चीन की वैश्विक लामबंदी और भारत

    दिनांक 15-जुलाई-2020
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एस. वर्मा

चीन की चालें अब दुनिया पहचान गई है। उसने अपनी लापरवाही या धूर्तता से वायरस फैलाकर अपने पड़ोसी देशों सहित विश्वभर के देशों को नाराज किया है। चीन का मुलम्मा उतर चुका है। भारत की सहभागिता वाले अनेक वैश्विक गठबंधन कोविड-19 के बाद चीन को अलग-थलग रखने की रणनीति पर जुटे हैं

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4 जून 2020 को आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मौरिसन के साथ वर्चुअल बैठक करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। इस वार्ता में दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक समझौते हुए थे


आज चीन पूर्वी लद्दाख समेत इसके निकटवर्ती क्षेत्रों में अपने घातक मंसूबों को अमलीजामा पहनाने की पुरजोर कोशिशों में लगा हुआ है, इसका एक उदाहरण हमें 15 जून को दिखा, जब गलवान घाटी में भारतीय क्षेत्र पर उसने अतिक्रमण का प्रयास किया जिसे भारतीय सेना के वीरता के साथ विफल कर दिया। चीन की आक्रामक गतिविधियां 1949 से ही देखने में आती रही हैं। वह कभी भी अपने पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण सह अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाया है। और अब कोविड-19 के बाद से विश्वभर में चीन की इन कुत्सित नीतियों का विरोध मुखर होने लगा है, जिसे भारत के विरुद्ध चीन के हाल के आक्रामक व्यवहार के कारण और भी बल मिला है।

आज विश्व में चीन की नीतियों के  विरोध में ध्रुवीकरण प्रारम्भ हो चुका है। इसमें एशिया से लेकर यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका में विभिन्न देशों और बहुपक्षीय संगठनों तक की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह प्रदर्शित करता है कि चीन का व्यवहार अब असहनीय हो गया है और इससे मुक्ति पाने हेतु वक्त अपने निर्णायक दौर में प्रवेश कर रहा है। इस प्रक्रिया में जहां भारत की केन्द्र्रीय भूमिका है वहीं अमेरिका, जापान, यूरोपीय संघ समेत अनेक देश और संगठन विशिष्ट भूमिका निभा रहे हैं।

हिन्द महासागर में बंढ़ंी चौकसी
चीन के लिए हिन्द महासागर का क्षेत्र अत्यधिक सामरिक महत्व का रहा है। उसकी ऊर्जा आपूर्ति लगभग पूर्ण रूप से इसी क्षेत्र पर निर्भर है। ऐसे में भारत ने चीनी आक्रामकता के विरुद्ध लामबंदी के लिए हिन्द महासागर में ही ताल ठोकी है। गत 27 जून को भारतीय और जापानी युद्धपोतों ने हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) में मलक्का जलसन्धि की ओर एक छोटा अभ्यास किया। इस अभ्यास में क्षेत्र में गश्त करने वाले भारतीय युद्धपोतों, राजपूत-वर्ग के विध्वंसक आईएनएस राणा और कोरा-वर्ग की मिसाइल कोरवेट आईएनएस कुलिश के साथ जापानी समुद्री आत्म-रक्षा बल के प्रशिक्षण स्क्वाड्रन से जेएस शिमायुकी और जेएस काशिमा के साथ अभ्यास में भाग लिया। उल्लेखनीय है कि यह अभ्यास एक ‘पासिंग एक्सरसाइज’ था, लेकिन इस अत्यंत संवेदनशील समय में यह चीन को महत्वपूर्ण सामरिक संकेत पहुंचाने की क्षमता रखता है। इस स्थिति में ‘क्वाड’ के एक सक्रिय सहयोगी अमेरिका ने भी इस क्षेत्र में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। इस वक्त तीन अमेरिकी विमानवाहक पोत, यूएसएस रोनाल्ड रीगन, यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट और यूएसएस निमित्ज पहली बार एक साथ प्रशांत महासागर में तैनात किए

गए हैं। उल्लेखनीय है कि अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा फारस की खाड़ी, अरब सागर और लाल सागर के क्षेत्र पर स्पष्ट प्रभाव रखता है और इसी क्षेत्र से चीन की 80 प्रतिशत ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। जापान 2015 से भारत और अमेरिका के बीच ‘मालाबार’ नामक नौसैनिक युद्ध अभ्यास में एक नियमित भागीदार बन गया है। यह चीन के लिए विशेष चिंता का विषय है, विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर में। (मालाबार संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान और भारत की स्थायी साझेदारी में एक त्रिपक्षीय नौसेना अभ्यास है। यह मूल रूप से 1992 में भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच द्विपक्षीय अभ्यास के रूप में शुरू हुआ था, जिसमें 2015 से जापान एक स्थायी भागीदार बन गया।) इस क्षेत्र में चीन का मुकाबला करने के लिए भारत ने अमेरिका, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और आॅस्ट्रेलिया के साथ इस तरह के समझौतों को प्रभावी किया है ताकि हिन्द महासागर क्षेत्र में अपने नौसैनिक संचालन को बढ़ाया जा सके। चीन हिन्द महासागर में भारत की इन गतिविधियों के प्रति चिंतातुर रहा है। उसने 2007 में बंगाल की खाड़ी में भारत-अमेरिका मालाबार अभ्यास पर कड़ी आपत्ति जताई थी, जिसमें जापान, आॅस्ट्रेलिया और सिंगापुर को शामिल किया गया था। 

