रेशम का फंदा-2 : ‘चीन की बैसाखी छोड़, अपने कौशल को निखारना होगा हमें’

    दिनांक 15-जुलाई-2020   
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गत 3 जुलाई को पाञ्चजन्य की ‘रेशम का फंदा’ वेबिनार श्रृंखला की दूसरी कड़ी में भारत-चीन तनाव के बीच दोनों देशों के आर्थिक और औद्योगिक परिदृश्य पर  विस्तार से विमर्श हुआ। वेबिनार के दूसरे सत्र में पत्रकारों ने उनसे कई सवाल किए जिनके विशेषज्ञों ने खुलकर उत्तर दिए। यहां प्रस्तुत हैं उसी सत्र के संपादित अंश

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अमेरिका से लेकर यूरोप और भारत तक चीन ने अपना संजाल बिछाया हुआ है। भारत के संदर्भ उसकी काट क्या है? और दुनिया के संदर्भ में यह क्यों आवश्यक है?

चीन करीब 70 देशों से व्यापारिक दरों पर व्यवहार कर रहा था, कई जगह परियोजनाओं का मूल्य जरूरत से ज्यादा भी था। जिन चीजों में चीन ने पैसा लगाया है उनमें से ज्यादातर देशों के लिए वे वहनीय नहीं रही हैं। बेल्ट एंड रोड परियोजना से जुड़े बहुत सारे देश इस पर पुनर्विचार कर रहे हैं, खासकर कोरोना के बाद वस्तुओं की कीमतें नीचे गिरने के बाद। इससे विकसित देशों की योजनाओं की क्षमता लगभग खत्म हो गई है। सारे देश इस चीज को अब महसूस कर रहे हैं। उन्हें लगने लगा है कि इसमें उतरने के बाद पूरे जीडीपी का 20 प्रतिशत चीन की उक्त परियोजना पर ही व्यय हो जाएगा। इसमें थोड़ा समय लगेगा, पर सभी देशों को विचार करना होगा कि ये पारदर्शिता से हो। लगभग 40 देश ऐसे हैं जिनको ये सोचना पड़ेगा। चीन-पाकिस्तान आर्थिक कोरिडोर का काम लगभग ठप हो गया है। चीन अब चाबहार के रास्ते आगे बढ़ने की सोच रहा है। इसलिए निश्चित रूप से इसको हम रोक पाएंगे।
आर्थिक पक्ष की बात करें तो हमारे सोलर पैनल में गुणवत्ता की कमी नहीं थी, पर ये चीन से लेने पड़े थे। चीन ने हमारे यहां इसकी डंपिंग शुरू की। अमेरिका और जापान से उलट, हमारे यहां सरकार पर दबाव बनाया गया कि एंटी डंपिंग शुल्क न लगाया जाए। हमारे मूल उद्योगों का कहना था कि उन्हें आर्थिक क्षेत्र में प्रश्रय मिले। हमने सभी क्षेत्रों में एंटी डंपिंग शुल्क लागू नहीं किया, इसके कारण हमारे उद्योगों का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा। इसलिए हमें कदम तो उठाना होगा। हमें आयात के इकोसिस्टम को कौशलयुक्त बनाने पर सोचना चाहिए।
जैसे आज हमारे यहां विद्युत से चलने वाले वाहनों का इकोसिस्टम नहीं है। 2030 तक केवल लीथियम बैटरी का बाजार 30 करोड़ का हो जाएगा। हम अभी कच्चे माल की उपलब्धता पर नहीं सोच पा रहे हैं कि लीथियम कहां से लाएंगे। हमें इस पर सोचना चाहिए क्योंकि टाटा आदि कंपनियों ने हाड्रोजन ईंधन पर आधारित बसें विकसित कर ली हैं। अगर पेट्रोल और डीजल इंजन देश में बनना बंद हो जाएंगे तो देश में 20 से ज्यादा कंपनियां प्रभावित होंगी। बिजली वाहन में केवल 20 पुर्जे लगेंगे। इसे अभी तक हमने विकसित नहीं किया है। अगर इन्हें हमें आयात करना पड़ा तो ये बहुत बड़ी चुनौती होगी। यदि हमें कोई भी चीज आयात करनी पड़े तो आर्थिक सेहत के हिसाब से यह ठीक नहीं होगा। जिन चीजों के लिए हम चीन पर टिके थे उनके निर्माण के लिए तंत्र विकसित करना होगा। हमें इनोवेशन के लिए आधार बढ़ाना होगा, जिससे हम दुनियाभर में अपना माल भेज सकें। हमने जीएसएम टेक्नोलॉजी विकसित की। इसी की देखादेखी और देश जीएसएम टेक्नोलॉजी में गये। उस समय चीन का 2जी में कहीं नाम नहीं था। लेकिन 3जी के समय चीन पानी की तरह पैसा बहाया और यूरोपीय तकनीक को अपने यहां आने नहीं दिया जिसके कारण 3जी का चीन में फैलाव नहीं हो सका। हमें सभी क्षेत्रों में घरेलू तकनीक विकसित करनी होगी।

