नारी शक्ति: संकट में मजबूत संबल

    दिनांक 03-जून-2020
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पश्यन्ति शुक्ला
कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई में महिलाओं का योगदान पुरुषों से कम नहीं है। देशभर में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत चलने वाले स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी करीब 2 लाख ग्रामीण महिलाएं मार्च मध्य से अब तक 10 करोड़ मास्क, 2 लाख से अधिक पीपीई किट बना चुकी हैं। कुछ महिलाएं तो अपनी सेहत की परवाह न करते हुए भी मदद का हाथ बढ़ा रही हैं
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पंजाब-बहार: 80 वर्ष की गुरदेव कौर की एक आंख कमजोर है, फिर भी जरूरतमंदों के लिए  मास्क बनाती हैं,
राज्य ग्रामीण आजीविका के तहत ‘जीविका दीदी’ मास्क बनाने के साथ लोगों को जागरूक भी कर रही हैं।


24 मार्च, 2020 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार 21 दिन के संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा की, तभी यह संकेत मिल गया था कि कोरोना संकट देश के सामने बड़ी चुनौती प्रस्तुत करने वाला है। हालांकि तब यह स्पष्ट नहीं था कि चीन से शुरू हुई यह वैश्विक महामारी भारत में कितना व्यापक रूप धारण करेगी, परन्तु इटली, लंदन, अमेरिका आदि देशों की तात्कालिक स्थिति देख कर लग गया था कि चुनौती जितनी दिखाई दे रही है, उससे बहुत बड़ी होगी। आने वाले समय में जनता की भागीदारी के बिना इससे निपटना सरकार और प्रशासन के लिए संभव नहीं होगा।

आज लॉकडाउन लागू हुए दो माह से अधिक बीत चुके हैं। इस दौरान हमने पूरे भारत में कोरोना को पैर पसारते तो देखा ही, यह भी देखा कि कैसे प्रथम पंक्ति सेवाओं से जुड़े लाखों लोग अपना घर-परिवार छोड़कर देश को इस महामारी से बाहर निकालने के लिए निरंतर जूझ रहे हैं। हमारे सामने ऐसे उदाहरण भी आए जब सैकड़ों संगठनों, समूहों, गैर-सरकारी संगठनों से जुड़े या निजी स्तर पर लोग विभिन्न स्तरों पर कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में एक योद्धा की तरह खड़े दिखे। इन योद्धाओं में मातृशक्ति भी कई महत्वपूर्ण मोर्चों पर नि:स्वार्थ भाव से सेवा के लिए समर्पित दिख रही हैं।

कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई में महिलाएं हर स्तर पर अपना योगदान दे रही हैं, चाहे वे डॉक्टर हों नर्स पुलिसकर्मी या गृहणी। गली-मुहल्लों में संक्रमण की जांच, मरीजों की सेवा से लेकर लोगों में जागरूकता फैलाने, मास्क, सेनिटाइजर और पीपीई किट बनाने सहित हर स्तर पर महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में चिकित्सा और सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की भागीदारी 70 प्रतिशत है। यानी यह दोनों क्षेत्र, जिनका इस वैश्विक बीमारी से निपटने में अतुलनीय योगदान हैं, महिलाओं पर बहुत अधिक निर्भर हैं। इन क्षेत्रों में महिलाओं की बड़ी भागीदारी का एक अर्थ यह भी हुआ कि कोरोना का जोखिम पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए कहीं अधिक है। फिर भी विषम परिस्थितियों में महिलाएं अपने-अपने क्षेत्र में काम कर रही हैं।

देशभर में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत चलने वाले स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी लगभग 2 लाख ग्रामीण महिलाएं मार्च मध्य से अब तक 10 करोड़ से अधिक मास्क बना चुकी हैं। यही नहीं, सैकड़ों महिलाएं देश के अनेक राज्यों में अग्रिम पंक्ति सेवाओं से जुड़े योद्धाओं के लिए 2 लाख से अधिक पीपीई किट बना चुकी हैं। आवश्यकता पड़ने पर ये एप्रन, टोपी, दस्ताने, जूते के कवर, गाउन और फेस शील्ड आदि भी बना रही हैं। कुल मिलाकर राज्यों में अनेक समूहों से जुड़ी या व्यक्तिगत स्तर पर काम करने वाली महिलाएं इन कार्यों में स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य सरकारों के दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन कर रही हैं।

