दक्षिण में सांस्कृतिक सूर्योदय

    दिनांक 30-जून-2020
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 प्रो. चंदन चौबे

तमिलनाडु सरकार ने उन स्थानों के नाम बदल दिए हैं, जिनके प्राचीन नाम को अंग्रेजों ने परिवर्तित कर दिए थे। अपनी संस्कृति को सहेजने की दिशा में इसे एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह सांस्कृतिक सूर्योदय भारतीयता के लिए कल्याणकारी है


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‘कोयम्बटूर’ को अब ‘कोयंपुत्थथूर’ के नाम से जाना जाएगा। यहां के रेलवे स्टेशन के बाहर सांस्कृतिक जागरण के लिए ऐसे चित्र पहले से ही बने हुए हैं। 

गत दिनों तमिलनाडु सरकार ने एक महनीय कार्य करते हुए प्रदेश के 1,018 स्थानों का नाम परिवर्तित कर दिया है। उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों के दीर्घकालिक शासन के दौरान राज्य के बहुत सारे स्थलों के नाम उनके मूल तमिल रूप से बहुत अधिक परिवर्तित हो गए थे। अत: ये बदले हुए नाम हमें अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन व्यवस्था की याद दिलाते थे। राज्य सरकार ने इन सभी के मूलनामों को पुनस्स्थापित करके राज्य की भाषिक और सांस्कृतिक भावना को मजबूत करने का कार्य किया है।
तमिलनाडु में राज्य की राजधानी के पास एक स्थान है- ‘तिरुवालिकेन्नी’ जिसका तात्पर्य है ‘कमल से युक्त सरोवर।’ अंग्रेजी शासन के दौरान इस स्थान का नाम ‘ट्रिप्लीकेन’ रख दिया गया था। यह नाम इस स्थान से किसी भी प्रकार का कोई सार्थक संबंध नहीं स्थापित करता था। सरकार ने इस स्थान का नाम पुन: ‘तिरुवालिकेन्नी’ रख दिया है।

इस प्रकार वहां की स्थानीय जनता उच्चारण के स्तर पर इस स्थान से अधिक भावनात्मक रूप में जुड़ सकी है। इसी प्रकार से उच्चारण के स्तर पर भिन्नता वाले एक और स्थल ‘कांदलूर’ का नाम बदलकर अब ‘कांतलूर’ कर दिया गया है, क्योंकि तमिल में अंग्रेजी के ‘दा’ का उच्चारण एक भिन्न प्रकार से ‘ता’ रूप में होता है। इसी प्रकार से ‘कोयम्बटूर’ को अब ‘कोयंपुत्थथूर’, ‘मयलापोर’ को अब ‘मयलापपरो’ तथा ‘वेल्लोर’ को अब ‘वेल्लूर’ कहा जाएगा। तमिल भाषा और साहित्य के प्राचीन ग्रंथों और अभिलेखों में इन स्थानों के नाम इसी प्रकार वर्णित किए गए हैं। यह तमिलभाषी लोगों के स्थान विशेष से रागात्मक लगाव तथा भूमि के प्रति उनके भाव संबंधों को अधिक मजबूत बनाएगा।

