नेपाल को निगल रहा ड्रैगन

    दिनांक 30-जून-2020
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काठमांडू से पंकज दास
 
नेपाल का सिर्फ रुई गांव ही चीन ने नहीं लीला है बल्कि तिब्बत से सटे सीमा के बहुत से हिस्से वह पहले से अपने में मिलाता चला आ रहा है। मूल नेपाली चीन की इन हरकतों के खिलाफ आवाज तो उठाते हैं, लेकिन ओली की कम्युनिस्ट सरकार चीन के मोहपाश में बंधी उसकी विस्तारवादी नीतियों को अनदेखा कर रही है 

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रुई गांव (बाएं) और नेपाल के नक्शे में उसकी स्थिति


नेपाल के गोरखा वीरों की दुनिया में अपनी एक पहचान और अपना सम्मान है। भारत सहित दुनिया के कई प्रमुख देश बाकायदा नेपाल आकर नेपाल के वीर गोर्खालियों को अपनी सेना या अन्य सुरक्षा निकायों में भर्ती कर अपने देश ले जाते हैं। गोर्खालियों की वीरता की कहानी हम समय-समय पर सुनते आए हैं। भारत के जम्मू-कश्मीर का इलाका हो या लद्दाख, हर जगह भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट के जवानों ने अपने अदम्य साहस और कुशल युद्ध तकनीक का परिचय दिया है। लेकिन अब इन्हीं वीर गोरखाली सैनिकों की जन्मभूमि नेपाल के गोरखा जिले, जिसकी सीमा चीन से लगी हुई है, पर चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति के तहत कब्जा करना शुरू कर दिया है।

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नेपाल सीमा व्यवस्थापन विभाग की 2003 की वह रपट जिसमें 1836 वर्ग किमी का भूभाग चीन के कब्जे में जाने की बात है (फाइल चित्र)
 
यह घटना नई नहीं है बस इसका खुलासा अभी हुआ है। गत 20 जून को गोरखा के सीमावर्ती गांव साम्दा के स्थानीय निवासी तान्जी लामा ने फोन कर बताया कि उनके परिवार के कुछ सदस्य सीमा पार रुई गांव में गए थे, लेकिन अब चीन के सुरक्षाकर्मी उन्हें वापस नहीं आने दे रहे हैं। जिज्ञासावश मैंने पूछा कि आखिर चीनी सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें सीमा पार जाने कैसे दिया? कभी उस गांव के प्रधान रह चुके लामा ने जो बताया उससे चीन की कुटिल चाल का खुलासा हुआ। उन्होंने कहा कि सीमा पार जो रुई गांव है वह तो नेपाल का ही अंग है, जिस पर धोखे से चीन ने कब्जा किया हुआ है और नेपाल सरकार खामोश है। इस विषय में मेरी जिज्ञासा और बढ़ी और तब इस बारे में विस्तार से जानकारी जुटाने का फैसला किया।


और उलझा भारत से सीमा विवाद 
नेपाल की राजधानी काठमांडू में शासक वर्ग से लेकर तथाकथित संभ्रांत वर्ग और शासन व्यवस्था को प्रभावित करने वाले हर क्षेत्र की तरफ से एक सुनियोनित नैरेटिव चलाकर यह साबित करने की कोशिश होती है कि नेपाल के लिए चीन मित्र है और भारत शत्रु। यह प्रचारबाजी प्रायोजित होती है। जमीन के मामले में भी ठीक ऐसा ही हुआ। भारत के साथ दशकों से चले आ रहे सीमा विवाद की 99 प्रतिशत समस्या को सुलझा लिया गया है। बस कालापानी क्षेत्र में विवाद रह गया है, जिसके कई रणनीतिक और तकनीकी कारण हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल सरकार के आग्रह पर विदेश सचिव स्तरीय समिति का भी गठन कर दिया था और कोरोना महामारी के पहले तक उसकी नियमित बैठक भी होती रही है। लेकिन भारत के लिपुलेक और लिम्पियाधुरा को लेकर नेपाल की वामपंथी सरकार ने जिस तरह से आक्रामक होकर गैर कूटनीतिक और अपरिपक्व कदम उठाये, उसका खामियाजा तो भुगतना ही होगा। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के प्राध्यापक श्रीधर खत्री बताते हैं कि नेपाल ने जोश में आकर जो नक्शा बदलने का कदम उठाया है उससे वह खुद अपने बुने जाल में फंस गया है। नेपाल की ओली सरकार के लिए यह कदम बहुत टेढ़ा साबित होने वाला है। उन्होंने यह भी कहा कि सीमा विवाद कोई एक बार में हल नहीं होता है। इसके लिए दोनों पक्षों की राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है जो कि इस समय भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र्र मोदी में दिखती है। नेपाल में विदेश मामलों के जानकार अरुण सुवेदी कहते हैं कि नेपाल ने भारत के साथ सीमा विवाद सुलझाने का एक अच्छा अवसर खो दिया है। बांग्लादेश के साथ सूझ—बूझ से मोदी सरकार ने सीमा विवाद को हल किया है। लेकिन नेपाल की वामपंथी सरकार की हरकतों की वजह से अब वह संभावना भी न्यून हो गयी है।

