नाम में बहुत कुछ रखा है

    दिनांक 13-जुलाई-2020
Total Views |

डॉ अंशु जोशी
 
गत दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में प्रकांड विद्वान एवं साहित्यशास्त्र के मूर्धन्य आचार्य अभिनव गुप्त के नाम पर परिसर में एक सड़क का नामकरण किया गया। यह पहला मौका नहीं है जब विवि ने देश के महापुरुषों के नाम पर सड़क का नाम करण किया है, इसके पहले भी विवि प्रशासन ने रानी मां गाइन्दिल्यू मार्ग, सावित्री फुले मार्ग, स्वामी विवेकानंद मार्ग, वीर सावरकर मार्ग सहित ऐसे ही कई ख्यातिलब्ध नामों की तख्तियां लगाकर छात्रों को सुनहरे इतिहास से जोड़ने का सदृप्रयास कर नई चेतना और प्रेरणा देने का काम किया है
jk_1  H x W: 0


भारत को ब्रिटिश गुलामी से आज़ाद हुए सत्तर वर्षों से भी अधिक समय बीत चुका है। पर स्वतंत्रता संग्राम की स्व-घोषित पुरोधा भारतीय कांग्रेस पार्टी ने उपनिवेशवादी मानसिकता का न खुद दामन छोड़ा न भारतीयों के मन से उस निरर्थक हीन भावना का बोध निकलने दिया, जिसका बीज ब्रिटिशों ने भारतीयों के मन में एक सुनियोजित षड़यंत्र के तहत बोया था। परिणाम निकला एक ऐसा भारत, जहाँ कागज़ी स्वतंत्रता तो मिल गयी पर आज भी भारतीयों के मन में गुलामी का पौधा फल फूल रहा है। शिक्षा हो या भाषा, तकनीक हो या खेल, हम भारतीयों ने अपनी प्रतिभा, अपने प्रतीक, अपने चिह्न भुला कर बड़ी सहजता से पाश्चात्य की गुलामी स्वीकार कर ली। सूती "लिनन" हो गया और हिंदी "वर्नाक्युलर"। इसी श्रृंखला में तमाम सरकारी अस्पतालों, मार्गों, संस्थानों और हवाई अड्डों के नाम गांधी परिवार और पाश्चात्य नामों पर रख छोड़े गए, जैसे भारत के सुनहरे इतिहास और संस्कृति में और कोई हस्ती हुई ही नहीं। कितनी ही बार दिल्ली के रास्तों से गुज़रते हुए, हवाई अड्डों पर उतरते हुए, सरकारी संस्थानों में प्रवेश करते हुए यह प्रश्न मेरे मन में कौंधा है कि क्या नव भारत के निर्माण में सिर्फ एक परिवार का योगदान है ? और कहां हैं उन तमाम भारतीय विचारकों, शासकों, योद्धाओं, लेखक-लेखिकाओं और कलाकारों के नाम जिन्होंने भारतवर्ष के नाम की पताका पूरे विश्व में लहराई ? कितनी ही बार बहसों का हिस्सा बनी और लब्बोलुबाब ये निकला कि आखिर नाम में रखा क्या है ?

मगर बीते कुछ दिनों में इस प्रश्न का उत्तर जेएनयू कैंपस में मिलना प्रारम्भ हुआ जब मैंने रानी गाइन्दिल्यू मार्ग, सावित्री फुले मार्ग, स्वामी विवेकानंद मार्ग, वीर सावरकर मार्ग और ऐसे ही कई नामों की तख्तियां देखीं। आखिर हममें से कितने जानते हैं कि रानी लक्ष्मी बाई की तरह नागालैंड की रानी गाइन्दिल्यू भी भारत की स्वतंत्रता के लिए खूब लड़ीं थीं ? कितनों ने किसी हवाई अड्डे, अस्पताल या संस्थान का नाम स्वामी विवेकानंद के नाम पर देखा है ? कितनों ने भारत के अतीत से गौरवशाली राजा-रानियों के नाम अगली पीढ़ी के समक्ष रखने की चेष्टा की है ?

