ढहती चीनी अर्थव्यवस्था

    दिनांक 14-जुलाई-2020   
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चीन ने अपने ऋणजाल के षड्यंत्र में जिन देशों को फंसाया था, अब वे उससे ऋण माफ करने या किस्त की अदायगी के लिए 10 साल का समय मांग रहे हैं। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अब चीन को अपना पैसा वापस आसानी से नहीं मिलने वाला। इसका चीनी अर्थव्यवस्था पर दूरगामी असर पड़ना तया है

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 बीजिंग स्थित ‘पीपुल्स बैंक आॅफ चाइना’ का मुख्यालय। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि ऋण के डूबने की आशंका से इस बैंक के अधिकारी चिन्तित हैं


इन दिनों चीन की अर्थव्यवस्था अपने ही ऋणजाल के षड्यंत्र में उलझ गई है। विकासशील देशों को ऋण के प्रलोभन में अपनी ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना में सम्मिलित कर छद्म शर्तों पर दिए ऋण के बदले में उनकी भूमि व संसाधनों को हथिया  कर, आर्थिक उपनिवेश बनाने के षड्यंत्र में लिप्त चीन अब कोरोना संकट के चलते स्वयं ही दिवालियापन की ओर बढ़ रहा है। चीनी वायरस से फैली महामारी के कारण चीन की राजनयिक प्रतिष्ठा, अर्थव्यवस्था और उसकी अत्यंत महत्वाकांक्षी ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना गंभीर संकट में पड़ती दिखाई दे रही है।

चीन से अलग हो रहे हैं देश
अपने विशाल विदेशी मुद्रा भण्डार और वृहद् निर्माण कम्पनियों के सहारे विश्वभर में आधारभूत संरचनाओं के लिए ऊंची ब्याज दर पर अपारदर्शी शर्तों पर परियोजनाओं के निर्माण के बाद उन देशों की सम्पत्तियों को अधिग्रहीत कर आर्थिक उपनिवेश की स्थापना में लगे चीन से धीरे-धीरे अब अधिकांश देश अलग होते जा रहे हैं। ऋण के बदले में उसकी ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना में सम्मिलित लगभग 78 देशों में से कई देश अब कोरोना महामारी के कारण उस ऋण की अदायगी के योग्य ही नहीं रह गए हैं। इससे चीन के अरबों डॉलर के ये ऋण डूबने के कगार पर हैं। ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना, जिसे नया रेशम मार्ग कहा जा रहा है, एक ऐसी परियोजना है, जिसका उद्देश्य भौगोलिक, व्यापारिक एवं वित्तीय रूप से एशिया, यूरोप, अफ्रीका और ओशियानिया के अनेक  देशों को जोड़ना बताया जाता रहा है। इसमें सड़क, रेल मार्ग, सामुद्रिक मार्ग तीनों ही प्रकार के परिवहन की आधारभूत संरचनाओं का निर्माण सम्मिलित है। परियोजना में सम्मिलित देशों के साथ पारदर्शिता रहित अनुबंधों, अत्यन्त ऊंची व अव्यावहारिक ब्याज दरों, भ्रष्ट शासकों को आर्थिक प्रलोभन और ऋणग्राही देशों को बिना जानकारी दिए सीधे चीनी कम्पनियों को निर्माण कार्यों का ऊंची दरों पर किए भुगतान आदि के कारण अब वे देश उस ऋण को चुकाने की स्थिति में ही नहीं हैं। छलपूर्वक अपनी ही कम्पनियों को ऊंची लागत पर सीधे-सीधे छद्म रीति से भुगतान करते रहने से उन सरकारों को, पूरी निर्माण अवधि के दौरान भी यह पता नहीं होता था कि इस प्रकार के छद्म भुगतानों से चीन ने कितना ऋण उनके नाम चढ़ा दिया है। फिर उस छद्म ऋण को चुकाने में विफल रहने वाले देशों की उस सम्पूर्ण परियोजना व अन्य सम्पत्तियों को चीनी कम्पनियां हस्तगत कर लेती रही हैं। श्रीलंका के हंबनतोटा व अफ्रीका में जीबूती का बन्दरगाह, केन्या का मोम्बासा बन्दरगाह आदि ऐसे कई उदाहरण हैं। ऋण के बदले उन सम्पत्तियों व उस देश के अन्य संसाधनों को 99 वर्ष के पट्टे पर बलपूर्वक हथिया कर वहां अपने सैन्य अड्डे तक बना लिए हैं। चीन के इस ऋणजाल के चक्रव्यूह को समझ कर अब अधिकांश ऋणग्राही देशों ने उन ऋणों की अदायगी में असमर्थता बतानी आरंभ कर उस जाल को ध्वस्त करना आरंभ कर दिया है।


