श्रद्धांजलि : सहजता, सरलता और शांति की मूर्ति थीं चन्द्रकांता जी

    दिनांक 09-जून-2020
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मृदुला सिन्हा
केंद्रीय मंत्री पीयूषगोयल की माता चन्द्रकांता गोयल जी का पिछले दिनों निधन हो गया।  तीन बार की विधायक चंद्रकांता जी की छवि बड़ी ही सहज, सरल और सहृदया थी। उन्होंने अपने कार्य और लोकप्रियता से यह सिद्ध किया कि राजनीति में सफल होने के लिए जो गुण गिनाए जाते हैंख् वह न होकर व्यक्ति को संस्कारित, संवेदनशील और जनता में सरल, सहज होना ही अतिआवश्यक होता है।
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भारतीय जनसंघ पार्टी से लेकर भाजपा का प्रादेशिक या राष्ट्रीय कार्यक्रम हो या राष्ट्र सेविका समिति का अथवा मुंबई के अन्य सामाजिक संस्थाओं का, एक हंसता हुआ महिला चेहरा, जिस पर गंभीरता और संस्कार का लेप चढ़ा होता था, अचानक कार्यक्रम में उनके प्रवेश करते ही सभी को अभिवादन करतीं, अभिवादन लेतीं, भीड़ में अपनी अलग पहचान बनातीं, आगे बढ़ती जाती थीं। पता नहीं उस महिला से किसको क्या मिलता था। लेकिन मिलने वालों का मन प्रसन्न अवश्य हो जाता था, मन शांत भी। वह थीं मुंबई की चन्द्रकांता गोयल। मध्यमवर्गीय परिवार की चन्द्रकांता जी का दिल बड़ा होने के कारण छोटे से मकान में ही राष्ट्रीय, प्रांतीय स्तर के बड़े-छोटे और गली-मुहल्ले अथवा झोपड़ पट्टियों के लोगों के लिए भी उनका घर अपना घर लगता था। जहां प्रवेश करते ही पार्टी के काम में संलग्न बहुत ही गंभीर मुद्रा वाले चन्द्रकांता जी के पति वेद प्रकाश गोयल मिल जाते थे। वे लोगों को देखते ही पहचान जाते थे कि वे उनकी पत्नी मिलने आए हैं।

चन्द्रकांता जी गोयल एक साधारण गृहिणी थीं। राजनैतिक परिवार होने के कारण नेताओं से मिलते, उन्हें अपने घर ठहराते, उनके भोजन-भात की व्यवस्था करते, उनके बीच हुई बातचीत से राजनैतिक गुर भी सीखती रहीं। इसीलिए जब उन्हें काॅर्पोरेशन चुनाव में पार्षद का चुनाव लड़ने के लिए कहा गया, वे न नहीं कर सकीं। छह वर्षों तक पार्षद रहीं। चन्द्रकांता गोयल की क्षमता लोगों की समस्याओं की समझ और समाधान के लिए कठिन प्रयास देखकर, मुंबई के नेताओं ने उन्हें विधान सभा चुनाव लड़ने योग्य समझा और देशभर के लिए उनका चुनाव लड़ना एक उदाहरण बन गया कि इतनी सरल, सहज, हंसमुख महिला व्यक्तित्व को भी चुनाव लड़ाया जा सकता है। अक्सर लोग मानते हैं कि राजनीति में सफल होने के लिए बहुत तेज, तर्रार और स्वार्थी होने की आवश्यकता होती है।

चन्द्रकांता गोयल का विधान सभा चुनाव जीतना, तीन बार विधायक बनना, लोगों में लोकप्रिय बनना, यह सिद्ध करता है कि राजनीति में सफल होने के लिए जो गुण गिनाए जाते हैं, उन गुणों की आवश्यकता नहीं। व्यक्ति को संस्कारित, संवेदनशील और जनता में सरल, सहज होना भी आवश्यक होता है। चंद्रकांता जी के सुखी, संपन्न और संस्कारित परिवार में उनके जीवन साथी वेद प्रकाश गोयल के साथ उनकी सासु जी, दो बेटे, प्रदीप गोयल और पीयूष गोयल (रेल मंत्री, भारत सरकार) दो बेटियां प्रमिला और प्रतिभा थीं। वे बच्चे भी घर आए राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से घुल मिल जाते थे। बहुत राजनीतिक प्रश्नों से अवगत हो रहे थे। उन नेताओं को एकांत में पाकर वे भी बहुत से प्रश्न करते थे। उन्होंने बचपन से अपने घर में सभी तरह के मेहमानों का आना—जाना देखा था। उन बच्चों को भी यह संस्कार मिलता रहा कि उनका परिवार वही नहीं है, जो सायन (मुंबई) के मकान में है बल्कि वे बड़े परिवार से जुड़े हुए थे। थोड़ी सेवा उन्हें भी आगंतुकों की करनी पड़ती थी। अपनी मां की मृत्यु के बाद पीयूष गोयल ने कम-से-कम शब्दों में अपने माँ और परिवार के बारे में ट्वीट कर के कह दिया। उन्होंने कहा है- ‘‘मेरी माँ ने अपना पूरा जीवन लोगों की सेवा करते हुए बिताया और हमें भी सेवा भाव से जीवन बिताने के लिए प्रेरित किया।’’

सच बात तो यह है कि राजनीति में जाने के लिए सेवा भाव ही होना चाहिए। क्योंकि सरकार में लगे लोग अधिकारी हो या मंत्री, सेवक ही कहलाते हैं। क्योंकि उनसे जनता की सेवा करने की अपेक्षा रहती है। चन्द्रकांता जी अपने व्यवहार से बड़ों का भी दिल जीतती थीं और अपने छोटों को स्नेह देते हुए भी भूल जाती थीं कि छल, कपट, असत्य बोलना, ये सारे अवगुण बहुत दूर से भी उनके पास नहीं फटक पाते थे। इसलिए मुंबई या देश का कोई कोना हो, वहां की सक्रिय कार्यकर्ती उन्हें पहचानती थीं और आदर मान भी देती थीं। मुझे भी इनके घर में कई बार ठहरने का सुअवसर मिला। मेहमान तो मैं उस घर में पहली बार भी नहीं बनी थी। मेरे पहली बार पहुंचने पर कितना खुश हुई थीं चन्द्रकांता जी। मुझे बड़े स्नेह से पूछ-पूछकर खिला—पिलाया। अपने कमरे मे ले गईं। कपड़े की आलमारी खोल दी, मुझसे कहा-‘‘मृदुला जी एक अपने पसंद की साड़ी निकाल लो।’’ मैं हथप्रभ रह गई। साड़ियां तो हमें मिलती रहती थीं; पर इतने प्रेम से किसी ने नहीं कहा। मैंने कहा-‘‘एक ही लेनी है या जितनी जी चाहें ?’’ हम दोनों गले मिलकर हंसने लगे। प्रसन्नता की बूँदों से चारों आंखें भरी हुई थीं।

चन्द्रकांता जी ऐसी ही सहज, सहृदया थीं। भाजपा के पास योग्य महिला नेत्रियों और कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है। उन सबका बहुत बड़ा योगदान है, भाजपा के जीत और विस्तार में। वे बड़े पदों पर सक्रिय हैं। आज भी चन्द्रकांता जी का व्यक्तित्व अलग झलकता है। हमने उनके घर जाकर बहुत सीखा, कुछ-कुछ अपनाया, लेकिन हू-ब-हू चन्द्रकांता जी की तरह नहीं बन पाई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ अधिकारी हों या भाजपा के, सब उनके हंसते हुए चेहरे को स्मरण रखते हैं।

चन्द्रकांता जी के निधन के बाद एक बहुत बड़ा स्थान मानों रिक्त हुआ है। लेकिन वह अपनी विरासत में बहुत कुछ छोड़ गई हैं। आज राजनीति में आने वाली महिलाओं के लिए आवश्यक नहीं कि वेे बहुत चतुर-चालाक हों, झूठ-फरेब का सहयोग लें। आज भी और आने वाले कल में भी सहज, सरल, सहृदय और संवेदनशील घरेलू महिलाएं भी राजनीति में सफल हो सकती हैं, राजनीति में काम कर सकती हैं। मैं उनके निधन पर श्रद्धांजलि व्यक्त करती हूं और उनके गुणों को धारण करने का संकल्प लेती हूं।
लेखिका राज्यपाल रही हैं।