जनसंख्या की दृष्टि से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों ने जिन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया, आज वही संकट की घड़ी में कहीं ‘दीदी किचन’ चला रही हैं तो कहीं मास्क और पीपीई किट का निर्माण कर रही हैं। राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 20 मई तक प्रदेश में 12,709 स्वयं सहायता समूह द्वारा करीब 56,34,939 मास्क बनाए गए हैं। इनमें से करीब 43,05,822 मास्क बिक चुके हैं। यही नहीं, राज्य सरकार के संरक्षण में 373 स्वयं सहायता समूहों ने लगभग 26,901 पीपीई किट भी बनाई हैं। प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद 70 से अधिक महिलाएं भी मास्क बनाकर कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में योगदान दे रही हैं। कानपुर के नारी बंदी निकेतन की महिलाएं सैनिटरी नैपकिन भी तैयार कर रही हैं। वैसे तो बंदी निकेतन में नैपकिन बनाने का काम दो साल से चल रहा है, लेकिन प्रशासन को इसका फायदा लॉकडाउन के दौरान मिला। हाल ही में संस्था ने 51 हजार सैनिटरी नैपकिन प्रशासन की मदद से मलिन बस्तियों की महिलाओं तक पहुंचायी हैं।

बिहार में राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत काम करने वाली ‘जीविका दीदी’ न केवल मास्क बना रही हैं, बल्कि कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए लोगों को जागरूक भी कर रही हैं। स्वयं-सहायता समूहों के माध्यम से यह महिलाएं अपने-अपने क्षेत्रों में वीडियो, गीतों और आॅडियो संदेशों की मदद से आइसोलेशन, सामाजिक दूरी, क्वारंटीन और हाथ धोने की सही विधि के प्रति लोगों को जागरूक कर रही हैं। साथ ही, राशन कार्ड के लिए परिवारों का सर्वेक्षण, किचन गार्डन किट के वितरण के अलावा विभिन्न अस्पतालों में भर्ती मरीजों को मुफ्त भोजन भी उपलब्ध करा रही हैं। जीविका दीदी सेनिटाइजर का भी निर्माण कर रही हैं और इसके लिए इन्हें यूनिसेफ द्वारा प्रशिक्षण प्रशिक्षण दिया गया है।

इसी तरह, झारखंड के ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के तहत ‘सखी मंडल’ से जुड़ी हजारों महिलाएं महामारी की चुनौती से निपटने के लिए ग्राम पंचायत के साथ कमर कस कर खड़ी हैं। राज्य के 2.46 लाख सखी मंडल से लगभग 32 लाख ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हैं। प्रदेश में एक भी व्यक्ति भूखा न सोए, इस उद्देश्य से 3 अप्रैल, 2020 से ‘मुख्यमंत्री दीदी किचन’ की शुरुआत हुई। शुरु में झारखंड में कुल दीदी किचन की संख्या लगभग ढाई हजार थी, लेकिन धीरे-धीरे इस का विस्तार होता गया और वर्तमान में राज्य की सभी पंचायतों में 7 हजार मुख्यमंत्री दीदी किचन संचालित हो रहे हैं। इनमें अब तक 2 करोड़ से भी अधिक थालियां बन कर जरूरतमंदों तक पहुंच चुकी हैं। जिला प्रशासन एवं सखी मंडल की महिलाएं मास्क और हैंड सेनिटाइजर भी बना रही हैं। साथ ही, राज्य में करीब 1463 बैंकिंग सखियों के माध्यम से करीब 7 लाख से ज्यादा ग्रामीणों तक इस मुश्किल समय में भी बैंकिंग सेवाएं पहुंच रही हैं।
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झारखंड:  ‘दीदी किचन’ के तहत दो करोड़ भोजन की थालियां जरूरतमंदों तक पहुंचाई गईं।

राज्य में काम कर रही लगभग 1463 बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट सखी गांव-गांव में बैंकिग सेवाएं पहुंचा रही हैं। आपदा की इस घड़ी में बैंकिंग सखी मनरेगा मजदूरी, वृद्धावस्था पेंशन, विधवा, बैंक से नकद निकासी समेत हर तरह की बैंकिंग सेवाएं दे रही हैं। इनके द्वारा बीमा का भी काम किया जा रहा है।