नाम परिवर्तन के सांस्कृतिक संदर्भ
किसी भी व्यक्ति, स्थान, मत व क्षेत्र का नाम उसकी समग्र सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है। अतएव नाम विशिष्टार्थव्यंजक होने के साथ-साथ व्यक्ति या स्थान को परिवेशगत विराटता प्रदान करता है। दर्शनशास्त्र ‘नाम’ को एक अमूर्त तत्व कहता है, तो भाषाविज्ञान की शब्दावली में नाम एक यादृच्छिक संज्ञा है। अर्थात् नाम को व्यक्ति या स्थान पर आरोपित किया जाता है या मान लिया जाता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति या स्थान में नाम का कोई विशेष चिन्ह होना आवश्यक नहीं। अत: नाम एकसमष्टिबोधक भाव है, जो किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थिति या स्थान को विराट बनाता है। नाम का महत्व समाजसापेक्ष होता है। अत: नाम को समाज के द्वारा माना जाना अनिवार्य है। यदि व्यक्ति अपने नाम के द्वारा अपना वैशिष्ट्य निरूपित करने का प्रयास करे, किन्तु समाज द्वारा व्यक्ति को मान्यता प्राप्त न हो, समाज उसको उसके नाम के द्वारा विशिष्टता प्रदान न करे तो वह नाम अनुमन्य नहीं होगा। अत: नाम व्यक्ति अथवा वस्तुवैशिष्ट्य बोधक होने के साथ-साथ समाजप्रेक्षा भी रखता है।

वे आक्रांता केवल कलाभंजक, मूर्तिभंजक, शिल्पभंजक ही नहीं थे, अपितु वे सौन्दर्यभंजक तथा सद्धर्मभंजक भी थे। यदि हमें अपने सद्धर्म और सौंदर्य की पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित करनी है तो अपने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक प्रबोध की पुनस्स्थापना के लिए भी पुन: प्रयत्न करने होंगे।
-पं.दीनदयाल उपाध्याय (काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर की भग्न चारदीवारी के संदर्भ में)


भारतीय संस्कृति में नाम का अपना एक अलग ही महत्व है। प्रकृति, तीर्थ, देव तथा लोक का विशिष्टार्थ उनका नाम ही है। आदियुगीन समय से लेकर आज तक विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों स्थानों, कार्यों एवं समाजों के नामों की एक अनन्त सूची हमें प्राप्त होती है। दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां देवाराधन के लिए ‘सहस्रनामस्तोत्र’ की रचना की गई। नाम के द्वारा विशिष्टता का बोध होता है, अत: सहस्रनामोच्चारण के द्वारा देवता की स्तुति तो होगी ही, इसके साथ-साथ उपासना की एक नई पद्धति ‘नामसाधना’ का भी विकास होगा।

प्राचीन काल में व्यक्ति के जीवन में नाम का बहुत अधिक महत्व होता था। इसी कारण से हमारे यहां सोलह प्रधान संस्कारों में एक नामकरण नामक संस्कार का भी प्रावधान है। व्यक्ति की जन्मलग्नस्थ राशि के अनुसार ही उसका नाम रखा जाता था। इन नामों में वंश, जाति, कुल अथवा गोत्र की विशिष्टता समाविष्ट होती थी। उदाहरण के लिए कश्यप के पुत्र को काश्यप, हिमालय की पुत्री को गिरिजा तथा दिति के पुत्र को दैत्य कहा जाता था। रावण के तीन अन्य नामों में पौलस्त्य-उसके कुल अथवा गोत्र का सूचक है, दशानन- उसकी अपनी शारीरिक विशिष्टता का सूचक तथा लंकेश-उसके अधिकारों और शासन वैशिष्ट्य का सूचक है। कभी-कभी व्यक्ति से जुड़ी वस्तुओं की विशिष्टता भी उस व्यक्ति के नाम के लिए प्रयुक्त होती थी। जैसे राजा दशरथ का रथ दसों दिशाओं में समान गति से प्रविष्ट होने में सक्षम था, अत: यह राजा के नाम का वैशिष्ट्य बन गया। गोस्वामी तुलसीदास ने नाम के प्रभाव को वर्णित करते हुए लिखा है-
नाम प्रभाउ जानि सिव नीके।
कालकूट फल दीन अमी के।।
राजा दशरथ के चारों राजकुमारों का नामकरण सभी के गुण-वैशिष्टय के अनुरूप ही होता है।
तुलसीदास लिखते हैं-
बिस्व भरन पोसन कर जोई।
ताकर नाम भरत अस होई।।
तात्पर्य यह है कि हमारे यहां नाम की सामाजिक एवं सांस्कृतिक सार्थकता रही है। यहां नाम उस प्रकार नहीं रखे जाते हैं जैसे कि यूरोप और पश्चिमी देशों की शब्दावलियों में रखे गए हैं। हमारे यहां नाम की सोद्देश्यता उसे सुन्दर, सुष्ठु और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।

