वामपंथ : ‘बीएलएम’ की बैसाखी और भारत के वामपंथी

    दिनांक 30-जून-2020
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प्रशांत पोल

मुसलमानों की अमेरिका के अश्वेतों से तुलना हो ही नहीं सकती। अमेरिका में अश्वेतों ने गुलामी का जीवन जिया है। भारत में मुस्लिम आक्रांता के रूप में आए, हिंदुओं को गुलाम बनाया, उनको बर्बरतापूर्वक मारा

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अमेरिका में ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन के तहत आगजनी करते उपद्रवी तत्व  (फाइल चित्र)

आज से करीब एक महीने पहले, अर्थात 25 मई को अमेरिका के मिनीसोटा प्रांत के मिनियापोलिस शहर में एक अमेरिका के मिनीसोटा प्रांत के मिनियापोलिस शहरद्वारा गर्दन दबाने से मौत हुई। भरी सड़क पर, दिनदहाड़े हुई इस घटना को वहां मौजूद कुछ आम लोगों ने मोबाइल पर कैद कर लिया। साथ ही वे अमेरिकी पुलिस से ऐसी बर्बरता न करने का आग्रह कर रहे थे। जॉर्ज फ़्लॉयड घुटन से भर्राती आवाज में चिल्लाने का प्रयास कर रहा था, ‘आई काण्ट ब्रीद’...। बाद में इस घटना के विरोध में हुए प्रदर्शनों में उसकी यही ‘घुटन भरी आवाज’ जन जन का नारा बन गई।

अमेरिका में रंगभेद या नस्लभेद नया नहीं है। अमेरिका के जो मूल निवासी थे, उन्हें लगभग समाप्त कर यूरोपीय लोगों ने, विशेषकर अंग्रेजों ने अमेरिका नाम का देश खड़ा किया था। 1619 में जब भारत में शिवाजी महाराज का जन्म होने से 11 साल पहले, जब दिल्ली के तख्त पर जहांगीर बैठा था, उसी वर्ष अमेरिका के वर्जीनिया में दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं। एक, वर्जीनिया के जेम्सटाउन में अंग्रेजी भाषा में पहली असेम्बली बैठक हुई, जिसने अमेरिका में लोकतंत्र की नीव डाली। दूसरी, वर्जीनिया में ही अफ्रीका से पहला अश्वेत गुलाम लाया गया!

1641 तक आते—आते अमेरिका ने गुलाम प्रथा को कानूनी जामा भी पहना दिया। गुलामों को अफ्रीका से लाने का यह क्रम निरंतर चलता रहा। 4 जुलाई 1776 को ‘यूनाइटेड स्टेट्स आॅफ अमेरिका’ की विधिवत् घोषणा हुई और 1787 से गुलामों के बारे में स्थिति बदलने लगी। 1808 में अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय गुलाम व्यापार को औपचारिक रूप से प्रतिबंधित किया। किन्तु उसके बाद भी चोरी-छिपे यह कारोबार चलता रहा। इस पूरी प्रक्रिया ने श्वेत अमेरिकियों के मस्तिष्क में खुद के प्रति श्रेष्ठता और अहं का इतना भाव भर दिया कि गुलामी प्रथा समाप्त होने के पश्चात भी वे अश्वेतों के साथ गुलामों जैसा ही व्यवहार करते रहे।

बाद में, जब अश्वेत अफ्रीकी संख्या में बढ़ने लगे और राजनीतिक रूप से जाग्रत होने लगे तो श्वेत-अश्वेत दंगे प्रारंभ हुए। 1965 में लॉस एंजेलिस में, 1967 में नेवार्क में, 1967 में ही डेट्राइट में बीसवीं सदी का अमेरिका का सबसे भयानक दंगा हुआ। 1968 में अश्वेतों का नेतृत्व करने वाले मार्टिन लूथर किंग की हत्या हुई और उसके कारण फिर दंगे भड़के। फिर 1980 में लिबर्टी सिटी में दंगे हुए। 1992 में लॉस एंजेलिस में रॉडनी किंग नामक अफ्रीकी अमेरिकी की हत्या भी उसी प्रकार हुई, जैसे जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत हुई थी। इस घटना के बाद दंगा भड़का। सिनसिनाटी शहर में 2001 में 11 सितम्बर की आतंकी घटना से पहले दंगे हुए थे। कुल मिलाकर, अमेरिका में हर 10—15 वर्ष में श्वेत-अश्वेतों के बीच दंगे भड़कते रहते हैं। वहां अफ्रीकी अमेरिकी अश्वेत 14 प्रतिशत हैं, तो श्वेत अमेरिकी 77 प्रतिशत।