पाकिस्तान सहित अधिकांश ऋणग्राही देशों ने अब कोविड-19 महामारी के बाद चीन से लिए ऋणों के पुनर्भुगतान के लिए 10-10 वर्ष के अतिरिक्त समय की मांग कर दी है। चीन के पास इस मांग को स्वीकारने के अतिरिक्त और कोई विकल्प भी नहीं है। अब चीन द्वारा कई देशों को दिए ऋण शायद ही वापस हो पाएंगे।
 

ऋणों के डूबने का संशय
पाकिस्तान सहित अधिकांश ऋणग्राही देशों ने अब कोविड-19 महामारी के बाद चीन से लिए ऋणों के पुनर्भुगतान के लिए 10-10 वर्ष के अतिरिक्त समय की मांग कर दी है। चीन के पास इस मांग को स्वीकारने के अतिरिक्त और कोई विकल्प भी नहीं है। अब चीन द्वारा कई देशों को दिए ऋण शायद ही वापस हो पाएंगे। कई देश चीन के इस ऋणजाल के कुचक्रों की कार्य प्रणाली को समझ चुके हैं। गत दिनों केन्या में एक जनहित याचिका पर निर्णय करते हुए न्यायालय ने चीन द्वारा ऐसे ऋणजाल से बनाए एक रेल मार्ग के 3.2 अरब डॉलर (25,000 करोड़ रुपए) के अनुबंध को अवैध घोषित कर दिया है। अब चीन के ऋण से बनी परियोजनाओं पर ऐसे न्यायिक निर्णयों की सभी देशों में बाढ़ आ सकती है। पिछले वर्ष ही दो अफ्रीकी देशों- सियरा लियोन और तंजानिया ने भी ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना से स्वयं को अलग कर लिया था। 2018 में म्यांमार ने भी चीन के सहयोग से बनने वाले क्यायूकफ्यू बन्दरगाह परियोजना को अत्यन्त छोटा कर दिया था। इस बन्दरगाह को भी ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना के अधीन ही बनाया जाना था। मलेशिया में भी ‘ईस्ट कोस्ट रेल लिंक प्रोजेक्ट’ की लागत भी शुरू से दो तिहाई घटा दी गई थी। कम्बोडिया में तो चीन का भारी जनविरोध भी आरंभ हो गया है। दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के सबसे बड़े साझेदार देश की जनता को भय है कि कहीं कम्बोडिया चीन के अधीन न हो जाए। ‘काउंसिल फॉर द डिवेलपमेंट आॅफ कंबोडिया’ के मुताबिक, चीन ने 2016 में 3.6 अरब डॉलर का निवेश किया था, जो एक साल बाद दोगुना बढ़कर 6.3 अरब डॉलर हो गया। कम्बोडियाई सरकार ने कोह कोंग प्रांत को चीन की एक कम्पनी को 99 साल के पट्टे पर दिया, जो देश के कुल ‘कोस्टलाइन’ का 20 प्रतिशत है।

‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना पर ग्रहण
चीन के साझेदार देशों में बढ़ती जाग्रति, चीनी ऋणजाल के कुचक्र और वुहान वायरस के कारण उनमें आ रही आर्थिक गिरावट आदि से ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना पर भी ग्रहण लग सकता है। इसी कारण से परियोजना के सदस्य कई देश चीन को ऋण को चुकाने में देरी के लिए बाध्य कर रहे हैं। कई अफ्रीकी देश तो कर्ज-माफी की मांग कर रहे हैं। चीन ऐसे समय में, जब उसकी राजनयिक प्रतिष्ठा अपने न्यूनतम स्तर पर है, इन देशों की मांगों को खारिज नहीं कर सकता है। आज उसकी प्रतिष्ठा का स्तर थ्येनआनमन चौक की घटनाओं या तिब्बत पर कब्जा करने के समय से भी नीचे गिर चुका है। इसलिए बीजिंग ने लगभग 77 देशों के लिए ऋण पुनर्भुगतान स्थगित कर दिया है। इनमें से 40 तो अफ्रीकी देश हैं। अनुमान है कि 2019 में बीजिंग ने अमेरिका सहित विश्व के लगभग 150 देशों को 5 ट्रीलियन डॉलर का ऋण दिया है। इसका एक भाग लगभग डूब के कगार पर है या फिर देर से वापस होने की उम्मीद है।  2013 में ही चीन ने अपना निवेश और व्यापार बढ़ाने के लिए 3.87 ट्रिलियन डॉलर और 2,951 अंगभूत परियोजनाओं से युक्त ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना को प्रस्तावित किया था। इस परियोजना के अन्तर्गत ही विकास के नाम पर चीन ने अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया और यूरोप में अरबों डॉलर की कई परियोजनाओं को वित्तपोषित किया। अन्य देश विकास के नाम पर ऋण लेते गए और चीन देता गया। अब लगभग 20 प्रतिशत ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजनाएं  कोरोना महामारी से उपजे आर्थिक संकट के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हैं व 40 प्रतिशत परियोजनाएं न्यूनाधिक सीमा में प्रभावित हुई हैं। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के अनुसार इस परियोजना के लिए चीन ने विश्व के 150 देशों को 1.5 ट्रिलियन डॉलर (115 लाख करोड़ रुपए) का ऋण दे रखा है, जबकि विश्व बैंक व मुद्रा कोष द्वारा केवल 500 अरब डॉलर का ही ऋण दिया गया है। अमेरिका पर चीन के 1.04 ट्रिलियन डॉलर के ऋण सहित विश्व के सभी देशों में चीन की कुल बकाया उधारी लगभग 5 ट्रिलियन डॉलर (375 लाख करोड़) की है। यदि चीनी वायरस की क्षतिपूर्ति के बदले सभी देश सामूहिक निर्णय लेकर इस ऋण को चुकता घोषित कर दें तो चीन का दिवालिया होना अवश्यम्भावी है, जिसके लिए विश्व का जनमानस तैयार करना कठिन पर असंभव नहीं है। 