ताइवान और हांगकांग की चुनौती 
आज चीन न केवल अपनी भूमि पर बल्कि वैश्विक रूप से लोकतंत्र के सम्मुख एक बड़े खतरे के रूप में प्रकट हुआ है। यह जहां हांगकांग में सुधारों के लिए उठाई जाने वाली आवाज को दबाने के लिए उत्पीड़न का सहारा ले रहा है वहीं ताइवान की स्वतंत्रता के सम्मुख बड़ा खतरा बना हुआ है। कोपेनहेगन में हुए ‘डेमोक्रेसी समिट’ में यही मुद्दा छाया रहा जहां चीन की इन कार्यवाहियों की भर्त्सना की गई। ‘कोपेनहेगन डेमोक्रेसी समिट’ हर साल होने वाला एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन है। ‘एलायंस आॅफ डेमोक्रैसीज’ नाटो के पूर्व महासचिव और डेनमार्क के प्रधानमंत्री एंडर्स फॉग रासमुसेन द्वारा 2017 में स्थापित एक गैर-लाभकारी संगठन है, जो डेनमार्क के कोपेनहेगन में आयोजित किया जाता है। शिखर सम्मेलन में दुनिया के लोकतांत्रिक देशों के वर्तमान और पूर्व प्रमुखों सहित राजनीतिक और व्यापारिक नेता शामिल होते हैं। इस वर्ष का यह सम्मलेन कोविड महामारी के चलते वर्चुअल रूप में आयोजित किया गया। इसे संबोधित करने वालों में अमेरिका के विदेश सचिव माइक पोम्पियो, ताइवान के नेता साई इंग-वेन और हांगकांग में लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले जोशुआ वोंग प्रमुख थे।

इस सम्मलेन में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि यह नई महामारी न केवल जन स्वास्थ्य और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर आघात कर रही है, बल्कि दुनिया भर में लोकतंत्र और शासन को बाधित भी कर रही है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब कई स्थानों पर लोकतंत्र पहले से ही खतरे में था, साथ साथ यह लोकतांत्रिक मूल्यों की अवनति और अधिनायकवादी समेकन को तीव्र कर रहा है। चीन जैसे देशों ने कार्यकारी शक्ति का विस्तार करने और व्यक्तिगत अधिकारों को प्रतिबंधित करने के लिए महामारी का उपयोग किया है।

चीन की सर्वाधिकारी सरकार आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग कर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रही है, साथ ही साथ ‘दुष्प्रचार’ से लड़ने की आड़ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला भी घोंट रही है। चीन सरकार ने कोविड—19 की आड़ में जहां एक ओर चीन में सैन्य शासन जैसी स्थिति ला दी है वहीं दूसरी ओर, हांगकांग के शांतिपूर्ण आन्दोलन का बलपूर्वक दमन कर रही है। इसके साथ ही वहां से एक युद्धोन्मादी विचार को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा जिसके तहत भारत और अन्य पड़ोसी देशों के साथ सीमा सम्बन्धी मामलों में उकसावे की कार्यवाहियां की जा रही हैं ताकि देश के अन्दर लोगों का ध्यान सुधारों से भटकाकर राष्ट्रीय सुरक्षा की ओर मोड़ा जा सके।

अमेरिका, यूरोपीय संघ और नए सुरक्षा समीकरण
चीन ने साम्यवादी आवरण के अंतर्गत जिस तरह के गिद्ध छाप पूंजीवाद को बढ़ावा दिया,  वह नव उपनिवेशवादी प्रणालियों में सबसे अलग है। इसने तीसरी दुनिया के निर्धन देशों को अपने ऋण के जाल में फंसाकर उनके सम्मुख संप्रभुता को खोने का संकट तो खड़ा किया ही है, साथ ही दुनिया के सर्वाधिक सम्पन्न देशों की अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह खोखला भी कर रहा है, जिसके कारण इनकी आर्थिक और राजनैतिक स्थिति प्रभावित हो रही है। यही कारण है कि ये देश भी चीन के विरुद्ध संगठित हो रहे हैं। हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ ने अप्रत्याशित रूप से चीन के खिलाफ एक नए संयुक्त मोर्चे की घोषणा की है, जो शीर्ष स्तर पर संवाद की स्थापना कर रहा है, जिसका नेतृत्व अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और यूरोपीय संघ के विदेश-नीति प्रमुख जोसेप बोरेल करेंगे। पोम्पिओ इस प्रक्रिया के आरम्भ के लिए ब्रुसेल्स की यात्रा करने वाले हैं ताकि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए संयुक्त कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ा जा सके। पोम्पिओ का मानना है कि इसके द्वारा दोनों पक्ष पहले चीनी खतरे की एक आम समझ तक पहुंचने की कोशिश करेंगे ताकि उस पर कार्रवाई करने के तरीकों के विषय में आगे बढ़ा जा सके। उन्होंने कहा, ‘ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन ने हमेशा लोकतंत्र और स्वतंत्रता को संरक्षित किया है, हम एक सामूहिक प्रत्युत्तर विकसित करेंगे, जो उन सभी स्वतंत्रताओं को सुरक्षित और संरक्षित करेगा जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दिन-प्रतिदिन कम करना चाहती है’। जर्मन मार्शल फंड फोरम के आॅनलाइन सम्मलेन में पोम्पिओ का वक्तव्य राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के चीन-विरोधी संघर्ष में समान विचारधारा वाले देशों को एकजुट करने के अमेरिकी कूटनीतिक प्रयासों की कड़ी में नवीनतम है।