हमारे देखते—देखते चीन भारत के तकनीकी क्षेत्र में, विनिर्माण क्षेत्र आदि हर क्षेत्र पर कब्जा करता चला गया। क्या हमारे नीति निर्माताओं, उस समय की सरकारों को ये सब नहीं दिखा? क्या हमने जानबूझकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी? साथ ही, मलक्का की खाड़ी से चीन को तेल जाता है। अगर मलक्का की खाड़ी का रास्ता हम बंद कर पाएं तो क्या चीन को तगड़ी मार नहीं पड़ेगी? क्या ऐसा करने हम समर्थ हैं? क्या भारत अपने मित्र देशों के साथ मिलकर ऐसा कर सकता है? क्या मलक्का की खाड़ी में चीन को फंदे में घेरा जा सकता है?

2004 के बाद जो सरकार आयी यानी संंप्रग की 10 साल सरकार रही, उसकी नीतियों में अस्पष्टता रही कि आखिर इस देश को किस रास्ते ले जाना चाहिए। इस देश को लेकर उनकी जो कल्पना थी वह ठीक नहीं थी। दूसरे, कांग्रेस 10-12 साल सत्ता में रही, उसमें मौजूद कम्युनिस्ट लॉबी के कारण हमारे देश को गर्त में जाने दिया गया। इसका उदाहरण यह है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने राहुल गांधी के रास्ते देश की राजनीति में प्रवेश किया। उस समय सत्ता में रहने वालों ने देश में चीन समर्थित कम्युनिस्टों की भ्रष्ट नीति को बढ़ावा दिया। सोनिया गांधी की राजीव गांधी फाउंडेशन और चीन के बीच समझौता हुआ, उसी में तय नीति के अनुसार सब चलता रहा। कांग्रेस और कम्युनिस्टों की गलत नीतियों के कारण आज भारत के लिए चीन सिरदर्द बना है।
दूसरी बात है मलक्का की खाड़ी की, तो ये 550 मील का इलाका है सुमात्रा और मलेशिया के बीच। हिन्द महासागर और प्रशांत से होकर व्यापार का आदान—प्रदान यहां से होता है। हमारे पूर्व नौसेना अध्यक्ष एडमिरल लांबा ने पोर्ट ब्लेयर के पास एक बेस की अनुमति दी थी, ताकि भारतीय नौसेना वहां की गतिविधियों पर नजर रख सके। पिछले दस साल में अमेरिका, इराक और अफगानिस्तान का आधा ध्यान प्रशांत पर रहने के कारण एक तरह से चीन को यहां खुलकर खेलने का मौका मिल गया। चीन भारत को हिमालय में इसलिए उलझाए रखना चाहता है ताकि मलक्का और दक्षिण चीन सागर में हमारी ज्यादा दखल न हो पाए। लेकिन हमें उस इलाके में निगरानी बढ़ाने की आवश्यकता है। खासकर इन दिनों दक्षिण चीन सागर में फिलिपींस, वियतनाम के साथ मिलकर अमेरिका ने पांच जगह अपने बेस बढ़ाए हैं, उससे चीन की हेकड़ी कम हुई है।
आज  के हालात में हमें 'ट्रिपल चाइना पॉलिसी' पर आना चाहिए। थोड़ा पलट कर देखें तो यूएन में हमने तिब्बत का मुद्दा नहीं उठाया। यह जरूर कहा कि तिब्बत के लामाओं की हम मदद करेंगे। उस समय नेहरू जी एवं अन्य लोगों ने कहा कि यह तिब्बत और चीन का आंतरिक मामला है। उस समय उस पर भारत में चर्चा नहीं होने दी। लेकिन अब सही समय आ गया है कि हम 'वन चाइना पॉलिसी' से पीछे हटें।

