दुश्मन दिल्ली के!

    दिनांक 09-जून-2020   
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दिल्ली दंगों पर पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्रों से पता चलता है कि ये दंगे सुनियोजित थे। दिल्ली को ‘कश्मीर’ बनाने के लिए पीएफआई, तब्लीगी जमात, वामपंथी और जिहादी तत्व साथ मिलकर काम कर रहे थे। इसमें जो लोग या संगठन शामिल हैं, उन्हें कड़ी सजा दिलाना सरकार का काम है
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पत्थर बरसाते और आगजनी करते मजहबी उन्मादी (फाइल चित्र)­

इस साल फरवरी के अंतिम सप्ताह में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के बारे में जो बातें सामने आ रही हैं, वे एक गहरे षड्यंत्र की ओर इशारा करती हैं। दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने कड़कड़डूमा अदालत में दो से 6 जून तक अनेक आरोपपत्र दाखिल किए हैं। इनमें कहा गया है कि दिल्ली में एक सुनियोजित योजना के तहत दंगे कराए गए। इस योजना में पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई), तब्लीगी जमात, अपनी बुद्धि को किराए पर देकर देश में अशांति फैलाने वाले वामपंथी, निर्दोषों की हत्या करने वाले जिहादी, जामिया कोआर्डिनेशन कमेटी और इस तरह के अनेक गुट शामिल हैं। इन आरोपपत्रों में दंगे के साजिशकर्ताओं के रूप में तीन लोगों का नाम प्रमुख रूप से लिया गया है। ये हैं आम आदमी पार्टी (आआपा) का नेता ताहिर हुसैन, वामपंथी छात्र नेता उमर खालिद और राजधानी पब्लिक स्कूल (शिव विहार, दिल्ली) का मालिक फैसल फारुख।

फैसल के मोबाइल की जांच से पता चला है कि वह दंगे के दौरान तब्लीगी जमात (जिसके कारण पूरे देश में कोरोना महामारी फैली) के अमीर मौलाना साद से बात कर रहा था। यानी इस दंगे में कहीं न कहीं तब्लीगी जमात भी शामिल है। यह भी पता चला है कि फैसल के संबंध पीएफआई, देवबंद के मजहबी नेताओं आदि से भी हैं। उस पर यह भी आरोप है कि दंगे के लिए उसने देवबंद से दंगाइयों को बुलाया था। दंगे से एक दिन पहले फैसल देवबंद भी गया था। दंगाइयों ने उसके स्कूल की छत से हिंदुओं को निशाना बनाया। इन्हीं दंगाइयों ने दिलबर नेगी नामक 20 वर्षीय एक युवा को बहुत ही क्रूरता से मारा था। फैसल 1,000 करोड़ रु. का मालिक है। जांच से पता चला है कि केवल एक साल में उसके पास अकूत पैसा आया है। ये बातें बहुत कुछ कहती हैं।
 

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आरोपपत्र के अनुसार दंगा भड़काने के लिए ताहिर हुसैन ने एक करोड़ रु. बांटे थे। उसे यह पैसा पीएफआई जैसे संगठनों से मिला था। उसके इशारे पर ही 24 और 25 फरवरी को चांदबाग (जहां ताहिर रहता था) में दंगा भड़का, जिसमें आईबी के कर्मचारी अंकित शर्मा सहित अनेक हिंदुओं की बर्बरता से हत्या कर दी गई थी। दंगे से दो दिन पहले यानी 22 फरवरी को ताहिर और उमर खालिद के बीच बैठक हुई थी। इससे पहले उमर, ताहिर, यूनाइटेड अगेंस्ट हेट ग्रुप से जुड़ा खालिद सैफी और कुछ अन्य साजिशकर्ताओं की बैठक आठ फरवरी को शाहीनबाग इलाके में हुई थी। इसमें दंगों की रूपरेखा खींची गई थी।
 
जब अमेरिका के राष्टपति भारत में होंगे तो हमें सड़क पर उतरना चाहिए।
24 फरवरी को ट्रंप आएंगे तो हम उन्हें बताएंगे कि भारत की सरकार देश को
बांटने की कोशिश कर रही है। महात्मा गांधी के सिद्धांतों की धज्जियां
उड़ा रही है। हम ट्रंप को दिखाएंगे कि भारत की आवाम भारत के
हुक्मरानों के खिलाफ लड़ रही है। उस दिन हम लोग
सड़कों पर उतर आएंगे
-उमर खालिद  (17 फरवरी को यवतमाल के एक कार्यक्रम में दिए गए भाषण का अंश)


उमर खालिद ने बैठक में कहा था,
राम मंदिर पर चुप रहे, अनुच्छेद-370 पर चुप रहे,
लेकिन अब सीएए पर खामोश नहीं रहना है।
— ताहिर हुसैन (पुलिस को  बताया )
 

