चीन: अपने ही चक्रव्यूह में

    दिनांक 14-जुलाई-2020
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डॉ. अजय खेमरिया

चीन यह तो मानता है कि कुछ पड़ोसियों के साथ ही सही, उसका सीमा विवाद है। हालांकि सच्चाई इसके उलट है। लेकिन यह तय है कि चीन की विस्तारवादी नीति अब नहीं चलने वाली है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर उसके रास्ते में भारत सबसे बड़ी बाधा है। भारत ने न केवल दुनिया में चीन के विरुद्ध अपनी स्वीकार्यता स्थापित की है, बल्कि चीन की सीमा पर तेजी से आधारभूत संरचना के साथ अपनी सैन्य क्षमता का भी विस्तार किया है
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लेह का दौरा कर सेना, वायुसेना और आईटीबीपी के जवानों से बातचीत की और उनका हौसला बढ़ाया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस अंदाज में सरहद पर चीन को नसीहत दी है, उसके बहुआयामी निहितार्थ को समझने की आवश्यकता है। उनके कूटनीतिक संदेश का सबसे सरल और सुबोध निहितार्थ यह है कि भारत में नेहरूयुगीन सिद्धांत के दिन लद चुके हैं। नए मोदी युग का भारत सरहद पर आंख में आंख डालकर राजनयिक संबंध बनाने का सामर्थ्य अर्जित कर चुका है और जरूरत पड़ने पर वह घर में घुसकर भी दुश्मनों से हिसाब चुकता कर सकता है।

चीन जैसा विस्तारवादी देश अगर यह समझता है कि पूंजी और तानाशाही शासन व्यवस्था के बल पर वह दुनिया को जीत सकता है तो मोदी ने लेह में खड़े होकर विश्व बिरादरी को आगाह भी कर दिया कि भारत अब ‘सॉफ्ट स्टेट’ नहीं रहा। नया भारत अगर बुद्ध की करुणा और शांति का हामी है तो उसी बुद्ध की अहिंसा में अंतर्निहित निर्भीकता और साहस के अबलंबन पर अब उसका राजनय निर्धारित होने लगा है। प्रधानमंत्री मोदी के इस सुस्पष्ट उद्घोष को दुनिया ने भी समझने में देर नही की। चीनी राजदूत की त्वरित प्रतिक्रिया ने तो यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय प्रधानमंत्री के निशाने पर कौन है। असल में चीनी राजदूत ने 14 में से 12 पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण सीमा समाधान की बात कहकर इस बात की पुष्टि कर दी कि विस्तारवादी कौन है? हालांकि चीन के विस्तारवाद से 12 नहीं, बल्कि उसकी थल और जलीय सीमा से लगे 24 में से 23 देश आज परेशान हैं। चीन को लेकर हमें यह सुस्पष्ट धारणा बना लेनी चाहिए कि मौजूदा दौर में वह वामपंथी नाजीवाद का नया विस्तारवादी संस्करण है। सीधे सैन्य विस्तार की जगह वह आर्थिक और सीमा विवाद जैसे हथियारों के जरिए अपने नाजीवादी एजेंडे पर आगे बढ़ रहा है। गलवान घाटी विवाद को इसी व्यापक संदर्भ और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है। सवाल है कि जिस तरह जर्मन नाजीवाद के विरुद्ध दुनिया ने चौथे दशक में मोर्चा बनाया था, कमोबेश वैसी ही वैश्विक परिस्थिति आज निर्मित नहीं हो रही है? भारत ने पहली बार चीन के इस एजेंडे को चुनौती दी है, इससे वैश्विक परिदृश्य में उसकी घेराबंदी का नया विमर्श खड़ा हो गया है। यह सब कूटनीतिक मोर्चे पर ही संभव है और भारत इसे बहुत गहराई से समझता है। मौजूदा घटनाक्रम के बाद दुनिया ने पहली बार भारत की निर्भीक संप्रभुता को महसूस किया है।



