संगठित समाज से हारता रहा है संकटकाल

    दिनांक 30-जून-2020   
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अनुभवसिद्ध बात यह है कि जब भी हमारे सामने कोई संकटकाल या आपातकाल आया है, समाज ने एकजुट होकर उसका सामना किया है और उस पर विजय भी प्राप्त की है। ऐसा इसलिए होता है कि हम भारत को धरती का टुकड़ा नहीं, बल्कि मां मानते हैं

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कोई शब्द जैसे अचनाक हमारी चिंतन प्रणाली में खिड़की सी खोल देता है जिससे वे चीजें भी दिखने लगती हैं जो बिल्कुल सामने होते हुए भी नहीं दिखती थीं या धुंधली थीं। ‘आपातकाल’ एक ऐसा ही शब्द है। 25 जून को याद करते ही एक खिड़की खुलती है और 1975 की तस्वीरें धूल झाड़कर जिंदा हो जाती हैं। इस एक शब्द से सरकार, तानाशाही और संगठित समाज के संघर्ष के विभिन्न आयाम हमारे सामने आ खड़े होते हैं।
आपातकाल के दौरान समाज की प्रतिक्रिया एक महत्वपूर्ण आयाम है। किसी समाज का चित्त, उस चित्त को बनाए रखने वाली मूल संस्कृति की पहचान ऐसे ही संकटकाल में होती है। अगर आजादी के बाद के तीन आपातकालों की बात करें तो ये होंगे-परतंत्रता से आजादी की लड़ाई, 1975 का आपातकाल और आज चाइनीज वायरस की आरोपित वैश्विक आपदा से उपजे आंतरिक और सामरिक समीकरण।
अनुभवसिद्ध बात यह है कि जब भी हमारे सामने कोई संकटकाल या आपातकाल आया है, समाज ने एकजुट होकर उसका सामना किया है और उस पर विजय भी प्राप्त की है। ऐसा इसलिए होता है कि हम भारत को धरती का टुकड़ा नहीं, बल्कि मां मानते हैं। और मां पर जब कोई संकट आता है, तो उसकी संतान अपने को मिटाकर भी उसकी रक्षा के लिए तैयार हो जाती है! हम भारतीयों की यह कोई नई या तात्कालिक भावना नहीं है, बल्कि यह भाव सदियों से हमारी शिराओं में दौड़ रहा है।
साझी लड़ाई को खंड-खंड देखने का दुश्चक्र
भारत सदियों से एक राष्ट्र रहा है, लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि यह 1947 के बाद ही बना। ये लोग नई पीढ़ी को भ्रमित कर रहे हैं। ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि अगर आजादी से पहले यह भारत नहीं था, तो लड़ाई किसको आजाद कराने के लिए चल रही थी? 1857 में झांसी की रानी, तात्या टोपे जैसे स्वतंत्रता सेनानी किसके लिए लड़ रहे थे? भक्ति आंदोलन क्या था?
