सरोकार और सामरिकता के सेतु

    दिनांक 04-जून-2020
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आराधना शरण
लद्दाख में विस्तारवादी चीनियों की बढ़ती दखलंदाजी और आक्रामकता को देखते हुए भारत सरकार ने गत 4-5 वर्ष में जम्मू-कश्मीर सहित लद्दाख में सामरिक महत्व के अनेक सड़क मार्गों और पुलों का निर्माण किया है। आज इन क्षेत्रों में भारत की रणनीतिक स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है 
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लद्दाख में बना कर्नल छेवांग रिनचेन सेतु


भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव का वातावरण है और दोनों ओर से सैनिकों की तैनाती बढ़ाई जा रही है। अपनी कथित भौगोलिक सीमाओं के प्रति संवेदनशील परंतु अन्य देशों की सीमाओं के प्रति लाप्रवाह विस्तारवादी चीनी नेतृत्व की आक्रामक प्रकृति के कारण ऐसी स्थिति आती ही रही है। देश के सुरक्षा सरोकारों के मद्देनजर समय की मांग थी कि हम सीमाओं को सशक्त करें। सजगता से काम करते हुए भारत के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व ने गत 4—5 वर्ष में चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बुनियादी ढांचा विकसित किया है। ऐसे में किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए सीमा पर बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की सरकार की प्रतिबद्धता को सामरिक तौर पर सबल करने में सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) बखूबी जुटा है।
मोदी सरकार के नेतृत्व में देश की सामरिक नीतियों ने कलेवर बदले और नए तेवर के साथ भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में सड़कों के सशक्त नेटवर्क तैयार करने की परियोजनाओं को प्राथमिकता दी गई। हम चीन पर भरोसा नहीं कर सकते। वह ‘हिन्दी चीनी भाई-भाई’ की आड़ में घात कर जाता है। चीनी घुसपैठ भी बदस्तूर जारी रहती है। 1986 में सोम दुरुंग, 2013 में लद्दाख, 2017 में डोकलाम जैसी घटनाएं चीन के खतरनाक मंसूबों की प्रमाण हैं। लेकिन आज नया भारत हर तरह से सन्नद्ध है।

भारत की रणनीतिक व्यवस्था में बीआरओ एक अहम निकाय है जो दुर्गम सीमान्त क्षेत्रों और सैन्य ठिकानों तक संपर्क, आवाजाही और सैन्य साजो-सामान पहुंचाने के लिए सड़क निर्माण और रखरखाव का दायित्व निभा रहा है। इसके पास सीमावर्ती इलाकों के 53,000 किलोमीटर सड़कों की जिम्मेदारी है। 7 मई, 1960 को गठित बीआरओ सीमावर्ती राज्यों के सामाजिक-आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान कर रहा है। खासतौर पर पिछले चंद महीनों के दौरान इसने जिन रणनीतिक पुलों का निर्माण किया है, वे चीन के साथ मौजूदा तनाव में हमारी बड़ी शक्ति साबित होने जा रहे हैं। सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर आर.पी.सिंह इन पुलों को भारत के लिए बहुत अहम मानते हैं।

वह कहते हैं, ‘अरुणाचल पर चीन की नजर रही है और उस इलाके में ढांचागत तैयारी करना बहुत जरूरी था। चीन ने अपने क्षेत्र में बेहतर सड़कें बना रखी हैं, तो हमें भी अपने इलाके में ऐसी व्यवस्था करनी थी जिससे जरूरत पड़ने पर भारी तोपखाने और टैंक वगैरह ले जा सकें।’गौरतलब है कि भारत का पाकिस्तान और चीन के साथ अक्सर उभरने वाला विवाद अन्य बातों के अलावा मुख्य रूप से सीमा संबंधी रहा है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद चीन और पाकिस्तान की गंभीर प्रतिक्रियाएं हमें इस हिमालयी पर्वतीय क्षेत्र में अपनी सामरिक ताकत को मजबूत और अभेद्य बनाने की प्राथमिकता के प्रति सचेत करती हैं। चीन के तिब्बत के अधिग्रहण के बाद से भारत और चीन में गंभीर सीमा विवाद शुरू हुए।

चीन भारत के पूर्व में स्थित अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत कहता है और तवांग को भी 'अपना क्षेत्र' मानता है। दोनों देशों के बीच 3,500 किमोलीटर लंबी सीमा है जो सीमांकित नहीं और यही सबसे बड़ी जड़ है मतभेद की। 1962 में चीन ने तवांग सहित पूरे अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा कर लिया था, लेकिन बाद में मैकमोहन रेखा तक हट गया था। हालांकि, लद्दाख के अक्साई चिन से वह टस से मस नहीं होता, क्योंकि इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति से वह खुद को मध्य एशिया और भारत के संबंध में ताकतवर समझता है। 1950 के दशक के अंत में चीन ने तिब्बत पर अधिग्रहण के बाद अक्साई चिन के करीब 38 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके पर अवैध कब्जा कर लिया था। चीन ने वहां नेशनल हाईवे 219 भी बना लिया था जो उसके पूर्वी प्रांत सिंक्यांग को जोड़ता है। यह भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित इलाके के भी नजदीक है।