चीन को आर्थिक झटके

  • भारत सरकार ने 3 अरब डॉलर की फूड डिलीवरी स्टार्टअप जोमैटो में ऐंट फाइनेंशियल को 150 मिलियन डॉलर में से आखिरी 100 मिलियन डॉलर यानी करीब 750 करोड़ रुपये के निवेश से रोक दिया है। ऐंट फाइनेंशियल चीनी कंपनी अलीबाबा समूह की
    सहयोगी है।
  • चीन के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के अनुसार, चीन के 59 ऐप पर प्रतिबंध लगाने के बाद केवल बाइटडांस को 6,000 करोड़ डॉलर यानी करीब 45,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। बाइटडांस, टिक-टॉक की सहयोगी कंपनी है।

  • हीरो साइकिल ने चीन से अगले तीन माह में किए जाने वाले 900 करोड़ रुपये का व्यापार रद्द कर दिया है। अब यह लुधियाना में साइकिल के पुर्जे बनाने वाली छोटी कंपनियों की मदद करने के साथ उन्हें विलय का प्रस्ताव भी दे रही है।

  • जेएसडब्ल्यू समूह की सहयोगी कंपनी जेएसडब्ल्यू सीमेंट चीन से सालाना होने वाले 3,000 करोड़ रुपये के आयात को अगले दो साल में खत्म कर देगी।

  • महाराष्ट्र सरकार ने चीनी कंपनियों के साथ हुए 5,000 करोड़ रुपये के तीन करार को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। इन समझौतों पर हाल ही में ‘मैग्नेटिक महाराष्ट्र 2.0 इन्वेस्टर समिट’ के दौरान हस्ताक्षर किए गए थे।

  • रेलवे ने करीब 471 करोड़ रुपये का चीनी कंपनी का ठेका रद्द किया है। बीजिंग नेशनल रेलवे रिसर्च एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट को कानपुर और मुगलसराय के बीच 417 किलोमीटर लंबे खंड पर सिग्नल और दूरसंचार का काम करना था। साथ ही, रेलवे ने 800 कृत्रिम बुद्धिमता आधारित निगरानी कैमरे की खरीद के लिए जारी निविदा को भी रद्द कर दिया है। इससे चीन की कंपनी हिकविजन को फायदा हो सकता था।

  • बीएसएनएल और एमटीएनएल 4ॠ अद्यतन में चीनी उपकरण का इस्तेमाल नहीं करेगा। बीएसएनएल ने 23 मार्च 2020 को जारी टेंडर वापस भी ले लिया है।

  • उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉपोर्रेशन ने तकनीकी खामियों के चलते कानपुर, आगरा मेट्रो के लिए चीनी कंपनी के ठेका रद्द कर दिया है।

  • केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के अनुसार, हाइवे परियोजनाओं में भी चीनी कंपनियों को प्रतिबंधित किया जाएगा। इसके अलावा एमएसएमई क्षेत्र में आने वाले निवेश पर भी नजर रखी जाएगी। अगर वर्तमान में कोई चीनी कंपनी संयुक्त उपक्रम में हाइवे परियोजना से जुड़ी होगी तो निविदा रद्द किया जाएगा।



लेह में अग्रिम मोर्चे पर खड़े होकर अपने सैनिकों का उत्साहवर्द्धन करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने जिस लहजे में भारत की भूमिका को रेखांकित किया है, उसके निहितार्थ दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ हैं। यानी मोदीयुग का भारत राष्ट्रीय हितों और सीमाई संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करने वाला है। वह आर्थिक मोर्चे पर भी अब किसी मजबूरी का अबलंबन नहीं करेगा। 2014 के बाद मोदी सरकार ने एक तरफ पाकिस्तान को सैन्य ताकत से घेरने की रणनीति पर काम किया है, वहीं चीन के विस्तारवाद के विरुद्ध न केवल वैश्विक स्तर पर अपनी स्वीकार्यता स्थापित की, बल्कि सीमा पर तेजी से सामरिक महत्व की आधारभूत सरंचनाएं तैयार कर अपनी सैन्य क्षमताओं का भी विस्तार किया है। 2014 के बाद भारत ने बहुमोर्चों पर जो काम किया, जिससे चीन के विस्तारवादी एजेंडे को रोकने में मदद मिली है। चीन नहीं चाहता है कि एशिया में उसके अलावा कोई अन्य देश शक्ति केंद्र के रूप में उसकी नीतियों को प्रभावित करे। इसलिए हमें भारत के प्रति उसकी सोच और नजरिए को भी समझना चाहिए। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने अपनी किताब में लिखा है कि चीन, भारत को ‘केंकड़े के एक पंजे’ के रूप में देखता है। उसकी दृष्टि में केंकड़ा कोई और नहीं, अमेरिका है जिसका एकमात्र उद्देश्य चीन को घेरकर उस पर दबदबा बनाना है। इस उद्देश्य के लिए वह अपने पंजों- जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, वियतनाम, आॅस्ट्रेलिया और भारत का प्रयोग करता है। यह निष्कर्ष चीनी थिंक टैंक का है, जो उसकी विस्तारवादी मानसिकता को छिपाने का प्रोपेगैंडा मात्र है।

भारत की पूर्ववर्ती सरकारें चीन की विस्तारवादी नीतियों पर मूकदर्शक बनी रहीं। 1962 के बाद तो यह भारतीय शासन और राजनीति की स्थाई नीति बन चुकी थी कि भारत को चीन के सीमावर्ती इलाकों में बुनियादी विकास इसलिए नहीं करना है, क्योंकि ऐसा करने से चीन सीमा रेखा लांघकर सीधे भारत में घुस सकता है। लेकिन मोदी सरकार ने इस नीति के उलट सीमांत इलाकों में विकास कार्यक्रम (बीएडीपी) को मंजूरी देकर लेह, लद्दाख और समूचे पूर्वोत्तर में मजबूत आधारभूत ढांचा खड़ा कर लिया है। पूर्वोत्तर में 'वर्तक', 'अरुणांक', ‘ब्राह्मक’ और ‘उड़यक’ नाम की चार विकास परियोजनाओं पर तेजी से काम चल रहा है। अरुणाचल के जिस तवांग शहर को चीन अपना बताता है, वहां तक रेलवे लाइन, सड़क नेटवर्क के अलावा सुरंग बनाकर पहुंच सुगम बना दिया गया है। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सीसेरी पुल का उद्घाटन किया है। सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ यह ‘ट्रांस अरुणाचल हाइवे' का हिस्सा है। इसके अलावा नाथुला दर्रा, जहां पिछले साल भारत-चीन सेना के बीच झड़प हुई थी, वहां भी दुनिया की सबसे ऊंची सड़क बनाकर भारत ने टैंक और बख्तरबंद गाड़ियों के साथ सेना को तैनात कर दिया है। 2006 में तत्कालीन विदेश सचिव ने इस इलाके में सामरिक महत्व वाले विकास का एक खाका तैयार किया था, लेकिन यह योजना ठंडे बस्ते में पड़ी रही। 2014 के बाद मोदी सरकार ने इसे धरातल पर उतारने में पूरी ताकत लगा दी। चीन से सटी सीमाओं पर सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के सड़क, रेल, सुरंग और डिजिटल विकास से चीन हतप्रभ है। यही नहीं, बीआरओ ने चीन से सटी सामरिक महत्व की 73 में से 60 सड़कें रिकॉर्ड समय में बनाकर सभी सामरिक ठिकानों तक भारतीय सेना की पहुंच को सुगम बना दिया है। लोकसभा में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके अंटोनी ने माना था कि चीन से सटे सीमावर्ती इलाकों में आधारभूत ढांचा विकास नीतिगत कारणों के चलते ही नहीं किया जा रहा है। लेकिन इसके उलट मोदी सरकार ने सीमाई परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया है।


दुनिया पड़ी चीन के पीछे
    • भारत के बाद अमेरिका भी टिक-टॉक सहित तमाम चीनी सोशल मीडिया ऐप को प्रतिबंधित करने का मन बना चुका है।

    • अमेरिकी सीनेट इस साल मई में ही अलीबाबा और बायडू इंक सहित कम से कम 800 चीनी कंपनियों को प्रतिबंधित कर चुका है।

    • चीन की सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी हुआवे-जेडटीई को ‘आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा’ बताते हुए अमेरिका ने इसे भी प्रतिबंधित कर दिया है, जिससे कंपनी को 8.3 अरब डॉलर का नुकसान होने की आशंका है। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी से भी चीनी दूरसंचार कंपनी को आर्थिक चोट पड़ रही है।

    • चीन अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी घिरता जा रहा है। भारत के साथ जापान, आॅस्ट्रेलिया, ताइवान और अमेरिका खुलकर चीन के खिलाफ हैं।




चीन का चाणक्य कहे जाने वाले जनरल सुन जू ने 2500 साल पहले ‘द आर्ट आॅफ वार’ पुस्तक में लिखा है कि ‘जंग की सबसे बेहतरीन कला यह है कि दुश्मन को बगैर लड़े ही पस्त कर दिया जाए।’ चीनी शासक इसी मंत्र के जरिए अपने पड़ोसियों को कब्जे में लेने के अभ्यस्त हैं। 24 में से 23 पड़ोसियों के साथ चीन का विवाद असल में बगैर सैन्य लड़ाई के शिकस्त देने की स्थायी नीति का प्रमाण है। भारत का दुर्भाग्य यह रहा कि यहां देश का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व चीन की इस कुटिलता का मुकाबला करने के स्थान पर ‘बचो-हटो’ की नीति पर अबलंबित रहा। लेकिन अब हालात तेजी से बदले हैं और भारत ने चीन की इस भयादोहित करने वाली नीति का पराक्रम के साथ जबाब देना आरम्भ कर दिया है। लेह में बुद्ध और कृष्ण के उदाहरण के जरिए मोदी ने जिस भारतीय दर्शन को अभिव्यक्त किया है, वह केवल बयान भर नहीं है। यह 6 वर्षों में 360 डिग्री से बदली शासन व्यवस्था और अग्रिम मोर्चों पर समानान्तर सैन्य तैयारी की नीति का निर्भीक ऐलान भी था। मोदी सरकार के कटु आलोचक और पूर्व थल सेना प्रमुख बीपी मलिक भी मानते हैं कि चीन की आक्रमकता का कारण सीमावर्ती इलाकों में भारत द्वारा खड़ा किया गया सड़कों का जाल ही है। लद्दाख में श्योक नदी से दौलत बेग ओल्डी तक 255 किलोमीटर तक सड़क निर्माण चीन के लिए किसी सदमे से कम नहीं है। सड़कों की सुगमता के कारण आज पूर्वोतर में तोप, टैंक, हथियारों और अन्य साजो-सामान से लैस सेना अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में तैनात है। पहले इन इलाकों में इन्फेंट्री की चौकसी रहती थी, लेकिन अब बख्तरबंद गाड़ियों के साथ सेना सुरक्षा में लगी रहती है।

इसी तरह डोकलाम विवाद के बाद अग्रिम मोर्चों पर इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप को तैनात किया गया है, जो हेलीकॉप्टर से लेकर सभी सैन्य उपकरणों के साथ बाकायदा आपूर्ति शृंखला के साथ न केवल पेट्रोलिंग करते हैं, बल्कि दुश्मन का मुकाबला भी कर सकते हैं। पूर्व सेनाध्यक्ष बीपी मलिक के अनुसार, चीनी फौज क्रीपिंग यानी रेंगते हुए भारतीय क्षेत्रों पर कब्जा करती रही, क्योंकि हमारी गश्ती टुकड़ियां दुर्गम इलाकों में अक्सर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर नहीं पहुंच पाती थीं। लेकिन बीते पांच वर्षों में बख्तरबंद गाड़ियों से पट्रोलिंग संभव हुई है। भारत ने चीन से निपटने के लिए बंगाल में माउंटेन स्ट्राइक कोर विकसित कर लिया है, जो आपात स्थिति में चीन के हवाई हमलों का जवाब दे सकता है। जाहिर है भारत ने चीन को युद्ध में हराने की जगह बिना लड़े जीतने के उसी मंत्र को अपना कर विस्तारवाद और वामपंथी नाजीवाद की कमर तोड़ दी है। विस्तारवाद के विरुद्ध प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास से भरा भाषण ठोस सामरिक ताकत और तैयारी की अभिव्यक्ति ही था।

... बाकी कसर भी पूरी

चीन द्वारा हांगकांग के लिए विवादास्पद राष्ट्रीय सुरक्षा कानून पारित करने के बाद चीन गहरी मुसीबत में फंस गया है। दुनिया के 27 देश चीन के इस फैसले के खिलाफ खड़े हो गए हैं। इन देशों ने नए सुरक्षा कानून पर गहरी चिंता जताते हुए एक संयुक्त बयान जारी कर कहा कि हांगकांग के लोगों, विधायिका या न्यायपालिका की प्रत्यक्ष भागीदारी के बिना कानून को लागू करना, हांगकांग को स्वायत्तता, अधिकार और स्वतंत्रता की गारंटी देते हुए 'एक देश, दो प्रणाली' सिद्धांत को कमजोर बनाता है। हम चीनी और हांगकांग सरकारों से इस कानून के लागू करने पर पुनर्विचार करने की अपील करते हैं और हांगकांग के लोगों, संस्थानों और न्यायपालिका को अधिकारों और स्वतंत्रता का क्षरण रोकने के लिए एकजुट होने का आग्रह करते हैं। इस बयान पर आॅस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, स्वीडन आदि सहित यूरोपीय संघ के 15 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। उधर, जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और जापान ने मांग उठाई कि चीन को संयुक्त राष्ट्र अधिकार प्रमुख को अपने पश्चिमी शिनजियांग प्रांत में पहुंच की अनुमति देनी चाहिए।



इसी साल 17 अप्रैल को मोदी सरकार ने उन देशों के लिए विदेशी निवेश (एफडीआई) कानून को कड़ा कर दिया है, जिनकी सीमाएं भारत से लगती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर चीन पर ही पड़ा है। आत्मनिर्भर भारत अभियान असल में भारत की दीर्धकालिक आर्थिक नीति की बुनियाद है। 59 चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध और खुद प्रधानमंत्री द्वारा वीवो ऐप हटाने का प्रतीकात्मक महत्व है। डिजिटल स्ट्राइक की इस कारवाई के बाद दुनिया के अनेक देशों में चीनी ऐप्स के विरुद्ध आवाजें उठने लगी हैं। यह तथ्य है कि भारत और चीन के व्यापारिक रिश्ते झटके में समाप्त नहीं किए जा सकते, लेकिन यह भी सच है कि अगर भारत अपनी क्षमता और योग्यता का अधिकतम दोहन अपने बलबूते करना सुनिश्चित कर ले तो चीन के आर्थिक साम्राज्यवाद को भी खत्म कर सकता है। 1982 तक चीनी नागरिकों की आमदनी भारत से आधी थी, लेकिन तानाशाही व्यवस्था के बल पर अर्जित आर्थिक उन्नति ने आज भारत को उसने काफी पीछे छोड़ दिया है। दुनिया का ऐसा कोई कोना नहीं, जहां चीनी निवेश नहीं पहुंचा हों। चीन दुनिया के कच्चे माल को डंप कर लेना चाहता है और बदले में अपने उत्पादन क्लस्टर के जरिए स्थानीय प्रतिस्पर्धा को निगल जाता है। मसलन, भारत से वह 16 अरब डॉलर का कच्चा माल आयात करता है और बदले में 68 अरब डॉलर का निर्यात करता है। भारत के दूरसंचार बाजार में उसकी भागीदारी 51 प्रतिशत है। सरकार इस परिदृश्य को भी बदलने का बुनियादी आधार तैयार करने में जुटी है।

संभव है चीन सीमा पर तनाव बढ़ाने वाली घटनाओं में इजाफा करे, लेकिन राष्ट्रपति शी जिनपिंग सीधी सैन्य लड़ाई की मूर्खता कभी नहीं करेंगे, क्योंकि कोरोना वायरस के फैलाव को लेकर चीन अभी वैश्विक अलगाव की ओर उन्मुख है और उसकी आर्थिक स्थिति भी वुहान के पाप से कमजोर हो गई है। भारत ने चीन को लेकर जो रुख अपनाया है, वह उसके नाजीवादी विस्तारवाद के विरुद्ध विश्व जनमत को सचेत और सक्रिय करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। जमीन को लेकर चीन कभी भी भारत से सीधी लड़ाई नहीं लड़ेगा। उसका थिंक टैंक इसे बखूबी जानता है कि मोदी निर्णय लेने में बहुत चतुर हैं। संयोग से उन्हें जनमत भी हासिल है। भारत में चीन के एजेंट अब अपनी जड़ों से उखड़ चुके हैं। ऐसे में उसके पास अपने आर्थिक हितों को बचाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।