दरअसल, इस देश को खंड-खंड दिखाने वाली मानसिकता को समाज का संगठन भाव नहीं दिखता। इसलिए उसकी कोई व्याख्या न तो पूरी होती है और न ही समाज उसको स्वीकार करता है। लेकिन समूचे भारत की सामूहिक शक्ति को बांटने-घटाने की जुगत में लगे तत्व बार-बार लगातार हमारे बीच दीवारें खड़ी करते हैं। भाषा, प्रांत, समुदाय की बात तो छोड़िए, आजादी के नायकों के बीच भी दीवारें खड़ी करते हैं! एक साझी लड़ाई को समग्रता में देखने की दृष्टि को बाधित करने का काम इसलिए किया जाता है ताकि इस समाज का संगठन भाव तिरोहित हो सके।
वीर सावरकर, बाबासाहेब आंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस जैसे कई महापुरुष इस षड्यंत्र का शिकार हुए हैं। महात्मा गांधी, वीर सावरकर के प्रशंसक थे, भगत सिंह सावरकर को बड़े सम्मान से देखते थे, इस तथ्य पर वामपंथी राजनीति के पोषक, कथित इतिहासकार धूल डालते रहे। बाबासाहेब की दृष्टि पाकिस्तान के प्रति एकदम स्पष्ट थी। उनका मानना था कि समुदाय को देश से ऊपर रखने की बात गलत और प्रतिगामी है। देश किसी भी संप्रदाय के ऊपर होता है। परतंत्रता के उस आपातकाल से देश कैसे निकला, उसकी कहानी सही तरीके से समाज के सामने नहीं आई और इसकी वजह थी महापुरुषों को खंडित तरीके से अलग-अलग खांचों में रखकर देखने की राजनीति। कुछ लोगों के छोटे-छोटे हितों ने समाज को कितना छोटा कर दिया, यह समझने की बात है। वास्तविकता यह है कि अगर समाज के सांगठनिक चरित्र का पहली बार पूरी समग्रता के साथ परिचय मिलता है तो वह समय आजादी के लिए लड़ी गई लड़ाई का कालखंड ही था। उस समय समाज के विराट रूप का दर्शन हुआ था। सैकड़ों महापुरुषों की जगाई अलख और हजारों बलिदानों के बाद गुलामी की बेड़ियां कटीं। कांग्रेस, यानी अंग्रेजों द्वारा अंग्रेजी सत्ता को बचाए रखने के लिए बनाया गया 'सेफ़्टी वॉल्व' रानी विक्टोरिया की जय-जयकार से आगे बढ़कर वंदेमातरम की हुंकार भरने वाला मंच बना और इस राष्ट्रीय मंच पर सभी वर्ग—समुदायों, विभिन्न संस्थाओं ने स्वतंत्रता के यज्ञ में अपनी आहुतियां डालीं। समाज की सामूहिक शक्ति के कारण ही भारत उस आपातकाल से बाहर आ सका था।
इंदिरा के अहं से फूटा दूसरा आपातकाल
देखा जा सकता है कि धीरे-धीरे कांग्रेस महात्मा गांधी के सपनों से कितनी दूर होती चली गई। आजादी के बाद गांधीजी चाहते थे कि चूंकि कांग्रेस का उद्देश्य पूरा हो गया, यानी देश आजाद हो गया, तो कांग्रेस को भंग कर दिया जाना चाहिए। ये और बात है कि राजनीति को समाज से ऊपर मानने वालों की सोच के चलते वैसा नहीं हुआ। गांधीजी की बातें कितनी सही थीं, इसका अनुमान नेहरू के समय की कांग्रेस से ही लगने लगा था। लेकिन इंदिरा तक आते-आते कांग्रेस परिवार-व्यक्ति आधारित संगठन हो गई थी। स्थिति यह थी कि जो बातें लोगों को कांग्रेस के फैसले के रूप में बताई जातीं, वे दरअसल इंदिरा की होतीं।
समाज वही था, समाज का चित्त वही था, समाज का स्वभाव वही था। लेकिन अंग्रेजी तर्ज पर समाज को बांटने के षड्यंत्र दोहराए गए। शासक को समाज से ऊपर समझने की इसी राजनीतिक संकीर्णता के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपा था। वह आपातकाल आज भी भारत के लोकतांत्रिक इतिहास पर एक बदनुमा दाग है और 21 महीने तक आपातकाल विरोधियों के साथ कैसे-कैसे अत्याचार हुए, यह दुनिया को पता है।
