ताईवान का पक्ष बलवान

    दिनांक 04-जून-2020
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 नम्रता हसीजा
चीन ताईवान कों डब्ल्यूएचओ में दुबारा शामिल करने के रास्ते में रोड़े अटका रहा है, लेकिन कोरोना के खिलाफ सफल लड़ाई में ताईवान की एक बड़ी भूमिका है। दुनिया का एक बड़ा वर्ग आक्रामक रुख वाले चीन के नहीं बल्कि ताईवान के साथ है। भारत को बहुत समझदारी से ताईवान के पाले में खड़ा होना होगा 
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ताईवान के स्वास्थ्य मंत्री चेन शि चुंग (मध्य में) गत दिनों जेनेवा में ताईवान के समर्थन में बैनर थामे दिखे
 
यह सुखद आश्चर्य ही है कि हाल में मुख्यधारा मीडिया के एक वर्ग ने ताईवान संबंधी चंद लेख छापे और कुछ टीवी चैनलों ने चाइनीज वायरस पर अंकुश लगाने में इसकी सफल लड़ाई का जिक्र भी किया। लेकिन इन लेखों से चीन चिढ़ गया और भारत में चीनी दूतावास के प्रवक्ता जी रोंग ने बयान जारी किया कि ‘भारतीय मीडिया विश्व स्वास्थ्य संगठन में ताईवान की भागीदारी की वकालत रहा है।’ 12 मई 2020 को धमकीभरे अंदाज में उन्होंने लिखा, ‘हम भारत के ऐसे मीडिया से अनुरोध करते हैं कि वे संप्रभुता और भौगोलिक अखंडता से जुड़े मुद्दों पर चीन के बुनियादी हितों को ध्यान में रखते हुए सही रुख अपनाएं, ‘वन-चाइना’ सिद्धांत का पालन करें, ताईवान की आजादी चाहने वाली ताकतों को मंच उपलब्ध न कराएं और लोगों को गलत संदेश देने से बचें।’
 
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजिआन ने भी 15 मई, 2020 को सख्त संदेश जारी करते हुए कहा था कि ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन की बैठक में ताईवान तभी भाग ले सकता है जब वह ‘वन चाइना’ सिद्धांत पर टिका रहे।’ लगता है जैसे चीन कभी-कभी भूल जाता है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जिसमें अगर कुछ मीडिया समूह हांगकांग में चीन के ‘न्यायसंगत तरीकों’ का समर्थन कर रहे चीनी राजदूत को जगह दे सकते हैं तो कुछ समूह चाइनीज वायरस से बखूबी लड़ने के लिए ताईवान की तारीफ भी कर सकते हैं।

ताईवान की तारीफ
साफ है कि 2015 में ताईवान में डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी की साई इंग वेन के राष्ट्रपति बनने के बाद से चीन ने ताईवान पर दबाव बढ़ा दिया है। अभी हाल में जब वह लगातार दूसरी बार राष्ट्रपति चुनी गईं तो चीन परेशान हो उठा। दुनिया में ताईवान के लोकतंत्र को हमेशा चंद खेमों से समर्थन मिलता रहा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में जहां कोरोना संक्रमण पर चीन का व्यवहार गैर-जिम्मेदाराना रहा और पूरी दुनिया को खामियाजा उठाना पड़ा, वहीं ताईवान के तत्पर कदमों ने खूब तारीफ बटोरी। उधर चीन तरह-तरह से अपना बचाव कर रहा है। उसका दुष्प्रचार तंत्र इसके लिए नए-नए सिद्धांत पेश कर रहा है, लेकिन असर उल्टा ही हो रहा है। चीन की ओर लगातार उंगलियां उठ रही हैं। इसके साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन में ताईवान को प्रवेश देने की मांग भी तेज हो गई है।
 

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 ताईवान की लोकप्रिय राष्ट्रपति साई इंग वेन

विश्व स्वास्थ्य संगठन में ताईवान के भाग लेने को अमेरिका के खुले समर्थन और राष्ट्रपति साई को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो के निजी संदेश भेजे जाने से चीन बौखला गया है। गौरतलब है कि 2015 में ताईवान में राष्ट्रपति चुनाव जीतने पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साई इंग वेन को बधाई दी थी, तब चीन ने इसकी निंदा की थी। हाल में अमेरिका ने ताईवान पर अपना रुख और स्पष्ट कर दिया जब उसके विदेश मंत्रालय ने उन्नत तकनीक वाले 18 एमके-48 तारपीडो 18 करोड़ डॉलर में ताईवान को बेचने की मंजूरी दी। अब न केवल अमेरिका बल्कि जापान, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया समेत विभिन्न यूरोपीय देश खुलकर ताईवान के समर्थन में आ गए हैं।