चीन और भारत के बीच एक तरह से विचारधाराओं की लड़ाई है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देश एक साथ आएं और एक स्तर पर आकर आपस में व्यापार करें, इन्हीं देशों की कंपनियों को बढ़ावा दिया जाए?

अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों को स्वतंत्रता देने के कारण वहां से उनका पलायन हुआ। अगर सभी देश अपने—अपने देश में औद्योगिक निर्माण कर अपने देश की आपूर्ति करें तो चीन का नीचे गिरना निश्चित है। चीन का 70 प्रतिशत माल निर्यात होता था। 2016 में जिन कंपनियों का दिवाला निकला उन कंपनियों को चीन ने इक्विटी में बदल दिया। जो उनका कर्जदार था वह उनका शेयर 'होल्डर' माना गया। चीन की ऐसी नीति को देखते हुए हमें अपने उत्पादों को उच्च स्तर पर ले जाकर बाजार बनाना होगा। एक समय अमेरिका और कनाडा ने सीमेंट का सस्ता निर्माण किया था, जिससे वहां के सारे सीमेंट उत्पादकों ने हाथ खड़े कर दिए थे। जिस तरह आज हम अन्य देशों को चमड़ा, कपड़ा इत्यादि क्षेत्रों में हमारे यहां निर्माण के लिए बुला रहे हैं उसमें काफी संभावनाएं हैं।


चीन का बहिष्कार क्यों नहीं होता? उसके खिलाफ कोई प्रस्ताव क्यों नहीं पास होते? जिस प्रकार डब्ल्यूएचओ उनके कब्जे में है वैसे ही बहुत सारी चीजें चीन के कब्जे में हैं। दो—तीन वर्ष पहले जब चीन के बाजार में बहुत बड़ी गिरावट आई थी, तो उसने अरबों डॉलर पैसा अपने तंत्र में झोंका। अब कोविड आया है, अब फिर उसने अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में पैसा झोंका है।


जब कभी किसी देश से ऐसा संकट आता है तब हम कहने लगते हैं हम उस देश का समान इस्तेमाल नहीं करेंगे। पर थोड़े दिन बाद सब ठंडा हो जाता है। लेकिन सच यह है कि भारतीय व्यापरियों के लिए आज की तारीख में व्यापार करना बहुत मुश्किल है। हालांकि सरकार की मंशा सकारात्मक है, पर व्यावहारिकता में दिक्कतें आज भी कायम हैं। ऐसे में अपने यहां के उद्योग कैसे पनपेंगे?