शायद यही कारण था कि जब हमारे देश में विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए तो उन्होंने यहां के विभिन्न स्थानों के नाम परिवर्तित किए। नाम परिवर्तन की यह पूरी प्रक्रिया एक योनाबद्ध तरीके से हुई। सूफियों, औलियाओं और अनेक मुल्ले-मौलवियों के कहने पर विभिन्न बादशाहों ने इस नाम परिवर्तन की प्रक्रिया को बखूबी अंजाम दिया। हिन्दू समाज को गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर इन सारे परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए बरगलाया गया। नाम परिवर्तन की इस सुनियोजित रणनीति का शिकार हमारे यहां के सांस्कृतिक और धार्मिक स्थल तो हुए ही, साथ ही साथ समाज में निहित उन अनेकानेक स्थलों के स्मृतिबोध को भी नष्ट करने का प्रयास किया गया।


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 ‘ट्रिप्लीकेन’ को अब ‘तिरुवालिकेन्नी’ कहिए।


पौराणिक काल में हमारे यहां के प्रसिद्ध नगर ‘इन्द्रप्रस्थ’ को ‘दिल्ली’ बना दिया गया। ‘इन्द्रप्रस्थ’ नाम के पीछे पूरी एक गौरवमयी ऐतिहासिक परंपरा रही है। खाण्डवप्रस्थ नामक वन को पांडवों ने साफ करके मय दानव के सहयोग से ‘इन्द्रप्रस्थ’ नामक भव्य नगर का निर्माण किया था। अत: ‘इन्द्रप्रस्थ’ नाम के पीछे देव, मनुष्य और दानवों की एकीकृत सर्जनशीलता और सांस्कृतिक ऐक्यभाव का निहितार्थ समाहित है। किन्तु इस नाम को विकृत करके दिल्ली बना देने के पीछे एक ही उद्देश्य है- हमारे गौरवशाली सांस्कृतिक वैभव की परंपरा को तमावर्त में तिरोहित कर देना। आज के समय में राजस्थान में स्थित ‘अजमेर’ को कभी प्राचीनकाल में ‘अजयमेरु’ कहा जाता था। सूफी-औलियाओं का ठिकाना बनने के कारण इसे ‘अजमेर’ कहा जाने लगा। ‘अजमेर’ फारसी के ‘आजमी’ से ध्वन्यात्मक तुलना करता है, अत: ‘अजमेर’ मुसलमानों की परंपरा के अधिक करीब है। राजस्थान के अन्य नगरों के साथ यह नहीं हुआ है, क्योंकि वहां के मुसलमान आक्रांताओं ने अपना स्थायी ठिकाना नहीं बनाया था।
‘कांदलूर’ का नाम बदलकर अब ‘कांतलूर’ कर दिया गया है, क्योंकि तमिल में अंग्रेजी के ‘दा’ का उच्चारण एक भिन्न प्रकार से ‘ता’ रूप में होता है। इसी प्रकार से ‘कोयम्बटूर’ को अब ‘कोयंपुत्थथूर’, ‘मयलापोर’ को अब ‘मयलापपरो’ तथा ‘वेल्लोर’ को अब ‘वेल्लूर’ कहा जाएगा। तमिल भाषा और साहित्य के प्राचीन ग्रंथों और अभिलेखों में इन स्थानों के नाम इसी प्रकार वर्णित किए गए हैं।

