चीन के फंदे में नेपाल

    दिनांक 15-जुलाई-2020
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 पंकज दास

पाकिस्तान को पूरी तरह शिकंजे में लेने के बाद चीन अब नेपाल को अपने कर्ज के मायाजाल में फंसा रहा है। नेपाल भी आंखें मूंदकर बर्बादी के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। श्रीलंका के साथ चीन ने क्या किया, नेपाल उससे भी सबक नहीं ले रहा है। नेपाल में चीन की घुसपैठ हिमालयी देश के लिए तो घातक है ही, भारत के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है


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नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिग के साथ।


चीन इस समय पूरी दुनिया में अपनी साम्राज्यवाद और विस्तारवाद नीति के तहत सशक्त रूप से आगे बढ़ने के लिए लालायित दिख रहा है। विश्व स्तर पर वह अपनी राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक प्रभुत्व को बढ़ाने के लिए ऋण-जाल कूटनीति पर काम कर रहा है। इसके तहत अपना साम्राज्य विस्तार करने के लिए चीन विभिन्न तरह के हथकंडे अपना रहा है। दुनिया के कई देशों में उसकी संदिग्ध भूमिका से ये बातें भी स्पष्ट हो रही हैं। दक्षिण एशियाई देश पाकिस्तान हो या श्रीलंका, यूरोप के इटली से लेकर कई अफ्रीकी देश चीन के झांसे में फंस कर आज पश्चाताप कर रहे हैं। चीन के इस मकड़जाल में फंसे लगभग सभी देश अपनी संप्रभुता, अपनी राष्ट्रीयता और देश की आर्थिक अवस्था तक गिरवी रखने को मजबूर हैं। नेपाल को भी कर्ज के जाल में इसी कूटनीति के तहत फांस रहा है। यह वास्तव में एक बड़ा खतरा है। नेपाल की वर्तमान राजसत्ता इस यथार्थ को जानते हुए भी आत्मघाती कदम आगे बढ़ा चुकी है।


नेपाल पर चीनी प्रभाव
नेपाल के कई स्कूलों में चीनी भाषा मंदारिन की पढ़ाई अनिवार्य कर दिया गया है। इस भाषा को पढ़ाने वाले शिक्षकों के वेतन का खर्च भी चीन सरकार उठा रही है।
ओली सरकार ने चीनी राजदूत हाओ यांकी के इशारे पर अमेरिका से मिलने वाली 50 करोड़ डॉलर की सहायता को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो के कहने के बाद भी ओली सरकार ने इस कोष पर कोई फैसला नहीं लिया है।
नेपाल में चीन का राजनीतिक, सैन्य और असर बढ़ा है, जिसके कारण इसने अमेरिका के हिंद प्रशांत रणनीति में शामिल नहीं हुआ। यानी नेपाल ऐसे किसी भी सैन्य गठबंधन में शामिल नहीं होगा जो चीन के विरुद्ध हो।


घाटे का सौदा

नेपाल एक भू-आबद्ध राष्ट्र है, जो भारत और चीन, दो विशालकाय देशों से घिरा है। हालांकि यह भारत पर निर्भर रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में दूसरे देशों से व्यापार के लिए नेपाल ने भारत की जगह चीन को ट्रांजिट कंट्री (जहां के बंदरगाहों से व्यापार हो सके) के रूप में चुना है। मार्च 2016 में केपी शर्मा ओली ने चीन यात्रा के दौरान पारगमन परिवहन समझौता (टीटीए) पर हस्ताक्षर किया, जिसके तहत चीन ने नेपाल को 7 पारगमन केंद्र दिए। इनमें चार समुद्री बंदरगाह (तियानजिन, शेंझेन, लियांयुगांग, झांजियांग) और 3 भू-क्षेत्र (लैंझोऊ, ल्हासा, शिगात्से) शामिल हैं। यानी नेपाल इन्हीं रास्तों से किसी तीसरे देश के साथ व्यापार कर सकेगा, लेकिन यह समझौता नेपाल के लिए घाटे का है, क्योंकि इन मार्गों से व्?यापार भारतीय मार्ग के मुकाबले उसे महंगा पड़ेगा। चीन के चार समुद्री बंदरगाहों से काठमांडू की दूरी करीब 4,000 किलोमीटर है। दूसरे शब्दों में चीन के पूर्वी तट के किसी बंदरगाह से माल को नेपाल लाने में करीब 45 दिन लगेंगे, जबकि कोलकाता या हल्दिया से मात्र 16 दिन में ही पहुंच जाएगा। जाहिर है भारत के मुकाबले चीन से आने वाले माल पर परिवहन खर्च बहुत अधिक आएगा।  


