कोरोना को लेकर दिल्ली सरकार के सारे दावे झूठे

    दिनांक 04-जून-2020   
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दिल्ली सरकार दावा तो कर रही है कि कोरोना के मरीजों के लिए उसके पास पर्याप्त बेड हैं। दिल्ली सरकार का कोरोना एप भी इसकी गवाही दे रहा है लेकिन सिर्फ एप पर बेड उपलब्ध हैं असल में नहीं। मरीज दर—दर भटक रहे हैं। पाञ्चजन्य के पास इस बात के पुख्ता साक्ष्य हैं कि दिल्ली सरकार के सारे दावे झूठे हैं

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कोरोना पॉजिटिव मरीजों का इलाज करने में दिल्ली सरकार फेल हो रही है। रोजाना प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कोरोना से न डरने की बात कहने वाले अरविंद केजरीवाल के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। दो जून को दिल्ली सरकार ने दिल्ली में कोरोना मरीजों के लिए बेड और वेंटिलेटर की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए दिल्ली कोरोना मोबाइल एप लांच किया, लेकिन एप पर दिखने वाले खाली बेड और वेंटिलेटर आम मरीजों की पहुंच से बहुत दूर हैं। खाली दिखने वाले बेड पर मरीज भर्ती होने के लिए पहुंचे तो उन्हें यह कहकर वापिस भेज दिया गया गया कि आठ से दस घंटे इंतजार करना पड़ेगा या फिर बेड खाली ही नहीं है। दो से चार जून के बाद ऐसी कई शिकायतें मरीजों ने कीं, जिसमें उन्हें बेड न होने पर अस्पताल से बिना इलाज लौटना पड़ा।
कोरोना पॉजिटिव अस्थमा मरीज को दिनभर दौड़ाया
राजौरी गार्डन निवासी 75 वर्षीय उमा अरोड़ा अस्थमा की मरीज हैं, और दो दिन पहले ही उनकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। बुजुर्ग होने के साथ ही अस्थमा की मरीज होने पर उन्हें न सिर्फ बेड की जरूरत थी, बल्कि उन्हें वेंटिलेटर भी चाहिए था। उमा अरोड़ा के बेटे ने दिल्ली सरकार के दिल्ली कोरोना मोबाइल एप पर बेड और वेंटिलेटर की जानकारी हासिल की तो पता चला कि राम मनोहर लोहिया अस्पताल में 21 बेड उपलब्ध हैं। वह अपनी मां को लेकर जब अस्पताल पहुंचे तो भर्ती करने से मना कर दिया गया, कहा गया कि आपको आठ से दस घंटे इंतजार करना पड़ सकता है, इसके बाद भी बेड मिल जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसके बाद वह अपनी मां को लेकर लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल पहुंचे, जहां मोबाइल एप में 17 वेंटिलेटर और 1129 बेड खाली दिखाए रहे थे, लेकिन लोकनायक में भी उमा अरोड़ा को बेड नहीं मिल पाया, बताया गया कि कुछ मरीजों के लिए इन्हें पहले ही बुक किया जा चुका है। इस बावत जब अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुरेश कुमार ने बात करने की कोशिश की गई तो जानकारी मिली कि वह खुद कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं और क्वारंटाइन में हैं। बात करने के लिए उपलब्ध नहीं हो पाएंगे।
गर्भवती महिला से इलाज के लिए मांगे पांच लाख रुपए
