कला की आड़ में निकल रही कुंठा

    दिनांक 30-जून-2020   
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इन दिनों वैचारिक रूप से पस्त कई लोग अपनी निराशा को ‘वेब सीरीज’ के जरिए समाज के सामने प्रकट कर रहे हैं। अभिव्यक्ति की आड़ में ये लोग अश्लीलता परोस रहे हैं, एक विचारधारा को गाली दे रहे हैं, पुलिस और प्रशासन को ‘सांप्रदायिक’ बता रहे हैं। ऐसे लोगों को चिन्हित करके उनको नियमन के दायरे में लाया जाना चाहिए

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वेब सीरीज ‘पाताल लोक’ का एक दृश्य। इसमें पुलिस और सीबीआई को मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित बताया गया है।


इन दिनों देश में ‘ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म’ (इंटरनेट के माध्यम से वीडियो या अन्य सामग्री प्रदर्शित करने का मंच, जिसे संक्षेप में ‘ओटीटी प्लेटफॉर्म’ कहा जाता है) के विषयों को लेकर बहस छिड़ी हुई है। सरकार लगातार स्वनियम की सलाह दे रही है और उनको मौके भी दे रही है कि वे अपनी विषय-वस्तु को लेकर खुद ही नियम तय करें और उसका पालन करें। इस बात को लेकर कई बार संबंधित लोगों से चर्चा भी हो चुकी है, लेकिन अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका है। ‘वेब सीरीज’ में भयानक हिंसा, जबरदस्त गाली-गलौच, जुगुप्साजनक यौन प्रसंग, राजनीतिक एजेंडा आदि को प्रतिपादित करने वाली स्थितियों का चित्रण हो रहा है। अभी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने ट्वीट करके वेब सीरीज ‘रसभरी’ में एक बच्ची से उत्तेजक नाच करवाने पर आपत्ति जताई है। प्रसून जोशी की आपत्ति का अर्थ है क्योंकि वे बहुत कम ही सार्वजनिक रूप पर किसी चीज पर प्रतिक्रिया देते हैं।

एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर तो लगभग बेहद अश्लील सीरीज ही परोसा जा रहा है। उसमें एक महिला पुरुषों के साथ दैहिक संबंध बनाती है और फिर फोन पर पूरा किस्सा किसी को बताती है। इसके अलावा इस प्लेटफॉर्म पर 10 कड़ियों की एक श्रृखंला मौजूद है, जिसमें बहुत ही घटिया दर्जे की अश्लीलता परोसी गई है। दैहिक संबंधों और कई बार तो अप्राकृतिक यौवन संबंधों को भी चित्रित किया गया है। ये सब केवल ‘हिट्स’ लेने के लिए बनाए गए हैं। ‘हिट्स’ का मतलब है कारोबार और कारोबार का अंतिम लक्ष्य तो मुनाफा ही होता है। लेकिन सरकार को इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या ये सब अश्लीलता की श्रेणी में आता है या नहीं? हमारे देश में इंटरनेट पर दिखाई जाने वाली सामग्री को लेकर पूर्व प्रमाणन जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। इसी की आड़ में ये लोग खुलेआम अश्लीलता परोस रहे हैं। यह तर्क दिया जाता है कि जो भी इस तरह के प्लेटफॉर्म पर जाते हैं उनको मालूम होता है कि वहां किस तरह की सामग्री मिल सकती है। बावजूद इसके सामाजिक मार्यादा या लोकाचार का ध्यान तो रखना ही चाहिए।

इस तरह की अराजकता को वेब सीरीज में प्रमुखता मिली थी ‘नेटफ्लिक्स’ पर प्रसारित ‘सेक्रेड गेम्स’ की आठ कड़ियों से। यह 2006 में प्रकाशित विक्रम चंद्रा के उपन्यास पर आधारित है। इसको अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवाणी ने निर्देशित किया है। इसके अलावा ‘लस्ट स्टोरीज’ को प्रस्तुत किया गया था। इसमें भी सेक्स प्रसंगों को भुनाया गया है। नवाजुद्दीन सिद्दिकि ने गैंगस्टर गायतोंडे की भूमिका निभाई है। यह वही गायतोंडे है जो अपनी मां के विवाहेत्तर सेक्स संबंध को जानने के बाद इतना उत्तेजित हो जाता है कि बचपन में ही मां के प्रेमी की हत्या कर घर से भाग जाता है। ‘सेक्रेड गेम्स’ में अनुराग कश्यप अपनी विचारधारा के साथ उपस्थित हैं, कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप से। इसमें यह दिखाया गया है कि पुलिस कैसे एक निर्दोष मुस्लिम लड़के को मुठभेड़ में मार देती है। और परोक्ष रूप से नेता बयान तब देते हैं, जब उस लड़के का परिवार धरने पर बैठा होता है और उसकी कोई सुध लेने वाला नहीं होता है। एक कड़ी में तो बाबरी ढांचे के विध्वंस के चित्रों को लंबे समय तक दिखाया गया है और फिर पीछे से उस पर राजनीतिक टिप्पणी आती है। इसी तरह से मुंबई बम धमाकों के चित्रों को दिखाकर पीछे से टिप्पणियां आती हैं, जो इसके निर्माता की सोच को उजागर करती हैं। इसके अलावा भी अनुराग कश्यप को जहां मौका मिलता है वे राजनीतिक टिप्पणी करने और मौजूदा सरकार और उसकी विचारधारा को कठघरे में खड़ा करने में नहीं चूकते हैं।