भारत के पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते गहरे करने और भारत की घेराबंदी करने की चीन की रणनीति अब रंग लाने लगी है। श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह को 99 साल के लिए पट्टे पर लेने के बाद चीन अब नेपाल में अपनी पदछाप गहरी करने के लिए उसके साथ ढांचागत विकास की कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पिछले वर्ष 12 व 13 अक्?तूबर के काठमांडू दौरे में जिन महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए उसका सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए तो एक बात स्पष्ट होती है कि वह नेपाल पर अपनी गहरी पकड़ तो बनाना चाहता ही है लेकिन उसका निशाना हमेशा भारत ही रहने वाला है। 23 साल बाद चीन के किसी राष्ट्रपति का नेपाल दौरा इस मायने में सामरिक नजरिये से भारत के लिए काफी अहम था। उनसे पहले 1996 में राष्ट्रपति जियांग जेमिन ने नेपाल का दौरा किया था। कभी भारत का सबसे नजदीकी रहा नेपाल आज चीन से नजदीकियां बढ़ा रहा है। राष्ट्रपति शी के नेपाल दौरे के बाद जो साझा बयान जारी हुआ था, उससे यह साफ होता है कि अब तक जो प्रस्ताव पिछले कुछ सालों से चर्चा में ही थे, उन्हें जल्द से जल्द जमीन पर उतारने की कवायद शुरू हो गई है।

अपनी साम्राज्यवादी नीति के तहत चीन बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में नेपाल को शामिल कर भारतीय सीमा के और करीब आने की कोशिश कर रहा है। बीआरआई के जरिये चीन एशिया, अफ्रीका और यूरोप को बुनियादी ढांचे के विकास जैसे सड़क, रेलवे, बंदरगाह, संचार लाइनों और सीमा पार आर्थिक क्षेत्र में बड़े निवेश की योजना को कार्यान्वित कर रहा है। चीन की बेल्ट एंड रोड योजना के तहत नेपाल के दुर्गम पर्वतीय इलाकों में विकसित की जाने वाली इन ढांचागत परियोजनाओं पर अरबों डॉलर के निवेश की जरूरत होगी। सवाल यह है कि नेपाल के भीतर संचालित होने वाली इन ढांचागत परियोजनाओं में निवेश कौन करेगा? नेपाल ने बिना सोचे समझे, बिना किसी अध्ययन और इसके प्रभाव को जाने बिना ही इस परियोजना पर हस्ताक्षर कर दिया। इस पर राष्ट्रीय योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष शंकर प्रसाद शर्मा कहते हैं कि इस वृहत परियोजना से नेपाल को क्या हासिल होने वाला है? इस पर न तो सरकार ने और न ही विशेषज्ञों ने कभी गंभीरता से विचार-विमर्श किया है। साथ ही, वह सवाल पूछते हैं कि क्या सिर्फ चीनी पर्यटकों को लाने के लिए बिना उसके गंभीर परिणाम को सोचे ही उससे जुड़ना देश की अखंडता और संप्रभुता के लिए खतरा नहीं हो सकता है?

स्वाभाविक है कि चीन इन परियोजनाओं के लिए नेपाल सरकार को कर्ज देगा। ठीक वैसे ही, जैसे श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह के विकास पर चीन ने आठ अरब डॉलर से अधिक के निवेश किये और श्रीलंका सरकार जब इन्हें लौटाने में असमर्थ दिखने लगी तो बदले में उसने इस बंदरगाह और इसके आसपास की हजारों एकड़ जमीन का 99 साल के लिए पट्टा लिखवा लिया। इस तरह इस इलाके में चीन अपने लोगों को बसा कर वहां कोई भी व्यापारिक गतिविधि करने के लिए स्वतंत्र होगा। स्वाभाविक है कि इसी की आड़ में चीन वहां अपनी सुरक्षा गतिविधि भी संचालित करेगा जो भारत के लिए भविष्य में सिरदर्द साबित हो सकता है। नेपाल में बीआरआई पर आयोजित एक सेमिनार में थाईलैंड के अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार डॉ. प्रबात ने कहा था कि शी जिनपिंग की इस अति महत्वाकांक्षी परियोजना में ही समस्या है। उन्होंने नेपाल को सचेत करते हुए कहा कि उसने इस पर हस्ताक्षर कर तो दिया है, लेकिन एक-एक कदम फूंक कर चलना होगा। श्रीलंका का उदाहरण देते हुए डॉ. प्रबात ने कहा था कि आर्थिक अनुशासन का पालन नहीं करने की वजह से श्रीलंका चीन के ऋण जाल में फंसा हुआ है। इसी तरह, उन्होंने मलेशिया का जिक्र करते हुए बताया कि महाथिर मुहम्मद ने चीन के साथ हुए अपने पूर्व समझौते को क्यों तोड़ लिया था, इस बारे में नेपाल सरकार को भी सोचना चाहिए।  



