पर्यावरण दिवस पर विशेष : प्रकृति के साथ विकास, हम और हमारा दायित्व

    दिनांक 05-जून-2020   
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प्राकृतिक संसाधन एवं मानव संसाधन एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों के मध्य संतुलन ही जीवन का आधार है। यदि यह संतुलन बिगड़ गया तो मानव जाति अपने सर्वनाश की ओर अग्रसर होगी
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विश्वभर में कोरोना काल चल रहा है। सर्वत्र यही बात सुनाई दे रही है - “जान है तो जहान है”। हमारी दृष्टि में हमारी जान या प्राण हमारी प्राथमिकता है। यह सही भी है, किन्तु हमने यह कभी नहीं सोचा कि जहान के बिना क्या हम जीवित रह सकते हैं? क्या इस प्रकृति या पर्यावरण के बिना हम एक क्षण भी रह सकते हैं? इसपर थोड़ा भी हम चिन्तन करते हैं तो अनुभव करेंगे कि प्रकृति के बीच, उससे समन्वय करके ही जीव स्वस्थ, सुरक्षित और विकसित रह सकता है। जल में थोड़ी भी गंदगी, वायु में जरा सी दुर्गंध या फिर मिट्टी में थोड़ी सी खराबी को महसूस करने पर हम नाक सिकुड़ने लगते हैं। यह स्वाभाविक भी है। पर जल, वायु, भूमि और समूचे पर्यावरण में ताजगी और उसमें जीव-जगत की अनुकूलता की स्थिति अक्षुण्ण बनाए रखने का दायित्व क्या हमारा नहीं है? यह प्रश्न आज समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनेआप से पूछना आवश्यक है। क्योंकि उपर्युक्त कहावत एकतरफा है जबकि जान और जहान एक-दूसरे के पूरक है। अतः “जहान है तो जान है” यह कहावत भी अब दुनियाभर में प्रचलित होना अतिआवश्यक है। हमें यह भी समझना होगा कि प्राकृतिक संसाधन एवं मानव संसाधन एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों के मध्य संतुलन ही जीवन का आधार है। यदि यह संतुलन बिगड़ गया तो मानव जाति अपने सर्वनाश की ओर अग्रसर होगी।

भारत प्राकृतिक संसाधनों और मानवीय संसाधनों की दृष्टि से एक समृद्ध राष्ट्र है। कृषिपरक जलवायु क्षेत्रों की विशाल शृंखला, भूमि एवं वन का अतुलित भंडार तथा जैव विविधता से सुसम्पन्नता के कारण भारत विश्व के सर्वाधिक सम्पदा सम्पन्न देशों में से एक है। भारतीय भूमि विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में अनेक प्रकार के जैविक एवं अजैविक संसाधनों का भण्डार है। जैविक संसाधनों के अंतर्गत वन, पशुधन, मछलियाँ, कोयला, तेल, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस आते हैं। इसी तरह अजैविक संसाधनों में भूमि, स्वच्छ जल, वायु एवं अनेक धात्विक खनिज (Metallic Mineral) जिसमें सोना, चांदी, लोहा, ताम्बा, पीतल आदि का समावेश है वहीं अधात्विक खनिज (Non-metallic minerals) के अंतर्गत संगमरमर, ग्रेनाइट ग्रुप, वोल्सटोनाइट, सिलीमेनाइट ग्रुप का समावेश है। 

भूमि और जल संसाधन : भारत के विशाल प्राकृतिक भंडार को समझने के लिए भारत की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक विशेषताओं को समझना होगा। भारत, 32,87,263 वर्ग किमी के भौगोलिक क्षेत्र के साथ विश्व का सातवां सबसे बड़ा राष्ट्र है। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 20-21 प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित है। भारत में 3,60,400 वर्ग कि.मी. की जलीय क्षेत्र है एवं यहाँ औसत वर्षा 1100 मि.मी. है। भारत के आंतरिक जल संसाधनों में नदियाँ, नहर, जलाशय व झील सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त हिंद महासागर के पूर्वी एवं पश्चिमी तटीय क्षेत्र एवं खाड़ी व गल्फ भी जल संसाधन में सम्मिलित हैं। उल्लेखनीय है कि भारत की कुल जल संसाधन का 92 प्रतिशत सिंचाई के कार्य में प्रयुक्त होता है।

भारत में 8118 कि.मी. की तटीय क्षेत्र सीमा, 3827 मछुआरे गाँव एवं 1914 मछली पकड़ने के केन्द्र हैं। भारत में मछलियों की कुल 2546 प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो सम्पूर्ण विश्व का 11.7 प्रतिशत है। भारत में विश्व के 4.4 प्रतिशत (197) उभयचरों की प्रजातियाँ भी पाई जाती हैं।

जैव एवं वनस्पति संसाधन : भारत जैव एवं वनस्पति संसाधनों का भी भंडार है। भारत विश्व के सत्रह सर्वाधिक जैव विविध राष्ट्रों में से एक है और विश्व के 7.6 प्रतिशत स्तनधारी, 12.6 प्रतिशत पक्षियों, 6.2 प्रतिशत सरीसृपों, 4.4 प्रतिशत उभयचरों, 11.7 प्रतिशत मछलियों एवं 6 प्रतिशत फूलों पर मँडराने वाले कीटों का संरक्षक है।

भारत विश्व के 7 प्रतिशत वनस्पतियों का भंडार है। भारत में फूलों वाली वनस्पतियों की 15000 प्रजातियों के साथ वनस्पतियों की 45000 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। कुछ प्रजातियाँ विश्व में अन्य किसी भी राष्ट्र में नहीं पाई जाती हैं। भारत में प्रारम्भ से ही वनस्पतियों का औषधीय महत्त्व रहा है एवं इसमें कई प्रकार की औषधीय एवं सगंध प्रजातियाँ भी सम्मिलित हैं।

अक्षय ऊर्जा या नवीकरणीय ऊर्जा : भारत अक्षय ऊर्जा के स्रोतों का भी भंडार है। अक्षय ऊर्जा या नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) में वे सारी ऊर्जा शामिल हैं जो प्रदूषणकारक नहीं हैं तथा जिनके स्रोत का क्षय नहीं होता, या जिनके स्रोत का पुनः-भरण होता रहता है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल-विद्युत ऊर्जा, ज्वार-भाटा से प्राप्त ऊर्जा, बायोगैस, जैव इंधन, भूगर्भ थर्मल ऊर्जा, हाइड्रोजन ऊर्जा आदि नवीनीकरणीय ऊर्जा के कुछ उदाहरण हैं।

पर्यावरण से प्राकृतिक संसाधन प्राकृतिक रूप से प्राप्त पदार्थ एवं घटक हैं। इनमें से कुछ हमारे जीवन के लिए आवश्यक हैं तो कुछ हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये। मनुष्य द्वारा निर्मित प्रत्येक पदार्थ आधारभूत रूप से प्राकृतिक संसाधनों द्वारा निर्मित हैं। हमारे देश में प्रकृति और संस्कृति अनादि काल से दोनों साथ-साथ चलते आए हैं और यही हमारी विशेषता भी है। “सगंच्छध्वं सं वदध्वम्” अर्थात् साथ मिलकर चलने और आगे बढ़ने का संदेश हमारे ऋषियों ने दिया है। आज का युग प्राकृतिक संसाधनों के वहनीय प्रबंध का युग है। 

प्राकृतिक संसाधन और चुनौतियां
विकास के नाम पर पृथ्वी पर आज जिस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय किया जा रहा है, उसके कारण न केवल इन संसाधनों के स्रोत समाप्त हो रहे हैं बल्कि प्रदूषण में वृद्धि, प्रदूषण-जनित बीमारियों का प्रसार, सूखा पड़ने, मरुस्थलों का विस्तार, प्राकृतिक असन्तुलन जैसी विभिन्न समस्याएँ भी अपने पैर पसार रही हैं। यहाँ तक कि प्राकृतिक संसाधनों के दुरुपयोग में वृद्धि एवं बढ़ते प्रदूषण के कारण प्राकृतिक आपदाओं के रूप में पृथ्वी पर कई प्रकार के उलट-फेर भी हो रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण दुरुपयोग के कारण हरी-भरी धरती मुरझा रही है तथा भोजन एवं पानी के प्राकृतिक स्रोत समाप्त हो रहे हैं।
जल संकट : हमारी पृथ्वी पर अथाह जल-सम्पदा है। इसके बावजूद आज जल के लिए चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है। लोगों को अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए पानी नहीं मिल रहा है और जो थोड़ा-बहुत जल जैसे-तैसे मिल भी रहा है वह किसी भी दृष्टि से मानवीय उपयोग के लायक नहीं होता। जल के लिए बढ़ता कलह और विभिन्न विवादों की उत्पत्ति एक विश्व-व्यापी समस्या है। एक ओर निरन्तर बढ़ता जल-संकट है तो दूसरी ओर जल-जनित बीमारियों का आतंक भी लगातार बढ़ता जा रहा है। एक आकलन के अनुसार, विकासशील देशों में सभी बीमारियों का 80 प्रतिशत तथा होने वाली मौतों का एक तिहाई भाग प्रदूषित जल का उपयोग करने में कारण होता है। इतना ही नहीं, प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन का दसवां भाग, प्रदूषित जल के कारण होने वाली बीमारियों से लड़ने में बिता देता है।

दुनिया के कई क्षेत्रों में अच्छी बरसात होती है और पानी की कोई कमी नहीं है। लेकिन बरसात के मौसम में पानी को बेकार बहने से रोका नहीं जाता और इसकी वजह से साल भर वहाँ पानी की कमी बनी रहती है। इस प्रकार, विभिन्न विकासात्मक गतिविधियों के लिये जरूरी पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये समुचित प्रयास नहीं किए जाते। अन्ततः पानी उपलब्ध न होने की स्थिति में जल के भूगर्भीय भण्डार का अनियन्त्रित उपयोग शुरू कर दिया जाता है। इस प्रकार लगातार पानी निकलने से धरती खोखली होने लगती है।

मिट्टी की अवनति : विकास की विभिन्न गतिविधियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरी दुनिया में वनों का निरन्तर विनाश जारी है। इसके कारण मानव-जीवन की आधार, भूमि का सन्तुलन बिगड़ गया है और मिट्टी ढीली पड़ती जा रही है। इससे भूमि के अपरदन अर्थात मिट्टी के कटाव में वृद्धि को बढ़ावा मिल रहा है।

दुनिया के कृषि-क्षेत्रों को देखें तो अन्न का उत्पादन बढ़ाने के लिए आज जितनी अधिक मात्रा में रासायनिक खाद का प्रयोग बढ़ रहा है उतना ही अधिक प्रदूषण भी फैल रहा है। कुल मिलाकर मिट्टी का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है और दुनिया के अनेक हिस्सों में यह तेजी से अनुपयोगी होती जा रही है। सिंचाई की अनियोजित सुविधाओं के कारण 13 करोड़ हेक्टेयर भूमि, जल-भराव और क्षरीयकरण की चपेट में है। वनों के विनाश के कारण दक्षिण एशिया में 7.4 करोड़ हेक्टेयर भूमि बंजर-भूमि में परिवर्तित हो गई है और यह प्रक्रिया अनवरत जारी है। अनुमान है कि एशिया में प्रतिवर्ष 1 प्रतिशत वन क्षेत्र गायब हो जाते हैं जिसकी सीधी-सीधी मार मिट्टी जैसी अनमोल प्राकृतिक सम्पदा पर पड़ती है।

वनों की कटाई :  ‘मत्स्यपुराण’ में कहा गया है :- ‘‘दशकूप समावापी, दशवापी समोहृदः। दश हृद समः पुत्रो, दश पुत्र समोवृक्षः।।’’ अर्थात् दस कुओं के समतुल्य एक बावड़ी है। दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब है। दस तालाबों के सदृश्य एक पुत्र है और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष होता है। वृक्षों के संबंध में कितना उदत्त विचार है यह!

