जातिप्रथा से हिन्दू समाज पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया है: बाबासाहेब

    दिनांक 05-जून-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 50:-

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सामाजिक परिप्रेक्ष्य में बाबासाहेब की आधारभूत चिंता सामाजिक असमानता थी। उन्होंने अपने समूचे जीवन में मानव-मात्र की समानता पर बल दिया। उनका दृढ़ विश्वास था कि किसी व्यक्ति को मात्र जन्म या प्रथा के आधार पर सामाजिक और आर्थिक न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। वे जाति-विभाजन को श्रम-विभाजन से पूरी तरह भिन्न मानते थे। लाहौर जांत-पांत तोड़क मंडल 1936 के वार्षिक अधिवेशन में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा, ‘जाति प्रथा मात्र श्रमिकों का विभाजन नहीं है, बल्कि यह श्रम के विभाजन से बिल्कुल भिन्न है। यह एक श्रेणीबद्घ व्यवस्था है जिसमें श्रमिकों का विभाजन एक के ऊपर दूसरे के क्रम में होता है।’ जाति-प्रथा के भावी दुष्परिणामों से वे भली-भांति अवगत थे। इसी भाषण में उन्होंने इस ओर संकेत करते हुए कहा, ‘जाति-प्रथा से आर्थिक उन्नति नहीं होती। जाति प्रथा से नस्ल या प्रजाति में न सुधार हुआ है और न होगा। इससे एक बात अवश्य सिद्ध हुई है कि इससे हिन्दू समाज पूरी तरह छिन्न-भिन्न और हताश हो गया है।’ आज के दौर में जाति-प्रथा जिस भी रूप में मौजूद है उससे सामाजिक समरसता को किस हद तक क्षति पहुंचती है, उससे हम सभी अवगत हैं। 31 मई, 1936 को बंबई में दिए गए अपने अविस्मरणीय भाषण में उन्होंने दलित वर्ग की राजनीतिक स्वतंत्रता पर सामाजिक स्वतंत्रता को तरजीह देते हुए घोषित किया, ‘अस्पृश्यों को राजनीतिक स्वतंत्रता की अपेक्षा सामाजिक स्वतंत्रता की त्वरित आवश्यकता है। जब तक आपको सामाजिक स्वतंत्रता नहीं मिलती, तब तक आपकी स्वतंत्रता के लिए बनाए गए कानूनी प्रावधानों का कोई उपयोग नहीं है।’ प्रगति और विकास के सारे दावों और सारे संवैधानिक एवं विधिक प्रावधानों के बावजूद सामाजिक न्याय की दिशा में हम कितना आगे बढ़ सके हैं, यह यक्ष प्रश्न अभी भी हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है।