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19 नवंबर, 2016 को ओबीओआर पर हस्ताक्षर के दौरान नेपाल-चीन के अधिकारी।   फाइल चित्र

 उसी तरह, नेपाल और चीन सीमा से होकर जब राजमार्ग, रेल मार्ग और सुरंगों का जाल बिछाने की योजना अगले कुछ सालों के भीतर लागू होगी तो नेपाल उनके लिए चीन से मिले कर्ज का भुगतान कैसे करेगा? काठमांडू से चीन सीमा के भीतर तिब्बत की सीमा तक प्रस्तावित 70 किलोमीटर की सुरंग पर ही पौने तीन अरब डॉलर का खर्च आने का अनुमान है। इस खर्च का भार नेपाल कैसे उठाएगा, इसे लेकर नेपाल में भी गहरी चिंता जताई जा रही है। लेकिन नेपाल को इन लुभावनी ढांचागत परियोजनाओं के लालच में फंसा कर चीन उसे पूरी तरह अपनी गोद में ले सकेगा जैसा कि उसने पाकिस्तान के साथ किया है। बीआरआई में नेपाल-चीन ट्रांस-हिमालयन बहुआयामी संपर्क नेटवर्क और नेपाल-चीन क्रॉस-बॉर्डर रेलवे को शामिल किया गया है। इसके तहत जिनपिंग ने नेपाल यात्रा के दौरान उसकी भारत पर निर्भरता खत्म करने के लिए तिब्बत काठमांडू को जोड़ने वाले रेल मार्ग और सुरंग के लिए समझौता किया है। रेल, सड़क और हवाई संपर्कों का जाल बिछाने से चीन और नेपाल के बीच आवागमन तो सुगम हो ही जाएगा, ये मार्ग भारत सीमा से भी जुड़ जाएंगे। इन मार्गों के जरिये चीनी व्यापारिक माल भारत में आने लगेंगे, क्योंकि भारत और नेपाल के बीच मुक्त व्यापार चलता है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के बीच जिन ढांचागत परियोजनाओं पर सहमति बनी है, उनसे नेपाल की चीन पर तो निर्भरता बढ़ेगी ही, नेपाल के राजनीतिज्ञ यही सोचने लगेंगे कि अब उन्हें भारत से पेट्रोल और अन्य जरूरी माल की सप्लाई पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

 2015 में नेपाल में मधेस समुदाय के लोगों द्वारा जब भारत-नेपाल सीमा पर नाकेबंदी की गई थी, तब प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली चीन गए थे और वहां से पेट्रोलियम और अन्य जरूरी सामान के आयात के लिए चीन सरकार से सहमति ले कर आए थे, लेकिन यह सब इसलिए मुमकिन नहीं हो सका, क्योंकि सड़क मार्ग से होने वाले आयात का खर्च भारत की तुलना में 18 गुना अधिक होता। तब से ही नेपाल और चीन के बीच परिवहन सुविधा विकसित करने की योजनाओं पर गंभीरता से काम शुरू हुआ। इसी के मद्देनजर पिछले वर्ष शी जिनपिंग के काठमांडू दौरे में सहमति बनी थी। ये ढांचागत परियोजनाएं ट्रांस हिमालयन बहुउद्देशीय संपर्क नेटवर्क के तहत लागू होंगी। चीन के काशगर से पाकिस्तान के ग्वादार बंदरगाह तक जाने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपीईसी की तर्ज पर विकसित होने वाले हिमालय गलियारे को चीन-नेपाल आर्थिक गलियारा भी (सीएनईसी) कहा जाने लगा है। इसे लेकर भारत की चिंताओं को दूर करने के लिए ही चीन और नेपाल ने इसे त्रिपक्षीय गलियारा बनाने का प्रस्ताव दिया था ताकि इसमें भारत को सहभागी बनाया जा सके, लेकिन भारत ने इसमें रुचि नहीं दिखाई। सीएनईसी के तहत कई परियोजनाओं पर सहमति का खुलासा जिनपिंग और ओली के बीच बातचीत के बाद जारी साझा बयान से हुआ था। अब तक जिन महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को लेकर अटकलें ही लगती थीं, चीन ने उनकी व्यवहार्यता रिपोर्ट करवा ली है और इसके आधार पर नेपाल और तिब्बत के बीच रेलवे मार्ग का जाल बिछाने की तैयारी कर चुका है।


