डायलिसिस पर स्वास्थ्य व्यवस्था, सरकार में आपसी गुटबाजी का खामियाजा भुगतना पड़ रहा गरीब और जरूरतमंदों को

    दिनांक 05-जून-2020   
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छत्‍तीसगढ़ में स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की स्थिति बदतर है। मुख्‍यमंत्री भूपेश बघेल और स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री टीएस सिंह देव की आपसी गुटबाजी का खामियाजा गरीबों और जरूरतमंदों को भुगतना पड़ रहा है। राज्‍य में कोरोना सहित दूसरी बिमारियां फैली हुई हैं, लेकिन सरकार मीडिया को नियंत्रित करने और अपना चेहरा चमकाने में जुटी है
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छत्तीसगढ़ में जब से कांग्रेस की सरकार सत्ता में आई है, तब से यहां की स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍था बदहाल हो गई है। दरअसल टीएस सिंह देव मुख्‍यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन चूक गए। भूपेश बघेल के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद उन्‍हें स्‍वास्‍थ्‍य विभाग की जिम्‍मेदारी मिली। बुझे मन से उन्‍होंने यह दायित्‍व स्‍वीकार तो कर लिया, लेकिन भूपेश बघेल के नेतृत्‍व में सहज नहीं हो पा रहे हैं। इसका सबसे ज्‍यादा खामियाजा सूबे के गरीब और लाचार लोगों को भुगतना पड़ रहा है। छत्‍तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार शायद देश की अकेली ऐसी सरकार होगी, जहां कोविड-19 की इस महामारी में भी चिकित्सा व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले चिकित्सकों को वेतन के लाले पड़ रहे हैं। कई महीने से वेतन नहीं मिल पाने के कारण पिछले दिनों प्रदेश के कनिष्‍ठ चिकित्‍सकों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया। प्रदेश में सरकारी कनिष्‍ठ चिकित्‍सकों की संख्या 450 है। हालांकि प्रदेश में एस्मा लागू होने के कारण चिकित्‍सकों ने कामकाज जारी रखा। बाद में मामले की लीपापोती की भी कोशिश हुई। केवल इस मामले से ही सरकार की चिकित्सा व्यवस्था के प्रति अरुचि को समझा जा सकता है। इन कनिष्‍ठ चिकित्‍सकों की नियुक्ति इसी साल मार्च में हुई थी। लेकिन नियुक्ति के बाद से इन्‍हें वेतन ही नहीं दिया गया। यही नहीं, नियमों के विपरीत जाकर इनकी ड्यूटी भी लगाई गई। नियमानुसार चिकित्‍सकों को शुरुआती दो वर्ष की सेवा ग्रामीण अंचलों में देनी होती है, लेकिन नियमों की अनदेखी करते हुए इन्‍हें रायपुर समेत अन्य जिला मुख्यालयों में तैनात कर दिया गया। उनसे यह कहा गया कि उनके इस सेवाकाल को दो वर्ष की अनिवार्य ग्रामीण सेवा में समायोजित किया जाएगा, लेकिन लिखित रूप से इसका उल्‍लेख कहीं नहीं किया गया। यहां तक कि इन कनिष्‍ठ चिकित्‍सकों की ड्यूटी कोरोना वार्ड में लगाई गई और उन्‍हें काम करने के लिए जरूरी सुरक्षा उपकरण आदि भी उपलब्ध नहीं कराए गए।

प्रदेश के चिकित्सकों के साथ कांग्रेस सरकार ने इस तरह का व्यवहार पहली बार नहीं किया है। इससे पहले रायपुर स्थित एम्‍स में कार्यरत चिकित्सकों और चिकित्सा कर्मियों को खाने तक के लाले पड़ गए थे। उल्लेखनीय है कि केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, तब तत्‍कालीन स्वास्थ्य मंत्री सुषमा स्वराज ने देशभर में 6 एम्स की स्थापना का निर्णय लिया था। रायपुर एम्‍स उनमें से एक है। कोरोना महामारी के समय यही अस्पताल आज प्रदेश के लिए संजीवनी बना हुआ है। तमाम शासकीय दावों के विपरीत हालत यह है कि केवल इसी अस्पताल में मरीजों का इलाज हो रहा है और लगभग सभी कोरोना संक्रमित मरीज स्वस्थ होकर अपने घर जा रहे हैं। ऐसे महत्वपूर्ण अस्पताल में कार्यरत कोरोना सेनानियों को पहले निगम द्वारा एक होटल में ठहराया गया। बाद में कहा गया कि निगम होटल में उनके ठहरने और खाने-पीने का बिल नहीं दे पाएगा। इसके बाद सभी स्‍वास्‍थ्‍यकर्मियों को एक होटल से दूसरे होटल में  ठहराया जाता रहा। काफी मशक्‍कत के बाद एक सस्‍ते होटल में उनके लिए सामान्य व्यवस्था संभव हो पाई।