काठमांडू स्थित सर्वे विभाग, मालपोत विभाग (जहां जमीनों के सारे अभिलेख रखे जाते हैं), गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय में अपने सूत्रों से जो कुछ पता चला वह चौंकाने वाला है। आखिर किसी एक देश का पूरा गांव और उस गांव में रहने वाले 500 से अधिक नागरिक देखते ही देखते विदेशी सरकार के कब्जे में चले जाते हैं और किसी को कानोंकान खबर नहीं होती, यह तो अपने आप में बहुत ही आश्चर्य वाली बात है। पूरे मामले की और गहराई में जाने पर चीन के इस हरकत के पीछे का असली स्वार्थ और नेपाल सरकार की खामोशी दोनों ही से पर्दा उठ गया।

तान्जी लामा ने बताया कि 60 साल पहले ही हमारे रुई गांव पर चीन ने कब्जा कर लिया था। संडे और रुई के बीच में एक नदी बहती है नाम्चे, उसके इस पार साम्दा है और उस पार   रुई। दोनों गांवों के लोगों में  सम्बन्ध भी उसी जमाने से चलते आ रहे हैं, जो आज भी जारी हैं। 1960 में अचानक एक दिन नदी के उस पार उन्हें जाने से मना कर दिया जाता है। रुई को चीन के स्वशासित क्षेत्र तिब्बत में मिला दिया जाता है।

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साम्दा गांव के पूर्व प्रधान तान्जी लामा


तान्जी लामा ने बताया कि 60 साल पहले ही हमारे रुई गांव पर चीन ने कब्जा कर लिया था। नेपाल के मालपोत विभाग से जो दस्तावेज मिले उनमें भी 1960 तक ही उस गांव के लोगों द्वारा जमीन का कर नेपाल सरकार को दिए जाने का प्रमाण मिला है। लामा बताते हैं कि संडे और रुई के बीच में एक नदी बहती है नाम्चे, उसके इस पार साम्दा है और उस पार रूई। दोनों गांवों के लोगों में एक—दूसरे के यहां आना-जाना और वैवाहिक सम्बन्ध भी उसी जमाने से चलते आ रहे हैं, जो अभी तक जारी हैं। 1960 में अचानक एक दिन नदी के उस पार उन्हें जाने से मना कर दिया जाता है। वहां चीनी सैनिक तैनात हो जाते हैं। रुई को चीन के स्वशासित क्षेत्र तिब्बत में मिला दिया जाता है। जिस गांव पर चीन का कब्जा है वहां 70-80 परिवार बसे हैं और आबादी 450—500 के बीच है। साम्दा गांव के निवासी अपने रिश्तेदारों से मिलने अभी भी जाते हैं, लेकिन उन्हें कुछ शर्तों के साथ ही चीनी सुरक्षाकर्मी जाने की इजाजत देते हैं। सुबह जाना और शाम तक वापस आ जाना और जिस घर में जाना होता है उसके अलावा ना तो किसी अन्य घर में जाने की इजाजत होती है और ना ही किसी अन्य परिवार के लोगों से बातचीत करने की अनुमति होती है। साम्दा के निवासी इस बात से बहुत दुखी हैं कि अपने ही देश के हिस्से में उनका अपने ही परिवार और सगे—सम्बन्धियों के यहां जाना भी मुश्किल हो गया है।

