संघीय ढांचे के समक्ष उभरती चुनौतियां

    दिनांक 01-जुलाई-2020
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प्रो.हरिकेश सिंह

संघीय ढांचे को संविधान की अपेक्षा के अनुसार बनाये रखना राष्ट्रहित में है। यह संतोष की बात है कि गत कुछ वर्षोें से संघीय ढांचा पुन: दृढ़ हो रहा है, परन्तु विदेशी मानसिकता और संबद्धता के कारण इसको कमजोर करने वाली राजनीतिक शक्तियां इस ढांचे को हानि पहुंचा रही हैं
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भारत की संसद ( बाएं) द्वारा अंगीकृत संविधान के आरम्भ में प्रकाशित उद्देशिका (ऊपर)

स्वतंत्रता एवं संविधान की प्राप्ति का महत्व कुछ लोग उत्तरोत्तर कम आंकते जा रहे हैं। इसका प्रमुख कारण है कि उन्होंने ठीक से भारत का समग्र इतिहास नहीं पढ़ा है। जिन्होंने स्वतंत्रता का संग्राम लड़ा और अपना जीवन मां भारती को अर्पित कर दिया, हमने उनकी शहादत का भी आदर नहीं किया है। इस राष्ट्र में प्राथमिक कक्षाओं से लेकर उच्च शिक्षा तक के पाठ्यक्रम में क्रमोत्तर विकास के सिद्धांत से भारतीय संस्कृति, औपनिवेशिक काल तथा स्वतंत्रता के इतिहास को अनिवार्य ज्ञानपुंज के रूप में पाठ्यक्रम में तो रखना ही चाहिये था, जो मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अभी तक नहीं हो पाया है। एक-दो राष्ट्रीय पर्वों पर स्वरयंत्रों के माध्यम से हम ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...’ जैसे मर्मस्पर्शी गानों को सुन तो लेते हैं, लेकिन प्रण के साथ प्राणशक्ति में लेकर हृदयंगम नहीं कर पाते हैं। भारत की वर्तमान लोकतंत्रात्मक संघीय राज्य व्यवस्था लाखों-लाख लोगों के बलिदान के प्रतिफल के रूप में मिली है। आज स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद तथा संविधान को विधिवत आत्मार्पित करने के 70 वर्ष बाद यह मूल्यांकन करना समीचीन प्रतीत होता है कि क्या संघीय ढांचा अपेक्षित दशा में है? क्या यह उचित दिशा में बढ़ रहा है? यदि है, तो संतोष की बात है, परन्तु क्या वर्तमान समय में संविधान में इंगित एवं अपेक्षित संघीय ढांचे के समक्ष कुछ चुनौतियां भी उभरी हैं? हम इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढने का प्रयास करेंगे।
 
संविधान का मर्म समझें
कुछ लोग बिना गंभीर विमर्श के कह देते हैं कि भारत का संविधान तो मात्र कुछ राष्ट्रों के संविधानों का मिश्रण है। संविधान को मात्र एक पुस्तक के रूप में सरसरी निगाह से देखने पर ऐसा कहा जाता है। परन्तु भारत के संविधान को बनाने में एक विशद् बौद्धिक प्रक्रिया संविधान-सभा द्वारा अपनायी गयी थी। स्वतंत्रता संग्राम में घोर यातनाओं को सहने वाले त्यागी बौद्धिकों की राष्ट्रीय स्तर की संविधान सभा ने बड़े ही परिश्रम, तन्मयता, दूरदर्शिता, स्वातंत्र्य आंदोलन की मौलिक अपेक्षाओं की अनुभूति को ध्यान में रखकर इस संविधान को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। आज विश्व परिदृश्य में भारत का संविधान सारभर्मित एवं सुपारभाषित है। इसी को हमने 26 जनवरी 1950 को अपने संघीय गणराज्य का आधार माना तथा संवैधानिक शपथ ली।