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पाकिस्तान स्थित ग्वादर बंदरगाह, जिसका विकास सीपैक के तहत किया जा रहा है, लेकिन पैसे की कमी से इसका काम रुका हुआ है। 

चीनी परियोजना का विकल्प
पाक अधिक्रांत कश्मीर से निकलने वाले चीन-पाक आर्थिक गलियारा भी इसी ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना का अंग होने से भारत ने तो आरंभ से ही इसमें हिस्सा लेने से स्पष्ट मना कर दिया है। मुम्बई से चाबहार के रास्ते उत्तरी यूरोप तक 13 देशों की भागीदारी वाली ‘अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर’ योजना इस चीनी परियोजना का बेहतर विकल्प ही नहीं उसका काट भी है। रेल, सड़क और समुद्री परिवहन वाले 7,200 किलोमीटर लंबे इस ‘अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर’ पर भारत, रूस और ईरान ने 2000 में सहमति बनाई थी। यह कॉरिडोर हिंद महासागर और फारस की खाड़ी को ईरान के जरिए कैस्पियन सागर से जोड़ेगा और फिर रूस से होते हुए उत्तरी यूरोप तक भारत की व्यापारिक पहुंच बनाएगा। इसके अन्तर्गत ईरान, अजरबैजान और रूस के रेल मार्ग भी भारत से जुड़ जाएंगे। इसी उत्तर दक्षिण कॉरिडोर योजना के अधीन ही भारत ईरान के चाबहार बन्दरगाह का विकास कर रहा है। चाबहार के रास्ते भारत कोरोना महामारी के दौरान अफगानिस्तान को खाद्यान्न व दवाइयों की पूर्ति कर सका है। 
उत्तर दक्षिण कॉरिडोर में 13 देश हैं। इनमें भारत, ईरान, रूस, टर्की, अजरबैजान, कजाकिस्तान, आर्मेनिया, बेलारूस, ताजिकिस्तान, किर्गिजिस्तान, ओमान, यूक्रेन व सीरिया सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं और बुल्गारिया पर्यवेक्षक की भूमिका में है। वर्तमान में मुंबई से मास्को या सेंटपीटरसबर्ग माल भेजने में 40-45 दिन का समय लगता है। अगर उसे इस उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर से भेजेंगे तो यह 25 दिन में पहुंच जाएगा। खर्च भी 40 प्रतिशत से कम आएगा जिससे हमारा व्यापार बढ़ेगा। यह कॉरिडोर हमारे व्यापार के साथ-साथ मध्य एशिया में हमारे रणनीतिक हितों के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत ने अफगानिस्तान में एक सड़क इसी श्रृंखला में बनाई है जिससे वहां की स्थिरता और शांति स्थापना में भी हम योगदान दे सकेंगे और यह कॉरिडोर सामरिक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण होगा।

चीन 1849 से 1949 की अवधि को चीनी इतिहास का एक शर्मनाक काला अध्याय मानता है। 1899 में तो उसे हांगकांग को भी 100 वर्ष के लिए इंग्लैण्ड को पट्टे पर देना पड़ा था। अब कोरोना वायरस के कारण हुई बदनामी और भारत से शत्रुतापूर्ण व्यवहार के बाद आने वाली गिरावट से चीनी इतिहास का 2020 से दूसरा शर्मनाक काला अध्याय आरंभ होगा।

