नेपाली प्रधानमंत्री का भारत के ऊपर सांस्कृतिक अतिक्रमण का आरोप समझ से परे

    दिनांक 15-जुलाई-2020
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गोकुलेश पाण्डेय
 

नेपाल के प्रधानमंत्री ओली ने भारत पर सांस्कृतिक अतिक्रमण का आरोप लगाते हुए कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या भारत में नही अपितु नेपाल में है। निश्चित ही उनका यह कहना न केवल तथ्य से परे है बल्कि हास्यास्पद भी है।

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हाल ही में नेपाल के प्रधानमंत्री ओली ने भारत पर सांस्कृतिक अतिक्रमण का आरोप लगाया है। ओली के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या भारत में नही अपितु नेपाल में है। भारत ने सांस्कृतिक अतिक्रमण करके अयोध्या उत्तर प्रदेश को राम जन्मभूमि के रूप में मान्यता दी हुई है।

भारत नेपाल का बड़ा सहयोगी के साथ-साथ व्यापार और विदेशी मुद्रा का प्रमुख स्रोत है। भारत व नेपाल के मध्य सांस्कृतिक संबंध सदियों पुराना है। इसलिए नेपाली प्रधानमंत्री का ऐसा कहना न सिर्फ भारत और नेपाल के सांस्कृतिक रिश्तों पर आघात है,अपितु हास्यास्पद भी है। भारत में विशेषकर हिंदुओं के मध्य राम जन्मभूमि, अयोध्या की स्थिति और अस्तित्व को लेकर कोई विवाद नहीं है। ओली को ऐसा बयान देने से पहले यह सोचना चाहिए कि भारत और नेपाल की सांस्कृतिक -आध्यात्मिक अवधारणाएँ एक हैं। हमारी धार्मिक मान्यता, धर्मग्रंथ और देवता एक हैं। ऐसे में किसी अल्पकालिक विवाद के चलते कोई भी ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिए जो दोनों देशों के सुदीर्घ सांस्कृतिक सम्बन्धों को छिन्न भिन्न कर दें।


वैसे भी प्रत्येक हिन्दू धर्मावलम्बी भगवान राम के जन्म स्थान और जीवन के अन्य कथानकों के संदर्भ में वाल्मीकि रामायण और व्यास द्वारा विरचित आध्यात्म  रामायण को ही प्रमाणित ग्रंथ मानता है। इस बात पर भारत और नेपाल में बिल्कुल भी मतभिन्नता नहीं है। ये दोनों ही ग्रन्थ अत्यन्त प्राचीन व सर्वस्वीकृत हैं। लेकिन दोनों की भाषा संस्कृत हैं जो अत्यन्त क्लिष्ट है और सबकी समझ में नहीं आती। इसलिए रामायण का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ।

वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण को आधार बनाकर अब तक अन्नामी, बाली, बांग्ला, कम्बोडियाई, चीनी, गुजराती, जावाई, कन्नड़, कश्मीरी, खोटानी, लाओसी, मलेशियाई, मराठी, ओड़िया, प्राकृत, संस्कृत, संथाली, सिंहली, तमिल, तेलुगु, थाई, तिब्बती, कावी आदि अनेक भाषाओं में रामायण लिखी जा चुकी हैं। इसी क्रम में नेपाली भाषा में भी सन 1853 में सुप्रसिद्ध नेपाली कवि भानुभक्त द्वारा भगवान राम का जीवन चरित्र लिखा गया जिसका स्त्रोत और प्रेरणा महर्षि वेदव्यास द्वारा विरचित अध्यात्म रामायण ही है। भानुभक्त द्वारा लिखी गई रामायण नेपाल का सर्वमान्य ग्रंथ है और उन्होंने अन्य भारतीय धर्म ग्रंथों के अनुरूप अयोध्या की स्थिति सरयू नदी के तट पर अर्थात जो वर्तमान अयोध्या है वही मानी है।

