‘राजकुमारी’ की पालकी के कहार

    दिनांक 15-जुलाई-2020
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कुछ सेकुलर पत्रकार प्रियंका गांधी वाड्रा की पालकी उठाए घूम रहे हैं

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उत्तर प्रदेश में चुनाव होने में अभी वैसे तो लगभग 2 साल हैं, लेकिन मीडिया ने अभी से माहौल बनाना शुरू कर दिया है। ऐसा कांग्रेस के इशारे पर हो रहा है। माना जा रहा है कि कांग्रेस की ‘राजकुमारी’ प्रियंका गांधी वाड्रा उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनना चाहती हैं। जनता के बीच उनका और उनकी पार्टी का कोई आधार हो न हो, लेकिन मीडिया के एक वर्ग के लिए उनकी यह इच्छा पोप के आदेश से कम नहीं है। लिहाजा ‘राजकुमारी’ को एक बार फिर से उतारने की तैयारी चल रही है। इसके लिए जमीन तैयार करने की जिम्मेदारी मीडिया के उसी जाने-पहचाने वर्ग को मिली है। इसी की रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश में जुड़ी सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा देने वाली खबरों को तूल दिया जाने लगा है।

जब भी ऐसा कुछ होता है तो इंडिया टुडे-आजतक समूह सबसे आगे रहता है। इंडिया टुडे समूह ने चित्रकूट में नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण का झूठा समाचार दिखाया। चैनल की मंशा का पता इसी से चलता है कि उसने समाचार प्रसारित करने से पहले स्थानीय प्रशासन या राज्य सरकार से उनका पक्ष जानने तक की औपचारिकता नहीं निभाई। अब पता चल रहा है कि आजतक चैनल की रिपोर्टर ने लड़कियों से मनचाही बात बुलवाने के बदले कुछ लालच दिया। जिस संवाददाता ने इसकी रिपोर्ट तैयार की वह कांग्रेस कार्यकर्ता की तरह मानी जाती है। यही कारण था कि चैनल पर चलने के साथ ही प्रियंका और राहुल गांधी ने ट्वीट करके इसे फैलाने में पूरी सहायता की। इसी प्रकार से कुछ दिन पहले कानपुर में महिला आश्रय केंद्र में शारीरिक शोषण की झूठी खबर उड़ाई गई थी। कानपुर के ही अपराधी विकास दुबे के मामले को भी जातीय रंग देने में कुछ कथित बड़े पत्रकारों ने विशेष रुचि दिखाई।

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों को लेकर मीडिया की दुराग्रह भरी रिपोर्टिंग जारी है। लगातार एक ही समुदाय विशेष के पीड़ितों पर ध्यान है। हिंदू पीड़ितों की कहानियां मुख्यधारा मीडिया में खोजे भी नहीं मिलेंगी। कई मुस्लिम-बहुल इलाकों में लोगों की दुकानें और मकान जला दिए गए। एक षड्यंत्र के तहत उल्टा उन्हें ही आरोपी बना दिया गया, लेकिन इन कहानियों के लिए सेकुलर मीडिया में कोई स्थान नहीं है। जांच में यह बात लगातार सामने आ रही है कि दिल्ली दंगों के लिए विदेशों से पैसे की मदद मिली। जैसी एकतरफा रिपोर्ट बनाई जा रही है, उससे लगता है कि कुछ पैसा कुछ मीडिया को भी मिला है। उधर, चाइनीज वायरस से मची त्रासदी के बीच देश में चीन के एजेंट भी अपना काम कर रहे हैं।

संकट के इस काल में कुछ देसी कंपनियों ने ‘वेंटिलेटर’ बनाने का काम शुरू किया है। ये बहुत सस्ते हैं और अलग-अलग अवस्था के रोगियों की देखभाल में उपयोगी साबित हुए हैं। लेकिन मीडिया का एक वर्ग उन्हें ‘नकली’ बताकर बदनाम करने की लगातार कोशिश में है। टाइम्स समूह का अखबार ‘अहमदाबाद मिरर’ इस खेल में सबसे आगे है। बीते सप्ताह इंडियन एक्सप्रेस ने झूठी रिपोर्ट छापी कि दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में केंद्र सरकार की तरफ से दिए गए 175 स्वदेशी ‘वेंटिलेटर’ उच्च गुणवत्ता वाले नहीं हैं। रिपोर्ट में जिस आधार पर ‘वेंटिलेटर’ को खराब बताया गया था, वह पूरी तरह मनगढ़ंत निकला। इसी तरह विदेशी समाचार वेबसाइट ‘हफिंगटन पोस्ट’ ने भी कुछ ऐसी ही फर्जी खबरें प्रकाशित कीं। यहां यह बात जानना जरूरी है कि चीन इस समय दुनिया में मेडिकल उपकरणों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता देश है। उसे उम्मीद थी कि भारत से उसे एक बड़ा बाजार मिलेगा, लेकिन देसी कंपनियों की उद्यमशीलता के कारण ऐसा नहीं हो पाया।

इसी तरह जब एक भारतीय कंपनी की ‘वैक्सीन’ के मानव परीक्षण का समाचार आया तो मीडिया का एक वर्ग अचानक अतिसक्रिय हो गया। इस पूरे प्रयास को ही संदिग्ध साबित करने की मानो होड़ सी लग गई। एनडीटीवी ने तो इतनी जल्दी ‘वैक्सीन’ बनाने की आवश्यकता और भारत सरकार की मंशा पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए। जबकि इसी चैनल ने कुछ हफ़्ते पहले एक अमेरिकी लैब के कोविड-19 वैक्सीन बनाने का झूठा समाचार प्रसारित किया था।

चाइनीज वायरस के बहाने पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले पत्रकार शफीकुल इस्लाम की गिरफ़्तारी का मामला भी सामने आया। बात-बात पर अभिव्यक्ति की आजादी का रोना रोने वाला मीडिया का एक वर्ग इस समाचार पर मौन है। वह भी तब जब राज्यपाल ने ट्वीट करके एडिटर्स गिल्ड, प्रेस क्लब जैसी संस्थाओं को घटना की जानकारी दी और संज्ञान लेने की अपील की। यह घटना बताती है कि पत्रकारिता के ये मठाधीश वास्तव में लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति कितने सजग हैं।    ल्ल