मध्य प्रदेश में भी महिलाएं कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम के लिए डटकर खड़ी हैं और यथासंभव योगदान दे रही हैं। स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं वैश्विक आपदा की इस घड़ी में न केवल आम जनता को 10 रुपये में मास्क उपलब्ध करा रही हैं, बल्कि प्रशासन को भी मांग के अनुरूप सहयोग दे रही हैं। कोरोना संक्रमित क्षेत्र में तैनात अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं के लिए गांव में सिलाई केंद्र्र पर महिला सहायता समूह द्वारा पीपीई किट बनाई जा रही हैं।

इसके जरिए महिलाओं को लॉकडाउन के बीच रोजगार उपलब्ध हो रहा है और प्रशासन की मांग की आपूर्ति भी निर्धारित समय सीमा में हो जा रही है। इसी तरह, राजधानी भोपाल में महिला पुलिसकर्मियों का एक समूह घंटों ड्यूटी करने के बाद अपने साथियों के लिए मास्क तैयार कर रहा है। अब तक ये महिला पुलिसकर्मी एक लाख से अधिक मास्क तैयार कर चुकी हैं। इतना ही नहीं, इन महिलाओं ने अप्रैल में अपने साथी पुलिसकर्मियों के लिए रसोईघर की भी शुरुआत की जहां हर दिन 115 पुलिसकर्मियों का भोजन बन रहा है। चंबल के बीहड़ इलाकों में रहने वाली महिलाएं भी संकट की इस घड़ी में पीछे नहीं है। यहां महिलाओं के कई समूह मास्क और सैनिटरी नैपकिन तैयार कर रही हैं। शुरू के पांच दिनों में ही 40 महिलाओं का समूह 7,000 से अधिक मास्क बनाकर प्रशासन की मांग के अनुसार विभिन्न विभागों को पहुंचा चुका है।

छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन 'बिहान' से जुड़ी महिलाओं ने लॉकडाउन के 10 दिन के अंदर ही 5 लाख से अधिक मास्क का बना लिया। साथ ही नौ जिलों में 23 स्वयं-सहायता समूहों ने पहले सप्ताह में 600 लीटर से अधिक सेनिटाइजर बनाया। वहीं, राजस्थान में 2,000 स्वयं सहायता समूह की महिलाएं कोरोना से उपजी इन विपरीत परिस्थितियों में कर्मवीर की भांति डटकर खड़ी हैं। हिन्दुस्तान जिंक की सखी परियोजना से जुड़ी ये महिलाएं कंपनी की इकाई के आसपास रहती हैं। इन महिलाओं ने अपने-अपने क्षेत्र में 75 ग्राम संगठनों के जरिए जरूरतमंद लोगों के लिए खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए अनाज बैंक की स्थापना की।
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पारालंपिक पदक विजेता दीपा मलिक ने बेटी के साथ श्रमिकों तक भोजन पहुंचाया
वायरॉलोजिस्ट मीनल भोसले ने देश की पहली कोरोना परीक्षण किट बनाई

‘द ग्रेन बैंक’ पहल के तहत अनाज के योगदान के लिए लगभग 20,000 महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों के जोड़ा गया है। ओडिशा में स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने शुरुआती कुछ दिनों में ही आम लोगों के बीच वितरण के लिए 10 लाख से अधिक मास्क बना लिए। असम में लगभग 10,600 स्वयं सहायता समूहों ने 51 लाख से अधिक मास्क बनाए, जिनमें 31 लाख से अधिक मास्क महिलाएं बेच भी चुकी हैं। इसी तरह, हिमाचल प्रदेश में 2,000 महिला सदस्यों के साथ स्वयं सहायता समूह मास्क की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पूरी मुस्तैदी से जुटा है। कुछ समूह तरल साबुन बना रहे हैं। आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मिजोरम, नागालैंड, तमिलनाडु की स्वयं सहायता समूह इकाइयां लॉकडाउन के 20 दिन के अंदर ही 50,000 लीटर हैंड वॉश उत्पादों का निर्माण करने में समर्थ रहीं।