सरकारी सहित दिल्ली के प्राइवेट ऐसे अस्पतालों के बीस प्रतिशत बेड कोरोना मरीजों के लिए आरक्षित करने के लिए कहा गया है, जहां बेड की संख्या 50 या इससे अधिक हैं। इस आधार पर दिल्ली में कुल 61 प्राइवेट अस्पतालों में कोरोना का इलाज कराया जा सकता है, और यहां बीपीएल कोटे के मरीजों के लिए किसी तरह का शुल्क भी नहीं लिया जा सकता। लेकिन यहीं से अस्पतालों का खेल शुरू होता है। चंदन विहार निवासी 26 वर्षीय भारती का ईडब्लूएस कोटे के अंर्तगत सरगंगाराम अस्पताल से इलाज चल रहा था। भारती आठ माह की गर्भवती हैं और उसकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आने के साथ ही अस्पताल प्रशासन ने महिला का निशुल्क इलाज करने से मना कर दिया और कहा कि महिला को कोरोना है, पहले पांच लाख रुपए जमा कराए इसके बाद ही इलाज शुरू हो सकेगा। भारती के पति ने आस पड़ोस की सहायता से दो लाख रुपए का इंतजाम कर लिया बावजूद इसके बुधवार दोपहर तक उसकी पत्नी को सरगंगाराम अस्पताल में बेड नहीं मिल पाया। भारती के पति ने अधिवक्ता अशोक अग्रवाल से मामले की पूरी की जानकारी दी, इसके बाद बुधवार रात्रि 12 बजे भारती को बिना पैसे जमा कराए सरगंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया जा सका। भारती के पति जयकुमार ने बताया कि हम एक जून से परेशान थे, पहले कोरोना जांच के लिए छह हजार रुपए खर्च किए, फिर डिलीवरी के लिए पांच लाख रुपए मांगे गए।
पिता की कोरोना से मौत, लेकिन परिवार का नहीं हुआ टेस्ट
दिलशाद गार्डन निवासी 50 वर्षीय जगदीश की 26 मई को लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में कोरोना से मौत हो गई। परिवार में एक बेटा बेटी और पत्नी है। जगदीश की मौत हुए एक सप्ताह से अधिक का समय बीत गया है लेकिन परिवार के किसी भी सदस्य की अभी तक कोरोना जांच नहीं हो पाई है। बेटी शिप्रा ने बताया कि पहले तो पिता को इलाज के लिए पटपड़गंज स्थित मैक्स अस्पताल लेकर गए, जहां कोरोना जांच रिपोर्ट आने से पहले ही 98 हजार रुपए जमा करा लिए गए। दोपहर बाद रिपोर्ट आई तो पिता को लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल रेफर कर दिया गया और कहा गया कि मैक्स अस्पताल की इस शाखा में अब कोरोना का इलाज नहीं किया जाता, या तो आप अपने पिता को साकेत मैक्स ले जाओ या फिर लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल। परिजनों ने जमा किए गए पैसों पर बहस करना सही नहीं समझा और पिता को लेकर एलएनजेपी अस्पताल आ गए, जहां उन्हें वेंटिलेटर नहीं मिला और 26 मई की सुबह जगदीश की मौत हो गई। शिप्रा ने बताया कि हमें फोन पर किसी से बात कराई गई और कहा गया कि ढाई लाख रुपए जमा करने पर एलएनजेपी अस्पताल में वेंटिलेटर मिल जाएगा, इससे पहले की हम ढाई लाख रुपए का इंतजाम करते पिता जी की मौत हो गई। शिप्रा ने कहा कि कोविड से पिता की मौत होने के बाद भी परिवार के किसी भी सदस्य का कोरोना टेस्ट नहीं किया गया। पिता की जरूरी चीजें जैसे मोबाइल और अन्य सामान भी अस्पताल से नहीं मिल पाया।
गुरूवार सुबह 10.30 दिल्ली में मोबाइल एप पर वेंटिलेटर और बेड की उपलब्धता
कोरोना बेड                     भर्ती मरीज             खाली बेड
8386 3                             440                        4946
कोविड वेंटिलेटर
408                                    255                          153
( नोट- इसमें सरकारी और निजी दोनों अस्पतालों के बेड की संख्या शामिल है। ये बात दीगर है कि एप पर बेड खाली दिखाए जा रहे हैं लेकिन मरीजों को नहीं मिल रहे हैं )