नेपाल पर चीन का कसता शिकंजा

चीन ने माओ की विस्तारवादी नीति के तहत नेपाल पर धीरे धीरे शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। वह हर तरह से नेपाल को घेरने और भारत के साथ संबंधों पर प्रहार करने के लिए यहां की वामपंथी सरकार पर दबाव बनाए हुए है। नेपाल ने नया नक्शा जारी कर भारत के साथ रहे कूटनीतिक और राजनीतिक संबंध को इस हद तक बिगाड़ लिया है कि इस ओली सरकार के रहते दोनों देशों के बीच औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता होना असंभव सा दिखता है। कोरोना के नाम पर नेपाल ने भारत की खुली सीमा को सील कर दिया। सीमा व्यवस्थापन के नाम पर कुछ चुनिन्दा नाकों से आने-जाने और व्यापार करने पर भी अंकुश लगा दिया है। भारत के साथ रहे रोटी-बेटी के संबंध को खत्म करने के लिए कम्युनिस्ट सरकार नया नागरिकता कानून लेकर आई है जिसके तहत अब किसी भी भारतीय बेटी को नेपाल में शादी करने पर उसे 7 वर्षों बाद ही नागरिकता का प्रमाण पत्र दिया जाएगा, वह भी बहुत से राजनीतिक अधिकारों की कटौती के साथ। नेपाल—भारत को जोड़ने वाली हिन्दी भाषा पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए न्यायालय का सहारा लिया जा रहा है। जबकि यहां के स्कूलों में चीनी भाषा की पढ़ाई पूर्व प्राथमिक विद्यालय से ही शुरू कर दी गई है। भारतीय दूतावास के साथ बिना सरकार की इजाजत के सभी तरह के आर्थिक सहयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, जबकि चीन जब चाहे, जिसको चाहे आर्थिक सहयोग कर सकता है।

इतना ही नहीं नेपाल के राजनीतिक दलों पर भी चीन का बहुत ही अधिक प्रभाव हो गया है। गोरखा जिले के रुई गांव पर चीन के कब्जे को लेकर वहां के सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. बाबूराम भट्टराई भी कुछ बोल नहीं रहे हैं। नई दिल्ली में जेएनयू से पीएचडी करने वाले डॉ. भट्टराई को भारत का बहुत करीबी माना जाता था। लेकिन भारत के साथ सीमा विवाद पर भारत के खिलाफ बयान देने वाले और भारत को इसके लिए अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय में घसीटने तक की चेतावनी देने वाले डॉ. भट्टराई अपने ही संसदीय क्षेत्र के एक गांव पर चीन के कब्जे वाली बात को बहुत अधिक न उछालने की नसीहत दे रहे हैं। भारत में धारा 370 को हटाए जाने पर भट्टराई की पार्टी ने ना सिर्फ भारतीय दूतावास का घेराव किया था बल्कि भारतीय सीमावर्ती क्षेत्र में भारत के विरोध में प्रदर्शन भी किया था, प्रधानमंत्री मोदी का पुतला जलाया था। लेकिन जब चीन ने माउंटएवरेस्ट को अपना हिस्सा दिखाया तो भट्टराई उसके बचाव में बयान देते नजर आए। नेपाल में इस समय सरकार पर भले ही वामपंथी दल का कब्जा हो, लेकिन प्रमुख विपक्षी पार्टी में भी भारत विरोध के नाम पर सभी इकट्ठे हो जाते हैं। लेकिन चीन के विरोध के नाम पर उनमें मतभेद दिखाई देता है। जिस मधेशी दल को भारत का सबसे करीबी कहा जाता है, उसने भी नेपाल सरकार के नए नक्शे वाले कदम का विरोध नहीं किया बल्कि उसके पक्ष में ही मतदान किया। इस समय चीन के द्वारा हर तरह से नेपाल को घेरा जा रहा है लेकिन उस मधेशी पार्टी के नेता उपेन्द्र यादव और राजेन्द्र महतो कुछ भी बोलने से बचते हैं। भारत के ‘रॉ’ के पूर्व अधिकारी आरएसएन सिंह कहते हैं कि जब हम अपने ही देश के वामपंथियों पर भरोसा नहीं करते तो नेपाल के कम्युनिस्टों पर कैसे भरोसा कर सकते हैं। भारत को नेपाल नीति पर गंभीर समीक्षा करने की आवश्यकता है।     