भारत-ताईवान रिश्तों में जुड़ें नए आयाम
भारत से भी सकारात्मक संकेत जा रहे हैं। यहां के कुछ मीडिया समूहों ने ताईवान के समर्थन में लेख ही नहीं छापे, बल्कि भाजपा के दो सांसदों मीनाक्षी लेखी और राहुल कासवान ने ताईवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन के शपथ ग्रहण समारोह में वेब के जरिए भाग लिया और उन्हें शुभकामना संदेश भी भेजे। ये संदेश ताईवान पर मोदी सरकार के बदलते रुख के संकेत हैं। गौरतलब है कि ताईवान को चीन अपना भू-भाग बताता है। साई के शपथ ग्रहण समारोह में 41 देशों के 92 प्रतिनिधि वेब के जरिए शामिल थे। कोविड-19 के कारण ताईवान में अभी विदेशियों के प्रवेश पर प्रतिबंध है।

सवाल है कि क्या भारत सरकार को इन सांकेतिक कदमों के अलावा भी कुछ करना चाहिए? इसमें संदेह नहीं कि व्यापार, शिक्षा और सांस्कृतिक रिश्तों के मामले में भारत और ताईवान एक-दूसरे के निकट आए हैं, लेकिन अब वक्त है परस्पर रिश्तों को नया आयाम देने की। विश्व स्वास्थ्य संगठन में ताईवान को फिर से शामिल करने के लिए समर्थन देना उसी दिशा में एक कदम होगा, जिसे भारत ‘वन चाइना पॉलिसी’ के प्रति अपने नीतिगत रुख पर बरकरार रहते हुए भी बढ़ा सकता है। ऐसा नहीं है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ताईवान को पहली बार आमंत्रण भेजा हो। 2009 में भी ताईवान के मा-यिन जियू, बीजिंग सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन की पूर्व महानिदेशक मार्ग्रेट चान के बीच बनी सहमति के बाद चीनी ताईपेई के तौर पर ताईवान ने इस बैठक में हिस्सा लिया था। भारत को ताईवान को फिर से इस मंच का हिस्सा बनाने की मजबूत वकालत करनी चाहिए, क्योंकि 2.3 करोड़ की आबादी वाले इस देश को विश्व स्वास्थ्य संगठन से बाहर रखना जायज नहीं, खासतौर पर जब उस देश ने चाइनीज वायरस के विरुद्ध लड़ाई में शानदार प्रदर्शन किया हो।

बदलते समीकरण
 आज भू-राजनीति बदल चुकी है। कोविड-19 के बाद समीकरणों में और बदलाव आएगा। ताईवान के जलडमरूमध्य, पूर्व चीन सागर, दक्षिण चीन सागर और भारत की सीमा के आसपास चीनी सेना की बढ़ती गतिविधियों के मद्देनजर दुनिया का दायित्व है कि वह ताईवान जैसे शांतिप्रिय देश को आजाद और चीनी हनक से मुक्त रहने में मदद करे। हाल में चाइनीज पीपुल्स पॉलिटिकल कन्सलटेटिव कॉन्फ्रेंस (सीपीपीसीसी) में अपने संबोधन में चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग ने चीन के साथ ताईवान के एकीकरण का जिक्र करने के दौरान ‘शांतिपूर्ण’ शब्द को हटा दिया। इसी बीच सिचुआन एकेडमी आॅफ फाइन आर्ट्स ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के कुछ रेखाचित्र प्रकाशित किए हैं, जिनमें चीन की सेना को ताईवान पर कब्जा करते दिखाया गया है।
 ताईवान के लिए वोट करते समय भारत को इन बातों का ध्यान रखना होगा। हमें ताईवान की कीमत पर चीन को खुश करने की जरूरत नहीं है। (लेखिका सेंटर फॉर चाइना एनालिसिस एंड स्टेÑटेजी में रिसर्च फेलो हैं)