समाज में उत्साह और नव सृजन के बीज बोने का समय

    दिनांक 15-जुलाई-2020
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रामानंद

कोरोना के चलते गांव हो या शहर। बच्चे हों या वृद्ध। हर तरह नकारात्मकता की अधिकता दिखाई दे रही है। ऐसे में जरूरत है, उस संबल की जो लोगों को इस अंधकार से निकालकर उजाले का रास्ता दिखाएं। भारतीय समाज में बहुत से ऐसे लोग हैं जो आशा और संभावना की कहानियां सुनाना जानते हैं। हमारे देश में ऐसे बहुत से अनौपचारिक संस्थान हैं, जो लोगों प्रेरित करते हैं। ऐसे सभी समूहों और व्यक्तियों की सहायता ली जानी चाहिए जो नए समाज में उत्साह और नव सृजन के बीज बो सकें|
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कोरोना वायरस जो कुछ माह से हमारे परिवेश में कही दूर-दूर तक नहीं था, वह वायरस और इसका प्रभाव अब हमारे जीवन का स्थाई भाव बन गया हैं| हमारी चर्चाओं में, हमारी कल्पनाओं में कोरोना शामिल हो चुका है। हमारी शब्दावलियां कोरोना और इससे उपजी परिस्थितियों से पट पड़ी हैं।

तमाम देश समाज जो पहले इसको कोई कारक नहीं मान रहे थे, आज वह नतमस्तक हो गए हैं, दुनिया का शायद ही कोई देश हो जिसके सामाजिक मन-स्मृति में इस वायरस को लेकर कोई नकारात्मक स्मृति न हो। यूरोप हो या अमेरिका या विश्वपटल पर अपनी पहचान को लेकर अड़ा चीन सब इसके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव का परिणाम भुगत रहे हैं।

अब सभी राष्ट्र इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि कैसे इससे बचने के लिए वैक्सीन जल्दी से जल्दी बने। अमेरिका, भारत और चीन सहित कई देश इस महामारी से बचने हेतु वैक्सीन पर काम कर रहे, मगर यह कार्य अभी शुरुआती दौर में हैं, इसलिए वैक्सीन की खोज और उसका उत्पादन तथा उसके सभी तक पहुंचने में अभी काफी समय है।

सभी राष्ट्रों में इस महामारी ने वहां की आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक जीवन में परिवर्तन लाया है। इस वायरस ने अगर किसी पहलू को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, तो वह व्यक्ति का सामाजिक पहलू। वायरस ने व्यक्ति की सामाजीकरण की गति और स्वरूप पर विशेष प्रभाव डाला हैं। बहुत से राष्ट्रों में समाजों का व्यवहार व चरित्र दोनों बदल गया है। भारत में भी पलायन के फलस्वरूप समाज के व्यवहार का परीक्षण भी हुआ और इसमें परिवर्तन भी हुआ।

इस महामारी ने लोगों को घरों में कैद कर दिया हैं, जिसके कारण लोगों की उपस्थिति सामाजीकरण वाले स्थानों पर नगण्य हो गई है। इस महामारी की प्रवृत्ति लोगों को सामूहिकता की भावना से विमुख कर रही है। लगातार लॉकडाउन के कारण लोगों की सामाजिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने की स्मृतियां भी क्षीण होने लगेगी क्योंकि लोगों का सार्वजनिक स्थानों पर जाना बंद या बहुत सीमित हो गया है।

एक समाज के रूप में हम अपनी कई आवश्यकताओं के लिए एक दूसरे पर निर्भर हैं। लोगों से मिलना, परस्पर व्यवहार और संवाद सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग हैं। मगर इस बीमारी के अचानक आगमन ने इन सब प्रक्रियाओं को रोक दिया है। हम तकनीक, विशेष रूप से मोबाइल फोन और अन्य माध्यमों को समाज में व्यक्तिवादिता को बढ़ाने का कारक मानते थे, मगर इस महामारी ने इस प्रक्रिया को सहसा बढ़ा दिया है।

