चीन की विस्तारवादी नीति और वामपंथ की चुप्पी

    दिनांक 14-जुलाई-2020
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डॉ. रूपेश कुमार शुक्ल

भारत के वामपंथी दलों की प्रतिबद्धता भारत के साथ न होकर चीन के साथ है। यहाँ मामला सिर्फ ‘आत्मीयता’ तक सीमित नहीं है। चाहे डोकलाम विवाद हो या गलवान-पैंगोंग विवाद, एक निरंतर चुप्पी समूचे वामपंथी खेमे में दिखाई देती है।
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इस शीर्षक का चुनाव करते समय मन में यह दुविधा थी कि वामपंथ के पहले ‘भारतीय’ लिखा जाए या नहीं, क्योंकि यहाँ संदर्भ भारत की वामपंथी पार्टियों का है। प्रश्न यह है कि जैसे रूस में लेनिन-स्टालिन से लेकर पुतिन तक वामपंथ का अपना सोवियत संस्करण है, चीन में माओ से लेकर जिनपिंग तक वामपंथ का चीनी संस्करण है, वैसे ही क्या भारत में वामपंथ का कोई भारतीय संस्करण है? अगर आप भारतीय वामपंथ के इतिहास को ध्यान से देखें तो इसका जवाब ‘नहीं’ में मिलेगा। भारत में वामपंथ आरंभ से ही न सिर्फ रूस और चीन का पिछलग्गू रहा है, बल्कि अपनी मान्यता के लिए भी तीनों पार्टियाँ (भाकपा, माकपा और मा-ले) उन देशों के सत्ता-केन्द्रों पर निर्भर रही हैं। सन् 1964 में जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ और माकपा का जन्म हुआ तो चीन ने इस नयी पार्टी के गठन का स्वागत करते हुए इसे मान्यता दी और वहाँ के सरकारी अखबार ‘पीपुल्स डेली’ ने इस पार्टी का कार्यक्रम विस्तार से प्रकाशित किया। इस मान्यता से माकपा के नेतृत्व में अभूतपूर्व उत्साह था, इसे वे अपनी एक बड़ी जीत और भाकपा पर एक बड़ी बढ़त के रूप में देख रहे थे। यह आश्चर्यजनक है कि भारत में गठित इस दल को भारतीय जनमानस की मान्यता की जगह चीनी सत्ता द्वारा प्रदत्त मान्यता में इतनी दिलचस्पी थी! उस दौर में भाकपा और माकपा क्रमशः ‘मास्को समर्थक’ और ‘पीकिंग समर्थक’ पार्टियों के रूप में जानी जाती थीं और अपनी इस पहचान को लेकर शर्मिंदा होने की जगह ये गौरवान्वित रहते थे। इसी तरह जब 1969 में मा-ले का गठन हुआ तब भी चीन ने उसे न सिर्फ मान्यता दी बल्कि चारु मजूमदार को भारत के वाम कट्टरपंथी संगठनों के सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित करने में भी निर्णायक भूमिका का निर्वाह किया। नक्सल आंदोलन के अध्येताओं ने यह स्वीकार किया है कि आंदोलन और पार्टी (मा-ले) में चारु की यह सर्वोच्च स्थिति स्वाभाविक न होकर चीन द्वारा निर्मित थी (बांग्ला पत्रिका ‘स्फुलिंग’ के सन् 1974 के अंक में इस मुद्दे पर मजूमदार के साथी सरोज दत्त का बयान प्रकाशित है)। ऐसे में वामपंथ के आगे ‘भारतीय’ लिखना एक ऐतिहासिक भूल होगी।

