फर्जी दुकान, फीके पकवान, बड़बोले ‘विद्वान’

    दिनांक 08-जून-2020
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अमेरिका की तर्ज पर भारत में दंगों की  आस में बैठा चीनी फरमाबरदार  सेकुलर मीडिया

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अमेरिका की तरह भारत में दंगे क्यों नहीं हो रहे? आखिर किसी निर्दोष को मारा क्यों नहीं जा रहा? सबकुछ ठीक क्यों चल रहा है? ये कुछ प्रश्न हैं जो पिछले सप्ताह से भारतीय मीडिया के एक जाने-पहचाने वर्ग में बार-बार उछल रहे हैं। पहले ‘आत्मनिर्भर भारत’अभियान और अब चीन के साथ भारतीय सेना का कड़ा रवैया, ये वे बड़े कारण हैं जिनके चलते उन पत्रकारों में बहुत बेचैनी है जिनकी गर्भनाल चीन से जुड़ी हुई है। वरना यह कैसे होता कि चीन से जुड़ी फेक न्यूज की बाढ़ सी आ जाए? रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने न्यूज18 चैनल से साक्षात्कार में चीन से चल रहे विवाद पर पूरी स्थिति स्पष्ट की, किंतु उसी ने उनके बयान पर फर्जी खबर गढ़ दी। चैनल ने बताया कि ‘रक्षा मंत्री ने मान लिया है कि पूर्वी लद्दाख में चीन की सेना बड़ी संख्या में भारतीय क्षेत्र में घुस गई है’। जब इस पर हंगामा मचा तो न्यूज18 चैनल ने रात 1 बजे ट्वीट करके अपनी गलती मान ली। शायद इसलिए ताकि किसी को पता न चले कि चैनल ने क्या खेल किया था।

आमतौर पर ऐसी फेक न्यूज चलाई ही इसलिए जाती हैं कि बाद में अगर खंडन करना पड़ जाए तो वह झूठ भी हमेशा चलता रहेगा। न्यूज18 ने औपचारिकता के लिए अपनी रिपोर्ट वापस ले ली, लेकिन इसे लेकर मीडिया का पूरा प्रोपेगेंडा तंत्र सक्रिय हो गया। ‘द वायर’ समेत कई फेक न्यूज वेबसाइटों ने इस झूठ को फैलाने में सहायता की। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसा किसी मानवीय भूल के कारण नहीं हुआ होगा। निश्चित रूप से यह सोचा-समझा खेल था। चैनल की संपादकीय टीम ही ज्यादा अच्छे से बता सकती है कि उसने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस संवेदनशील मामले में क्या सोचकर झूठ फैलाया। न्यूज18 चैनल की ही एक रिपोर्टर ने कुछ दिन पहले यह फेक न्यूज भी फैलायी थी कि एम्स में 50 कर्मचारियों को संक्रमण हो गया क्योंकि मास्क और पीपीई किट की गुणवत्ता खराब है। इसके पीछे का उद्देश्य भी किसी से छिपा नहीं है। 

लद्दाख के शिक्षाविद् सोनम वांगचुक ने लोगों से चीन में बने सामान के बहिष्कार की अपील की तो मीडिया का यही वर्ग छटपटा उठा। इंडिया टुडे चैनल पर राजदीप सरदेसाई ने उनका साक्षात्कार किया। सोनम वांगचुक तो सहजता और शांतचित्तता के साथ मुस्कुराते हुए उत्तर देते रहे, लेकिन राजदीप सरदेसाई की तिलमिलाहट उनके चेहरे पर तैर रही थी। अंत आते-आते उन्होंने निर्णय सुना ही दिया कि ‘चीन का बहिष्कार व्यावहारिक नहीं है?’ जब इतने से उनका जी नहीं भरा तो एक ट्वीट किया कि ‘चीन के मोबाइल एप का बहिष्कार तो चलो ठीक है, लेकिन गुजरात का स्टैचू आॅफ यूनिटी भी तो चीन में बना है’। स्टैचू आॅफ यूनिटी के चीन में बने होने की बात भी एक फेक न्यूज का ही परिणाम है।  जिस अखबार ने इसे छापा था उसने बहुत पहले गलती मानकर खेद भी व्यक्त कर दिया था। लेकिन वह झूठ आज भी नए-नए रूपों में परोसा जाता है। एक बड़े मीडिया समूह के संपादक को यह सब नहीं पता रहा होगा, ऐसा नहीं हो सकता। यह भी संभव है कि इस झूठ को दोबारा चलाने का विचार इंडिया टुडे मीडिया समूह की संपादकीय नीति का हिस्सा हो।

दिल्ली में चाइनीज वायरस को लेकर अव्यवस्था के बीच अरविंद केजरीवाल सरकार का विज्ञापन अभियान जारी है। उपचार न मिलने के कारण लोगों की जान जा रही है लेकिन अखबारों और चैनलों पर बताया जा रहा है कि कैसे पार्टी के सांसद ने अपने 34 हवाई टिकट मजदूरों को घर भेजने के लिए दे दिए। कुछ ऐसी ही स्थिति महाराष्ट्र की है। देश की राजधानी और आर्थिक राजधानी में जो कुछ हो रहा है वह तो दुखद है ही लेकिन खुद को निष्पक्ष बताने वाला मीडिया जो कर रहा है वह चिंताजनक है। अगर सोशल मीडिया और आॅपइंडिया जैसे समाचार पोर्टल नहीं होते तो इससे जुड़े समाचार लोगों को पता तक नहीं चल पाते।

कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद पहली बार वहां पर समलैंगिकों की परेड आयोजित हो रही है। उन्हें इस्लामी कट्टरपंथियों की धमकियां मिल रही हैं। पूरी दुनिया में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की वकालत करने वाले इस पर शांत हैं। वह टाइम्स आॅफ इंडिया अखबार, जो धरती के हर कोने में समलैंगिक समुदाय से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से स्थान देने के लिए जाना जाता है, ने भी अनदेखी कर दी। देशभर के शहरों में ‘गे-परेड’ के नाम पर हिंदू देवी-देवताओं को अपमानित करने का जो वामपंथी खेल चलता है उसमें मीडिया भी सक्रिय रूप से भागीदार होता है। लेकिन जैसे ही मामला मुस्लिम समलैंगिकों का आया, लगता है उन सबको सांप सूंघ गया।