राजनीतिक मंशा से एक विचारधारा विशेष को आगे बढ़ाने और दूसरी विचारधारा को बदनाम करने की मंशा से भी वेब सीरीज बनाई जा रही है। ‘लैला’ इसी श्रेणी में आती है। यह लेखक प्रयाग अकबर के उपन्यास पर आधारित है। इसे सनातन धर्म और संस्कृति की कथित भयावहता को दिखाने के उद्देश्य से बनाई गई है। इसमें 40 साल बाद हिंदुओं की काल्पनिक कट्टरता को उभारने की कोशिश करते हुए परोक्ष रूप से एक विमर्श खड़ा करने की कोशिश की गई है। इसमें कल्पना के आधार पर भविष्य के भारत का नाम ‘आर्यावर्त’ रखा गया है। वहां राष्ट्रपिता बापू की जगह एक आधुनिक व्यक्ति जोशी आर्यावर्त का भाग्य- विधाता होता है। ‘आर्यावर्त’ के लोगों की पहचान उनके हाथ पर लगे चिप से होगी। लोग एक-दूसरे को ‘जय आर्यावर्त’ कहकर अभिभावदन करेंगे। यहां दूसरे मत-पंथ के लोगों के लिए कोई जगह नहीं होगी। भविष्य का भारत हिंदू राष्ट्र होगा, जहां धर्म का राज होगा। एक आदमी की मर्जी से कानून चलेगा। उसकी अपनी पुलिस और प्रशासन होगा। उस काल्पनिक ‘आर्यावर्त’ में अगर कोई हिंदू लड़की किसी मुसलमान लड़के से शादी कर लेती है तो उसके पति की हत्या कर लड़की को आर्यावर्त के ‘शुद्धिकरण केंद्र’ ले जाया जाता है। वहां महिलाओं को नारकीय जीवन जीना पड़ता है। ‘शुद्धिकरण’ की प्रक्रिया के तहत महिलाओं को पुरुषों के खाए जूठे पत्तलों पर अपमानजनक तरीके से लोटना पड़ता है। ‘शुद्धिकरण’ की प्रक्रिया को नहीं मानने वाली लड़कियों को ‘आर्यावर्त’ की गुरु मां गैस चैंबर में डालकर मार डालती है। ‘आर्यावर्त’ में एक ‘पवित्र पलटन’ भी है, जो ‘शुद्धिकरण’ करवाता है।

हद हो गई हिंदू विरोध की
प्रयाग अकबर के उपन्यास पर आधारित ‘लैला’ वेब सीरीज में एक काल्पनिक ‘आर्यावर्त’ के बारे में कहा गया है कि इसमें हिंदू के अलावा और किसी मत-पंथ के लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। इसके अतिरिक्त भी इसमें ऐसी अनेक बातें हैं, जो बताती हैं कि कुछ लोग सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए सारी हदें पार कर गए हैं।

हिंदू लड़की और मुसलमान लड़के से पैदा हुए संतान को ‘मिश्रित’ कहा जाता है और उसको भी उसकी मां से अलग रखकर ‘आर्यावर्त’ के संस्कारों में संस्कारित किया जाता है। इस तरह के बच्चों को बेचने का धंधा भी दिखाया जाता है। लैला में ऐसी अनेक बातें हैं, जो उसके निर्माताओं की असली मंशा को उजागर करती हैं। इसे दीपा मेहता और अन्य दो लोगों ने निर्देशित किया है। ये वही दीपा हैं, जिन्होंने ‘वाटर’ फिल्म के जरिए बता दिया है कि उनकी मंशा क्या है। इसी तरह से अभी हाल ही में एक वेब सीरीज आई है ‘पाताल लोक’। इसमें साफ तौर पर पुलिस और सीबीआई दोनों को मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित दिखाया गया है। थाने में मौजूद हिंदू पुलिस वालों के बीच की बातचीत में मुसलमानों को लेकर जिस तरह के विशेषणों का उपयोग किया जाता है उससे यह लगता है कि पुलिस बल ‘सांप्रदायिक’ है।

इसी तरह से जब इस वेब सीरीज में न्यूज चैनल के संपादक की हत्या की साजिश की जांच दिल्ली पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंपी जाती है, और जब सीबीआई इस मामले को हल करने का दावा करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करती है, तो वहां तक उसको मुसलमानों के खिलाफ ही दिखाया गया है। मुसलमान हैं तो आईएसआई से जुड़े होंगे, नाम में ‘एम’ लगा है तो उसका मतलब मुसलमान ही होगा आदि आदि। संवाद में भी इस तरह के वाक्यों का ही प्रयोग किया गया है, ताकि इस विमर्श को मजबूती मिल सके। और अंत में ऐसा ही होता है कि सीबीआई मुस्लिम संदिग्ध को पाकिस्तान से और आईएसआई से जोड़कर उसे अपराधी साबित कर देती है। कथा इस तरह से चलती है कि जांच में क्या होना है यह पहले से तय है।अगर किसी चरित्र को सांप्रदायिक दिखाया जाता तो कोई आपत्ति नहीं होती, आपत्तिजनक होता है पूरी व्यवस्था को सांप्रदायिक दिखाना। बात यहीं तक नहीं रुकती है। इसमें तमाम तरह के अपराध को हिंदू धर्म के प्रतीकों से जोड़कर दिखाया गया है। यह सब कला के नाम पर हो रहा है। कला का दुरुपयोग न हो, इसकी चिंता सरकार को जरूर करनी चाहिए। सरकार ने इस दिशा में पहल की थी लेकिन वह बेहद धीमी गति से चल रही है। इस बीच ‘लॉकडाउन’ के दौर में सिनेमा हॉल बंद हैं और लोगों के पास मनोरंजन के विकल्प कम हो गए। बड़ी संख्या में दर्शक ओटीटी प्लेटफॉर्म की ओर गए हैं, ऐसे में सरकार को अपनी पहल को तेज करनी चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)