चीनी कहानी, कांग्रेस की जुबानी

    दिनांक 08-जून-2020   
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 \\राहुल गांधी को चीन के बारे में देशभक्तों को किसी भी बात की नसीहत देते वक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि लोगों को यह भी याद है कि ‘युवराज’ के पिता के नाना ने कैसे चीन को अक्साई चिन सौंप दिया था! छिटपुट कहानियों को सूक्ष्मदर्शी कांच से दिखाकर चीन के सुर में सुर मिलाती ये आवाजें, देश में उठें या बाहर, उनके झांसे में आने के दिन लद गए।
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जरूर, देशभक्तों को बिल्कुल याद रखना चाहिए...। जब आप किसी से कहते हैं, ‘‘आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए’’ तो इससे आपका आशय यही होता है कि इसके मर्म को समझें और याद रखें। राहुल गांधी ने भी कुछ ऐसा ही कहा है। उन्होंने एक वेबसाइट में छपे एक लेख के बारे में कहा, ‘‘देशभक्तों को इसे जरूर पढ़ना चाहिए।’’ यह लेख लद्दाख में चीन की गतिविधियों के बारे में है। राहुल भी चाहते होंगे कि देशभक्त इसे पढ़ें, गुनें और स्मृति में रखें। लेकिन मुद्दा यह है कि आखिर राहुल गांधी क्या और क्यों दिखाना चाह रहे हैं? क्या बता रहे हैं, क्या छिपा रहे हैं? चलिए इसी की बात कर लें, हो सकता है कि देशभक्तों को बहुत कुछ याद आ जाए।

वैसे, यह लेख जनरल पनाग ने लिखा है। सेवानिवृत्ति के बाद अपनी अभिनेत्री बेटी गुल पनाग के साथ आम आदमी पार्टी से नजदीकियों के बीच वह जनरल हैं या आम आदमी पार्टी के सिपहसालार, यह सोचने वाली बात है! वही आम आदमी पार्टी जो हाल ही में सिक्किम को अलग देश ठहराकर चीनी दावों में दम भरने का करतब दिखा चुकी है! एक संयोग यह भी है कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद आम आदमी पार्टी या कांग्रेस, दोनों ही पाकिस्तान की तर्ज पर भारत से सुबूत मांग रहे थे! खैर, जिस लेख की चर्चा है उस लेख का शीर्षक है-‘इंडियाज फिंगर कम अंडर चाइनीज बूट्स’ यानी चीनी जूते के नीचे भारत की अंगुली।

भारत और चीन के बीच एक बड़े क्षेत्र में नियंत्रण रेखा के निर्धारित नहीं होने के कारण दोनों ओर की सेनाओं के एक-दूसरे के इलाके में घुस जाने के सालाना सैकड़ों मामले होते रहते हैं। इनकी संख्या और तीव्रता अलग-अलग हो सकती है और यही सच है। लेकिन सवाल यह है कि पनाग साहब क्या बता रहे हैं और राहुल कौन-सी सचाई दिखाना चाहते हैं? आखिर ऐसा क्यों है कि आम आदमी पार्टी से जुड़े लोगों के लेख, राहुल और उनकी पार्टी की चिंताएं वही हो जाती हैं, जो चीन और पाकिस्तान की चिंताएं होती हैं? आखिर उनका नजरिया भारत के दुश्मनों से मेल क्यों खा जाता है? ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ पर पाकिस्तान सवाल खड़े करता है, तो सबूत कांग्रेस मांगने लगती है। जब डोकलाम में भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने होती हैं, तो राहुल चोरी-छिपे चीन के राजदूत से मिलते हैं, और उनकी पार्टी सबूत मांगती है कि सेना वहां सफल रही। जिन सोनम वांगचुक के जीवन पर फिल्म ‘थ्री इडियट’ बनी थी, उनकी अपील पर जब लोग चीनी सामान से किनारा करने लगते हैं, तो कांग्रेस अचानक बेचैन हो जाती है और उसके मुखपत्र में इस अभियान के खिलाफ संपादकीय लिखा जाता है।

चलिए थोड़ी देर के लिए जनरल पनाग की बात को मान लेते हैं कि चीन लद्दाख में काफी अंदर आ गया है तो दो घटनाओं पर गौर करना जरूरी होगा। एक, चीन के राजदूत कहते हैं कि भारत को चीन के साथ टकराना नहीं चाहिए। चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ यह खबर जारी करती है। बेशक एजेंडा हो, लेकिन घटना थी, खबर थी इसलिए मीडिया में इसे जगह मिली। दो, यही ‘लाइन’ कांग्रेस का विचार बन जाती है। सलमान खुर्शीद कांग्रेस के मुखपत्र में वैचारिक लेख में कहते हैं कि भारत को चीन के साथ सैनिक या व्यापारिक युद्ध में नहीं उलझना चाहिए। बयान और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के विचारों में मुहावरे और शब्द प्रयोग तक एक से दिखाई देते हैं! कैसा अजब संयोग है! पहले बताना कि लद्दाख में चीन आपके इलाके में काफी अंदर घुस आया है, फिर समझाना कि भारत को तनना नहीं चाहिए। जनरल पनाग का लेख पढ़कर लोगों को यही समझने के लिए प्रेरित कर रहे थे राहुल!

