जम्मू—कश्मीर: मूल निवासी होने का प्रमाणपत्र मिलना खुली हवा में सांस लेने जैसा है

    दिनांक 30-जून-2020   
Total Views |
जम्मू—कश्मीर में बाहर से गए वाल्मीकियों, गोरखाओं और 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को अधिवास प्रमाणपत्र मिलने से उनमें खुशी की लहर दौड़ गई है। इन लोगों का कहना है कि दशकों तक गुलामी जैसी जिंदगी जीने के बाद आजादी की एक नई सुबह देखने को मिल रही है

jammu _1  H x W
 
जम्मू मंडल के आयुक्त संजीव वर्मा के हाथों अधिवास प्रमाणपत्र प्राप्त करते घारू भट्टी (सबसे बाएं)
जम्मू के गांधीनगर में रहने वाले 40 वर्षीय घारू भट्टी के जीवन में 27 जून का दिन एक नया सवेरा लेकर आया। इस दिन उन्हें जम्मू मंडल के आयुक्त संजीव वर्मा के हाथों वह कागज मिला, जिसके लिए पहले उनके परिवार वालों ने बरसों तक लड़ाई लड़ी और अब वे खुद करीब 30 साल से संघर्ष कर रहे थे। वह कागज है अधिवास प्रमाणपत्र (डोमिसाइल सर्टिफिकेट)। भट्टी के अनुसार उनके दादा को 1957 में पंजाब के होशियारपुर से एक सफाई कर्मचारी के नाते जम्मू बुलाया गया था। उन्हें नौकरी की सारी सुविधाएं दी गईं, रहने के लिए सरकारी घर दिया गया, लेकिन इतने दिनों तक जम्मू में रहने के बावजूद उन्हें राज्य का नागरिक नहीं माना गया। इस कारण वे न तो वहां जमीन खरीद सकते थे, न विधानसभा के चुनाव में मतदान कर सकते थे और न ही उनके बच्चे किसी सरकारी शिक्षण संस्थान में उच्च शिक्षा के लिए दाखिला ले सकते थे। भट्टी कहते हैं, ‘‘ इस कागज के मिलने से अब हमें एक नागरिक के नाते राज्य की सारी सुविधाएं मिलेंगी। अब तक हमें गुलाम की तरह रखा गया था। जीवन चलाने के लिए हमें छोटा—मोटा कारोबार करने की भी छूट नहीं थी। योग्यता रहने के बावजूद हमारे समाज के लोगों को सफाईकर्मी के अलावा और कोई दूसरी नौकरी नहीं दी जाती थी। भारत को तो आजादी 1947 में ही मिल गई थी, लेकिन हमें 27 जून को आजादी मिली। इसलिए यह अधिवास प्रमाणपत्र नहीं, हमारी आजादी का प्रमाणत्र है।’’
घारू भट्टी वाल्मीकि समाज, जम्मू—कश्मीर के अध्यक्ष हैं। उन्होंने बताया कि इस समय जम्मू के गांधीनगर में वाल्मीकि समाज के लगभग 300 परिवार रहते हैं और पूरे जम्मू—कश्मीर राज्य में इस समाज की आबादी लगभग 10,000 है। इनमें से ज्यादातर सफाई का काम करते हैं। इन सभी के पूर्वज 1957 के आसपास ही पंजाब के अमृतसर और गुरदासपुर जिले से जम्मू—कश्मीर राज्य में रोजगार के लिए गए थे। इनकी पीढ़ियां तभी से सफाई कर्मचारी का काम कर रही हैं। इन लोगों को बाहरी मानकर कभी इन्हें वे सुविधाएं नहीं दी गईं, जो जम्मू—कश्मीर के किसी मूल निवासी को मिलती रही हैं। अब उन्हें ये सारी सुविधाएं मिल रही हैं, तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है।
इसी तरह जम्मू—कश्मीर में रहने वाले गोरखा परिवारों को भी कोई सुविधा नहीं दी गई। अब उन्हें भी अधिवास प्रमाणपत्र मिल रहा है, तो उनमें भी एक नया उत्साह पैदा हो गया है। जम्मू—कश्मीर, गोरखा सभा की अध्यक्ष करुणा छेत्री कहती हैं, ‘‘अनुच्छेद 370 और 35—ए की जंजीरों से गोरखा भी जकड़े हुए थे। 5 अगस्त, 2019 को इन दोनों के हटने के बाद वह जकड़न टूटी और अब अधिवास प्रमाणपत्र के मिलने से हम लोगों को खुले आकाश में सांस लेने का अधिकार मिल गया है। इसके लिए केंद्र सरकार को दिल से धन्यवाद।’’