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25 जून 2020 को वेब के जरिए जर्मन मार्शल फंड फोरम को संबोधित करते हुए अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने चीन को कड़ा संदेश दिया 

इसी समावेशीकरण की नीति के तहत ‘फाइव आईज’ खुफिया साझेदारी का विस्तार भी किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि ‘द फाइव आइज’ एक खुफिया गठबंधन है जिसमें आॅस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, यूनाइटेड किंग्डम और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं। इसके साथ ही अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, जापान और भारत के ‘क्वाड’ ने भी अपने समूह में विस्तार के लिए कोरिया, वियतनाम और न्यूजीलैंड के साथ संपर्क में वृद्धि की है। वर्तमान परिदृश्य में अमेरिकी अध्यक्षता वाले जी-7 समूह में आॅस्ट्रेलिया, कोरिया और भारत जैसे सम विचारी लोकतांत्रिक देशों के एक समूह को शामिल किये जाने की भी संभावना है। उल्लेखनीय है कि मई के अंत में यूनाइटेड किंग्डम के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने एक नया अंतरराष्ट्रीय मंच डी—10 या ‘डेमोक्रेसी-10’ बनाने का विचार दिया था जिसमें जी-7 के सात राष्ट्रों के साथ आॅस्ट्रेलिया, भारत और दक्षिण कोरिया का सम्मिलित होना प्रस्तावित किया गया था। 

यूरोपीय देशों में चीन के प्रति बदलता रुख यूरोपीय संघ की बदलती गतिशीलता को रेखांकित करता है। यूरोप के देशों ने चीन के प्रति व्यवहार में सावधानी बरतना प्रारम्भ कर दिया है, जो उसके गलत आर्थिक व्यवहार, मानव अधिकारों के दुरुपयोग, लोकतंत्र के अभाव और दूसरी ओर कोविड-19 के बाद की परिस्थितियों में व्यापार और निवेश के बदलते अवसरों को ध्यान में रखते हुए चीन के प्रति अपने दृष्टिकोण का निर्धारण करने पर बल देता है। जहां एक ओर विश्व भर में समूहों और संगठनों के विस्तार की प्रक्रिया प्रारंभ हो गयी है और नई रणनीतिक साझेदारियां विकसित हो रही हैं, वहीं इस ओर एक नया मौलिक परिवर्तन देखा जा रहा है। यह पूर्ववर्ती कालों, विशेष रूप से शीतयुद्ध के बाद के काल के लिए अनोखा ही कहा जा सकता है। वर्तमान समय आगे गहन होती कठिनाइयों का संकेत दे रहा है। इस समय के संगठन और साझेदारियां इस चुनौती की अभिव्यक्तियां हैं, जिनके गठन का उद्देश्य पूरी तरह से पारस्परिक लाभ के लिए न होकर चीन की चुनौती का अधिक प्रभावशाली तरीके से सामना करना है। भारत चीन के साथ एक लम्बी सीमा साझा करता है।

चीन की आक्रामक कूट-रचनाओं का सामना भी भारत को ही करना पड़ता है। साथ ही दक्षिण एशिया में भारत ही वह शक्ति है जो चीन को चुनौती दे सकता है। यही कारण रहा कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश चीन का सामना करने में भारत की मदद चाहते हैं। पिछले वर्षों में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने चीन की महत्वाकांक्षाओं का सामना करने के लिए भारत को एक नजदीकी सैन्य और आर्थिक साझेदार बनने की कई बार पेशकश की है, जिन पर भारत एक सधी हुई प्रतिक्रिया देता आया है। परन्तु अब चीन द्वारा छेड़े गए घातक सीमा संघर्ष ने एक लम्बे समय तक चलने वाले गतिरोध की शुरुआत कर दी है। चीन के खिलाफ होने वाली वैश्विक लामबंदी के केंद्र में भारत स्वाभाविक रूप से आ गया है। भारत का वर्तमान नेतृत्व चीन के विरुद्ध न केवल सैन्य बल्कि आर्थिक और राजनैतिक उपायों से वर्तमान संकट के दौर से निकलने का ही प्रयास नहीं कर रहा है, बल्कि आने वाले समय में रक्षा समीकरण इस तरह विन्यासित करने के लिए प्रयासरत है ताकि पड़ोसी देशों के इस तरह के शत्रुतापूर्ण और आक्रामक व्यवहारों पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।