जहाँ तक चीन की विस्तारवादी नीति का सवाल है, चीनी क्रांति के साथ इस राष्ट्र की नींव ही शांति और सह-अस्तित्व की जगह हिंसा और विस्तारवाद के सीमेंट से तैयार हुई। माओ एक हिंसक अतिवादी थे, जिनका मानना था कि सत्ता का रास्ता बंदूक की नली से होकर जाता है। अब आप लगभग उसी दौर में चल रहे भारतीय स्वाधीनता-संग्राम और उसके मूल्यों को देखें, आपको दोनों देशों की बुनियाद का निर्णायक अंतर साफ़ दिख जाएगा। माओ के लिए सत्ता अंतिम लक्ष्य है, गाँधी के लिए सत्ता का कोई मोल ही नहीं है। हिंसा पर अंतिम भरोसा तानाशाहों को जन्म देती है और उन्हें विस्तारवाद की ओर ले जाती है। विश्व का समूचा मध्यकालीन इतिहास इसका गवाह है। यही कारण है कि रूस और चीन जैसे देशों में लोकतन्त्र के लिए कोई स्पेस आज तक नहीं बन सका। तानाशाह जीवनपर्यंत शासन करना चाहता है, इसके लिए वह सम्पूर्ण नियंत्रण चाहता है, पहले अपने नागरिकों पर फिर उन तमाम स्थितियों पर, जिससे उसे कोई खतरा हो, भले ही वह खतरा आभासी ही क्यों न हो। नियंत्रण की इस प्रक्रिया में वह अपनी सीमा से लगते कमजोर देशों को अपना उपनिवेश बना लेता है और मजबूत देशों को दबाव में रखने के लिए निरंतर मोर्चा खोले रखता है। इससे उसके दो लक्ष्य सिद्ध होते हैं- पहला, वह अपना वैश्विक दबदबा कायम करता है और अन्य ताकतवर देशों को अपने आंतरिक मामलों से दूर रखता है। दूसरा, वह अपने नागरिकों के बीच यह भ्रम कायम रखता है कि वे एक सक्षम शासन में हैं और इस क्रम में वह सेंसरशिप और मानवाधिकार-हनन के बावजूद अपने नागरिकों के असंतोष को दबाए रखने में सफल हो जाता है। पिछले सात दशकों से चीन यही कर रहा है।

अब सवाल यह है कि चीन की इन विस्तारवादी नीतियों और उसके द्वारा साल-दर-साल वास्तविक नियंत्रण रेखा के अतिक्रमण को लेकर भारत के वामपंथी दलों की क्या राय है? भारत के वामपंथी दलों के लिए यह वैसे ही मामला है कि उन्हें उस आदमी के चरित्र पर टिप्पणी करनी पड़े जिससे वे खुद अपना चरित्र-प्रमाण-पत्र बनवाते हों। पिछले कुछ महीनों की मीडिया रिपोर्ट्स देखें तो स्थिति आपके सामने स्पष्ट हो जाएगी। भारत के तीनों वामपंथी दलों भाकपा, माकपा और मा-ले ने भारतीय सीमा के अतिक्रमण और हमारे बीस सैन्य-जवानों की बर्बर हत्या के लिए एक बार भी चीन की निंदा नहीं की। इन दलों का कोई बड़ा नेता गलवान में बलिदान हुए किसी सैनिक के परिवार से मिलने नहीं गया। इनमें से किसी ने भी भारतीय सेना के मनोबल को बढ़ाने वाली कोई बात नहीं कही। लेकिन इन्होंने एक काम बहुत मुस्तैदी से किया- चीन द्वारा भारतीय सीमा के अतिक्रमण के इस मुद्दे पर पिछले एक महीने में इन दलों ने पाँच-छह बार भारत सरकार से सवाल पूछे और भारत सरकार की विदेश-नीति को कोसा।