बता दें कि इन गोरखाओं के पूर्वजों को महाराजा हरिं सिंह के समय नेपाल से बुलाकर राज्य की सेना में शामिल किया गया था। उस समय ये गोरखा महाराजा की सेना में बहुत प्रभावशाली पदों पर थे। 1947 में आजादी मिलने के बाद बाहरी के नाम पर इन गोरखाओं की अनदेखी की जाने लगी। उन्हें अनेक अधिकारों से वंचित कर दिया गया। पहले ये लोग भारतीय सेना में भर्ती होते थे, लेकिन 1989 के बाद राज्य सरकार ने नियम बना दिया कि जिनके पास राज्य का स्थाई निवासी प्रमाणपत्र होगा, वही सेना में भर्ती हो सकता है। इस कारण बाद में ये लोग सेना में भी नहीं जा पाते थे। अनुच्छेद 370 और 35—ए के हटते ही इन लोगों के लिए भी हर दरवाजा खुल गया है। एक अनुमान के अनुसार पूरे जम्मू—कश्मीर में करीब 10,000 गोरखा रहते हैं। जम्मू में गोरखा नगर है, जहां इनकी एक बड़ी संख्या रहती है।
अधिवास प्रमाणपत्र मिलने से 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से आकर जम्मू के आसपास रहने वाले शरणार्थियों में भी खुशी की लहर है। ‘वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी कमेटी’ के अध्यक्ष लब्बाराम कहते हैं, ‘‘19,960 परिवार 70 साल से भारत की नागरिकता मांग रहे थे, लेकिन अनुच्छेद 370 की वजह से ऐसा नहीं हो पा रहा था। अब हम लोगों को भी एक मानव के नाते जीवन जीने के सारे अधिकार मिल रहे हैं। इस कारण पूरा समाज भारत सरकार का कर्जदार है।’’ हालांकि वे यह भी कहते हैं कि अधिवास प्रमाणपत्र देने में प्रशासनिक स्तर पर बहुत ढीलापन है। उनका इशारा जम्मू—कश्मीर के सरकारी तंत्र में मौजूद उस मानसिकता की ओर है, जिसने इन लोगों को करीब सात दशक तक उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा है। वे कहते हैं कि जब तक ऐसी मानसिकता वाले लोग दफ्तरों में रहेंगे, तब तक हम लोगों को आसानी से सारी चीजें नहीं मिलेंगी।
उल्लेखनीय है कि जम्मू—कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद वहां रहने वाले बाहरी लोगों को नागरिकता देने का काम शुरू हो गया है। अब तक ऐसे लोगों को ‘राज्य विषय प्रमाणपत्र’(स्टेट सब्जेक्ट सर्टिफिकेट) दिया जाता था, पर अब इन्हें अधिवास प्रमाणपत्र ( डोमिसाइल सर्टिफिकेट) मिलने लगा है। जम्मू—कश्मीर के कृषि विभाग में मुख्य सचिव के पद पर कार्यरत आईएएस अधिकारी नवीन कुमार चौधरी पहले ऐसे बाहरी व्यक्ति हैं, जिन्हें राज्य का अधिवास प्रमाणपत्र मिला है। ये मूल रूप से बिहार के हैं।
पूरे राज्य में अब तक 33,157 लोगों ने नागरिकता प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया है। इनमें से
25,000 लोगों को प्रमाणपत्र मिल भी गए हैं।
सबसे ज्यादा आवेदन जम्मू और उसके आसपास के 10 जिलों से आए हैं। इन जिलों के 32,000 से अधिक लोगों ने आवेदन दिए हैं, वहीं कश्मीर घाटी में केवल 720 लोगों के आवेदन मिले हैं।
नए नागरिकता कानून के अनुसार हर वह व्यक्ति, जो 15 साल से जम्मू-कश्मीर में रह रहा हो है या फिर केंद्र सरकार के वे कर्मचारी, जो 10 वर्ष से प्रदेश में नियुक्त हों या ऐसे बच्चे जिन्होंने 10वीं या 12वीं की परीक्षा जम्मू—कश्मीर के शिक्षा विभाग के अन्तर्गत दी हो, वे यहां के नागरिक हैं। ऐसे लोगोें को जम्मू एंड कश्मीर ग्रांट डोमिसाइल सर्टिफिकेट प्रोडक्शन रुल्स 2020 के नियम पांच के अन्तर्गत नागरिकता दी जा रही है।