हमारे देश में ज्ञान केन्द्रों की एक समृद्ध परंपरा रही है। नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय हमारी आदर्श शिक्षण परंपरा के मूर्तिमान स्तंभ थे। तेरहवीं शताब्दी के पहले दशक में बख्तियार खिलजी ने नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया तथा हजारों बौद्ध भिक्षुओं की हत्या कर दी। नालंदा विश्वविद्यालय के अत्यंत विशाल ‘धर्मयज्ञ’ नामक पुस्तकालय को जला दिया गया। लेकिन आज कितने शर्म की बात है कि हमने इन आक्रान्ताओं के नाम से विभिन्न नगरों का निर्माण किया है। बिहार में एक स्थान का नाम ‘बख्तियारपुर’ रखा गया है।

मुगलिया सल्तनत कायम होने से पूर्व ही हमारे देश में कई प्राचीन स्थलों के नाम बदले जा चुके थे। देश के वामपंथी इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से इस पूरी प्रक्रिया को सांस्कृतिक मेल-मिलाप बताया। नाम परिवर्तन की इस प्रक्रिया में हम एक बात प्रधान रूप से पाते हैं कि अधिक कट्टर और जिहादी मानसिकता वाले आक्रांताओं और शासकों ने इन कार्यों में अधिक रुचि ली है। मुहम्मद बिन तुगलक ने राजधानी परिवर्तन करते समय ‘दौलताबाद’ नामक नगर बसाया। सिकन्दर लोदी ने ‘आगरा’ की स्थापना की। यह वही सिकन्दर लोदी था जिसने नगरकोट के ज्वालामुखी मंदिर को तोड़कर उसकी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे और उन्हें कसाइयों को मांस तौलने के लिए दे दिया था।

दिल्ली के मुगल शासक अकबर ने अपने ‘दीन-ए-इलाही’ को लोकप्रिय बनाने की सनक में भारत के अत्यंत प्राचीन एवं पवित्र तीर्थस्थल ‘प्रयागराज’ का नाम बदलकर ‘इलाहाबाद’ कर दिया था। इसी प्रकार उसके वंशज शाहजहां ने अपने आपको अमर बनाने की इच्छा से राजधानी ‘दिल्ली’ में ‘शाहजहानाबाद’ नामक नगर बसा दिया था।

महाराष्टÑ की धरती छत्रपति संभाजी महाराज के अप्रतिम शौर्य, त्याग और बलिदान की साक्षी रही है। वहां पर उन्हीं के निर्दयी हन्ता औरंगजेब के नाम पर ‘औरंगाबाद’ नामक नगर बसाया गया। ये सारे कृत्य हमारे गौरवशाली स्मृतिबोध को नष्ट करने और हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए किए गए।


जब हमारे देश में विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए तो उन्होंने यहां के विभिन्न स्थानों के नाम परिवर्तित किए। नाम परिवर्तन की यह पूरी प्रक्रिया एक योनाबद्ध तरीके से हुई। सूफियों, औलियाओं और अनेक मुल्ले-मौलवियों के कहने पर विभिन्न बादशाहों ने इस नाम परिवर्तन की प्रक्रिया को बखूबी अंजाम दिया। हिन्दू समाज को गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर इन सारे परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए बरगलाया गया।

देश के मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इसे खूब महिमामंडित किया लेकिन हमारी स्मृतियों में इन सभी स्थलों की पूर्व परंपरा सदैव विद्यमान रही। ऐसा ही षड्यंत्र भगवान राम की जन्मस्थली ‘अयोध्या’ के साथ किया गया जिसका नाम मुस्लिम पद्धति के अनुसार ‘फैजाबाद’ रख दिया गया। यथासंभव ऐसे प्रत्येक स्थल जो विशेष रूप से हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े रहे हैं, इन आक्रांताओं के विशेष निशाने पर रहे। उन्होंने वहां की कला, शिल्प, वास्तु-सौन्दर्य को तो नष्ट किया ही, सामूहिक रूप से कन्वर्जन भी कराया और इनके प्राचीन नामों को भी बदल दिया। आज जब हम अपने अतीत की ओर देखते हैं तो हमें अपनी सप्तपुरियों, अष्टादश महाजनपद आदि के कोई भी चिन्ह नजर नहीं आते। बहुत सारे लोग आज इनके नाम भी भुला चुके हैं।

