ये मादा हाथी उमा का खत है आपके लिए

    दिनांक 04-जून-2020   
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केरल के पलक्कड़ स्थित साइलेंट वैली नेशनल पार्क की मादा हाथी उमा 27 मई को मल्लापुरम की वेल्लियार नदी में मर गई. उसे विस्फोटकों से भरा अनानास खिला दिया गया था. अकल्पनीय दर्द के बीच तीन दिन तक ये मादा हाथी नदी में खड़ी रही और आखिरकार उसकी मौत हो गई. वह गर्भ से थी. उमा यदि लिख पाती, कह पाती, तो शायद ऐसा ही कुछ कहती

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मैं उमा हूं....
आप नहीं जानते होंगे. बताऊंगी तो पहचान जाएंगे. वही केरल में जिसे अनानास में पटाखे भरकर खिला दिए गए. मैं अब दुनिया में नहीं हूं. मेरे साथ मेरा वो बच्चा, जो गर्भ में पल रहा था, अनंत यात्रा पर निकल गए हैं. मेरी मौत की जिम्मेदारी किस पर है. क्या गुनाह था मेरा. यही कि मैं कुछ पेड़ों की पत्तियां या फल खा लिए थे. मैं गर्भ से थी, मैं भूखी थी. क्या करती. मेरा तो मानना था कि प्रकृति ने जो बनाया है, वो हम सबका है. जितना इंसान का हक है, उतना ही मेरा भी. मेरी कहानी बस इतनी नहीं कि मेरी हत्या कर दी गई. मेरी कहानी हर मानव से सवाल है. क्या आप मानव कहलाने के काबिल हैं.
मैं तो ये सोचकर खुश थी कि मैं भारतभूमि के सबसे ज्यादा शिक्षित राज्य में हूं. मुझे लगता था कि इंसान पढ़ जाता है, तो संवेदनशील हो जाता है. मुझे नहीं पता था कि ये पढ़ाई कुछ और है. ये कैसी पढ़ाई है, कैसी शिक्षा और कैसा शिक्षा का स्तर है. क्या इससे बेहतर वे सनातन संस्कार नहीं हैं, जिनकी शिक्षा सर्व प्राणी मात्र को कुटुंब मानने की सीख देती है. हर काम शुरू करने से पहले गजानन का नाम लेने वाला ये समाज ऐसा कैसे हो सकता है. मुझे लगा था कि बीस साल के मेरे जीवन में बहुत कुछ बदला है. मैंने इसी केरल की धरती पर सार्वजनिक रूप से गाय को काटे जाते देखा. और फिर उसके मीट पर दावत उड़ाई जाते देखा. मुझे तभी समझ जाना चाहिए था. फिर मैंने देखा कि एक गर्भवती बिल्ली को मारकर टांग दिया जाता है. मुझे तभी इस समाज की शिक्षा की असलियत को समझ जाना चाहिए था. हम तो खैर आपकी जुबान में जानवर हैं. मैंने तो इसी धरती पर देखा कि दो मुट्ठी अनाज चुरा लेने पर एक आदिवासी को मार डाला गया. मैं नासमझ थी. मुझे समझना चाहिए था कि यहां तो मानव ही मानव को भूख मिटाने पर मार डालता है, फिर मेरी क्या बिसात. मैं सुनती थी कि इसी केरल को चर्च खुदा का मुल्क कहता है. मुझे लगा था कि कम से कम उसके मुल्क में तो मैं सुरक्षित रहूंगी. लेकिन मैं भूल गई थी कि इसी केरल से जिहाद के लिए आईएसआईएस की फैक्ट्री में शामिल होने के लिए सबसे ज्यादा लोग गए थे. जी हां, मेरे कातिलों की तरह वे भी पढ़े-लिखे रहे होंगे.
क्या मैं उस भारत भूमि पर मारी गई हूं, जिसे बार-बार भगवान ने अपने अवतार के लिए चुना है. मैं तो उस भूमि पर मार दी गई, जो परशुराम की भूमि मानी जाती है. वही परशुराम, जो जरा सा अन्याय होने पर युद्ध की घोषणा कर देते थे. लेकिन मैं तो यहां दर्द का सागर लिए तीन दिन तक पानी में खड़ी रही. कोई भी तो नहीं आया मेरी मदद के लिए. मैंने तो देखा था कि इस देश में एक घोड़े की टांग टूट जाने पर बवाल हो जाता है. देश के किसी हिस्से में उस घोड़े की प्रतिमा तक लगी है. मुझे उनसे बहुत उम्मीद थी कि मेरी मदद करेंगे. मुझे न्याय दिलाएंगे. मुझे उम्मीद उनसे भी थी, जो पशु अधिकारों और अन्याय के लिए लड़ाई लड़ने का दावा करते हैं. संगठन चलाते हैं. कई विकास परियोजनाओं में मेरे अस्तित्व के नाम पर अड़ंगा लगाने वाले आज कहां हैं. कहां है वे, जो बस फर के कोट की मुखालफत करके हमारे अधिकारों की रक्षा कर लेते हैं. कहां हैं वो, जो हमसे हमदर्दी के नाम पर सरकार से, दुनिया से चंदा बटोर लेते हैं.
कुछ लोग कह रहे हैं, मैं नुकसान कर रही थी. मुझे तो साइलेंट वैली के उस नेशनल पार्क की हद में रहना चाहिए था. मुझे कहां पता थी ये सीमाएं. सीमाएं आपको बनानी हैं, अपने लिए बनाइए. हमें प्रभु ने ये बंधन नहीं सिखाया था. जब वो अनानास मैंने खाया, तो एक विस्फोट हुआ. मेरे मुंह के अंदर. मेरी जीभ के, मुंह के चिथड़े उड़ गए. जख्म अंदर पहुंचे. बहुत दर्द था. लेकिन मैं खड़ी रही शांत. मैंने पानी को उस दर्द से दबान का खूब प्रयास किया. लेकिन मैं दर्द में पागल नहीं हुई. मैंने इतनी चोट के बाद भी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया. मैं इंसान नहीं हूं न... इसलिए. मैं खड़ी रही और फिर इस दुनिया से चली गई. कहां थे श्री हरि, आपने तो मुझे कभी मगर से बचाया था. मेरी हत्या हुई है, मेरे अजन्मे बच्चे की हत्या हुई है. मुझे नहीं है उम्मीद किसी इंसाफ की. जरूरत भी नहीं है. अपने पास रखिए अपने संविधान का अनुच्छेद 51 (ए). अपनी बड़ी-बड़ी अलमारियों में सजाकर रखिए कानून की किताबों को.
इस पत्र की ये अंतिम लाइनें आपके लिए नहीं, मेरे अजन्मे बच्चे के लिए हैं
बेटा, मुझे माफ करना. बच्चे की रक्षा करना मां का दायित्व होता है. मैं उसे पूरा न कर सकी. किसी भी हालात में, किसी भी वजह है, मेरा कोई गुनहगार हो सकता है, लेकिन मैं तुम्हारी रक्षा न कर सकी. लेकिन बेटा.. अच्छा हुआ, तुम इस दुनिया में आने से पहले ही चले गए. क्योंकि क्या देखते यहां आकर. क्या करते. कहीं कोई अनानास तुम्हारा इंतजार कर रहा होता. कहीं कोई शिकारी गड्ढा खोदे बैठा होता. कहीं कोई अपने मनोरंजन के लिए तुम्हें मार डालता. अच्छा हुआ, तुमने इंसान की कब्जा की हुई इस दुनिया को नहीं देखा. और हां, ये लोग खुद को मानव कहते हैं....