‘मानव निर्माण से राष्ट्र-निर्माण’ की पद्धति का पालन करता विद्यार्थी परिषद्

    दिनांक 14-जुलाई-2020
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श्रीनिवास
विद्यार्थी परिषद् वह सांचा है जिसने अनेक पीढ़ियों के तरुण मानस को राष्ट्रभाव के रंग में ढालकर राजनीति, शिक्षा, प्रशासन, शोध, अनुसन्धान, प्रबंधन, मीडिया, पत्रकारिता, समाजसेवा और नागरिक समाज जैसे अनेक क्षेत्रों में प्रभावी नेतृत्व दिया है|  परिषद् न सिर्फ अपेक्षित परिवर्तनों के लिए एक संगठन के रूप में आंदोलनरत रहेगा बल्कि अपने बीच से ऐसे कार्यकर्ताओं का निर्माण भी करेगा जो विविध क्षेत्रों में जाकर परिवर्तन का बिगुल बजा सकें|

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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद मूलतः एक छात्र संगठन है परन्तु यह महज एक छात्र संगठन ही नहीं है|यह समग्र व्यवस्था परिवर्तन के माध्यम से राष्ट्र–पुर्ननिर्माण के लक्ष्य को लेकर चलने वाला एक असाधारण आन्दोलन है| अपने 72 वर्षों के इतिहास में विद्यार्थी परिषद् लगातार आन्दोलनरत रहते हुए विद्यार्थी समुदाय के हितों के साथ—साथ देश और समाज की आवश्यकताओं के लिए भी लड़ा है और अपने संघर्षों को सार्थक परिणामों में परिवर्तित करने में कामयाब हुआ है| 1975 में तानाशाही सरकार द्वारा लगायी गयी इमरजेंसी के खिलाफ संघर्ष करके लोकतंत्र को बचाने की भूमिका हो या 1989-90 के समय जम्मू-कश्मीर की अलगाववादी ताकतों की हिंसा के समय ‘कश्मीर बचाओ, भारत बचाओ’ आन्दोलन का श्रीनगर तक कूंच करने की ललकार, विद्यार्थी परिषद प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संघर्ष की नवीन परिभाषाएं लिखने के लिए जाना जाता है|
 
आज विश्व के सबसे बड़े छात्र संगठन के रूप में स्थापित हो चुके विद्यार्थी परिषद् की अनौपचारिक रूप से शुरुआत तो अम्बाला के डीएवी कॉलेज में कुछ ऊर्जावान और चिंतनशील युवाओं की बैठक से हुई| परन्तु धीरे—धीरे राष्ट्रभाव को शिक्षण संस्थानों में अभिव्यक्ति देने की इच्छा रखने वाले युवा और छात्रों का साथ मिलता गया और देखते ही देखते विद्यार्थी परिषद् का प्रसार हो गया| 9 जुलाई 1949 को औपचारिक रूप से अपनी स्थापना के दिन से ही विद्यार्थी परिषद् राष्ट्रीय गौरव की स्थापना, सांस्कृतिक मूल्यों के प्रसार और युवाओं में राष्ट्र-हित सर्वोपरि का भाव भरने का प्रयास कर रही है |

 अ.भा.वि.प का गठन ऐसे चुनौतीपूर्ण दौर में हुआ था, जब विद्यार्थी संगठनों को सरकारों द्वारा समाप्त किया जा रहा था| भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद जब भारत के लोगों को स्व-शासन का अधिकार मिला उस समय कांग्रेस और वामपंथी संगठनों ने अपने अपने छात्र संगठनों को कमज़ोर करना और समाप्त करना शुरू कर दिया था| सरकार में बैठे प्रमुख लोग कहते नहीं थकते थे कि- ‘स्टूडेंट्स पॉवर इस नुइसेंस पॉवर’ ( छात्र शक्ति- अराजक शक्ति है)| उस दौर में विद्यार्थी परिषद् ने नारा दिया कि – स्टूडेंट्स पॉवर इस नेशंस पॉवर ( छात्र शक्ति-राष्ट्र शक्ति है) और इस नारे को अपने आचरण से सिद्ध करके दिखाया भी| विद्यार्थी परिषद् का मानना है कि छात्र कल का नहीं बल्कि आज का नागरिक है, अतः उसकी भी समाज के प्रति उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी किसी अन्य नागरिक की| विद्यार्थी देश का नागरिक है और उसकी देश के प्रति जिम्मेदारी है-ऐसा विचार करते ही राष्ट्रहित के मुद्दे और विद्यार्थी हित के मुद्दे जुड़ जाते हैं, उनमें कोई टकराव या विरोधाभास नहीं रह जाता| ऊर्जा से लबरेज़ युवा शक्ति राष्ट्र हित में अपना हित देख पाती है और उसकी रचनाशीलता और प्रखरता का प्रयोग देश और समाज की उन्नति के लिए होता है|