इसी बीच माकपा के सर्वोच्च नेता सीताराम येचुरी का एक इंटरव्यू वायरल हो रहा है। दिसम्बर 2019 में येचुरी ने यूट्यूब चैनल स्कूपव्हूप के समदिश भाटिया को यह इंटरव्यू दिया। निश्चित रूप से यह साक्षात्कार हालिया सीमा-विवाद से पहले का है, किन्तु इससे वामपंथी दलों की विचार-प्रणाली और चीन के प्रति इनके मोह को समझने में ज़रूर मदद मिलती है। अमेरीकी नेट्फ़्लिक्स के प्रशंसक येचुरी पिज़्ज़ा खाते हुए और मारिजुआना ज्वाईंट की चर्चा करते हुए चीन के प्रति अपनी ‘अफ़्फ़िनिटि’ को स्वीकारते हैं। चीन को एक सफल और महान देश बताते हुए वे कहते हैं कि हर वामपंथी को चीन से ‘आत्मीयता’ होनी ही चाहिए। उइगर मुसलमानों के ऑर्गन-हार्वेस्टिंग और चीन में मानवाधिकार-हनन के लगातार बढ़ते मामलों पर वे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रवक्ता की तरह जवाब देते हैं, लेकिन कश्मीर का सवाल आते ही इसे मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आज़ादी के हनन का ऐतिहासिक मामला बताने लगते हैं। हाँगकाँग में चीन के खिलाफ़ चल रहे जन-विद्रोह की जानकारी भी येचुरी को नहीं है, इससे जुड़े सवालों पर उनका जवाब है- “वे (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी) तो कहते हैं कि वहां ऐसा कुछ भी नहीं है।”

दरअसल इस ‘आत्मीयता’ की जड़ें भारत के वामपंथी दलों के भीतर बहुत गहरी हैं, जिससे आज की युवा-पीढ़ी अनभिज्ञ है। इसे समझने के लिए वामपंथी दलों के इतिहास को खंगालना पड़ेगा। खासतौर पर सातवें और आठवें दशक की भारतीय राजनीति को इस सिलसिले में देखना ज़रूरी है। सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय तत्कालीन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का एक अतिवादी गुट चीन के प्रति सहानुभूति रखता था। उन पर ये आरोप थे कि युद्ध के दौरान वे भारत-विरोधी गतिविधियों में संलिप्त थे। इस राष्ट्रद्रोह के कारण चारु मजूमदार, कानू सान्याल समेत दर्जनों वामपंथी नेताओं को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का यह कटृटरपंथी गुट खुद को उदारवादी संशोधनों के खिलाफ़ बताता था, लोकतान्त्रिक चुनाव-प्रणाली में अपनी अनास्था ज़ाहिर करता था और हिंसक संघर्ष को तख़्तापलट का एकमात्र रास्ता मानता था। यह जानना दिलचस्प है कि भारतीय चुनाव-प्रणाली में अनास्था ज़ाहिर करने वाले मजूमदार सन् 1963 में भाकपा के प्रत्याशी के रूप में सिलीगुड़ी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से एक उपचुनाव लड़ कर अपनी जमानत ज़ब्त करवा चुके थे। इससे यह शक पैदा होता है कि लोकतन्त्र में मजूमदार की यह अनास्था वैचारिक थी या प्रतिक्रियावादी (खिसियानी बिल्ली वाली)। सन् 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विघटन हुआ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का जन्म हुआ। चारु और कानू समेत तमाम कटृटरपंथी इस नई पार्टी में शामिल हो गए। प्रमुख मार्क्सवादी चिंतक और माकपा के पूर्व राज्यसभा सदस्य बिप्लब दासगुप्त ने अपनी पुस्तक ‘नक्सलवादी आंदोलन’ में लिखा है- “मजूमदार इस दौर में चीनी पार्टी के प्रति उग्र रूप से वफादार रहे। उन्होंने नई पार्टी की गतिविधियों के लिए अध्यक्ष माओ के विचारों को अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त बनाए जाने की वकालत की और एक बार तो भारतीय पार्टी को चीनी संगठन की एक शाखा घोषित करने की बात कहकर उन्होंने भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन को सांगठनिक स्तर पर चीनी पार्टी से जोड़ देने की हिमायत की थी” (नक्सलवादी आंदोलन, बिप्लब दासगुप्त, पृष्ठ संख्या- 04-05)। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि माकपा के गठन का उद्देश्य क्या था और इसके पीछे चीन की भूमिका क्या थी।