ऐसा लगता है कि जो चीन और पाकिस्तान की चिंताएं हैं, वही हमारे यहां राजनीति और मीडिया के एक धड़े की भी चिंता है। सोचने की बात यह है कि राजनीति और मीडिया का यह धड़ा तब ही क्यों जाग पड़ता है जब चीन किसी बात से ध्यान भटकाने की जुगत कर रहा होता है। जरूरी यह देखना है कि चीन की वास्तविक चिंताएं क्या हैं जिनसे हमारे देश में कुछ लोग दुबले हुए जा रहे हैं। दरअसल, अभी चीन की कई चिंताएं हैं। पहले दुनिया तिब्बती झंडे में लिपटी त्रासदी और थ्येआनमन चौक पर टैंकों के पहिए के नीचे दबे सपनों को ही देखती थी, वह भी रस्मी तौर पर। किन्तु विश्व की तंत्रिकाओं में वायरस फैलाने के बाद से अपने लिए तिरस्कार की वैश्विक भावना से वह चिंतित है। जिस देश पर चीन ऐतिहासिक तथ्यों और जनभावनाओं को ठेलते हुए कब्जा जमाए बैठा है उस तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री ने कहा है कि लद्दाख, सिक्किम तथा अरुणाचल भारत के अभिन्न भाग हैं! चीन के पेट में मरोड़ इस बयान से है।

अभी हाल ही में थ्येआनमन कांड की बरसी गुजरी है। और चीन नहीं चाहता कि उसकी जनता या फिर दुनिया के कानों में उन 10 हजार बच्चों की चीखें ताजा हो जाएं। ड्रैगन की चिंता हांगकांग में दिनोंदिन तेज होते प्रदर्शन को कुचलने की है। उसकी चिंता ताईवान की आवाज को दबाने की है। वही ताईवान जो किसी भी तरह दबाव में नहीं आ रहा है। अमेरिका से लड़ाकू विमान हासिल करने के बाद अभी उसने 18 करोड़ डॉलर का टारपीडो खरीद समझौता किया है। और तो और, कंप्यूटर सिमुलेशन टेस्ट के बाद यह स्पष्ट भी कर दिया है कि अगर चीन के साथ पानी में जंग हुआ तो उसके पास अभी चीन के आधे बेड़े को ही डुबोने की क्षमता है इसलिए वह और मिसाइल खरीदेगा।

तिब्बत के तेवर चीनी साम्राज्यवाद को पलीता लगाएं, हांगकांग की अंगड़ाई ड्रैगन की अकल ढीली करे, ताईवान की ताकत चीन की तेजी और तुर्शी को पस्त करे, थ्येआनमन पर कुचले गए बच्चों का खून लाल झंडे की असलियत बताए... यह सब चीन को बर्दाश्त क्यों होगा भला! लेकिन चीन थ्येआनमन, हांगकांग, तिब्बत और ताईवान से भाग नहीं सकेगा, क्योंकि ये उसकी परछाई हैं और कोरोना काल में दुनिया को आत्मज्ञान की जो रोशनी मिली है, उसमें यह परछाई और स्पष्ट दिख रही है। हांगकांग में अत्याचारी शासन के खिलाफ प्रदर्शन करते युवाओं को थ्येआनमन चौक की कहानी प्रेरित करती है और इस प्रेरणा के वापस मुड़कर उसी खूनी चौक पर पहुंच जाने से इनकार नहीं किया जा सकता। ताईवान के पास नैतिक बल है और अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी। इन्हीं क्रांति बीजों ने चीन के होश उड़ा दिए हैं।

खैर, चीन को छोड़िए। अपने देश को ध्यान से देखिए। मधुमेह से मूर्छा और झुंझलाहट उत्पन्न होती है, यह सब जानते हैं। अपने देश में भी राजनीति और मीडिया के एक धड़े की मूर्छा और झुंझलाहट के पीछे क्या कोई ‘चीनी’ कारण है! राहुल गांधी को चीन के बारे में देशभक्तों को किसी भी बात की नसीहत देते वक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि लोगों को यह भी याद है कि ‘युवराज’ के पिता के नाना ने कैसे चीन को अक्साई चिन सौंप दिया था! छिटपुट कहानियों को सूक्ष्मदर्शी कांच से दिखाकर चीन के सुर में सुर मिलाती ये आवाजें, देश में उठें या बाहर, उनके झांसे में आने के दिन लद गए।