हिंदू और मंदिर पर ही सेकुलरिज्म का उबाल क्यों?

    दिनांक 01-जुलाई-2020
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सोनाली मिश्रा की फेसबुक वॉल से
हमारी आस्था क्या है, व्रत रखना, रोजे रखना, फास्टिंग करना, घूंघट करना, बुर्का पहनना, ईसाई नन वाले परिधान पहनना? इस पर अपने-अपने मतानुसार विचार रखे जाएं या फिर स्व-चेतना पर छोड़ दिया जाए। मगर जब आपके सामने यह मामला आए कि किसी मस्जिद, किसी कान्वेंट और किसी मंदिर परिसर में लड़की के साथ गलत हुआ, तो बिना किन्तु-परन्तु के बोला जाए।

हम लोग दिल्ली में हैं, सुविधाजनक रूप से सुनते-सुनाते हैं। पहले तो मुझे लगता था कि फेसबुक पर हर उस स्त्री के प्रति बहनापा दिखाया जाता होगा, जिसके साथ अत्याचार होता है। फिर धीरे-धीरे मुझे लगा कि हमारे यहां केवल राजनीतिक एजेंडे के तहत ही शोर मचाया जाता है, बाकी समय हम लोग कान में रुई डालकर बैठे रहते हैं। अभी मैं बनारस की उभरती प्रगतिशील मूल्यों वाली पत्रकार रिजवाना की आत्महत्या पर अपने बौद्धिक वर्ग की चुप्पी पर हैरान-परेशान थी कि केरल में एक बार फिर कान्वेंट में एक ट्रेनी नर्स ने आत्महत्या कर ली। आपको जानकर हैरानी होगी कि साल दर साल कान्वेंट में ननों की संदिग्ध मृत्यु 1987 से चालू है। कुछ पर शोर मचता है तो मामला दर्ज होता है, नहीं तो नहीं! सच्चाई यही है कि दरिया से टकराने की हिम्मत दिल्ली का हमारा प्रगतिशील समाज नहीं कर पाता और जब बात केरल की हो तो और भी नहीं। केरल में किस तरह से कोरोना के मामलों में कमी आ रही है, वह तो हमें दिखता है, मगर केरल में मत-मजहब की कुरीतियों के नाम पर हमारी ही बहनों को जीवन समाप्त करना पड़ रहा है, यह हमें नहीं दिखता। सवाल यह नहीं कि हम दूसरे के मजहब के खिलाफ नहीं बोल सकते। हमें यहां पर दो बातों को स्पष्ट रूप से जानना होगा।

यदि यह सवाल होगा कि हमारी आस्था क्या है, व्रत रखना, रोजे रखना, फास्टिंग करना, घूंघट करना, बुर्का पहनना, ईसाई नन वाले परिधान पहनना? इस पर अपने-अपने मतानुसार विचार रखे जाएं या फिर स्व-चेतना पर छोड़ दिया जाए। मगर जब आपके सामने यह मामला आए कि किसी मस्जिद, किसी कान्वेंट और किसी मंदिर परिसर में लड़की के साथ गलत हुआ, तो बिना किन्तु-परन्तु के बोला जाए। अब हमारे साथ क्या होता है कि मंदिर का नाम सुनते ही हमारे भीतर का सेकुलरिज्म का कीड़ा एकदम से छटपटाने लगता है। मंदिर में ऐसा होता है, वैसा होता है, पंडित ऐसा होता है, इत्यादि-इत्यादि कहने लगते हैं। कविताएं पोस्ट करने लग जाते हैं। मगर जब रिजवाना तबस्सुम की आत्महत्या के मामले में कोई शमीम पकड़ा जाता है तो किसी प्रोपेगैंडा वेबसाइट ने कोई भी तफ्तीश नहीं की, जिनके लिए वह काम करती थी अर्थात द वायर, द प्रिंट आदि। वह भी तब जबकि वह नोटिस बोर्ड पर बाकायदा नाम लिखकर छोड़ गई! ऐसा नहीं होता तो हमारे एक प्रगतिशील लेखक तो उसकी आत्महत्या को अपराधबोध से प्रेरित आत्महत्या बता ही चुके थे। और तो और प्रिंट ने भी यह लिखकर पल्ला झाड़ लिया कि यह मामला प्रेम प्रसंग का हो सकता है। क्या होता यदि यह प्रेम प्रसंग किसी शमीम के साथ न होकर आदित्य, अंकित या किसी अन्य हिन्दू नाम के साथ होता? क्या मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग में इतना सन्नाटा होता?

याद कीजिये जिया खान की आत्महत्या को! एक बेहद साधारण अभिनेत्री। उसने आत्महत्या करने से पहले सूरज पंचोली को जिम्मेदार ठहराया था। तब मीडिया न जाने कब तक इसे उठाता रहा। सूरज पंचोली के जेल जाने से पहले उसकी चारित्रिक हत्या हुई थी। मगर क्या आपको पता है कि रिजवाना को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले शमीम ने आखिर ऐसा क्या कहा होगा या किया होगा कि उसे जीवन खत्म करना पड़ा? आपको नहीं पता चलेगा, क्योंकि शमीम न केवल मुसलमान है, बल्कि स्थानीय सपा नेता भी है। हर आत्महत्या देश और समाज पर एक कलंक है, मगर रिजवाना जैसी बेचारी लड़कियां दो बार मरती हैं। एक बार खुद और दूसरी बार न्याय की तलाश में बुद्धिजीवियों की बेरुखी से।

8 मई, 2020 को केरल के कान्वेंट में दिव्या पी. जॉनी का निर्जीव शरीर एक कुएं में पाया गया, वह भी सुबह के 11 बजे। उसी कुएं में कूद कर समस्त स्त्री विमर्श को आत्महत्या कर लेनी चाहिए, क्योंकि हमने अपने विमर्श को केवल और केवल कथित ठेकेदारों के हवाले कर दिया है, जो नफा-नुकसान देखकर बात करते हैं। हमें सिस्टर लूसी याद नहीं, हमें सिस्टर अभया याद नहीं है। हमने उन सभी स्त्रियों को अपनी स्मृति से निकाल कर फेंक दिया है, जिनसे  हमारा ‘पोलिटिकल मोटिव सेट’ नहीं होता। उसके बारे में लिखने पर वामपंथी आलोचक हमारी लिखी कहानियों पर नहीं लिखेंगे, मेरी किताबों पर अमुक आलोचक चर्चा नहीं करेगा। हकीकत यही है कि हमारा विमर्श मुट्ठी भर आलोचकों ... ओह! वामपंथी अवसरवादी आलोचकों की दया दृष्टि पर निर्भर है।