भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण एवं प्रसार का समय

    दिनांक 13-जुलाई-2020   
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गत दिनों इन्द्रप्रस्थ अध्ययन केन्द्र, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी "भारत मंथन-2" का समापन समारोह वेबिनार के माध्यम से किया गया। संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय संस्कृति एवं चिंतन से जुड़े विषयों जैसे पर चर्चा और मान बिंदुओं के संरक्षण पर बल देना था। इस दौरान विभिन्न बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों, शोध-छात्रों एवं अन्य प्रबुद्ध जनों द्वारा शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।

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गत दिनों इन्द्रप्रस्थ अध्ययन केन्द्र, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी "भारत मंथन-2" का समापन समारोह वेबिनार के माध्यम से किया गया। समापन सत्र की अध्यक्षता हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने की। इस सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में गुजरात तकनीकी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह बौद्धिक शिक्षण प्रमुख श्री सुनील भाई मेहता ने विचार रखे। संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय द्वारा सभी प्रतिभागियों, वक्ताओं एवं इस कार्यक्रम को सफल बनाने वाले कार्यकर्ताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया गया।

श्री विनोद शर्मा 'विवेक' ने इन्द्रप्रस्थ अध्ययन केन्द्र का परिचय दिया एवं इसकी संगठनात्मक एवं कार्यपद्धति के स्वरूप एवं संरचना को समझाया। इसी क्रम में उन्होंने बताया कि इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र समाज का एक ऐसा मंच है जिसमे सामाजिक सरोकारों के प्रति संवेदनशील हर वर्ग और व्यवसाय के बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, प्रशासक, शोध-छात्र, व्यावसायिक, श्रमिक आदि व्यापक समाज की सोच से सीधे-सीधे जुड़ने वाले बिन्दुओं को अध्ययन और चिंतन का विषय बनाया जाता है| संगोष्ठी के समापन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर क्षेत्र के बौद्धिक शिक्षण प्रमुख  एवं मुख्य वक्ता श्री अजय द्वारा ई-शोध पत्रिका (इंद्रप्रस्थ शोध संदर्श) का विमोचन किया गया।  चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के प्राध्यापक श्री राजेंद्र पांडेय ने ई-शोध पत्रिका (इंद्रप्रस्थ शोध संदर्श) की प्रस्तावना दी एवं इस पत्रिका के महत्व को समझाया। यह पत्रिका सारगर्भित शोध पत्रों,अंतर्दृष्टि एवं पुस्तक समीक्षा जैसे विभिन्न विषयों का प्रस्तुतीकरण करेगी।

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प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने आहृवान किया कि भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण एवं प्रसार का समय आ गया है और इस संबंध में यह संगोष्ठी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र का तीसरा चरण भारत मंथन से भी जो अमृत निकलेगा वह भारतीयता, राष्ट्रीयता का परिचय देते हुए सभी को एक नई ऊर्जा प्रदान करेगा। यह उस आत्मभाव और आंतरिक भावना का स्पंदन कराएगा जिस भावना को बचाते हुए महाराणा प्रताप तथा गुरु गोविंद सिंह जी के बच्चों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया। कार्यक्रम में उपस्थित श्री सुनील भाई मेहता ने कहा कि भारत के मान बिंदु क्या हैं, उनका संश्लेषण कैसे किया जाए और संरक्षण किस दिशा में हो। भगवान श्री राम तथा भगवान श्री कृष्ण जैसे महान आदर्श पुरुषों का उल्लेख करते हुए समझाया कि किस प्रकार भगवान श्री राम ने सारे कष्टों को सहते हुए मर्यादा को सर्वोच्च स्थान देते हुए वनवास पूरा किया। उसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए कष्ट सहते हुए संघर्ष किया और महाभारत के युद्ध में स्वयं लड़ने की बजाय शस्त्र नहीं उठाने का संकल्प लिया और धर्म की स्थापना की। इसीलिए इस गौरवशाली भूमि को हम राम-कृष्ण की भूमि की संज्ञा देते हैं ।


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उन्होंने कहा कि इसी भारतीय संस्कृति की परिवार व्यवस्था का विदेशों में शोध किया जाता है। हमारे यहां कुटुंब में रक्त संबंध होते हैं तथा परिवार में रक्त संबंध के साथ-साथ वह सारे संबंध जो सुख-दुख में हमेशा साथ देते हैं। यहां तक पशु, पक्षी को भी समान स्थान दिया गया है। इस प्रकार की व्यवस्था दुनिया के लिए आश्चर्य वाली है। मार्गरेट थैचर ने एक बार कहा था की इंग्लैंड में क्राइम रेट बढ़ रहा है क्योंकि "सिंगल पैरंट सिस्टम" वहां पर प्रचलित है। हमारी संस्कृति में गाय एवं नदी को भी माता माना जाता है तथा मंदिर एवं अन्य धार्मिक स्थल स्वयं संस्कृति के 'मानबिंदु' हैं। इन मान बिंदुओं की रक्षा के लिए जनमानस ने निरंतर संघर्ष तथा बलिदान दिया है। विदेशी आक्रांताओं द्वारा इन मान बिंदुओं का खंडन किया गया।

अतः आज की आवश्यकता है कि इन मान बिंदुओं को समझकर इनका पुनर्स्थापन एवं संरक्षण किया जाए। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर उन्होंने कहा कि विदेशी शासन के बाद भी भारत में गुरु और संत परंपरा समाप्त नहीं हुई और इसी के माध्यम से इन मान बिंदुओं को हम संरक्षित कर सकते हैं।

दरअसल संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय संस्कृति एवं चिंतन से जुड़े विषयों जैसे नारी सशक्तिकरण की दशा और दिशा, भारतीय जीवन शैली, पर्यावरण समस्या:, सनातन दृष्टि और समाधान, परिवार संकल्पना एवं भारत की पहचान के मान बिंदुओं के संरक्षण पर बल देना था। इस दौरान विभिन्न बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों, शोध-छात्रों एवं अन्य प्रबुद्ध जनों द्वारा शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। इस संगोष्ठी में भारत के विभिन्न प्रांतों से राष्ट्रहित में समर्पित 236 प्रतिभागियों ने भाग लिया।