विद्यार्थी परिषद् व्यवस्था परिवर्तन के उद्देश्य से कार्य करता है| देश भर के विद्यार्थियों और वृहतर समाज के विचारों को समायोजित करके ऐसे कुछ क्षेत्र और उनकी व्यवस्थाओं को चिन्हित किया जा सकता हैं, जिनमें आमूल—चूल परिवर्तन के लिए गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है| ऐसी कम से कम पांच व्यवस्थाएं – शिक्षा व्यवस्था, आंतरिक सुरक्षा विशेषकर पुलिस व्यवस्था, न्याय-व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था और चुनावी व्यवस्था में सुधार करने को लेकर और भी प्रभावी कदम उठाये जाने के लिए संघर्ष करना होगा| जिसमें विद्यार्थी समुदाय की सहभागिता अति महत्वपूर्ण है, और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् इसी हेतु से कार्य भी कर रहा है|


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सबसे पहले बात शिक्षा व्यवस्था की करें तो हम यह देखते हैं कि देश की स्वतंत्रता के बाद जिन भी लोगों के हाथ में शिक्षा व्यवस्था को नियोजित करने और पाठ्यक्रम बनाने की बागडोर आई, वे लोग राजनीति से प्रेरित लोग थे| हमारे शिक्षा का पाठ्यक्रम बनाने वालों ने युवाओं में स्वाभिमान की भावना जगाने के बजाय उनमें अपने इतिहास के प्रति घृणा और वर्तमान में हीनभावना और भविष्य के प्रति विभ्रांति का भाव पैदा करने का प्रयास किया| इतना ही नहीं भारतीय शिक्षा की अकादमिक संरचना ही कुछ इस प्रकार से की गयी है कि स्कूल से लेकर कालेज तक की पूरी पढ़ाई की विषयवस्तु औपनिवेशिक दृष्टी का पर्याय बनी हुई है| भारतीय दृष्टी से भारत का अध्ययन करना वर्तमान शैक्षणिक संरचना में बहुत कठिन है|अतः शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन विद्यार्थी परिषद् का एक प्राथमिक उद्देश्य है| हमारी शिक्षा का स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि हमारे विद्यार्थी उन्मुक्त होकर सोचने में सक्षम होने के साथ समाज, राष्ट्र और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों से भी पूरी तरह परिचित हों| ऐसी शिक्षा प्राप्त करने वाला युवा ही एक अच्छा नागरिक बन सकता है| शिक्षा व्यवस्था की गड़बड़ियों के चलते ही अन्य व्यवस्थाओं में समस्याएं और गहराती चली गयीं हैं|
समुचित शैक्षणिक दृष्टि के अभाव में इस शिक्षा व्यवस्था से निकलने वाले व्यक्ति विविध क्षेत्रों में जाकर शिक्षा के दौरान मिले बौद्धिक दृष्टिदोषों को अपनी भूमिका निभाते समय उपयोग में लाते हैं, जिसके फलस्वरूप अन्य व्यवस्थाओं में जटिलताएं बढ़ती जाती हैं|  इसका असर पुलिस जैसी महत्वपूर्ण संस्था पर भी पड़ता है| पुलिस के ज़्यादातर कानून और नियमावलियां अंग्रेजों के शासन काल में बनी थीं| पुलिस एक्ट खुद 1861 में बना था| पुलिस की कार्यप्रणाली औपनिवेशिक सत्ताधीशों की सुविधा को ध्यान में रख कर बनायी गयी थीं और उसका उद्देश्य जन हित नहीं था बल्कि वह तो जनता के दमन का एक उपकरण अधिक था| पुलिस की संरचना और उसकी कार्यप्रणाली में व्यापक सुधारों के बिना देश में आतंरिक सुरक्षा सुनिश्चित कर पाना संभव नहीं है| यह हाल सिर्फ पुलिस तक ही सीमित नहीं है| देश के संचालन के लिए अति महत्वपूर्ण प्रशासनिक शक्ति की कार्य पद्धति भी ब्रिटिश काल की छाप लिए हुए है| जिस प्रकार आंग्लवंशी अधिकारी भारतियों पर नस्लीय अहंकार और अभिजत्यतावादी दृष्टि लिए शासन किया करते थे, उसी के अनुरूप उन्होंने प्रशासन चलाने वाले अधिकारियों के विशेषाधिकार बनाये| प्रशासक और सामान्य जनता के बीच में सीधा संपर्क और संवाद न हो इसके लिए एक अनावश्यक विभाजन भी किया गया| दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी प्रशासन की नियमावली और परम्पराएं मोटे—मोटे तौर पर वही हैं|