बीएलएम आंदोलन के माध्यम से भारत के मुसलमानों और  ‘दलितों’ को उकसाने का प्रयास हुआ।  वामपंथी जमात ने इसे  अपने ‘इको सिस्टम’ के अंतर्गत एक   'ज्वलंत विषय' बनाने का प्रयत्न किया।  इसकी  शुरुआत  हुई     जॉर्ज फ्लॉयड की मृत्यु के एक सप्ताह के अंदर। 1 जून 2020 को  ‘द वायर’  में एक बड़े आलेख  में  यह  लिखकर  चिंगारी  भड़काने  की  कोशिश की  गई  कि   ‘भारतीय लोग पुलिस  के  दमन के विरोध में सड़क  पर  क्यों  नहीं  उतरते?’
 
जॉर्ज फ़्लॉयड की मृत्यु के बाद हुए विरोध प्रदर्शन ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ या ‘बीएलएम’ के बैनर तले हुए। अनेक लोगों को लगा की जॉर्ज फ्लॉयड की मृत्यु के कारण ही बीएलएम की संकल्पना सामने आई है। किन्तु ऐसा नहीं है। ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ अभियान की शुरुआत सात वर्ष पहले 13 जुलाई 2013 को हुई थी। यह एक विकेंद्रित विश्वव्यापी आंदोलन है और इस आंदोलन के ज्यादातर सूत्रधार वामपंथी हैं। विगत एक माह से अमेरिका में चल रहे इस बीएलएम आंदोलन में एक और हैरान करने वाली बात है कि इसमें मुस्लिम बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। ‘मुस्लिम अमेरिकन सोसाइटी’ नाम से अमेरिकी मुसलमानों का प्रमुख संगठन है। इस संगठन ने सभी मुस्लिमों से इस आंदोलन में पूरी ताकत के साथ शामिल होने की अपील की थी। सबसे दिलचस्प बात न्यूयार्क के ब्रुकलिन में देखने में आई। वहां प्रदर्शन के दौरान नमाज का वक्त होने पर सभी मुस्लिम प्रदर्शनकारी भरी सड़क पर बीचोंबीच नमाज पढ़ने लगे। बाकी सारे गैर-मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने उनके इर्द—गिर्द घेरा बनाकर उनको नमाज पढ़ने में मदद की। यह जानना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2001 में 11 सितम्बर की आतंकी घटना के पश्चात न्यूयॉर्क की सड़कों पर किसी भी मुस्लिम संगठन ने कोई भी हरकत करने की हिम्मत नहीं थी। अमेरिकी मुसलमानों को मुख्यधारा में वापस आने का यह एक अच्छा अवसर दिखा, जिसे उन्होंने जमकर भुनाया है।

आंदोलन को हथियाने का ऐसा ही प्रयास किया अमेरिकी वामपंथियों ने। वहां उन्हें ‘व्हाइट लिबरल्स’ कहा जाता है। अमेरिका के अटार्नी जनरल बार्र ने खुलेआम कहा, ‘जॉर्ज फ़्लॉयड की मृत्यु के विरोध में हो रहे ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शनों को अतिवादी वामपंथी संगठनों ने हथिया लिया है।’ उनका यह वक्तव्य ‘यूएस टुडे’ समाचार पत्र की सुर्खी बना था। वामपंथियों द्वारा इस आंदोलन को वैश्विक बनाने के प्रयास किए गए। इंग्लैंड, फ्रांस, ब्राजील, आॅस्ट्रेलिया, कनाडा, इटली, नीदरलैंड आदि देशों में रंगभेद-नस्लभेद के विरोध में बीएलएम के बैनर पर बड़े-बड़े प्रदर्शन अभी भी हो रहे हैं। अनेक स्थानों पर नस्लवाद के प्रतीक माने जाने वाली हस्तियों की प्रतिमाओं को तोड़ा गया। लंदन में जब बीएलएम ने विरोध प्रदर्शन की घोषणा की तो लंदन के महापौर सादिक खान ने पार्लियामेंट सर्कल के पास लगीं सर विंस्टन चर्चिल और महात्मा गांधी की प्रतिमाओं को ढक दिया। इसका जबरदस्त विरोध हुआ। इंग्लैंड के गांधी प्रतिष्ठान के अध्यक्ष लॉर्ड मेघनाथ देसाई और विंस्टन चर्चिल के पोते ने प्रतिमाओं को ढकने वाली डरपोक हरकत की तीव्र भर्त्सना की।

पूरी दुनिया के साथ, भारत में भी इस बीएलएम आंदोलन के माध्यम से भारत के मुसलमानों और ‘दलितों’ को उकसाने का पूरा प्रयास हुआ। वामपंथियों की जमात ने इसे अपने ‘इको सिस्टम’ के अंतर्गत एक बड़ा ‘ज्वलंत विषय’ बनाने का प्रयत्न किया। इसकी शरुआत हुई जॉर्ज फ्लॉयड की मृत्यु के एक सप्ताह के अंदर। 1 जून 2020 को ‘द वायर’ में एक बड़े आलेख में यह लिखकर चिंगारी भड़काने की कोशिश की गई कि ‘भारतीय लोग पुलिस के दमन के विरोध में सड़क पर क्यों नहीं उतरते?’ 3 जून को वामपंथी समाचार पोर्टल ‘स्क्रोल डॉट इन’ में रुचिका जोशी का एक बड़ा लेख छपा-‘यूएस में चल रहे प्रदर्शनों में छिपा है भारतियों के लिए पाठ, जो सामूहिक विरोध की संभावनाओं को तलाश रहे हैं।’

वे आगे लिखती हैं-‘एक बड़ी समानता है श्वेत बहुल अमेरिका में अश्वेत लोगों और हिन्दू बहुल भारत में मुसलमानों की अवस्था में।’ इसके बाद 5 जून को ‘फॉरेन पॉलिसी डॉट कॉम’ में किसी प्रकाश कुमार के लेख में लिखा जाता है-‘‘भारतीय जॉर्ज फ्लॉयड का तो समर्थन कर रहे हैं पर अपने ही देश में पुलिसिया अत्याचारों को नजरअंदाज कर रहे हैं।’’

आगे लिखते हैं-‘‘अमेरिका में हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा किया है कि अनेक बार होने वाले निष्ठुर पुलिसिया अत्याचारों के विरोध में भारत में व्यापक सामूहिक प्रदर्शन क्यों नहीं हो रहे हैं?’ किसी ‘कॉमन कॉज’ नाम के एनजीओ के सर्वे का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं—‘पचास प्रतिशत पुलिस वालों को लगता है कि मुसलमान सामुदायिक अपराध में लिप्त होते हैं।’ फिर 8 जून को अरुंधति रॉय भी इस विमर्श को तैयार करने के अभियान में कूद पड़ती हैं। ‘दलित कैमरा’ नाम के विदेशी वामपंथी समूह में लोकप्रिय पोर्टल को दिए साक्षात्कार में वे कहती हैं-‘भारत वालों का अश्वेत लोगों के प्रति जो नस्लवादी रवैया है, वह श्वेत लोगों के रवैये से भी बदतर है।’ इस पूरे साक्षात्कार में ये मोहतरमा ‘दलित और मुस्लिमों के प्रति, हिन्दू कैसा घृणा का भाव रखते हैं’, यह बताती हैं। वे भारत में ‘दलित लाइव्स मैटर’ की आवश्यकता के बारे में भी बात करती हैं। मूर्तियों को तोड़ने के बारे में वे कहती हैं, ‘गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत अफ्रीकियों के विरोध में नस्लवादी टिप्पणी की थी, इसलिए उनकी प्रतिमा की तोड़—फोड़ की गई।’ तुरंत 9 जून को ‘द वायर’ में दिव्या चेरियन का लंबा सा आलेख आता है-‘ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन की नजरों से भारत’। इसमें वे लिखती हैं-‘भारत में भी (इस आंदोलन जैसी) समानता है। पुलिस बल की अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों के रक्षा की विफलता और ‘एक ऐसा राष्ट्रीय नेता’ जो अल्पसंख्यकों और विरोधियों के प्रति शत्रुता का भाव रखता हैं।’
 
 
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अशोक स्वैन नामक वामपंथी इकोसिस्टम से जुड़े तत्व ने बीएलएम की आड़ में भारत के मुसलमानों को भड़काने की साजिशी मंशा से किया यह ट्वीट