1960 में ही नेपाल के सर्वे विभाग ने अपनी सीमाओं की पहचान करते हुए सीमा स्तम्भ लगाने का निर्णय भी लिया था। बताया जाता है कि उस समय रुई गांव के बाद जो चीन की सीमा है वहां भी सीमा स्तम्भ लगाने का प्रयास किया गया था, लेकिन चीन के हस्तक्षेप और उस समय काठमांडू में सत्ता संभाल रहे राजा महेन्द्र ने इस पर कोई भी ध्यान नहीं दिया, जिसकी वजह से यह गांव उसी समय से चीन की कब्जा में चला गया था। राजा महेन्द्र ने ही जब चुप्पी साध ली तो उनके प्रशासकों या आम नागरिक की इस विषय में बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई। अब जाकर जब यह मामला बाहर आया है तो साम्दा गांव पालिका के अध्यक्ष वीरबहादुर लामा का कहना है कि हमारी भाषा—संस्कृति सभी मिलती है, लेकिन हमारे ही घर—परिवार के लोग अब चीन के कब्जे में चले गए हैं। इसको लेकर अब काठमांडू की संघीय सरकार तक आवाज उठाने की बात कर रही है।


‘नेपाल का हाल तिब्बत जैसा ही होगा’
तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. लोबसांग सांगेय ने आगाह किया है कि नेपाल ने अभी ध्यान नहीं दिया तो उसका भी वही हाल होगा जो 1949 में तिब्बत का हुआ था। उन्होंने कहा कि नेपाल के शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों को खरीद कर चीन अपनी ओर मिलाने की नीति पर काम कर रहा है। जिस तरह चीन ने पहले तिब्बत तक सड़क बनाई और फिर उसी सड़क से ट्रक, टैंक और बंदूक लाकर तिब्बत पर कब्जा जमाया, उसी तरह नेपाल को भी अपनी सीमा में मिला लेगा।



ये तो हुई एक गांव की कहानी, लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है। चीन से सटे नेपाल के सभी 15 जिलों की कुल 1836 वर्ग कि.मी. जमीन या तो चीन ने हड़प ली है या नेपाल के शासकों की अनदेखी के कारण चीन के कब्जे में चली गयी है। नेपाल और चीन के बीच 1961 में सीमा संबंधी एक समझौता हुआ था। उस समय भी नेपाल सरकार चीन के इतने प्रभाव में थी कि नेपाल की सुगम, प्राकृतिक सौन्दर्य वाली मानव बस्तियों को चीन ने अपने कब्जे में कर लिया और दुर्गम, बंजर जमीन को नेपाल के हिस्से में दिखाते हुए सीमा समझौते पर हस्ताक्षर करवा लिये थे। अभी भी लगातार चीन नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में नेपाल के हिस्से को धीरे—धीरे अपने नक़्शे में दिखाता जा रहा है, लेकिन दुर्भाग्य ये नेपाल सरकार बेसुध है।