इसी प्रकार ही हमारी न्याय व्यवस्था भी औपनिवेशिकता से बंधी हुई है| उच्च अदालतों में तो सारा कामकाज ही अंग्रेजी में होता है न कि भारतीय भाषाओँ में| किसी भी वाद की सत्यता प्रमाणित करने के लिए साक्ष्यों को मानने या नहीं मानने के जो मानक हैं वे भी स्वंतत्रता के काफी पहले सन 1872 में अंग्रेजों के द्वारा बनाये गये थे| न्यायपालिका की स्थिति ऐसी हो गयी है कि इसके विषय में कहा जाने लगा है कि ‘यहां जजमेंट तो मिलता है लेकिन जस्टिस नहीं।’ लाखों की संख्या में मुकदमों का लंबित होना हो या निचली अदालतों में फैले भ्रष्टाचार का विषय हो, न्याय-व्यवस्था में सुधार के लिए सतत् पहल हो इसके लिए युवाओं और छात्रों को आगे आने की आवश्यकता है|

चुनावी व्यवस्था में सुधार एक बहुत ही संवेदनशील विषय है| चुनावों की प्रमाणिकता पर ही लोकतंत्र के प्रति लोगों की आस्था टिकी हुई होती है| लेकिन हमें यह देखने के लिए मिलता है कि अनेक आपराधिक छवि वाले लोग, धनबली व बाहुबली लोग भी चुनावों में जीत हासिल कर रहे हैं| जाति, पंथ तथा इसी प्रकार के अन्य विभाजक मुद्दों के आधार पर वोट प्राप्त करके लोग चुनाव जीत रहे हैं| यह सब कुछ लोकतंत्र के स्वस्थ के लिए उचित नहीं है| अतः चुनावी व्यवस्था में सुधार करने लिए नीति निर्धारक एजेंसियों पर दबाव बनाये जाने की जरूरत है| युवाओं को कटिबद्ध होकर इसके लिए आगे आना होगा| नोटा जैसे अलोकतांत्रिक प्रलोभनों के चक्कर में न आते हुए युवाओं को पूरी समझदारी के साथ जनजागरण करना होगा| प्रत्येक नागरिक को उसके वोट की शक्ति के बारे में बताना होगा| एक मतदाता होने के नाते उसके ऊपर कितनी बड़ी जिम्मेदारी है, इस बात का उसे एहसास करना होगा, तभी वह अपने मत का सही प्रयोग कर सकेगा|

इन पांच व्यवस्थाओं में परिवर्तन नितांत आवश्यक है| आने वाले कुछ वर्ष भारत की वैश्विक स्थिति के दृष्टीकोण बहुत ही अधिक संवेदनशील हैं| यही कुछ वर्ष तय करेंगे कि हम एक वैश्विक शक्ति के रूप उभर रहे हैं या फिर किसी भविष्य की पीढ़ी के आने तक प्रतीक्षा करने के लिए बाध्य होने जा रहे हैं| अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सचेत रहते हुए समग्र व्यवस्था परिवर्तन के कार्य में लगा हुए है| ‘मानव निर्माण से राष्ट्र-निर्माण’ की पद्धति का पालन करता है| विद्यार्थी परिषद् वह सांचा है जिसने अनेक पीढ़ियों के तरुण मानस को राष्ट्रभाव के रंग में ढालकर राजनीति, शिक्षा, प्रशासन, शोध, अनुसन्धान, प्रबंधन, मीडिया, पत्रकारिता, समाजसेवा और नागरिक समाज जैसे अनेक क्षेत्रों में प्रभावी नेतृत्व दिया है| विद्यार्थी परिषद् न सिर्फ अपेक्षित परिवर्तनों के लिए एक संगठन के रूप में आंदोलनरत रहेगा बल्कि अपने बीच से ऐसे कार्यकर्ताओं का निर्माण भी करेगा जो विविध क्षेत्रों में जाकर परिवर्तन का बिगुल बजा सकें| अपने 72 स्थापना दिवस पर विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं एक बार पुनः व्यवस्था परिवर्तन के लिए दृढ संकल्पित हो रहे हैं|

(लेखक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री हैं)