17 जून को वॉशिंग्टन से प्रकाशित होने वाली आॅन-लाइन पत्रिका, ‘द डिप्लोमेट’ में सुरभि सिंह के आलेख का शीर्षक है-‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ भारत के लिए चेतावनी है’।  इसमें वे जोर देकर कहती हैं कि भारत में मुस्लिमों के साथ भेदभाव हो रहा है। वे लिखती हैं-‘मजहबी अल्पसंख्यकों, विशेषत: मुसलमानों को ‘आतंकवादी’, ‘जिहादी’और ‘पाकिस्तानी’ जैसे कलंकित नामों से पुकारा जाता है। जो इनके समर्थन में बात करते हैं उन पर ‘राष्ट्र विरोधी’ का तमगा चिपकाया जाता है। ऐसे लोगों पर हमले भी होते हैं, जो हत्या में भी बदल जाते हैं। ऐसे समाचार बड़े सामान्य हो गए हैं।’’

अभी 21 जून को ‘द प्रिंट’ के हिन्दी संस्करण में कांचा इलैया शेफर्ड का आलेख आया, जो बड़े स्पष्ट शब्दों में वामपंथियों की मंशा बयान करता है। इस लेख का शीर्षक है ‘भारत में जाति विरोधी आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ जैसी आग चाहिए, तभी वह मुख्य विलेन से लड़ पाएगा।’ इन सब को एक क्रम से पढ़ें तो क्या चित्र सामने आता हैं? यही कि द वायर, स्क्रोल, प्रिंट जैसे तमाम वामपंथी मुखपत्र इस देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं। ये भारतीय पुलिस की तथाकथित बर्बरता का विकृत चित्र सारे विश्व के सामने रखते हैं। कोरोना संक्रमण की तीन महीने की कालावधि में भारतीय पुलिस का जो मानवीय, दयालु और सकारात्मक चेहरा सामने आया है, उसे ये लोग तार-तार करना चाहते हैं। वे बार-बार अमेरिका के अश्वेतों से भारतीय मुसलमानों की तुलना करके हिंदुओं को उनसे ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ की तर्ज पर घुटने टेककर क्षमा मांगने की शरारत भरी मांग कर रहे हैं।
भारतीय मुसलमानों की अमेरिका के अश्वेतों से तुलना हो ही नहीं सकती। वहां अमेरिका में अश्वेतों ने गुलामी का जीवन जिया है। भारत में मुस्लिम आक्रांता के रूप में आए।

वे यहां के सैकड़ों वर्ष शासक रहे। उन्होंने हिंदुओं को गुलाम बना कर रखा था। हिंदुओं के धर्मस्थल ध्वस्त किए थे। उनकी मां-बहनों को उठा लिया था। उनके साथ बलात्कार किए थे। उनको बर्बरतापूर्वक मारा था। अनगिनत हत्याएं की थीं। ज्यादा दूर की बात क्यों करें, 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (आज के बांग्लादेश) में इन्होंने ही हिंदुओं का ‘नरसंहार’ किया था। एक लाख से ज्यादा हिंदुओं की दो-तीन महीनों के अंदर हत्या की थी। अभी 1990 के दशक के प्रारंभ में कश्मीर में उन्होंने यही किया था। ऐसे में वे बताएं, कौन किससे माफी मांगेगा? इतना ही नहीं, ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ की तर्ज पर ये वामपंथी ‘आदिवासी लाइव्स मैटर’ आंदोलन चला रहे हैं। इनकी अपनी वेबसाइट है, फेसबुक और ट्विटर खाते हैं। ये लोग बड़े ही नियमित तरीके से फेसबुक लाइव करते हैं। इस आंदोलन का उद्देश्य एक ही है-यह स्थापित करना कि ‘आदिवासी’ हिन्दू नहीं हैं। अगले वर्ष होने जा रही जनगणना में इन अतिवादी वामपंथियों का पूरा प्रयास है

कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड आदि प्रान्तों के अधिक से अधिक वनवासी जनगणना में अपने आप को हिन्दू न दर्ज कराएं।
संक्षेप में, प्रगति के पथ पर बढ़ते हुए भारत में ये तमाम वामपंथी बड़े पैमाने पर अराजकता फैलाना चाहते हैं, दंगे भड़काना चाहते हैं, अपने देश की महकती हवा में जहर घोलना चाहते हैं। ऐसे में इन्हें कोई देशद्रोही कहता है तो क्या गलत करता है?   
    (लेखक जाने-माने चिंतक हैं)