इस महामारी में यह आवश्यक है कि हम भौतिक दूरी बनाकर रखें, क्योंकि इसी के माध्यम से ही हम इस महामारी को अपने से दूर कर सकते हैं। भारत जैसे देश में जहाँ जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है और संसाधन कम, वहां भौतिक दूरी को कायम करने के एकमात्र उपाय के रूप लॉकडाउन को अपनाया गया है, क्योंकि सामान्य साधनों से भौतिक दूरी को कायम करना संभव नहीं हैं।

इस महामारी के दौर ने एक बात और स्पष्ट की है, वह यह कि इस प्रकार के दौर में जब आर्थिक, सामाजिक अनिश्चितता बढ़ रही हैं, ऐसे समय व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सहायता की और भी ज्यादा आवश्यकता हैं। जो लॉकडाउन की परिस्थितियों में संभव नहीं हैं।

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इस समय हमारे समाज में ऐसी बहुत बड़ी जनसंख्या है, जिसको भावनात्मक सहायता की आवश्यकता हैं। वरिष्ठ नागरिक, बच्चे, अकेले रह रहे परिवार, शहरों में अटके मजदूर सभी एक अनिश्चितता और नकारात्मकता के दौर से गुजर रहे हैं। इनको आवश्यक वस्तुएं फिर भी प्राप्त हो जा रही हैं, क्योंकि इनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कई सारे समूह कार्य कर रहे हैं, मगर इनको भावनात्मक सहयोग तथा मनोवैज्ञानिक सहायता देने हेतु बहुत कम संस्थाएं ही कार्य का रही हैं।

तकनीकि जिसे भौतिक दूरी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार माना जा रहा था, वह संकट की इस घड़ी में बहुत सहायक सिद्ध हो सकती है। हमें तकनीक की सहायता से भौतिक दूरी कायम करते हुए सामाजिक और भावनात्मक दूरी को कम करना होगा|
 
इस कठिन समय में जब शासन स्वयं लोगों को एकांत के लिए प्रेरित कर रहा हो और भौतिक दूरी को बढ़ाने के संस्थागत प्रयास हो रहे हैं, ऐसे समय यह आवश्यक है कि सामाजिक संस्थाएं आगे निकल कर आएं और भौतिक दूरी और सामाजिक दूरी में भेद स्पष्ट करते हुए, समाज में फ़ैल रही सामाजिक दूरी को कम करने का प्रयास करें क्योंकि सामाजिक दूरी, भावनात्मक दूरी बढ़ाने का कार्य कर रही है।

अब जब केंद्र सरकार ने एक वृहद राहत पैकेज घोषित कर दिया है और यह उम्मीद की जा रही है कि लोगों की आर्थिक गतिविधियों में कुछ गति मगर अर्थव्यवस्था को अपने पूर्व की अवस्था में आने में कुछ माह अवश्य लगेंगे| रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने भी आर्थिक विकास की दर नकारात्मक रहने की संभावना जताई है। ऐसे समय में जब सामाजिक और आर्थिक जगत से नकारात्मक संकेत मिल रहे हों, हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी सकारात्मकता को बरक़रार रखना है।

हर समाज में सभी प्रकार के लोग होते हैं, किसी को समाज का सकारात्मक पहलू दिखाई पड़ता है तो किसी को समाज का नकारात्मक पहलू| नकारात्मक कहानियां भी समाज में कही जा रही हैं, जिनमें कुछ सत्य और कुछ अनुमान और कल्पना आधारित। मगर ऐसे समय में आशा और सद्भावना आधारित सकारात्मक कहानियां भी कही जानी आवश्यक है।

ऐसे में व्यक्तियों, संस्थाओं का सामने आना आवश्यक है, जो आशा और संभावना की कहानियां लोगों को सुनाएँ, जो केवल यथार्थ के नाम पर अंधकार की बात न सुनाएँ अपितु लोगों को उजाले की राह भी दिखाएँ।

भारतीय समाज में बहुत से ऐसे लोग हैं जो आशा और संभावना की कहानियां सुनाना जानते हैं। हमारे देश में ऐसे बहुत से अनौपचारिक संस्थान हैं, जो लोगों प्रेरित करते हैं। ऐसे सभी समूहों और व्यक्तियों की सहायता ली जानी चाहिए जो नए समाज में उत्साह और नव सृजन के बीज बो सकें|