रेल परियोजना भी छलावा
चीन बीआरआई रेलवे परियोजना के तहत नेपाल की राजधानी काठमांडू को दक्षिणी तिब्बत के केरुंग शहर से जोड़ेगा, जो रासुवा जिला होते हुए भारत की सीमा पर निकलेगा। 98 प्रतिशत रेल मार्ग नेपाल से गुजरेगा, लेकिन इन मार्गों पर सबसे ज्यादा सुरंग और पुल बनाने होंगे। परियोजना के लिए चीन द्वारा किए गए अध्ययन में कुछ ऐसे स्थान आए हैं, जहां परियोजना को धरातल पर उतारना बेहद चुनौतीपूर्ण है। सबसे बड़ी समस्या है कि इनमें कुछ इलाके भूकंप की दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। यही नहीं, रेल मार्ग कहीं बहुत ऊंचा तो कहीं बहुत नीचा रहेगा, क्योंकि 4,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जबकि काठमांडू की ऊंचाई 1400 मीटर ही है। ऐसे में बीआरआई भी छलावे से कम नहीं है।


नेपाल को निगल रहा चीन
नेपाल सरकार ने ऐसे 11 जगहों की पहचान की है, जिस पर अब चीन का कब्जा है। कुल मिलाकर चीन ने नेपाल की 33 हेक्टेयर जमीन पर अतिक्रमण कर रखा है। यही नहीं, तिब्बत से सटे गांव रुई पर भी चीन ने लंबे समय से कब्जा किया हुआ है। बताया जा रहा है कि 72 घरों वाले रुई गांव में चीन ने घुसपैठ करके कब्जा किया है। हालांकि रुई गांव क्षेत्र अभी भी नेपाल के मानचित्र में शामिल है, लेकिन वहां पर पूरी तरह से चीनी नियंत्रण है। नेपाल की जमीन हड़पने के लिए चीन नदियों के बहाव को भी मोड़ रहा है।

इसके लिए पिछले साल जून में चीन-नेपाल शिखर बैठक के दौरान रेलवे परियोजनाओं पर सहमति के ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए थे। पिछले साल 13 अक्तूबर को जो समझौता हुआ, उसके तहत तिब्बत की राजधानी ल्हासा और शिकात्से के आगे काठमांडू तक रेल नेटवर्क बिछाने के लिए व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार की जाएगी। इसके अलावा दोनों पक्षों ने काठमांडू-पोखरा-लुम्बिनी रेलवे परियोजना में भी सहयोग करने की प्रतिबद्धता दिखाई है।

ल्हासा से जो रेलवे लाइन काठमांडू तक बढ़ाई जाएगी, वह जब लुम्बिनी तक पहुंच जाएगी तो चीनी रेल भारतीय सीमा के काफी नजदीक तक पहुंच जाएगी। चूंकि रेलवे से माल ढुलाई सड़क मार्ग की तुलना में काफी सस्ता होता है, इसलिए नेपाली नेता भविष्य में भारत पर धौंस जमा सकते हैं कि उन्हें भारत से माल आयात की जरूरत नहीं। भगवान बुद्ध के जन्म स्थल लुम्बिनी के विकास में भी चीन की भागीदारी चल रही है। जब चीन की रेल लाइन वहां तक पहुंचेगी तो स्वाभाविक है कि वहां न केवल भारी संख्या में पर्यटक पहुंचेंगे, बल्कि वहां चीनी माल की भरमार होगी। इस तरह नेपाल के बाजार पर चीनी माल छा जाएगा और इसे भारत में भी शुल्क मुक्त प्रवेश से रोका नहीं जा सकेगा।