ऐसे में  नेपाली प्रधानमंत्री का भारत के ऊपर सांस्कृतिक अतिक्रमण का आरोप समझ से परे है। दरअसल भारत नेपाल के मध्य तनाव का तात्कालिक कारण भले ही  सीमा विवाद हो किन्तु मूल कारण चीन का भारत के प्रति विद्वेष है।अगर नेपाल की भौगोलिक संरचना को देखें तो इसकी सीमायें तीन ओर से भारत से जुड़ी हैं और एक एक ओर से तिब्बत से!  इस दृष्टि से नेपाल भारत और चीन दोनों ही देशों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। भारत सांस्कृतिक एकता और रोटी-बेटी के संबंध के चलते नेपाल का सहयोग करता रहा है जबकि चीन इसे अपनी सामरिक रणनीति का हिस्सा बनाना चाहता है।चीन नेपाल में भारत की पकड़ को कमजोर कर नेपाल और अन्य पड़ोसियों के माध्यम से भारत की घेराबंदी करना चाहता है, जबकि भारत  नेपाल को एक स्वतंत्र राष्ट्र और अपने सहयोगी के रूप में देखता है। भारत नेपाल की आर्थिक -सामाजिक और शैक्षणिक उन्नति चाहता है।

संभवतः इसलिए नेपाल को अन्य देशों के साथ व्यापार करने के लिए भारत ने पारगमन की सुविधा दे रखी है। समुद्री व्यापार के लिए नेपाल कोलकाता बंदरगाह का उपयोग करता है। इसके अतिरिक्त बिजली -पर्यटन ,आपदा प्रबंधन और सेवा के क्षेत्र में नेपाल में मूलभूत सुविधाओं के विकास में भारत की बड़ी भूमिका रही है। भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट में नेपाल के पहाड़ी इलाकों से युवाओं की भर्ती की जाती है। इसके अतिरिक्त भूकम्प-प्राकृतिक आपदा आदि के समय भी भारत नेपाल को मानवीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध करवाता रहता है।

भारत  की नेपाल के प्रति यह सहृदयता और संवेदनशीलता यूं ही नहीं है।भारत और नेपाल सांस्कृतिक दृष्टि से एक हैं। भारत में स्थित केदारनाथ मंदिर का आधा भाग नेपाल के पशुपति नाथ मंदिर को माना जाता है।नेपाल की गण्डकी नदी के किनारे पाई जानी वाली शिला को भारत भर में शालिकग्राम अर्थात भगवान के अंश के रूप में पूजा जाता है। गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बनी में हुआ था और उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति बोधिगया बिहार में हुई। ये सभी सांस्कृतिक और आत्मीय जुड़ाव दोनों देशों के बीच भावनात्मक सम्बन्धों का मजबूत पक्ष रहा है। भारत हर प्राकृतिक आपदा में बड़े भाई की तरह नेपाल के साथ खड़ा रहा है। अभी कुछ वर्ष पूर्व  नेपाल में भयानक भूकंप आया था और नेपाल की जनता समेत पूरा विश्व इस बात का गवाह है कि भारत ने इस आपदा काल में नेपाली जनता की ऐतिहासिक मदद की।

सारांशतः भारत- नेपाल के संबंध इतने प्राचीन,प्रगाढ़ और आत्मीय हैं कि उन्हें तोड़ने का कोई भी षड्यंत्र सफल नहीं हो सकता।दोनों देशों के मध्य साझा सांस्कृतिक विरासतों,आजीविका और विवाह संबंधों की परस्पर पवित्र नींव है और इसे ही रोटी-बेटी का रिश्ता कहा जाता है। चूँकि भारत बड़ा और अधिक समर्थ देश है इसलिए इन सम्बन्धों को सम्हालकर रखने की जिम्मेदारी उसी की है। दोनों देशों के मध्य द्विपक्षीय मसलें हैं, उन्हें अविलम्ब बातचीत के द्वारा सुलझाया जाना चाहिए। भारत और नेपाल के मध्य प्रगाढ़ मैत्री संबंध समूची दुनिया के लिए उदाहरण है और  इसे बरकरार रखने की आवश्यकता है।