा कहने के पीछे आधार ऑप इंडिया की वह रिपोर्ट है, जिसमें इनके संबंध में बताया गया है कि ''नताशा और देवांगना ने मुसलमानों को भड़काने के लिए पूरी रणनीति तैयार की थी। नताशा और देवांगना ने साजिश रच के 66 फुटा रोड को ठप करवाया था। दोनों का काम जाफराबाद तक ही सीमित नहीं था। इन्होंने कई अन्य इलाकों में घूम-घूम कर मुसलमानों को भड़काया और दंगों में भाग लेने को उकसाया।''
नरवाल और कलीता हैं कौन ?
नताशा नरवाल और देवांगना कलीता जवाहर लाल नेहरू विवि की छात्राएं हैं। कलीता सेंटर फॉर वीमेन स्टडीज में एमफिल कर रहीं हैं। नरवाल सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज में पीएचडी की छात्रा हैं। इन दोनों ने मिलकर 2015 में पिंजरा तोड़ बनाया था। इन दोनों के खिलाफ दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल, जाफराबाद पुलिस और क्राइम ब्रांच द्वारा जांच कर रही हैं। नताशा नरवाल की गिरफ्तारी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (UAPA) के अन्तर्गत हुई है।
दिल्ली पुलिस के अनुसार नताशा नरवाल के साथ अन्य मामले में गिरफ्तार की जा चुकी जेएनयू की छात्रा देवांगना कलिता की दंगों में भूमिका क्राइम ब्रांच के जांच के दायरे में है।
यमुना पार में हुए दंगों के संबंध में आठ सौ से अधिक लोगों की गिरफ्तार हुई है, सोचने वाली बात है कि पूरा लेफ्ट लिबरल गिरोह इन दोनों को बचाने के पीछे क्यों पड़ा है। आइसा, दिशा, डीएसयू, एसएफआई जैसे छात्र संगठन जो एक दूसरे खिलाफ छात्र राजनीति करते हैं लेकिन इन दो छात्राओं के लिए एक साथ आ गए। ऐसा लगता है कि इन दोनों से सही पूछ ताछ हो तो वामपंथ गिरोह की बहुत सारी गंदगी सामने आएगी।
दिल्ली में हुए दंगों को जिसने देखा और समझा, वह देख—बुझकर कह सकता है कि इतने बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक दंगा बिना किसी पूर्व योजना के नहीं भड़क सकता। अब जब सारे तार जुड़ने लगे। जब ऐसा लग रहा है कि इस पूरी कहानी के मास्टर माइंड का नाम अब सामने आ सकता है, देश भर के लेफ्ट लिबरल बौखला गए है। देश के कानून को अपना काम नहीं करने दे रहे।
यदि मानवाधिकार से लेकर वामपंथी छात्र राजनीति करने वाले संगठन अपनी मांग को लेकर ईमानदार होते तो वे उन 800 लोगों की रिहाई की मांग भी करते, जो बिना चार्जशीट के जेल में हैं लेकिन इनका पूरा अभियान ही जब बदनीयती की भेंट चढ़ा हुआ है, इनसे किसी सकारात्मक पहल की अपेक्षा ही कैसे की जाए?
पूर्वाग्रह से भरी कॉमरेड नरवाल
नताशा नरवाल की एक स्टोरी 23 जनवरी 2018 को न्यूज लॉन्ड्री पर प्रकाशित हुई थी, जिसे पढ़कर कोई समझ सकता था कि कैसे एबीवीपी के मंच पर अक्षय कुमार को देखकर उनके अंदर का वामपंथ पूरे लेख में कुलांचे मार रहा है। उनके अंदर की सारी पीड़ा लेख में साफ—साफ झलक रही थी। वर्ना नरवाल यह शिकायत क्यों करती कि एबीवीपी के छात्र महिलाओं के मुद्दे पर कैम्पस में इकट्ठे क्यों हुए हैं? जबकि वे 'पिंजरा तोड़' की गतिविधियों को सहयोग नहीं करते। यह लेख हास्यास्पद इस अर्थ में था क्योंकि न्यूज लॉन्ड्री जैसी वेबसाइट एक ऐसा लेख प्रकाशित कर रही है, जिसमें देश के सबसे अधिक कार्यकर्ताओ वाले छात्र संगठन विद्यार्थी परिषद की आलोचना की गई थी और दिल्ली में गुमनाम सी पिंजरा तोड़ नाम की संस्था की तारीफ में कसीदे पढ़े गए जो उस संस्था को बनाने वाली नरवाल खुद कर रही थी। यह लेख लिखने से पहले यदि नरवाल ने विद्यार्थी परिषद के किसी छात्र नेता से इस संबंध में बात कर ली होती तो कोई भी बता देता कि परिषद रचनात्मक आंदोलनों के साथ तो खड़ा हो सकता है लेकिन अराजक तत्वों के साथ कभी खड़ा नहीं हो सकता। 'पिंजरा तोड़' की अराजकता का रिकॉर्ड भी कैम्पस में कुछ ऐसा ही है। इसी का परिणाम था कि दिल्ली विश्वविद्यालय में कभी 'पिंजरा तोड़' ने कोई चुनाव तक नहीं लड़ा और जिस आईसा (आल इंडिया स्टूडेंड एसोसिएशन) से उनकी सबसे अधिक नजदीकी है, वह कभी चुनाव जीती नहीं। वैसे जिस वेबसाइट पर नताशा नरवाल की खबर प्रकाशित हुई थी, वहां पहले भी विद्यार्थी परिषद के लिए भ्रामक खबर छपती रही है। वह न्यूज—व्यूज वेबसाइट कम प्रोपेगेंडा साइट अधिक है