‘ब्लू डॉट नेटवर्क’ की पहल  
कुछ समय पहले अमेरिका, जापान व आस्ट्रेलिया द्वारा प्रस्तावित ‘ब्लू डॉट नेटवर्क’ भी चीन की ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना का बहुत अच्छा अमेरिकी काट है। इस पर भारत ने भी अपनी रुचि दिखाई है। इसे नवंबर, 2019 में थाईलैंड में  इंडो-पैसिफिक बिजनेस फोरम में जापान, आस्ट्रेलिया व अमेरिका द्वारा शुरू किया गया था। भारत भी अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, जापान के साथ चार देशों के संयुक्त रणनीतिक समूह ‘क्वाड’ का पहले से ही सदस्य है।
विश्वभर में उच्च गुणवत्ता वाली आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाले, टिकाऊ और भरोसेमंद विकल्पों की पहुंच हो, इसलिए कई देश ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना के स्थान पर ‘ब्लू डॉट नेटवर्क’ के अधीन आधारभूत संरचनाओं के विकास को प्राथमिकता देंगे। भारत-अमेरिकी संयुक्त बयान के अनुसार, ‘‘ब्लू डॉट नेटवर्क एक बहु-हितधारक पहल होगी, जो वैश्विक आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए उच्च गुणवत्ता वाले विश्वसनीय मानकों को बढ़ावा देने के लिए सरकारों, निजी क्षेत्र और सिविल सोसाइटी को एक साथ लाएगा।’’ आज अमेरिकी बेस रेट (ब्याज दर) जो हमारी रेपो दर की तरह होती है, शून्य होने से चीन के 6.5-7 प्रतिशत ब्याज के स्थान पर इस योजना में वित्तीय लागत अत्यन्त कम होगी। ऋणजाल में फांसने वाली चीनी ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना के स्थान पर भारत का ‘अन्तराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण गलियारा योजना’ और ‘ब्लू डॉट नेटवर्क’ जैसी न्याययुक्त व पारदर्शी योजनाएं विश्व को बेहतर विकल्प देंगी।

भारत की समयोचित दृढ़ता
भारत ने हाल ही में गलवान घाटी की घटनाओं के बाद आवश्यक दृढ़ता दिखाते हुए दूरसंचार, निर्माण, रेल परियोजनाओं में और अन्य कई क्षेत्रों में चीनी कम्पनियों की भागीदारी पर जो रोक लगायी है उसका चीनी अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ेगा। अमेरिका द्वारा चीनी आयातों से लेकर, अमेरिकी शेयर बाजार में चीनी कम्पनियों के सूचीयन तक पर जो प्रतिबंध लगाए गए हैं और यूरोपीय देश जो चीन पर कई प्रतिबंध लगा रहे हैं उनके कारण चीन की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था का चरमराना स्वाभाविक है। चीन 1849 से 1949 की अवधि को चीनी इतिहास का एक शर्मनाक काला अध्याय मानता है। 1899 में तो उसे हांगकांग को भी 100 वर्ष के लिए इंग्लैण्ड को पट्टे पर देना पड़ा था। अब कोरोना वायरस के कारण हुई बदनामी और भारत से शत्रुतापूर्ण व्यवहार के बाद आने वाली गिरावट से चीनी इतिहास का 2020 से दूसरा शर्मनाक काला अध्याय आरंभ होगा। इसलिए अब भारत को भी ‘वन चाइना’ अर्थात् एकल समेकित चीन के स्थान पर ‘त्रिराष्ट्र युक्त चीन’ अर्थात् चीन, तिब्बत व ताईवान के प्रति तीन पृथक राष्ट्रों के रूप में व्यवहार की नीति पर चलना आरंभ कर देना चाहिए। कश्मीर व अरुणाचल के संबंध में चीन के व्यवहार को देखते हुए यही उसका सटीक उत्तर होगा। चीन की सामरिक क्षमताओं का आधार आर्थिक है। 2018 में भारत के आयात ही 90 अरब डॉलर (लगभग  7 लाख करोड़ रु.) के थे। अब आत्मनिर्भर भारत अभियान के फलस्वरूप घट कर  अत्यन्त न्यून रह जाएंगे। जापान, अमेरिका व यूरोप सहित अधिकांश देशों द्वारा आर्थिक बहिष्कार चीन को पराभव की ओर ले जाएगा। चीनी वस्तुओं के वैश्विक बहिष्कार से यह घटित होना अवश्यम्भावी है।  
  (पाञ्चजन्य के वेबिनार रेशम का फंदा -2 में दिया वक्तव्य)  (लेखक : गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति )