जी-7 में भारत को जाते देख तिलमिलाया चीन

    दिनांक 08-जून-2020
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आराधना शरण
दुनिया में भारत के बढ़ते कद से चीन ने जैसे आपा खो दिया है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने धमकी दी है कि अगर भारत चीन-विरोधी खेमे में जा बैठता है तो इसका नतीजा उसके लिए बुरा होगा। वैसे, मजेदार बात यह है कि अब उसकी भी जुबान पर 'भारत-प्रशांत' चढ़ गया है

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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही जी-7 में शामिल होने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पेशकश पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी, चीन एकदम बौखला गया। अपनी पुरानी आदत की तरह चीन ने भारत को धमकी दे डाली कि अगर वह अमेरिका के चीन-विरोधी खेमेबाजी में शामिल हुआ तो उसके लिए बहुत बुरा होगा। धमकी दी कि इससे सीमा पर तनाव भड़क सकता है जो भारत के हित में नहीं होगा। खिसियाया ड्रैगेन खंभा नोच रहा है, बिना यह सोचे कि अगर ज्यादा जोर से नोच लिया तो नाखून उखड़ भी सकते हैं।
चीन ने भी माना “भारत-प्रशांत”
ग्लोबल टाइम्स ने कहा कि “जी-7 का विस्तार चीन के खिलाफ एक सोचे-समझे भूराजनैतिक समीकरण तैयार करने के लिए किया जा रहा है। भारत को इसमें केवल इसलिए शामिल नहीं किया जा रहा है कि वह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, बल्कि इसलिए किया जा रहा है कि अमेरिका उसे भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन पर अंकुश के लिहाज से महत्वपूर्ण मानता है।” बहरहाल, इस टिप्पणी की सबसे अच्छी बात यह है कि चीन के सरकारी अखबार ने “भारत-प्रशांत” शब्द का इस्तेमाल किया, जिसे सुनकर कभी ड्रैगन के नथूने फूलने लगते थे। गौरतलब है कि पहले इस समुद्री क्षेत्र को “एशिया प्रशांत” कहा जाता था लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लगा कि इसका नाम तो “भारत प्रशांत” होना चाहिए क्योंकि इस पूरे इलाके में भारत की भूमिका सबसे अहम है। खैर, चीन के नजरिये में यह सकारात्मक बदलाव है और निश्चित ही इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
वही गीदड़भभकी
लेकिन इसके साथ ही चीन बंदरघुड़की देने की अपनी आदत पर उतर आता है। अखबार लिखता है, “ भारत लंबे समय से दुनिया के अग्रणी क्लब में भाग लेना चाह रहा था। जी-7 के विस्तार के अमेरिकी प्रस्ताव को मंजूर करके भारत इन दिनों चल रहे सीमा विवाद में चीन को संदेश देना चाह रहा है।...मोदी ने जबसे अपना दूसरा कार्यकाल शुरू किया है, भारत का चीन के प्रति नजरिया बदल गया है। इस साल फरवरी में ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान अमेरिका और भारत ने अपने रिश्तों को “व्यापक वैश्विक रणनीतिक भागीदार” में बदलने का फैसला किया जिसका मतलब है कि भारत भारत-प्रशांत में अमेरिकी रणनीति को पूरा करने को तैयार हो गया है।… वे मानते हैं कि पश्चिमी देश अब भी बेहतर स्थिति में हैं और अगर वे अमेरिका के साथ खड़े होंगे तो इससे उन्हें लाभ मिलेगा। लेकिन अगर भारत हड़बड़ी में एक छोटे समूह में शामिल हो जाता है जो चीन को अपना काल्पनिक दुश्मन मानता है तो भारत-चीन रिश्ते और खराब होंगे। यह भारत के हित में नहीं है।” दरअसल, शी जिनपिंग की टीम में यही दिक्कत है। डेंग जियापिंग की जो नीतियां थीं, वे विवादों से दूर रहते हुए, बिना किसी को नाराज किए हुए आगे बढ़ते जाने की थी जो उस दौरान के राजनयिकों के व्यवहार से लेकर उनकी भाषा-शैली सबमें दिखता था। और यह उन्हीं का समय था जब चीन ने दुनिया में अपनी जगह बनाई, लेकिन शी जिनपिंग को एक ऐसा चीन मिला जिसके सामने राजनीतिक-कूटनीतिक तौर पर सही दिखने की मजबूरी नहीं थी और बेशक चीन शक्ल-सूरत में पूंजीवादी बन गया लेकिन उसकी सीरत और चरित्र वही साम्यवादी रहा। इतिहास से लेकर वर्तमान तक, तमाम उदाहरण हैं जब चीन ने अपनी भौगोलिक सीमाओं से बाहर भी वही निरंकुश-अक्खड़पन बरकरार रखा, जो उसने घर के भीतर अपनाया। आज दुनिया को संकट में डालने वाले चीन को यह भी मंजूर नहीं कि कोई उससे सवाल करे और अपने विरोध में उठने वाली हर आवाज को बंद कर देना चाहता है। उसे पता है कि अगर दुनिया के कोने-कोने से उसके खिलाफ उठ रही आवाजों को नहीं दबाया गया तो उसकी गूंज उसका सतुंलन बिगाड़ देगी। भारत के जी-7 में प्रवेश की तैयारी को वह ऐसे ही देख रहा है। इसी कारण वह भारत को धमका रहा है।
आर्थिक ताकत का गुमान
इसके साथ ही अखबार भविष्यवाणी करता है कि “चीन का शानदार आर्थिक विकास और अवसरों को परस्पर बांटने की रणनीति के कारण अमेरिका का चीन-विरोधी अभियान विफल हो जाएगा।” इसमें संदेह नहीं कि चीन दुनिया की बहुत बड़ी आर्थिक ताकत है, तमाम मामलों में अमेरिका से भी बड़ी। लेकिन यह भी देखने की बात है मजबूती और कमजोरी एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं और जो जितनी बड़ी मजबूती होती है, वह उतनी ही बड़ी कमजोरी भी होती है। चीन की अर्थव्यवस्था की अपनी कमजोरी है- चाहे वह अधिक उत्पादन को खपाने की हो या फिर विकास को एक निश्चित गति से दौड़ाने की, नए बाजार खोजने की या फिर जमा पैसे को बाजार में लगाने की। इन तमाम विषयों की अपनी जटिलताएं भी हैं, लेकिन एक बात तय है कि धंधा भरोसे से होता है और आज कम से कम इस मोर्चे पर अपना पड़ोसी बैकफुट पर है। पूरी दुनिया का भरोसा उसपर से उठ चुका है और उसकी हरकतें दुनिया की सोच को और मजबूत ही कर रही हैं। इसलिए, आने वाले समय में इस तरह की खबरें और आम होने जा रही हैं जब चीन के विरोध में कोई लामबंदी हो और उसके खिलाफ आपा खोता चीन लाल-पीला हो रहा हो, अनाप-शनाप बयान दे रहा हो।