माउंट एवरेस्ट को दिखाया चीन में
 
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सिर्फ जमीन ही नहीं, बल्कि चीन नेपाल को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर भी कब्जा करने की फिराक में है। या कहें कि चीन ने लगभग उसको अपने कब्जे में कर लिया है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। गत मई महीने की शुरुआत में ही चीन के सरकारी मीडिया ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी चोमोलुंग्मा (माउंट एवरेस्ट का चीनी नाम) की एक तस्वीर के साथ उसे ‘चीन के स्वशासित क्षेत्र तिब्बत का दृश्य’ कह कर प्रचारित किया था। जैसे ही यह बात नेपाल में लोगों को पता चली और कुछ भारतीय चैनलों और अखबारों के आनलाइन संस्करण में इस खबर को दिखाया गया तो नेपाल में इस हरकत का जमकर विरोध हुआ। मजबूर होकर ‘ग्लोबल टाइम्स’ को अपने ट्विटर हैंडल पर इसमें बदलाव करना पड़ा। लेकिन उसके बाद भी जिस शब्द का इस्तेमाल किया गया वह बहुत ही चतुराई के साथ उसे चीन का हिस्सा बताने जैसा ही था। बाद में ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने लिखा कि ‘तिब्बत और नेपाल, दोनों की सीमा में रहे माउंटएवरेस्ट पर नेपाल में कुछ लोग इतने खुश हो गए और यह प्रचारित किया कि चीन ने अपनी गलती तुरन्त मान ली और उसमें सुधार कर लिया’। लेकिन दरअसल चीन ने इस बात को स्थापित कर दिया कि पूरी दुनिया जिस माउंट एवरेस्ट को नेपाल का अंग मानती थी कि नेपाल में ही माउंट एवरेस्ट शिखर है, यह बात पूरी दुनिया की पाठ्य पुस्तकों में पढ़ायी जाती है उसे बदलते हुए चीन ने बड़ी चालाकी से नेपाल और तिब्बत की सीमा में बताकर पूरा ना सही, उस पर आधा कब्जा तो कर ही लिया है। यदि आप गूगल नक्शे में इसे तलाशें तो वह माउंट एवरेस्ट को पूरी तरह से चीन के हिस्से में दिखाता है। चीन के पर्यटन विभाग के प्रचार में अब माउंट एवरेस्ट के चीन में होने की बात खुलेआम बताई जाती है। लेकिन इन सबके बावजूद नेपाल सरकार की तरफ से ना तो कोई आपत्ति जताई जा रही है और ना ही इसको लेकर चीन से कोई बात करने का प्रयास ही किया जा रहा है। नेपाल का अधिकांश मीडिया भी इस विषय को उठाने से कतराता है।



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35 नम्बर के इस सीमा स्तम्भ की मौजूदगी से ही मुकर रही है नेपाल सरकार

रुई गांव पर चीन के कब्जे वाली खबर जब नेपाल और भारत के मीडिया में जोर—शोर से उठायी जाने लगी और नेपाल के प्रमुख विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने सरकार से जवाब मांगा तो पहले तो सरकार खामोश ही रही। लेकिन जब नेपाली कांग्रेस इस विषय पर संसद में संकल्प प्रस्ताव लाई और इस पर विशेष चर्चा कराते हुए प्रधानमंत्री से संसद में बयान देने को कहा तो नेपाल के विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में यह कह दिया कि चीन के साथ नेपाल का कोई भी सीमा विवाद नहीं है। जब सामाज से लेकर सड़कों तक पर सरकार से यह पूछा जाने लगा कि आखिर भारत के साथ सीमा विवाद पर एकाएक आक्रामक रही ओली सरकार चीन के मामले पर चुप्पी क्यों साधे है, तो इसके जवाब में विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि यदि चीन के साथ हमारी कोई समस्या है भी तो हम मिल—बैठकर सुलझा लेंगे। इतना ही नहीं, सरकार ने मीडिया में दिखाए तथ्यों और प्रमाणों को भी खारिज कर दिया है। लेकिन संसद में संकल्प प्रस्ताव लाने वाली नेपाली कांग्रेस के सांसद देवेन्द्र राज कंडेल ने कहा कि झूठा बयान जारी कर सरकार इस मसले से बच नहीं सकती है। इसी पार्टी के उपाध्यक्ष बिमलेन्द्र्र निधि ने सरकार से मांग की है कि जिस तरह से भारत से सटे भूभाग को शामिल करते हुए पहले नक़्शा जारी किया, फिर उसको संसद से अनुमोदित कराया और संविधान संशोधन के जरिये उसको संविधान का हिस्सा बनाया ठीक वही काम अब भी होना चाहिए। आखिर चीन ने भी हमारे कई हिस्सों को अपने कब्जे में कर रखा है। उसके साथ थी हमें सीमा विवाद सुलझाने के लिए आगे बढ़ना चाहिए।

नेपाल के इन 11 इलाकों में चीन ने किया कब्जा
  • हुमला जिले के भागडेर खोला में 6 हेक्टेयर जमीन पर चीन का कब्जा

  • हुमला जिले की करनाली नदी की  4 हेक्टेयर जमीन पर चीन का कब्जा

  • रसुवा जिले के सिनजेन खोला की 2 हेक्टेयर जमीन पर चीन का कब्जा

  • रसुवा जिले के भुरजुक खोला में एक हेक्टेयर जमीन पर चीन का कब्जा

  • रसुवा जिले  के लमडे खोला की जमीन पर चीन का कब्जा

  • रसुवा जिले के जंबू खोला में तीन हेक्टेयर जमीन पर चीन का कब्जा

  • संधु पल चोक जिले के खरने खोला में 7 हेक्टेयर जमीन पर चीन का कब्जा

  • संधु पल चोक जिले के भोटे कोसी में 4 हेक्टेयर जमीन पर चीन का कब्जा

  • संखुवसाभा जिले के समझुंग खोला में 3 हेक्टेयर जमीन पर चीन का कब्जा

  • संखुवसाभा जिले के कम खोला में 2 हेक्टेयर जमीन पर चीन का कब्जा

  • संखुवसाभा जिले में अरुन नदी की 4  हेक्टेयर जमीन पर चीन का कब्जा



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नेपाल के विदेश मंत्रालय का बयान जिसमें चीन के साथ कोई सीमा विवाद न होने और
इस संबंध में समाचार प्रकाशित कर नेपाल—चीन संबंध को न बिगाड़ने की अपील की गई है
लेकिन नेपाल में फिलहाल यह संभव दिखाई नहीं देता है, क्योंकि काठमांडू के शासक की मानसिकता, काठमांडू के सत्ता गलियारों में हावी सरकारी अधिकारी, बुद्धिजीवी, पत्रकार और नागरिक समाज की भी मानसिकता इस मामले में एक ही है। कहने के लिए दोनों नेपाल के पड़ोसी देश हैं, दोनों को मित्र राष्ट्र कहा जाता है। जब तक नेपाल की सत्ता पर लोकतंत्रवादी शक्तियों का बोलबाला था तब तक तो यह माना जाता था कि भारत और चीन दोनों पड़ोसी हैं, दोनों से संबंध अच्छे रखने हैं। लेकिन चूंकि कई कारणों से भारत से नेपाल का विशेष प्रकार का संबंध है तो निश्चित ही भारत हमारा अतिनिकट मित्र देश है। लेकिन वामपंथी पार्टी ऐसा नहीं मानती है। नेपाल के उच्च सदन में हाल के विवाद पर पूर्व मंत्री जितेन्द्र्र्र देव ने कहा कि भारत के साथ विशेष संबंध के मर्म को बदलने और चीन को खुश करने के लिए यहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने दोनों पड़ोसी देशों के साथ एक जैसी दूरी बनाने का सिद्धांत लाकर हमारी विदेश नीति को ही बदलने का दुष्प्रयास किया है। उन्होंने नेपाल सरकार के हाल के निर्णयों को देखते हुए ओली सरकार पर आरोप लगाया कि भारत के साथ सभी प्रकार के रिश्ते खत्म कर देश को चीन की झोली में डालने का प्रयास होता दिख रहा है। सांसद जितेन्द्र्र देव का यह आरोप अत्यंत गंभीर है। कुल मिलाकर, वामपंथी सरकार के तहत नेपाल अपनी अस्मिता से समझौते करता जा रहा है, जो देश के लिए किसी तरह हितकर साबित नहीं होने वाला।