सन् 1967 में बंगाल चुनाव के बाद चौदह दलों का गठबंधन सत्ता में आया, जिसमें भाकपा और माकपा दोनों शामिल थीं। इस अवसर का लाभ उठाकर माकपा के मजूमदार गुट ने नक्सलबाड़ी में भारतीय लोकतन्त्र के खिलाफ़ सशस्त्र मोर्चा खोल दिया। इसी बीच चीन ने पूर्वोत्तर में नाथु-ला और चाओ-ला की भारतीय सीमा पर युद्ध शुरू कर दिया। क्या इन दोनों घटनाओं में कोई संबंध था? इसका जवाब भी आपको यहाँ मिल जाएगा। सशस्त्र नक्सलियों ने ग्रामीण इलाकों में भीषण लूटपाट शुरू कर दी। देहाती इलाकों में राष्ट्रीय प्रशासन, कानून तथा अदालत को ख़ारिज कर उन्होंने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। यह सब कुछ सत्ता में काबिज़ माकपा के राजनीतिक संरक्षण और चीन की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मदद से हो रहा था। जिस समय सभी भारतीय दलों को एकजुट होकर संघर्षरत भारतीय सेना के साथ खड़ा होना चाहिए था, उस समय एक बड़े राज्य की सत्ता पर काबिज़ दल चीन के साथ मिलकर भारत सरकार के तख़्तापलट की साजिश में शामिल था। नक्सलबाड़ी की खबरें चीन के सरकारी अखबारों और समाचार एजेंसियों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर लगातार प्रकाशित की जा रही थीं और अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारतीय लोकतन्त्र को बदनाम करने, भारत सरकार को अपनी ही जनता के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने का अपराधी साबित करने की साज़िश रची जा रही थी। ध्यान रखें कि इस समय तक चारु मजूमदार और कानू सान्याल दोनों माकपा के सदस्य थे। चीन के पीपुल्स डेली ने 5 जुलाई 1967 को ‘स्प्रिंग थंडर ब्रेक्स ओवर इंडिया’ शीर्षक से अपना संपादकीय प्रकाशित किया, जिसमें कहा गया –“दार्जिलिंग इलाके के किसानों के इस क्रांतिकारी तूफान का अभिनंदन चीनी जनता आनंद-विभोर होकर करती है। ...भारत की स्वाधीनता नाम मात्र की स्वाधीनता है। वास्तव में भारत एक अर्द्ध-सामंती, अर्द्ध-औपनिवेशिक देश से अधिक कुछ नहीं।...अंदरूनी तौर पर यह भारतीय जनता पर बेरहमी से जुल्म करता है और उसका खून चूसता है जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने पुराने हुक्मरान ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ-साथ अपने नए आका अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके पहले नंबर के सह-अपराधी सोवियत संशोधनवादी शासक गुट की सेवा करता है।

इस प्रकार यह बड़े पैमाने पर भारत के राष्ट्रीय हितों का सौदा करता है।...चीनी क्रांति के समान भारतीय क्रांति की खास विशेषता यह है कि सशस्त्र क्रांति सशस्त्र प्रतिक्रांति से लड़ रही है। सशस्त्र संघर्ष भारतीय क्रांति के लिए एकमात्र सही रास्ता है। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। ‘गांधीवाद’, ‘संसदीय मार्ग’ इत्यादि जैसा कूड़ा-करकट भारतीय शासक वर्गों द्वारा भारतीय जनता को निकम्मा बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली अफ़ीम है।” नक्सल हिंसा के बारे में यह था चीन का प्रोपेगंडा, जिसे वह विश्व भर में प्रसारित कर रहा था। इतना ही नहीं, पीपुल्स डेली के इस संपादकीय में इस हिंसक आंदोलन का पूरा ब्लू-प्रिंट भी बताया गया है और यह निर्देश भी किया गया है कि माओ के रास्ते पर चलकर कैसे चरणबद्ध तरीके से भारतीय लोकतन्त्र को हराया जा सकता है। चारु मजूमदार द्वारा लाल आधार क्षेत्रों के निर्माण, उनके द्वारा चलाये गए सफाया अभियान, जिसमें वर्ग-दुश्मन की हत्या एकमात्र लक्ष्य था, (इससे सम्बद्ध चारु के आलेख को ‘मर्डर-मैनुअल’ की संज्ञा दी गयी है) आदि में हम वह चीनी ब्लू-प्रिंट देख सकते हैं। मजूमदार ने यह घोषणा की – “भारत में क्रांति आंदोलन का नेतृत्व अंतर्राष्ट्रीय नेतृत्व (चीनी की कम्युनिस्ट पार्टी) के मातहत रहेगा। छापामारों को अध्यक्ष माओ के विचारों का अध्ययन करने और भारतीय किसानों में उनका प्रचार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा” (नक्सलवादी आंदोलन, बिप्लब दासगुप्त, पृष्ठ संख्या- 40)।