चीन-पाकिस्तान नजदीकी
चीन की विस्तारवादी नीति हमारे एक अन्य दुश्मन यानी पाकिस्तान के साथ अपना फायदा भुनाने में परहेज नहीं करती है। हाल में भारत के मजबूत इरादों और नए रुख को देखकर, जाहिर है चीन को चिंता होने लगी है कि भारत सरकार अब पाकिस्तान अधिक्रांत कश्मीर यानी गिलगित, बाल्टिस्तान और अक्साई चिन को अपने में शामिल कर सकती है। भारत के लिए अक्साई चिन की क्या अहमियत है, इसका अंदाजा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के संसद में दिए बयान से लगाया जा सकता है। 6 अगस्त 2020 को लोकसभा में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने की घोषणा करते समय शाह ने कहा था,‘पाकिस्तान अधिक्रांत कश्मीर और अक्साई चिन जम्मू-कश्मीर का हिस्सा हैं। हमारे और जम्मू-कश्मीर के संविधान ने जम्मू-कश्मीर की जो सीमाएं तय की हैं, उसमें पाक अधिक्रांत कश्मीर और अक्साई चिन दोनों समाहित हैं। ..और जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।’

ढांचा मजबूत, पहुंच आसान
भारत ने आज अपनी क्षमता बेहतर कर ली है और वह चीन से सटी सीमा के पास तैनात चौकियों पर अपेक्षाकृत कम समय में सैन्यबलों, टैंक-भारी तोपखाने और अन्य साजो-सामान वगैरह पहुंचा सकता है। इस संदर्भ में बीआरओ के पिछले चंद महीने के दौरान बनाए गए कर्नल छेवांग रिनचेन सेतु, सीसरी नदी पुल और दापोरजियो पुल जैसे मील के पत्थर हमारे सीमावर्ती इलाकों और सेना के कवच बनेंगे। भारत का चीन के साथ डोकलाम में तनाव वह मोड़ बना जिसने साफ दर्शाया कि भारतीय सेना का पलड़ा सिर्फ इसलिए भारी रहा क्योंकि वहां भारत का बुनियादी ढांचा अपेक्षाकृत बेहतर था। लेकिन अन्य सीमावर्ती इलाकों के हालात अच्छे नहीं थे। वजह हमारी ही दोषपूर्ण नीतियों में छिपी थी। कई दशकों से चली आ रही

भारत की सीमा क्षेत्रीय नीतियों में भारत-चीन सीमा पर सड़क संपर्क प्रणाली के समुचित विकास के मामले में अपेक्षित तेजी नहीं रहने की वजह संभवत: 1962 की हार रही तो कभी भौगोलिक दुश्वारियां आड़े आईं। लेकिन मोदी सरकार के नेतृत्व में देश की सामरिक नीतियों ने कलेवर बदले और नए तेवर के साथ भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में सड़कों के सशक्त नेटवर्क तैयार करने की परियोजनाओं को प्राथमिकता दी गई। हम चीन पर भरोसा नहीं कर सकते। वह ‘हिन्दी चीनी भाई-भाइ’ की आड़ में घात कर जाता है। चीनी घुसपैठ भी बदस्तूर जारी रहती है। 1986 में सोम दुरुंग, 2013 में लद्दाख, 2017 में डोकलाम जैसी घटनाए़ं चीन के खतरनाक मंसूबों की प्रमाण हैं।

अरुणाचल में मजबूत हुए हम
दापोरजियो पुल: 20 अप्रैल, 2020 को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने प्रदेश में सामरिक महत्व के दो पुलों का उद्घाटन किया-दापोरजियो और सिसरी पुल, जो हर मौसम में चालू रहेंगे। दापोरजियो पुल भारत और चीन सीमा पर वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास के इलाकों से जुड़ने वाला सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण संपर्क सेतु है। बीआरओ ने अरुणाचल प्रदेश के सुदूरवर्ती ऊपरी सुबानसिरी जिले में अरुणांक परियोजना के तहत सुबानसिरी नदी पर महज 27 दिन में इस पुल का निर्माण किया। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि अब भारत-चीन सीमा तक 40 टन वजन के सैन्य साजो-सामान की आवाजाही हो सकती है। देश में कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन के दौरान भी परियोजना चालू रही। चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर उभरे वर्तमान तनाव के इस दौर में इन पुलों का महत्व और भी बढ़ जाता है। वैसे, अरुणाचल के आर्थिक विकास के नजरिये से भी इन पुलों की अलग अहमियत है, क्योंकि मानसून के समय ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों में बाढ़ के कारण राज्य के कई इलाकों का संपर्क देश से टूट जाता है और सारा जनजीवन और कामकाज ठप पड़ जाता था।
 
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20 जुलाई, 2019 को उझ पुल के उदघाटन के बाद पुल की विशेषताएं समझते रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र प्रसाद