किसी भी राष्टऔर धर्म, संस्कृति और समाज की यथावत रक्षा तभी संभव है, जब हम उसके प्राचीन गौरव और स्मृतिबोध को पुन: स्थापित करें। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने इसी बोध की पुनस्स्थापना की बात अपनी पुस्तक ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’  में की है। काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर की भग्न चारदीवारी को देखकर वे कहते थे, ‘‘वे आक्रांता केवल कलाभंजक, मूर्तिभंजक, शिल्पभंजक ही नहीं थे, अपितु वे सौन्दर्यभंजक तथा सद्धर्मभंजक भी थे। यदि हमें अपने सद्धर्म और सौंदर्य की पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित करनी है तो अपने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक प्रबोध की पुनस्स्थापना के लिए भी पुन: प्रयत्न करने होंगे।’’ स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत देश की सत्ताओं ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि देश में लोकतंत्र की स्थापना के साथ ही अवसरवादी राजनीति और तुष्टीकरण की परंपरा की शुरुआत हो गई।

महाराष्ट की धरती छत्रपति संभाजी महाराज के अप्रतिम शौर्य, त्याग और बलिदान की साक्षी रही है। वहां पर उन्हीं के निर्दयी हन्ता औरंगजेब के नाम पर ‘औरंगाबाद’ नामक नगर बसाया गया। ये सारे कृत्य हमारे गौरवशाली स्मृतिबोध को नष्ट करने और हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए किए गए।

देश के कर्णधारों ने सेकुलरवाद के नाम पर मजहब विशेष को खूब तुष्ट करने के प्रयत्न किए। जो काम बहुत पहले हो जाने चाहिए थे, उनकी शुरुआत आज के समय में हो रही है। इस प्रक्रिया की शुरुआत औरंगजेब नामक अन्यायी और मजहबी  शासक के नाम पर बनी रोड का नाम परिवर्तित करके महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखने के साथ हुई। इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए हरियाणा सरकार ने ‘गुड़गांव’ का तत्समीकरण किया और इसका नाम ‘गुरुग्राम’ रखा। वस्तुत: इन्हीं नामों और प्रतीकों से हम ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जीवनदर्शन और अपनी गौरवशाली परंपरा का प्रबोध प्राप्त कर सकते हैं।

परिवर्तन की इस प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश स्थित हमारे दो अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व धार्मिक महत्व के स्थल ‘प्रयागराज’ और ‘अयोध्या’ के नामों को सरकारी मान्यता प्रदान की गई। कुंभ मेला के अवसर पर देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालु प्रयागराज आते हैं। अब उन्हें ग्लानिपूर्वक नहीं कहना पड़ेगा कि वे अपने तीर्थस्थल ‘इलाहाबाद’ जा रहे हैं। इसी प्रकार ‘फैजाबाद’ को ‘अयोध्या’ के रूप में स्थापित करना प्रकारान्तर से हमारे द्वारा अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों की ओर लौटने की ही प्रक्रिया है।

नाम परिवर्तन के इन सारे प्ररिप्रेक्ष्यों को जानते और समझते हुए हमें इसे राजनीतिक चश्मे से मुक्त होकर देखने की आवश्यकता है। अत: आज हमको अपने सांस्कृतिक परिपार्श्व का संधान करने की आवश्यकता है। हम अपनी भूमि, अपने क्षेत्र को जड़ तत्व न मानते हुए उसे अपनी विराट संस्कृति का चेतन भाग मानें, उससे जुड़ें- भावना और बुद्धि के दोनों स्तरों पर।
(लेखक  दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं)