गेशे जम्पा

    दिनांक 01-जुलाई-2020
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नीरजा माधव 
 
तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी। अपने देश को आजाद कराने की उम्मीद लिए अपनी निर्वासित सरकार को भारत के हिमाचल प्रदेश में पीठासीन किया। तब से लेकर आज तक जब भी तिब्बत में आजादी की आग भड़की, उसकी आंच भारत और चीन के सम्बन्धों ने भी महसूस की, क्योंकि भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बने रहे। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी भारत ने चीन की नीतियों पर सरकारी तौर पर कभी कोई आपत्ति नहीं की। लगभग यही नीति विश्व के तमाम देशों की रही। अब परिणाम यह हुआ कि तिब्बत पर अधिकार जमाने के बाद चीन भारत की सीमा में भी घुसपैठ करने लगा। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की पहली कड़ी 


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पूर्णमासी की रात थी परंतु घने कुहरे के कारण चांद दिखाई नहीं दे रहा था। गेशे जम्पा को नींद नहीं आ रही थी। कमरे में पड़ी आरामकुर्सी पर धम्म से बैठ गए थे। आज पुन: मठ में दस बच्चों का एक समूह धर्मशाला से उनके पास भेजा गया था, जिसमें छह लड़कियां थीं और चार लड़के। सभी की उम्र लगभग पांच वर्ष से बारह वर्ष के भीतर। कड़ाके की इस ठंड में उनके मां-बाप ने नए-पुराने ऊनी कपड़ों से ढककर पीठ पर आवश्यकता की वस्तुएं तथा ज्यूपा और मासुंग की पोटली लादकर चुपके से बर्फीली चोटियों पर हांक दिया था ताकि वे अपने देश की घुटनभरी जिंदगी से दूर, दूसरे देश में जाकर अच्छा जीवन बिता सकें।

व्याकुलता में गेशे जम्पा ने उठकर खिड़की खोल दी। बाहर एक निस्तब्ध सन्नाटा बिखरा था। ठंडी हवा का एक हल्का झोंका उनके कक्ष में घुसने का प्रयास करने लगा। चीवर के ऊपर से ओढ़े गए कत्थई शाल को भेदती हुई ठंडक उनकी नंगी भुजाओं को स्पर्श करने लगी तो उन्हें सिहरन-सी हुई थी। उन्होंने अपने दोनों हाथों को कसकर सीने पर जकड़ लिया और बाहर देखने लगे। मठ की नीची चारदीवारी से बाहर दूर तक पसरा दृश्य दिखाई पड़ रहा था। सामने सड़क के उस पार लगे आम, जामुन और अन्य जंगली वृक्ष कुहरे के साये में दुबके-सिकुड़े से खड़े थे। सड़क के किनारे खंभों पर लगे दूधिया बल्ब बहुत मद्धिम से दिखाई पड़ रहे थे। सब कुछ शांत-सा। ठंड के कारण रात के दस बजे से ही एक सन्नाटा-सा छा जाता था सारनाथ की सड़कों पर। एक बाल्टा वाला दिखाई पड़ा था। साइकिल के हैंडिल और कैरियर के दोनों ओर बंधे चार बड़े-बड़े दूध के खाली बाल्टे गति के साथ आपस में लड़भिड़कर खड़खड़ कर रहे थे। कुछ पल के लिए निस्तब्धता भंग हुई थी। बाहर की भी और गेशे जम्पा के भीतर की भी। ठंड में साइकिल वाले की ठिठुरी चाल देखकर जम्पा को कुछ याद आया था। कमरे में उनके अतिरिक्त एक और नन्हा मेहमान सोया है। उसे ठंड लग रही होगी, यह सोचते हुए उन्होंने भारी मन से खिड़की का पल्ला बंद कर दिया। सन्नाटा बाहर रह गया था। गेशे जम्पा के मन में उथल-पुथल मच गई थी। कब तक चलता रहेगा यह सिलसिला? बिस्तर पर ताशी सोया था। उम्र लगभग पांच—छह वर्ष। उन्होंने बिस्तर के पास जाकर उसका कंबल ठीक किया और रूम हीटर को उसकी ओर घुमा दिया। नन्हे ताशी के चेहरे पर एक भोली सी उदासी नींद में भी स्पष्ट झलक रही थी। गेशे जम्पा का मन विह्वल हो उठा था। वे उसी के पास बिस्तर पर बैठ गए और बहुत धीरे-धीरे उसके नन्हे-नन्हे बालों पर हाथ फेरने लगे।
चा-फु... मा-फु। ताशी नींद में बड़बड़ा उठा।

गेशे जम्पा का शांत मुखमंडल करुणा से भर उठा। ताशी के साथ आए हुए बच्चों ने बताया था कि तिब्बत से बर्फीली चढ़ाई के साथ ही उनके पास की खाने-पीने की सामग्री समाप्त होने लगी थी। कुछ ही दूर चढ़ाई करने के बाद ताशी ने उन लोगों के लिए समस्या पैदा कर दी। बार-बार पीछे मुड़कर मां-मां पुकारता हुआ बिलखने लगता। वह तो अच्छा था कि अधिक ठंड के कारण सीमा के सैनिक भी अपनी बफीर्ली चोटियों पर स्थित चौकियों को छोड़कर निचले स्थानों पर चले गए थे, अन्यथा ताशी का रोना—चिल्लाना सुनकर उन सबको पकड़ लिया जाता। किसी तरह वे जल्दी-जल्दी भारत की सीमा में पहुंच जाना चाहते थे। बर्फीली चोटियों पर चलते हुए बड़े थर्मस में भरी चाय भी समाप्त होने लगी थी। ताशी अत्यधिक ठंड के कारण चा-फु...मा-फु करते-करते मूर्छित हो गया था। पहले तो उन लोगों ने सोचा कि वह मर गया, परंतु मुंग्फे ने देखा था कि उसकी सांस चल रही है। वे लोग उसे मूर्छित अवस्था में ही अपनी पीठ पर बारी-बारी लादकर उतराई में उतरे थे।

मां .. मां ..। नींद में ताशी शायद अपनी मां से बातें कर रहा था। उसके मुख पर एक हल्की हंसी फैली थी। ओंठ बार-बार हंसने की मुद्रा में फैलकर सिकुड़ जा रहे थे। गले से दबी-दबी-सी किलकारी निकल रही थी।

गेशे जम्पा की आंखें आंसुओं से भर आई थीं। नन्ही-सी जान अपने मां-पिता से बिछुड़कर उनकी शरण में आ गया है। कैसे वे उसे समझा पाएंगे? शाम से ही मां के पास पहुंचाने की जिद करने वाले ताशी को उन्होंने किसी प्रकार फुसलाया था-देखो, ये दूध पील लो और खाना खा लो तो मैं तुम्हें कल ले चलूंगा मां के पास।

—नहीं, मुझे अभी जाना है अपनी मां के पास। नन्हा ताशी अपनी तिब्बती भाषा में हठ कर बैठा था।
—देखो ताशी, अभी रात हो गई है। शो-ला में कोई खच्चर भी नहीं मिलेगा। कैसे जाएंगे? फिर रास्ते में भयानक डोंग् मिल जाएंगे तो? गेशे जम्पा ने नन्हे ताशी को रास्ते की भयावहता से डराने की कोशिश की। उनका प्रयास सार्थक हुआ था। ताशी के चेहरे पर भय की एक काली छाया मंडरा उठी। शायद अभी कुछ ही दिनों पूर्व की गई त्रासद यात्रा की स्मृति ताजा हो उठी। वह लपककर गेशे जम्पा के चीवर में छिप गया था। उन्होंने उसे सीने से चिपका लिया और धीरे-धीरे उसके नन्हे बालों में उंगलियां फिराने लगे।
कल हम लोग कब चलेंगे? ताशी ने कछुए की तरह अपना सिर बाहर निकाल पूछा था।
बस खाना खाकर चल देंगे। उन्होंने गोलमोल उत्तर देकर इस समय टालना चाहा।
लेकिन मैं तो यह खाना नहीं खाऊंगा।

फिर क्या खाओगे?
चमरी का मांस और भात। ताशी ने अपनी मांग रखी।
हूं। और? गेशे जम्पा उसे इस समय किसी तरह बहलाना चाह रहे थे।
और मासुंग्।
अच्छा, और?
और, और, चाय। ताशी ने कुछ देर सोचकर बताया था।
ठीक है। सबेरे सब ला देंगे। पर इस समय जाकर मुंग्फे और छुंग्ची के साथ सो जाओ। उन्होंने ताशी को अपने से पृथक करते हुए कहा।
नहीं, मैं वहां नहीं सोऊंगा। मैं आपके पास सोऊंगा।
नहीं ताशी, छुंग्ची तुम्हें कहानी सुनाएगी। उसी के पास सोओ। उन्होंने समझाया था।
नहीं, मैं तो आपके पास ही साऊंगा। मुझे डर लगता है। वह ठुनक पड़ा था। उसकी आंखों में आंसू मचल पड़े। कहीं फिर अपनी मां को याद करके ताशी रोने न लगे, इस भय से गेशे जम्पा उसे अपने कमरे में लेकर चले आए थे। अन्य बच्चों के लिए बिस्तर आदि की व्यवस्था करके मठ की वृद्धा भिक्षुणी लोये दोलमा को दायित्व सौंप दिया था।

दोलमा बहुत ही स्नेह से तिब्बत से भागकर आए इन नन्हे बच्चों की देखभाल करती थी। पहले यह मठ केवल एक तिब्बती बौद्ध मंदिर था, परंतु शरणार्थी बच्चों की संख्या और आवश्यकता को देखते हुए भारत सरकार के आर्थिक सहयोग से इसी के पास प्रारंभिक भोट संस्कृति शिक्षा संस्थान भी खोल दिया गया था, जिसमें इन बच्चों को भारतीय भाषाओं के साथ ही तिब्बती संस्कृति की शिक्षा दी जाती थी, ताकि उसे संरक्षित किया जा सके। भिक्षुणी दोलमा मंदिर के साथ-साथ मठ में रहने वाले बच्चों की संरक्षिका भी थी। गेशे जम्पा के इस संस्थान के अध्यक्ष पद पर चयनित होने के बहुत पहले से ही लोये दोलमा इसमें कार्यरत थी। सभी बच्चे और संस्थान के कर्मचारी तथा शिक्षक भिक्षुणी को बहुत आदर देते थे। शुरू-शुरू में मठ के बगल में ही चाय की दुकान वाले भारतीय बचाऊ ने दोलमा को 'माई' कहकर संबोधित करना प्रारंभ किया। धीरे-धीरे दोलमा लामाओं और तिब्बती लड़के-लड़कियों के लिए भी माई हो गई। सभी लोग उसे प्यार से माई पुकारने लगे और दोलमा भी उनमें इसी रूप में लोकप्रिय होने लगी। गेशे जम्पा के लिए तो वह अपनी मां जैसी आदरणीय थी।... (जारी)