उस दौरान इंदिरा गांधी की मानसिकता को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। 1971 के लोकसभा चुनाव में 352 सीटें जीतकर इंदिरा जी ने सरकार बनाई। लेकिन उनके मन में टीस थी, एक गुस्सा था। वह गुस्सा मूलत: न्यायपालिका के लिए था क्योंकि गोलकनाथ केस, प्रिवी पर्स और बैंकों के राष्ट्रीयकरण के मामलों पर न्यायपालिका की राय सरकार और कांग्रेस यानी इंदिरा की राय से अलग थी। इतने प्रबल जनमत के कारण उन्हें लगने लगा था- मैं जो कहूं, वही पत्थर की लकीर है! या-जो मेरी बात नहीं मानेगा उसे मैं ठीक कर दूंगी! दरअसल, मन में पलते इसी अहंकार के चलते उन्होंने न्यायपालिका से लेकर संसद तक को ठेंगा दिखाते हुए सभी संवैधानिक संस्थाओं की बांह मरोड़नी शुरू कर दी। उनसे अपने अनुसार काम करवाने शुरू कर दिए। विश्लेषक मानते हैं कि इसके कारण सर्वोच्च न्यायालय के जज भी बंट गए। कुछ इंदिरा के समर्थन में तो कुछ उनके खिलाफ। जो खिलाफ रहे, उन्हें प्रोन्नति जैसे मामलों की आड़ में प्रताड़ित करने की बात भी हवा में तैरी। इस तरह उन्होंने आपातकाल की पृष्ठभूमि तैयार की और जैसे ही उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय की इलाहाबाद खंडपीठ ने उनके चुनाव को निरस्त किया, उन्होंने अपनी सरकार बचाने के लिए आपातकाल की घोषणा कर दी। माना जा सकता है कि यह फैसला इंदिरा का ही था, क्योंकि उन्होंने न तो कैबिनेट में इस पर चर्चा की और न पार्टी में। ना उन्होंने संवैधानिक व्यवस्था के तहत आपातकाल लगाने के बारे में कोई सलाह ही ली।
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने संविधान संशोधन के जरिए व्यवस्था की कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष पर उंगली नहीं उठाई जा सकती, इनके निर्वाचन की भी जांच नहीं की जा सकती। दरअसल, इंदिरा गांधी की सोच ‘समर्पित नौकरशाही’ और ‘समर्पित न्यायपालिका’ की समर्थक थी। लोकतंत्र के मूल भाव को समझे बिना वह इसे ‘कुनबाशाही’ से चलाना चाहती थीं और इसीलिए न्यायपालिका के स्वतंत्र दृष्टिकोण और मत को वह स्वयं पर हमले की तरह देखती थीं। यही कारण था कि वह न्यायपालिका से मिली ह्यचोटह्ण को बर्दाश्त नहीं कर सकीं। उन्होंने सोचा कि अगर इन चार पदों पर कब्जा करके और कुनबे की पकड़ बनाकर चलें तो आगे उनके लिए बड़ी आसानी होगी। इस संशोधन के आईने में तो यही लगता है कि वह मान बैठी थीं कि देश पर शासन उनके परिवार का ही चलना है। मगर इंदिरा की तानाशाही के विरुद्ध समाज अलग तरीके से आंदोलित हो गया।
समाज की पुकार पर सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) आगे आए और उनके नेतृत्व में एक बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ जिसमें समाज का हर वर्ग, हर समुदाय शामिल था। ठीक उसी तरह जैसे आजादी के आंदोलन के दौरान एक बड़े लक्ष्य के लिए पूरा समाज संगठित हो गया था। जेपी के एक नारे पर सभी एक छतरी के नीचे आ गए, वे चाहे समाजवादी हों या बहुजन सभा वाले, चाहे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद हो या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े 30 आनुषांगिक संगठन। संगठित समाज ने आंदोलन को सफल बनाने में दिन-रात काम किया। आपातकाल में करीब 3,00000 लोग कारावास में थे। इनमें से लगभग 1,50,000 संघ के स्वयंसेवक थे। इन लोगों ने किसी राजनीतिक इच्छा से आपातकाल का विरोध नहीं किया था। इनका एक ही उद्देश्य था कि देश में लोकतंत्र बचा रहे। इन लोगों ने संगठन-शक्ति से दिखा दिया कि इस लोकतंत्र पर एक व्यक्ति को हावी नहीं होने देंगे।