किन्तु आज उपयोगी वृक्षों एवं वनों तथा औषधीय महत्त्व के पौधों के अन्धाधुंध विनाश के कारण दुनिया के अनेक हिस्सों में पर्यावरणीय असन्तुलन को बढ़ावा मिला है और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। वनों के विनाश तथा पेड़ पौधों की अन्धाधुंध कटाई से पृथ्वी पर खतरनाक स्थिति उत्पन्न हो गई है। पर्याप्त पेड़ पौधों के अभाव के कारण भूमि में जल को सोखने एवं अपनी उर्वरता को बनाए रखने की क्षमता नष्ट हो गई है। वृक्षों के अभाव में प्रदूषण के दुष्प्रभाव में वृद्धि हो जाती है और प्रदूषण बढ़ने से बीमारियों की संख्या भी बढ़ जाती है। पर्याप्त वनस्पति के अभाव में गर्मी, सूर्य प्रकाश, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन आदि का प्रकोप काफी बढ़ जाता है। इसके परिणाम स्वरूप मनुष्य को अनेक शारीरिक कष्टों और विभिन्न व्याधियों को झेलना पड़ता है। वर्तमान युग में भौतिक समृद्धि और अवसंरचना का तीव्र विकास हर देश का प्रमुख उद्देश्य बन गया है। इसी प्रगति के लालच में वनों की अन्धाधुंध कटाई के कारण पृथ्वी पर हरियाली का साया लगातार घटता गया है।

प्राकृतिक संसाधनों के दुरुपयोग का परिणाम
सभ्यता के आरम्भ से ही मानवीय उपयोग के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाता रहा है तथा आधुनिक विश्व की अर्थव्यवस्था इन्हें प्राकृतिक संसाधनों के ऊपर निर्भर है। लेकिन विकासात्मक गतिविधियों से सम्बन्धित बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के कार्यान्वयन के परिणामस्वरूप वर्तमान युग में पर्यावरण-सम्बन्धी समस्यायों का स्वरूप अधिक-से-अधिक गम्भीर होता जा रहा है। प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण विदोहन का परिणाम कितना गम्भीर है, इसे मौसम के उलट-फेर और आपदाओं की संख्या में वृद्धि ने स्पष्ट कर दिया है। हम जानते हैं कि मानव समाज को प्रदूषण और प्रदूषण-जनित समस्याओं में वृद्धि प्राकृतिक संसाधनों का अभाव, पर्यावरणीय असन्तुलन और जलवायु-परिवर्तन जैसी विकटतम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। फिर भी हम जान-बूझ कर इन समस्याओं की अवहेलना कर रहे हैं जिसके कारण समस्याओं के विनाशकारी परिणाम हमें ही भुगतने पड़ रहे हैं।

प्राकृतिक संसाधनों के दीर्घकालिक विकास के उपाय 

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प्राकृतिक संसाधनों और प्रकृति-प्रदत्त सम्पदा की सुरक्षा करके ही मानव जाति का अस्तित्व सुरक्षित किया जा सकता है। बढ़ती जनसंख्या के लिए अधिक सुविधाओं की आवश्यकता और घटते प्राकृतिक संसाधनों की इस पृष्ठभूमि में दुर्लभ होते जा रहे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता पहले से बहुत अधिक बढ़ गई है। ऐसे में प्राकृतिक सम्पदा की लूट की जो प्रवृत्ति में आज समाज में सर्वस्वीकृत हो गई है, इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने तथा प्रकृति-विरोधी मानसिकता में बदलाव लाने की तात्कालिक आवश्यकता है। प्रकृति की अनदेखी करके विकास कार्यों को लम्बे समय तक जारी नहीं रखा जा सकता है। प्रत्येक विकास कार्य को हमें सतत विकास (सस्टेनेबल डवलपमेंट) के रूप में देखना होगा और इसके लिए व्यापक जनजागरण करना होगा।

उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का उल्लेख अत्यन्त प्रमुखता से एवं विस्तारपूर्वक किया गया है। अनेक अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर भारत सरकार ने प्रदूषण नियन्त्रण एवं पर्यावरण-संरक्षण के सम्बन्ध में अपने संकल्प का परिचय दिया है। लायकुला, इटली में जुलाई 2009 में आयोजित जी-8 सम्मेलन में, भारत ने जी-5 का एक सदस्य होने के नाते, कार्बनडाइऑक्साइड एवं अन्य वायुमंडलीय विरोधी उत्सर्जन में सीमित मात्रा में कटौती की घोषणा की है। साथ ही वायुमंडल विरोधी अपशिष्टों पर भी यथासम्भव रोकथाम हेतु वैश्विक लक्ष्य के प्राप्ति में सकारात्मक योगदान की घोषणा की है ताकि प्राकृतिक संसाधनों के विनाश पर अंकुश लगाया जा सके और पर्यावरण के संरक्षण के लिए वैश्विक चेतना जगाई जा सके। 
ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों के निवासी स्थानीय जलस्रोतों, जंगल और जमीन के रख-रखाव के प्रति सजग रहते हैं तो स्थानीय विकास के लिए इन संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के साथ-साथ पानी जैसे अनमोल संसाधन की बचत करना भी सम्भव हो सकेगा। हम जानते हैं कि मिट्टी का अपरदन रोकने एवं जल-सन्तुलन बनाए रखने के लिए पृथ्वी पर पर्याप्त मात्रा में पेड़ों का होना आवश्यक है। लोगों को खाली स्थानों पर वृक्ष लगाने और उसके जतन के लिए प्रोत्साहित करने से हरियाली आएगी और जल-चक्र भी सन्तुलित बना रहेगा। इस प्रकार, जल, जमीन और जंगल तीनों की रक्षा हो सकेगी तथा पानी की कमी जैसा संकट समाप्त करने में भी सहायता मिलेगी।

निष्कर्ष
धरती पर मानव का जीवन प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करता है। अतः यदि प्रत्येक व्यक्ति इन संसाधनों का महत्त्व पहचान ले तो मानव के अस्तित्व की सुरक्षा सम्भव है। प्राकृतिक संसाधन मानव जाति को महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) सेवाएं प्रदान करते हैं और यह मनुष्य जीवन और उनके समग्र विकास के लिए भी आवश्यक है। पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहे क्योंकि इसके असंतुलन से ही बाढ़, सूखा, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदा आती है। जनसंख्या वृद्धि के दबाव एवं सीमित संसाधनों की घटती हुई मात्रा के कारण प्राकृतिक संसाधनों का तत्कालिक वहनीय प्रबंधन आवश्यक है। यह प्रबंध भारत जैसे विशाल जनसंख्यावाले देश में और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है जिनका विकास उनके प्राकृतिक संसाधनों के अनुकूलतम दोहन में छिपा है। इस दिशा में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विकास व प्रयोग तथा इस हेतु दृढ़ इच्छा शक्ति के जागरण की आवश्यकता है।

मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य और पृथ्वी के संरक्षण के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधनों का सन्तुलन न बिगड़े। पृथ्वी से ही नाना प्रकार के फल-फूल, औषधियाँ, अनाज, पेड़-पौधे आदि उत्पन्न होते हैं तथा पृथ्वी-तल के नीचे बहुमूल्य धातुओं एवं जल का अक्षय भंडार है। आवश्यकता है मात्र प्राकृतिक संसाधनों के प्रभावपूर्ण एवं संतुलित दोहन की जिससे कि देश के मनुष्य धन का अधिकतम कल्याण किया जा सके।