ऐसे लोगों की मानसिकता समझने के लिए केरल के राज्यपाल  आरिफ मोहम्मद खान के एक वक्तव्य पर गौर करना जरूरी लगता है। उन्होंने कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में कहा था, ‘‘उस समय की सरकार के पास 400 से अधिक सांसद थे। इतना बड़ा बहुमत भारतीय संसदीय इतिहास में कभी किसी प्रधानमंत्री के पास नहीं था। उस वक्त भारतीय मुसलमानों के नेताओं द्वारा हिंसक भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा था। भाषा इतनी हिंसक थी कि पर्सनल लॉ बोर्ड के समर्थक एक सांसद का भाषण संसद में इतना आपत्तिजनक हो गया था कि उनके भाषण से चार जगह शब्दों को हटाना पड़ा। यह भारतीय संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ कि भारत सरकार के किसी मंत्री ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए अत्यंत अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया हो। उन चार शब्दों को अध्यक्ष महोदय को कार्रवाई से हटाना पड़ा।’’

इसमें वे राजीव गांधी सरकार और शाहबानो मामले की चर्चा कर रहे हैं। वैसे मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम का यह ऐतिहासिक मामला अब 35 साल पुराना हो गया है। पर आरिफ मोहम्मद खान को सुनते हुए लगता है कि देश तो बदल गया, लेकिन इस देश का कट्टरपंथी मुसलमान नहीं बदला। समाज के मजहबी उन्मादी तत्व आज भी उतने ही हिंसक हैं, जितने 35 साल पहले थे। मुस्लिम समुदाय को जब अपनी समस्याओं का समाधान शिक्षा में तलाशना चाहिए, वह इसे हिंसा में तलाश रहा है। इसके पीछे कहीं एक वजह मदरसा तालीम में उसका विश्वास तो नहीं है? मुस्लिम समाज आज भी मदरसा की शिक्षा से बाहर निकलने को तैयार नहीं हो रहा है। मुस्लिम लड़कियां घरों से निकलना चाहती हैं, लेकिन उन्हें जबरन इस्लामी तालीम दी जा रही है। उन्हें जबरन उन लड़ाइयों में शामिल किया जा रहा है, जिसमें शामिल होने के लिए वे तैयार नहीं हैं। याद कीजिए दो-तीन महीने पहले सीएए के कथित विरोध का हवाला देकर सड़कों पर खड़ी कर दी गई लाखों मुस्लिम महिलाओं को। इन महिलाओं को सीएए के बारे में कुछ भी नहीं पता था। शायद ऐसे ही हालात को देखकर इस्लामिक विद्वान तुफैल अहमद लिखते हैं, ‘‘मदरसे आजादी के लिए खतरा हैं।’’

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दिल्ली पुलिस के एक सिपाही पर पिस्तौल तानता हुआ एक मुस्लिम दंगाई

दिल्ली में सीएए के खिलाफ चल रहे पूरे आंदोलन के दो उद्देश्य थे-एक, हिंदुओं की ‘कब्र खोदना’ और दूसरा खिलाफत-2.0 की शुरुआत करना। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में सीएए के विरोध के दौरान जो नारा लगा था, ‘‘हिंदुओं की कब्र खुदेगी, एएमयू की धरती पर।’’ उसकी जमीन दिल्ली में तलाशी गई और उसके लिए पूरी तैयारी के साथ दंगे भी किए गए। इसके लिए वामपंथी, उन्मादी मुस्लिम और डॉ. आंबेडकर के चेहरे के पीछे छिपकर हिंसा के लिए उकसाने वाला गिरोह सक्रिय हुआ। इन सबकी योजना यही थी कि हिंसा के दम पर सीएए के मुद्दे पर सरकार को घुटने पर ले आएंगे। जैसे शाहबानो प्रकरण में राजीव गांधी को ले आए थे। लेकिन उन्मादी भूल गए कि वह साल दूसरा था, यह साल दूसरा है। तब हाल दूसरा था, अब हाल दूसरा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का फरवरी के अंतिम सप्ताह में जब भारत आगमन हुआ, उसके दो महीने पहले ही सीएए प्रदर्शनकारियों के बीच मौजूद उन्मादी तत्वों द्वारा हिंसा की इबारत लिखी जा चुकी थी। दिल्ली को सुलगाने में आम आदमी पार्टी (आआपा) की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता है। इसके विधायक अमानतुल्लाह खान ने सीएए विरोधियों को उकसाया और हिंदुओं के विरुद्ध भड़काऊ भाषण दिए। वहीं जब दंगाइयों ने एक बस में आग लगा दी तो उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने तुरंत ट्वीट कर कहा, ‘‘यह दिल्ली पुलिस का काम है।’’

वकील पर तनातनी
कुछ दिन पहले इन दंगाइयों के वकील को भी लेकर दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस के बीच ठन गई थी। पुलिस ने अपनी पैरवी करने के लिए वकीलों की एक सूची दिल्ली सरकार के पास भेजी तो सरकार ने उस सूची को लौटा दिया और अपने द्वारा बनाई गई एक सूची भेज दी। माना जा रहा है कि इसके पीछे भी दिल्ली सरकार की मंशा ठीक नहीं थी। ऐसी बात इसलिए उठ रही है कि अमानतुल्लाह ने ताहिर हुसैन की गिरफ्तारी के कुछ दिन बाद कहा था, ‘‘ताहिर हुसैन को मुसलमान होने की सजा मिल रही है।’’ आआपा ने खान के इस बयान का न तो विरोध किया और न ही उनसे कुछ पूछा। इसलिए जब वकीलों पर दिल्ली पुलिस और दिल्ली सरकार पर ठनी तो कुछ लोग कहते सुने गए कि दिल्ली सरकार दंगाइयों के प्रति नरमी दिखा रही है। खैर, अब दिल्ली सरकार और पुलिस दोनों सहमत हो गए हैं कि दिल्ली पुलिस की पैरवी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता करेंगे। तुषार मेहता का नाम सुनकर वामपंथी गिरोह परेशान है। हर्ष मंदर ने तो इस फैसले के खिलाफ याचिका दायर कर दी है। तुषार मेहता के साथ ही अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल मनिंदर आचार्य और अमन लेखी भी पुलिस के लिए पैरवी करेंगे। वहीं, केंद्र सरकार की तरफ से अधिवक्ता अमित महाजन एवं रजत नायर पेश होंगे।
पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्रों पर 16 जून को सुनवाई होगी। उम्मीद करनी चाहिए कि अदालती कार्रवाई जल्दी से जल्दी पूरी होगी और दिल्ली के दुश्मनों को उनके किए की सजा मिलेगी।


आरोपपत्र की मुख्य बातें
  • अंकित शर्मा हत्याकांड में 650 पृष्ठ का आरोपपत्र दाखिल किया गया है। इसमें आम आदमी पार्टी से जुड़े ताहिर सुसैन को मुख्य आरोपी बनाया गया है। इसमें कुल 10 आरोपी और 96 गवाह हैं। 

  • ताहिर हुसैन को तीन मामलों में मुख्य आरोपी बनाया गया है। ऐसे उसके खिलाफ 10 मामले हैं।

  • ताहिर हुसैन ने चांद बाग के अलावा ब्रजपुरी मस्जिद और करदमपुरी में मस्जिद के पास चल रहे सीएए विरोधी प्रदर्शन में  पैसा लगाया था।

  • ताहिर ने साजिश के तहत चांदबाग में घर के पास लगे सीसीटीवी कैमरे बंद करवाए थे।

  • ताहिर 27 फरवरी तक चांद बाग इलाके में ही था। पुलिस को फोन करना उसके षड्यंत्र का हिस्सा था।

  • शाहीन बाग में 8 जनवरी को हुई बैठक में ताहिर हुसैन, उमर खालिद, खालिद सैफी के अलावा भी कई लोग शामिल थे।

  • दिल्ली विधानसभा चुनाव के मद्देनजर ताहिर की पिस्तौल  खजूरी खास थाने में जमा थी। वह इस पिस्तौल को दंगे शुरू होने से ठीक एक दिन पहले 22 फरवरी को घर ले आया। यानी वह जानता था कि दंगे होने वाले हैं। अब यह पिस्तौल जब्त कर ली गई है।

  • जाफराबाद घटना से संबंधित आरोपपत्र में कहा गया है कि भीड़ को भड़काने में पिंजरा तोड़ ग्रुप, जामिया को-आर्डिनेशन कमेटी के सदस्य और जेएनयू के छात्र शामिल थे।

  • दंगों के दौरान जख्मी में हुए 10 लोगों में से 5 को गिरफ्तार किया गया है, जबकि पांच लोगों ने अपना पता गलत या अधूरा लिखवाया था। इसलिए वे पुलिस गिरफ्त से अब तक बचे हुए हैं।

  • आरोपी शाहरुख खान ने बयान दिया कि पिंजरा तोड़ गुट की देवांगना, नताशा, गुलफिशा, रुमशा समेत अन्य लड़कियों ने भीड़ को पुलिस पर हमला करने के लिए उकसाया था।

  • रिफाकत ने अपने बयान में कहा कि जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे बैठीं तीन-चार महिलाएं कह रही थीं कि रोड से हटना नहीं है। ऐसे में रिफाकत ने भी भीड़ को पुलिस पर पथराव करने, रॉड-डंडे से हमला करने और फायरिंग करने के लिए उकसाया।

  • दंगों से पहले समुदाय विशेष के लोग जिन क्षेत्रों मे रहते हैं, वहां दंगों से बचने का पूर्वाभ्यास चल रहा था। महिलाओं को समझाया गया था कि दंगों की स्थिति में उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है। ऐसा एक विस्तृत संदेश आरोपी रिफाकत अली के मोबाइल में मिला है। पुलिस इस संदेश के मुख्य स्रोत तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। 

  • देवांगना और नताशा ने बताया कि वे साजिश के तहत धरने पर बैठी थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 22 फरवरी को भारत आने से पहले वे जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे रोड जाम करके बैठ गई थीं। मकसद दूसरे समुदाय के लोगों को भड़काना था, ताकि हिंदू-मुस्लिम दंगा कराया जा सके।

  • देवांगना और नताशा के मोबाइल को खंगालने पर पाया गया कि वे ‘इंडिया अगेंस्ट हेट’ ग्रुप के लोगों और जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद के संपर्क में थीं।