कोरोना महामारी के प्रति राज्‍य सरकार की गंभीरता का पता इसी से चलता है कि इस विषय पर होने वाले बैठकों की जानकारी स्वयं विभागीय मंत्री को नहीं थी। इस पर टीएस सिंह देव ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी भी जाहिर की थी। आश्‍चर्य की बात यह है कि कोरोना महामारी को लेकर उस बैठक में दूसरे विभाग के मंत्रियों को तो बुलाया गया था, लेकिन स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री को ही इसकी खबर नहीं थी। इस घटना से नाराज मंत्री महोदय मुंबई चले गए। ऐसी विषम परिस्थिति में स्‍वास्‍थ्‍य विभाग बिना मंत्री के ही काम करता रहा। कई सप्‍ताह बाद उन्‍हें शासकीय विमान से वापस बुलाया गया। जाहिर है ऐसी गुटबाजी से सबसे ज्यादा नुकसान अंततः मरीजों को ही हो रहा है। बहरहाल अविभाजित मध्यप्रदेश के जमाने से ही छत्तीसगढ़ अंचल देशभर में सबसे बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था वाले क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। आंत्रशोध से लेकर अनेक तरह की बीमारियों से यहां के आदिवासी अंचल के लोग असमय काल कवलित होते रहे थे। अभी भी राज्‍य सिकलसेल से लेकर अनेक तरह की बीमारियों से ग्रस्त है। प्रदेश के कुछ इलाके तो ऐसे हैं जहां एक-एक गांव में किडनी खराब होने से दर्जनों लोगों की मौत हुई। हालांकि अलग राज्‍य बनने के बाद सूबे की सेहत काफी सुधरी है। खासकर पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की ‘स्मार्ट कार्ड योजना’ काफी सफल रही थी। इस योजना के तहत स्मार्ट कार्ड से हर व्यक्ति किसी भी अस्‍पताल में 30,000 रुपये तक का इलाज मुफ्त करा सकता था। बाद में इलाज की सीमा बढ़ा कर 50,000 रुपये कर दी गई। इसके अलावा संजीवनी समेत अन्य योजनाओं के माध्यम से लाखों रुपये तक की राशि देने का अलग से प्रावधान भी था। बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘आयुष्मान योजना’ की शुरुआत भी प्रदेश के आदिवासी जिले बीजापुर के जांगला नामक स्थान से पूरे देश के लिए शुरू कर एक संदेश देने की कोशिश की थी। लेकिन 2018 के जाते-जाते राज्‍य में कांग्रेस सत्ता में आई और प्रदेश की सेहत के रीढ़ इन योजनाओं को ही खत्‍म करने में अपनी जान लगा दी। नए स्वास्थ्य मंत्री थाईलैंड में स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के इंतजाम देखने के लिए के लिए गए। लौटकर आने के बाद उन्‍होंने बताया कि थाईलैंड में जिस तरह की योजनाएं चल रही हैं, उसे अपने यहां भी लागू करेंगे। हालांकि स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री नया तो कुछ नहीं कर पाए, अलबत्‍ता पुरानी व्‍यवस्‍था को भी तहस-नहस कर दिया, जिसका खामियाजा इस कठिन समय में भी भुगतना पड़ रहा है।

अभी भी कोरेंटाइन केंद्र तमाम अव्यवस्थाओं का केंद्र बना हुआ है। कहीं लोगों को सांप काट रहे हैं तो कहीं अन्य कारणों से मौतें हो रही हैं। लेकिन सरकार को इन सबसे कोई मतलब नहीं। वह बस मीडिया पर शिकंजा कसते हुए अपना चेहरा चमकाने की कवायद में जुटी रहती है। पिछले दिनों एक बड़े अखबार में आधे पृष्‍ठ की बड़ी सी खबर छपी कि प्रदेश के मुख्‍यमंत्री सहित सभी मंत्रियों ने कोरोना को प्रदेश में घुसने नहीं दिया। उस समय तक कोरोना मरीजों की संख्या दहाई का आंकड़ा ही छू सका था। उसके बाद से 3 जून तक 638 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए। यह आंकड़ा तब है, जब राज्‍य में पर्याप्त संख्या में नमूनों की जांच ही नहीं हो रही है। तुष्टिकरण के कारण जमातियों आदि पर भी लगाम नहीं कस पाने के कारण संक्रमण बढ़ता गया। चिंता की बात यह है कि प्रदेश में कोरोना के अलावा पीलिया का भी प्रकोप है, लेकिन शासन को मीडिया पर नियंत्रण कर अपनी महिमामंडन वाली खबरें छपाने से ही फुर्सत नहीं है।