इससे भी आगे बढ़कर चारु ने यह नारा दिया कि “चीन के चेयरमैन हमारे भी चेयरमैन हैं।” चीन की सरकारी मीडिया ने चारु मजूमदार के आलेखों को प्रमुखता से प्रकाशित किया, साथ ही पीकिंग रिव्यू, पीपुल्स डेली और चीन की शिंहुआ समाचार एजेंसी ने इस हिंसक संघर्ष को जन-क्रांति का दर्जा देते हुए इस पर दर्जनों रिपोर्ट्स प्रकाशित-प्रसारित कीं। जुलाई 1967 से लेकर फरवरी 1968 के बीच शिंहुआ समाचार एजेंसी द्वारा इस मुद्दे पर प्रकाशित कुछ खबरों के शीर्षक इस प्रकार थे- ‘भारतीय जनता रोटी के लिए लड़ती है’, ‘भारतीय किसान उठ खड़े हुए हैं’, ‘ग्रामीण भारत में सामंती व्यवस्था केवल सशस्त्र क्रांति द्वारा विनष्ट की जा सकती है’, ‘भारतीय क्रांति अध्यक्ष माओ द्वारा प्रदर्शित उज्जवल पथ पर अग्रसर हो रही है’, ‘संसदीय मार्ग का लगातार दिवाला पिट रहा है’, ‘भारतीय जनता अध्यक्ष माओ से प्यार करती है’ आदि। ये शीर्षक पर्याप्त हैं यह बताने के लिए कि इस तथाकथित किसान आंदोलन को भड़काने और संचालित करने कि प्रक्रिया में विस्तारवादी चीन किस हद तक शामिल था।

इस तथ्यपरक विश्लेषण से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान चीन ने न सिर्फ भारत के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप किया बल्कि उसने यहाँ के वाम कटृटरपंथियों के साथ मिलकर गृहयुद्ध की स्थिति पैदा करने और भारत को तोड़ने की गंभीर साजिश की। भारतीय जनमानस के बीच अभी इस तथ्य का आना बाकी है कि नक्सलियों के पास इतनी भारी मात्रा में गोला-बारूद और आधुनिक हथियार कहाँ से आए ? नक्सल आतंक में चीन की भूमिका और यहाँ के वामपंथियों के साथ उसका गठजोड़ कोई रहस्य नहीं है। भारत के वामपंथियों का एक बड़ा गुट हमेशा से चीन के निर्णायक प्रभाव में रहा है और वहाँ से मिलने वाले निर्देशों के अनुरूप यहाँ देश-विरोधी गतिविधियाँ चलाता रहा है।

सशस्त्र संघर्ष की असफलता के बाद इस गुट ने पिछले पाँच दशकों में विश्वविद्यालयों के युवा-मस्तिष्क को अपहृत करने की कोशिश की है। युवा पीढ़ी को गुमराह करने, उनके भीतर भारत-विरोधी विचार को पैदा करने और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के प्रति एक ग्लानि-भाव उत्पन्न करने का काम किया है। इससे सम्बद्ध एक महत्वपूर्ण प्रसंग नक्सल-हिंसा के दौरान ‘बुत तोड़ो अभियान’ का है। भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति युवाओं के मन मे घृणा पैदा करने के अभियान के तहत नक्सलियों ने 19वीं सदी के पुनर्जागरण के प्रमुख चिंतकों और समाज-सुधारकों की प्रतिमाएँ नष्ट कर दीं या उनके मुँह कर कालिख पोत दी।  प्रमुख भारतीय नेताओं के साथ-साथ रवीन्द्रनाथ ठाकुर, ईश्वरचंद्र विद्यासागर,स्वामी विवेकानंद, आशुतोष मुखर्जी, राममोहन राय आदि की प्रतिमाएँ बड़े पैमाने पर तोड़ी गयीं। वाम कटृटरपंथियों का यह ‘बुत तोड़ो अभियान’ आज भी चल रहा है, फर्क यह है कि आज प्रतिमाएँ सड़कों और मैदानों में नहीं टूट रहीं, विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के मन-मस्तिष्क में टूट रही हैं। 

यह बहुत स्पष्ट है कि भारत के वामपंथी दलों की प्रतिबद्धता भारत के साथ न होकर चीन के साथ है। यहाँ मामला सिर्फ ‘आत्मीयता’ तक सीमित नहीं है। चाहे डोकलाम विवाद हो या गलवान-पैंगोंग विवाद, एक निरंतर चुप्पी समूचे वामपंथी खेमे में दिखाई देती है। वामपंथी तथाकथित बुद्धिजीवी, जिन्हें अपनी वैज्ञानिक सोच और तर्क-क्षमता पर अहंकारनुमा गर्व रहता है, वे भी चीन से जुड़े हुए मुद्दों पर खामोश रहना ही पसंद करते हैं। विश्व-मानव व वैश्विक नागरिक की बात करने वाले और राष्ट्रवाद को प्रतिक्रियादी बुर्जुआ विचार मानने वाले इन बुद्धिजीवियों की विचार-परिधि में अपने लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लड़ते हाँगकाँग के नागरिक नहीं आते। ताइवान को लाल झंडे में लपेटने की चीनी साजिश उन्हें दिखाई नहीं देती। दक्षिण चीन सागर में चीन की विस्तारवादी कोशिशें उन्हें बेचैन नहीं करतीं। पाकिस्तान और नेपाल का क्रमशः चीनी उपनिवेश में बदलते जाना उन्हें परेशान नहीं करता। तिब्बत, जिसके साथ हमारा हजारों वर्ष पुराना सांस्कृतिक रिश्ता है, उस पर चीन के गैरकानूनी कब्ज़े पर ‘हमें चाहिए आज़ादी’ का नारा लगाता कोई वामपंथी बुद्धिजीवी-नेता कहीं दिखाई नहीं देता। भारत में वामपंथ के इस चरित्र को देखकर आज फिर से चारु मजूमदार की वह बात याद आती है कि “भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को चीनी संगठन की एक शाखा घोषित कर देनी चाहिए।” वामपंथ की इस चुप्पी का कारण बहुत साफ है - स्वातंत्र्योत्तर भारत में वामपंथ सोवियत और चीनी छाँव में पला-बढ़ा। सोवियत संघ के विघटन के बाद चीन ऐसा इकलौता कम्युनिस्ट देश बचा है, जिसके पीछे चलकर भारत के वामपंथी नेता और बुद्धिजीवी अंतर्राष्ट्रीय पटल पर अपनी उपस्थिति बचाए रखने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं। राष्ट्रीय पटल पर वैसे भी अब उनकी न कोई उल्लेखनीय उपस्थिती बची है, न सार्थकता। भारत के वामपंथियों को अब यह स्वीकार लेना चाहिए कि इक्कीसवीं सदी की इस नई दुनिया में शासन के गैर लोकतान्त्रिक स्वरूपों और विस्तारवादी सोच के लिए जगह बहुत सिकुड़ गयी है। दुनिया का आखिरी आदमी भी अपने लिए एक लोकतन्त्र का पासपोर्ट चाहता है, जहाँ वह स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा के माहौल में विकास कर सके। प्रधानमंत्री ने अपने समय की नब्ज़ को ठीक पकड़ा है कि ‘यह विस्तारवाद का नहीं, विकासवाद का युग है।’ लोकतन्त्र, अंतर्राष्ट्रीय सह-अस्तित्व और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, इस विकास की पूर्व शर्त हैं।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ़ वोकेशनल स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)