अपने सतरंगी अतीत को, वैभव को, गौरव को भूल आज यदि हम पाश्चात्य के रंगीन चश्मे को पहन एक खोखली जीवन शैली जी रहे हैं तो गलती किसकी है ? नाम में बहुत कुछ रखा है। पूरे विश्व में अपनी सार्थकता सिद्ध कर हमारा अपना योग जब "योगा" बनकर हमारे पास आता है तो हम उसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लेते हैं, संस्कृत जब ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाती है तब हमें अचानक याद आता है कि हमारी पुरा-प्राचीन भाषा विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा है। और तो और कोरोना काल में जब बड़े-बड़े "ग्लोबल" ब्रांड पांच-पांच सौ रुपयों में एक कप "ट्यूमरिक लात्ते" बेचने लगते हैं तब हम अचानक समझते हैं कि हमारी दादी-नानियाँ क्यों बचपन में हर रोज़ कभी डाँट कर तो कभी फुसला कर हमें हल्दी वाला दूध पिलाया करती थीं। नाम में एक पूरा ब्रांड है, एक पूरा इतिहास, एक पूरी कहानी और एक पूरा भविष्य। शायद यही कारण है कि कॉंग्रेस ने अपने शासन काल में नेहरू-गांधी के अलावा कोई नाम पनपने ही नहीं दिया।

इस नामकरण में छिपे सायकोलॉजिकल असर को हममें से कितने समझ पाए या पाते हैं ? यदि नाम में कुछ न रखा होता तो पूरे देश का इस तरह एक परिवार के नाम पर नामकरण क्यों किया जाता ? वस्तुतः यह एक सफल प्रयास रहा हर नयी पीढ़ी को अपने प्राचीन इतिहास से काट इस मिथ्या को सत्य मान लेने का कि भारत के निर्माण में सिर्फ एक ही परिवार की भूमिका है। आज जब हम इतिहास और पाठ्यक्रम संशोधन से लेकर भारत के वैभवशाली इतिहास को पुनर्जीवित करने की बात करते हैं तो सर्वप्रथम आवश्यक हो जाता है उन सभी नामों को भारतीयों के समक्ष रखना जिनका भारत से अभिन्न नाता रहा है, योगदान रहा है। उस सभी भूले-बिसरे नामों को अपनी अगली पीढ़ी से परिचित कराना जो राजनीति के तहखाने में बड़ी चालाकी से अँधेरे में धकेल दिए गए थे। उन सभी नामों को भारत के भविष्य से जोड़ना जो भारत का बेहतरीन इतिहास रहे हैं। इसके लिए किसी पश्चिमी "एक्सपर्ट" के "सर्टिफिकेट" की आवश्यकता क्यों हो ? जेएनयू में ऐसे तमाम नामों के नाम पर विभिन्न मार्गों का नामकरण किया जाना एक बड़े बदलाव का द्योतक है। जब—जब "सावित्री बाई फुले" मार्ग से गुज़रती हूँ तो याद आ जाती है एक भारतीय  महिला के शिक्षा की दिशा में की ऐतिहासिक पहल की, उसके संघर्षों की, उसके सामाजिक उत्थान और शिक्षा की दिशा में किये गए सद्प्रयासों की।  जब “स्वामी विवेकानंद” पथ पर चलती हूँ तो अचानक ही, कुछ क्षण के लिए ही सही, एक नयी चेतना, एक नयी प्रेरणा से ऊर्जावान हो उठती हूँ। वीर सावरकर मार्ग पर एक ऐसे बलिदानी, ऐसे स्वातंत्र्य वीर की याद आ जाती है जो निरंतर कर्त्तव्य पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं। "बिरसा मुंडा" मार्ग पर एक ऐसे जनजातीय हीरो को याद करती हूँ जिन्होंने अपनी वीरता से ब्रिटिशों के दाँत खट्टे कर दिए थे।


कितनी ही बार बेटे को इन तमाम हस्तियों की जीवनियाँ सुनाई हैं और तब यह समझ आया कि इन नामों को, ऐसे देखकर नयी पीढ़ी इतिहास से जुड़ रही है, जुड़ना चाह रही है। मार्गों का भारतीय नामों पर नामकरण और पुनर्नामकरण न राजनीति हैं न कोई चाल। ये पिछले कई वर्षों से हज़ारों-लाखों भारतीय युवाओं के प्रश्नों का समाधान है जो देश के हर सरकारी मार्ग, संस्थान या हर उपक्रम के "नेहरूकरण" या "गांधीकरण" से हैरान थे। यह एक सद्प्रयास है नयी पीढ़ी को, भारत के भविष्य को उस सुनहरे इतिहास से जोड़ने का जिसे जानने के वे हक़दार हैं। यह एक कोशिश है प्रेरक नामों और उनकी जीवनियों के माध्यम से युवाओं को नयी चेतना, नयी प्रेरणा देने के लिए। 

(लेखिका जेएनयू में सहायक प्राध्यापक हैं)