सिसरी पुल: 5 नवंबर, 2019 को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने अरुणाचल प्रदेश में सिसरी पुल का उदघाटन किया। जोनाई-पासीघाट-राणाघाट-रोइंग सड़क के बीच बना यह 200 मीटर लंबा पुल सामरिक तौर पर अहम दिबांग घाटी और सियांग को जोड़ता है। यह सभी मौसमों में काम करेगा। इसे सीमा सड़क संगठन ने ब्रह्मांक परियोजना के तहत बनाया है।

लद्दाख में कर्नल छेवांग रिनचेन सेतु
21 अक्तूबर, 2019 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लद्दाख में नवनिर्मित कर्नल छेवांग रिनचेन सेतु का उद्घाटन किया था। भारत-चीन सीमा से 45 किमी. दूर 15,000 फीट की ऊंचाई पर बेहद खतरनाक श्योक नदी (जिसे स्थानीय भाषा में ‘मृतकों की नदी’ कहते हैं) पर हिमांक परियोजना के तहत माइक्रो पाइलिंग टेक्नोलॉजी से बना कर्नल छेवांग रिनचेन पूर्वी लद्दाख में दुरबुक और रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण दौलत बेग ओल्डी को जोड़ता है, जहां से चीनी सीमा यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा सिर्फ 8 किमी. दूर है। सीमा सड़क संगठन के जवानों ने महज 15 महीने में इसका निर्माण किया है। इसका नाम अपनी अदम्य वीरता से भारत का सबसे बड़ा शौर्य पुरस्कार, महावीर चक्र दो बार हासिल करने वाले लद्दाख के शेर कर्नल छेवांग रिनचेन पर रखा गया है। अक्साई चिन जैसे सरहदी इलाके में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए काराकोरम और चांग चेनमो पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बना है यह पुल।
 
उत्तराखंड में कैलास-मानसरोवर जुड़े सड़क से
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गत 8 मई को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए कैलास-मानसरोवर तक बने गर्बाधार-लिपुलेख मार्ग का शुभारंभ किया। सीमा सड़क संगठन ने कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग पर धारचूला से लिपुलेख दर्रे (चीन सीमा) तक 17,060 फीट की ऊंचाई पर 80 किलोमीटर लम्बी सड़क का निर्माण किया है जो सामरिक तौर पर बहुत अहमियत रखती है। अब चीन सीमा स्थित लिपुलेख तक वाहनों की आवाजाही हो सकती है। इन दुर्गम स्थानों पर तैनात सेना की टुकड़ियों तक आवश्यक सामान, अस्त्र-शस्त्र और उपकरण बहुत कम समय में पहुंचाए जा सकेंगे। यह सड़क भी लॉकडाउन के दौरान विषम परिस्थितियों में पूरी की गई। यह मार्ग कैलास-मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक बेहद सुगम राह है।
 
जम्मू में उझ और बसंतर पुल
20 जुलाई, 2019 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों में पाकिस्तान से लगी सीमा के पास सामरिक महत्व के उझ और बसंतर पुल का उदघाटन किया। बसंतर नदी पर राजपुरा-मडवाल-पंगादुर-फूलपुर मार्ग पर स्थित यह पुल और परोल-कोरेपन्नू राजपुरा मार्ग पर उझ नदी पर बना पुल बेहतर संपर्क मार्ग बने हैं। इनके जरिए सीमावर्ती क्षेत्रों में सशस्त्र बलों, टैंक और भारी तोपखाने वगैरह की आवाजाही आसान होगी। इन इलाकों की कानून व्यवस्था भी बेहतर होगी और सामान्य जनजीवन को भी सुविधाएं मिलेंगी।

कासोवाल एनक्लेव तक संपर्क
इस बीच सीमा सड़क संगठन ने रावी नदी पर स्थायी पुल का निर्माण किया है जो देश के शेष हिस्से को कासोवाल एनक्लेव से जोड़ता है। पहले 35 वर्ग किलोमीटर का यह एनक्लेव पंटून पुल से जुड़ा था, जिसकी भार वहन करने की क्षमता बहुत सीमित थी। पुल के निर्माण कार्य के दौरान बीआरओ को न सिर्फ बरसात के मौसम की तमाम दुश्वारियों का सामना करना पड़ा, बल्कि पाकिस्तान की ओर से बरसाए जा रहे गोले भी झेलने पड़े।

पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 में हुए युद्धों के दौरान यह इलाका सैन्य नजरिए से अत्यंत संवेदनशील था। इसके अलावा किसानों के लिए भी यह पुल बड़ी राहत लेकर आया है। यहां की जमीन बहुत उपजाऊ है। यह पुल उनके लिए खेती की बेहतर संभावनाओं की सौगात और आर्थिक सशक्तिकरण का संदेश लाया है।  
  
हमारी ढांचागत तैयारियों को देखते हुए अगर चीन ने नियंत्रण रेखा के पास तनाव बढ़ाया तो हमारे ये नए संपर्क साधन भारत का सामरिक तौर पर बेहतर स्थिति में रखेंगे। आज चीन के सामने नया भारत खड़ा है, जो उससे अपनी शर्तों पर बात करना और निर्भीकता के साथ उसका सामना करना जानता है।