कोरोना आपातकाल में भी सरोकारी समाज
पहले परतंत्रता थी जिसमें समाज बाहरी ताकत के विरुद्ध एकजुट हुआ था, उसके बाद 1975 के आपातकाल के दौरान समाज एक आंतरिक संकट से निपटने के लिए खड़ा हुआ। अब तीसरी बार वैश्विक आपदा से उपजे आंतरिक तथा सामरिक संकटों से दो-दो हाथ करने में भारतीय समाज लगा है। भारत समेत पूरी दुनिया पर आरोपित यह आपदा ऐसी चुनौती है जो सैकड़ों वर्षों में मनुष्य और समाज की परीक्षा लेती है। पर भारत ने जिस तरह से इसे स्वीकारा है और रोका है, उसकी चर्चा दुनियाभर में हो रही है। इतनी सघन आबादी के बाद भी कोरोना को संभाल लेना कोई छोटी बात नहीं है। इसको रोकने के लिए तंत्र जो कर रहा है, वह तो कर ही रहा है, पर इस संकटकाल में समाज का वही स्थायी सर्वहितकारी भाव सामने आया। समाज ने महसूस किया कि उसका भी कुछ दायित्व है और वह दायित्व सरकार से बड़ा है। समाज का यही भाव संकटकाल से बाहर निकालता है। इस भाव का प्रत्यक्ष दर्शन कुछ दिन पहले तक हुआ है। आखिर हजार किलोमीटर की यात्रा पर निकला कोई प्रवासी अपने साथ इतनी लंबी यात्रा के लिए जरूरी रसद-पानी तो लेकर नहीं गया! उसी समाज ने उसकी यात्रा की चिंता की जो कांवड़ यात्रा में जाने वाले लोगों के पैरों में मेहंदी लगाता है, पैरों की मालिश करता है और उनके लिए लंगर का इंतजाम करता है। उन्हें गंतव्य तक छोड़ने के लिए गाड़ी का इंतजाम किया गया। इन कार्यों में संघ के लाखों कार्यकर्ता लगे। उन दिनों दिल्ली के प्रसिद्ध झंडेवाला मंदिर में प्रतिदिन लगभग 40,000 लोगों के लिए भोजन बनता था और इस भोजन को पूरी दिल्ली में पहुंचाने के लिए संघ के हजारों कार्यकर्ता जुटे थे। ये सब समाज के संगठन के कारण हो रहा था। यानी हर संकट का समाधान समाज-जागरण, समाज संगठन में है और यह भारत के लिए अच्छी बात है कि हमारे यहां संघ जैसे संगठन हैं जो समाज को जोड़ने-जगाने के लिए अहर्निश कार्य कर रहे हैं।
यह अलग बात है कि समाज की विभाजक रेखाओं के इर्द-गिर्द अपने राजनीतिक समेत कई अन्य तरह के हितों को साधने वाले लोगों ने चीन की चालबाजियों और चाइनीज वायरस से उपजी पीड़ा की आड़ लेते हुए समाज को भ्रमित करने, भड़काने का प्रयास किया। लेकिन समाज जानता है कि यह परीक्षा कितनी बड़ी है और इसलिए वह भ्रमित नहीं हुआ और एक बार फिर से राष्ट्रसेवा में जुट गया। यह सब राजनीति से नहीं होता। राजनेता ठीक हों तो अच्छे से होता है (जैसे अब हो रहा है) अन्यथा समाज राजनेता को ठीक करता है (जिस तरह आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी के साथ किया)।
सही को पुरस्कार, गलत का तिरस्कार और गलत जहां तक सही हो सके उसके लिए परिष्कार, यह भारत के संगठित समाज का सांस्कृतिक स्वभाव है। अगर हम भारत को माता मानते हैं और यह महसूस करते हैं कि हम सब उसके बच्चे हैं तो सबमें आपस में एक रिश्ता कायम हो जाता है। यह शक्ति भारत को किसी भी आपातकाल से निकलने की ताकत देती है। सदियों से संजोई हुई यह सामाजिक शक्ति भारतीय समाज की मुट्ठी में है। यह दुनिया में अनूठी है और बाकी सबके लिए सबक भी।
@Hiteshshankar