आज आधुनिक नागर समाज के लिए सर्वमान्य संविधान अपरिहार्य है। भारत का संविधान भारतीय जनमानस के सम्यक् विकास के लिए समर्थ शास्त्र एवं शस्त्र है। रही बात इसके उपयुक्त प्रयोग की तो यह तो हम सभी नागरिकों का नैतिक दायित्व है कि हम अपना प्रत्येक आचरण संविधान की आत्मा के अनुरूप ही करें। आज जब हम नागरिक हो गये हैं तो अपने हमने मौलिक कर्तव्य वाले अनुच्छेदों को तो पढ़ लिया है, परन्तु मौलिक कर्तव्य का बोध भी नहीं रखना चाहते। भारत के संविधान का मस्तिष्क है इसकी मूलपीठिका (प्रिएम्बल)। इसी मूल मंतव्य को प्राप्त करने के लिए ‘राज्य’ बनाया गया। राज्य व्यवस्थाओं के अध्येता यह जानते हैं कि दुनिया में लोकतंत्रात्मक राज्य व्यवस्था धीरे-धीरे आयी है तथा इसको प्राप्त करने में अनगिनत प्राणों की आहुति देनी पड़ी है। अत: यह सर्वमान्य है कि लोकतंत्र दुनिया की सर्वाधिक सुसंगत और श्रेष्ठतम राज्य व्यवस्था है। भारत विविधताओं वाला देश प्रारम्भ से ही रहा है। यह विविधता उत्तरोत्तर बढ़ती ही गयी। इसी विविधता में एकता के दार्शनिक तत्व की सामाजिक-राजनीतिक अपरिहार्यता को दृष्टिगत रखते हुए संविधान निर्माताओं ने संविधान की मूलात्मा की घोषणा में यह स्पष्ट उद्घोषणा की है-‘‘हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा; और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत्, दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’’

उपरोक्त उद्देशिका के सूक्ष्म अवलोकन से यह स्पष्ट है कि हम भारतवासियों ने अपने संविधान में समानता (समता), स्वतंत्रता, न्याय एवं भ्रातृत्व (बंधुता) को आदर्श जीवन मूल्य के रूप में स्वीकार करने की शपथ ली है। इन्हीं मूल्यों की प्राप्ति हेतु राज्य व्यवस्था के रूप में लोकतंत्रात्मक गणराज्य की अभिकल्पना रची है तथा संघीय संरचना के माध्यम से भारतीय जनमानस को विकास के पथ पर अग्रसर करने की आकांक्षा की है। संविधान की मौलिक मान्यता के रूप में हमारी पहचान के विभिन्न आयाम हैं और रहेंगे भी, परन्तु सर्वोच्च पहचान एक नागरिक के रूप में ही होनी चाहिए। इसके अनुपालन के अभिभावक के रूप में भारतीय गणराज्य के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति, संसद एवं उच्चतम न्यायालय सर्वोच्च हैं। राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी विपथन को रोकने तथा शुचितापूर्ण संवैधानिक मर्यादाओं का अनुसरण इन्हीं अभिभावक संस्थाओं द्वारा सुनिश्चित होता है। लेकिन क्या वर्तमान संघीय लोकतंत्रात्मक व्यवस्था ठीक प्रकार से संचालित हो रही है?

वर्तमान भारत कई प्रकार की आंतरिक एवं बाह्य विरोधी शक्तियों से जूझ रहा है। शहीदों के बलिदान के उपरान्त मिली स्वतंत्रता की जो समझ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के शुरुआती वर्षों में थी, उसमें शिथिलता आयी है। अति स्वच्छंदता की प्रवृत्ति बढ़ी है। विघटनकारी क्षेत्रीय दलों ने अविवेकपूर्ण एवं स्वार्थपरक समझौते किये हैं। आज एकतरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) है, तो दूसरी तरफ संयुक्त प्रगतिशील संगठन (संप्रग)। भारत की जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया ही है। संघीय ढांचे को संविधान की अपेक्षा के अनुसार बनाये रखना राष्ट्रहित में है। यह संतोष की बात है कि गत कुछ वर्षों से संघीय ढांचा पुन: दृढ़ हो रहा है, परन्तु विदेशी मानसिकता और संबद्धता के कारण इसको कमजोर करने वाली राजनीतिक शक्तियां इस ढांचे को हानि पहुंचा रही हैं। ये शक्तियां निजी स्वार्थ, परिवारवाद एवं वैदेशिक कूटनीति के उपकरण बन जाने के कारण ऐसा कर रही हैं।

संघीय ढांचे के विपरीत आचरण
संघीय ढांचे एवं संविधान के विपरीत आचरण करने वालों ने एक आम नागरिक होने की नैतिकता को भी ताक पर रख दिया है। ‘वन्दे-मातरम्’ नहीं गायेंगे, ‘राष्ट्रगान’ के समय सावधान की मुद्र्रा में खड़े नहीं होंगे, संविधान की प्रति जलायेंगे, धारा 370 एवं 35ए के निरस्तीकरण का विरोध करेंगे, राष्ट्रीय जनसंख्या पंजिका नहीं बनने देंगे आदि जैसे आचरण किसी भी व्यक्ति, समूह, सम्प्रदाय अथवा राजनीतिक दल द्वारा किये जा रहे हैं तो यह उसी संविधान की घोर अवमानना एवं उपेक्षा है जिसके अंतर्गत उन्हें (हमें) नागरिकता, मूल अधिकार एवं मूल कर्तव्य प्राप्त हुए हैं। 

स्वतंत्रता से पूर्व ही विदेशी शासक अपने कूटनीतिक चातुर्य के अंतर्गत ‘फूट डालो राज करो’ की नीति को और विद्रुुप बनाते हुए विभेदकारी कारकों के प्रति उकसाने लगे थे, जिसका अवांछनीय रूप अब अधिक दिख रहा है। स्वतंत्र भारत में प्रांतों के बीच सीमा विवाद, जल संसाधन जैसे प्राकृतिक संसाधनों के बंटवारे का विवाद, भाषा विवाद आदि को अनुचित प्रोत्साहन दिया जाने लगा। केन्द्र की सरकार हो अथवा प्रान्त की सरकारें, सबका गठन तो संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत ही हुआ है, परन्तु दुर्भाग्य है कि जिस संविधान की मर्यादाओं के आलोक में एक ग्राम प्रधान से लेकर राष्ट्र प्रधान तक शपथ लेता है, कुछ दल अथवा ताकतें उसी संविधान की धज्जी उड़ाते हुए संविधान के विपरीत आचरण करने लगी हैं। प्रांत की सरकारों का केन्द्र से टकराव की स्थिति में आना उचित कैसे कहा जा सकता है? यह बड़ी साजिश प्रतीत होती है। अति तुष्टीकरण एवं वैदेशिक साठ-गांठ का कहीं न कहीं इसमें योगदान है।

भारतीय चुनाव आयोग के समक्ष राजनीतिक दलों द्वारा प्रस्तुत किये गये अनुबन्ध-पत्रों को एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा परखना चाहिए कि दल द्वारा घोषित नीति, वक्तव्य एवं कार्यक्रम भारतीय संविधान के अनुरूप हैं अथवा नहीं। इसी आधार पर किसी दल को मान्यता मिलनी चाहिए। संघीय लोकतंत्रात्मक सम्प्रभु राष्ट्र के लिए यह मूलमंत्र है। राष्ट्र के प्रतीकों, संवैधानिक पर्वों एवं संकल्पों को एक स्वर में आदर के साथ सहर्ष स्वीकार करना चाहिए, तभी हम प्रगति के पथ पर आगे बढ़ेंगे। वास्तव में संघीय ढांचे की मूल अवधारणा चार स्तम्भों वाली राज्य व्यवस्था पर आधरित है जो गांव, जनपद, प्रांत और राष्ट्र में स्तरीकृत है, न कि विघटित अथवा विभाजित। इस संघीय ढांचे में सबकी समान सहभागिता होनी चाहिए। इसकी चार प्रमुख विशेषताएं सदैव परखी जानी चाहिए-यथा एकता, आंतरिक सुदृढ़ता, समन्वय एवं सामाजिक समरसता। व्यापक संवैधानिक अनुशासनहीनता की स्थिति में केन्द्र्र को कठोर कदम भी अवश्य उठाना चाहिए। 

आवश्यक है कि हम जीवन्तता (जन), गणराज्यबोध (गण) और मनस्विता (मन) की त्रयी को ठीक से आत्मसात करें। तभी संघीय लोकतंत्रात्मक संस्कृति को प्राणवान बना सकेंगे।
(लेखक जयप्रकाश विश्वविद्यालय, बिहार के पूर्व कुलपति हैं)