इनके अलावा, कोरोना के चलते उत्पन्न हुई विषम परिस्थितियों में व्यक्तिगत स्तर पर भी योगदान देने वाली महिलाओं की कमी नहीं हैं। कोरोना वायरस के खिलाफ इस जंग में महिलाएं आगे बढ़कर काम कर रही हैं। वायरोलॉजिस्ट मीनल दखावे भोसले, जिन्होंने भारत की पहली कोरोना वायरस टेस्टिंग किट बनाई। पुणे में ‘माई लैब डिस्कवरी’ की अनुसंधान एवं विकास विभाग की प्रमुख मीनल ने अपनी डिलीवरी के एक दिन पहले प्रशासन को यह परीक्षण किट भेजी। इन्हीं की तरह कोरोना महामारी के शुरुआती दिनों में एक नाम काफी चर्चित रहा, वह थीं कैप्टन स्वाति रावल। 22 मार्च को इटली में फंसे भारतीय छात्रों की मदद के लिए जब बोइंग 777 विमान भेजा गया तो कैप्टन राजा चौहान के साथ मिलकर छात्रों को सुरक्षित भारत वापस लाने वाली कैप्टन
स्वाति रावल थीं। स्वाति इस महामारी के दौरान राहत एवं बचाव अभियान के तहत विमान उड़ाने वाली पहली महिला पायलट बनीं।
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इटली में फंसे भारतीयों के लिए फरिश्ता बनीं एयर इंडिया की पायलट स्वाति रावल

इनके अलावा, कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं, जो भले ही राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां न बटोर पाई हों, लेकिन कोरोना के विरुद्ध युद्ध में उनका योगदान किसी योद्धा से कम नहीं रहा। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में एसिड अटैक पीड़िता पांच महिलाओं संगीता कुमारी, बदामा देवी, शन्नो सोनकर, विमला देवी और सोमवती ने मिलकर फरवरी में एक छोटा रेस्तरां शुरू किया था। लेकिन लॉकडाउन के कारण इनका नया व्यवसाय ठप पड़ गया। पर ये हिम्मत नहीं हारीं और परेशानी को पीछे छोड़ते हुए प्रतिदिन 200 भोजन के पैकेट बांटने का फैसला किया। इसी तरह, तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली के एक निजी अस्पताल में काम करने वाली 25 साल की एस. विनोथिनी की कहानी भी कम प्रेरणादायी नहीं है। आठ महीने का गर्भ होने के बावजूद उन्होंने कोरोना के मरीजों का इलाज करने का फैसला किया और इसके लिए रामनाथपुरम के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में काम करने के लिए उन्होंने 250 किलोमीटर का सफर तय किया।

इसी कड़ी में चेन्नई की सड़कों पर जरूरतमंदों तक खाना पहुंचाने वाली ‘फूड बैंक’ की संस्थापक स्नेहा मोहनदास का नाम भी आता है। इस वैश्विक महामारी ने लोगों के समक्ष भोजन का संकट खड़ा कर दिया है, स्नेहा और उनका एनजीओ ‘फूड बैंक’ ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन के साथ मिलकर बेसहारा और बेघर लोगों तक पका पकाया खाना पहुंचा रहा है। भारत की इकलौती महिला पारालंपिक पदक विजेता दीपा मलिक ने अपनी बेटी देविका के साथ मिलकर लॉकडाउन के दौरान दिहाड़ी मजदूरों को पका हुआ भोजन देने की पहल की। ‘हैप्पी जनता किचन’ नामक इस मुहिम के तहत मां-बेटी की यह जोड़ी उत्तर प्रदेश के कानपुर में जरूरतमंदों को भोजन करा रही है। इसी तरह, पंजाब के मोगा की रहने वालीं 98 साल की गुरदेव कौर का जज्बा भी किसी से कम नहीं है। गुरदेव की एक आंख में रोशनी नहीं है, फिर भी वह प्रतिदिन लगभग 8 घंटे मास्क बनाती हैं और जो लोग इसे खरीदने में सक्षम नहीं हैं उन्हें नि:शुल्क देती हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह उन्हें सम्मानित भी कर चुके हैं।

कोरोना का संकट अभी टला नहीं है। देश में कोरोना के मामले जिस तरह बढ़े हैं, उसे देखते हुए यह स्पष्ट है कि संक्रमण के इस दौर में इससे बचने और निपटने की लड़ाई अभी लंबी चलेगी। इसलिए महिलाओं की भूमिका आने वाले समय में और भी महत्वपूर्ण रहने वाली है।