पिछले 20-25 वर्षों से डब्ल्यूटीओ में जुड़ने के बाद से हमने अपनी पीठ बहुत थपथपाई। मध्यम वर्ग ने भी राहत महसूस की। लेकिन इतने वर्षों के दौरान हमारी खपत की स्थिति इतनी बिगड़ी है कि वह जल्दी ठीक होने वाली नहीं है। अभी गत 15-20 दिन में जो काम हुए हैं उनसे थोड़ा लग रहा है कि लोगों में जागरूकता आ रही है। इससे तंत्र में एक बड़े बदलाव का संकेत मिला है। चीन की कूटनीति शातिर है। आज चीन में थोड़ी बौखलाहट दिख रही है। देश के जो लोग कर चुकाते हैं या मेहनत से कमाते हैं उन्हें लुटेरा समझना गलत होगा। लुटेरे तो अंग्रेज थे। लुटेरे तो चीनी हैं। हमारे देश के लोग ऐसे नहीं हैं। पहले लघु उघोग के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था। कांग्रेस ने जाते—जाते ऐसे कई कानून बना दिये थे। लेकिन अब नीतियों पर और ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।
 
आज लोग कह रहे हैं कि चीन का माल नहीं खरीदना चाहिए, जबकि और देशों से इसका माल सस्ता होता है। तो ग्राहक सस्ते माल की तरफ जाएगा ही। यहां के लोग चीनी माल खरीद कर मुनाफा कमाते हैं। क्या यह हमारी विफलता नहीं कि हम इस संदर्भ में कोई नीति नहीं बना पाए?


आपके पैसे चीन को जा रहे हैं, इस पर रोक लगायी जाए तो यह अच्छी बात है। इससे स्थानीय उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। अब लोग बदल रहे हैं। हमें बचपन से सिखाया जाता है कि आप अगर दूसरों का पैसा लाकर कहीं लगा रहे हैं तो वह तरक्की है। आप अपना पैसा वहां मत भेजिए। आप उनको कहिए कि आप यहां इकाई लगाएं जिसमें सारे कर्मचारी भारतीय होने चाहिए। मारुती सुजूकी कंपनी जापानी है फिर भी उसके 99 प्रतिशत कर्मचारी भारतीय हैं। चीन ने भारत के पूरे तंत्र को धोखा दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई बार चीन से दोस्ती का हाथ बढ़ाया, यहां तक कहा कि नये सिरे से सीमा विवाद को बातचीत के जरिए निपटाते हैं। लेकिन चीन की नीयत खराब है। हम अपनी सरलता के कारण बड़ा धोखा खा चुके हैं।  अब ऐसा नहीं होना चाहिए और यदि ऐसा होता है तो ये हमारे देश के लिए बहुत खराब बात होगी।

वास्तविकता तो यह है आज देश में हमने एफडीआई को बहुत ज्यादा बढ़ावा दिया है। चीन की कंपनियों का हमारे यहां निवेश 1.5 करोड़ डॉलर का है। ये कंपनियां बाहर से पुर्जे लाकर भारत में केवल 'एसेंबल' करती हैं। निवेश की दृष्टि से कहा जाता है कि अपना पूरा निवेश एक जगह पर केन्द्रित न करें।  चीन की दृष्टि से देखें तो वे अगर कोई बांध बनाते हैं या कोरिडोर, जैसे चीन-पाकिस्तान गलियारा, या जब कोई आईटी कंपनी बनती है तो दूसरे देशों की बड़ी कंपनियां में उसका निवेश या तो ब्रांड पर केन्द्र्रित होता है या परियोजना पर। क्या हमें निकट भविष्य में इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा? बड़ी बड़ी कंपनियां, चाहे आटोमोबाइल में हों या आईटी में या टेलीकॉम में। इन सबमें उनका चीनी हित सर्वोपरि होता है। इस मॉडल को कैसे देखते हैं और इसकी काट क्या है?

पहली बात, अमेरिकी सरकार ने सबसे ज्यादा सरकारी कर्जा चीन में लगा रखा है। दूसरे, चीन के वित्तीय खाते क्या हैं, कोई नहीं जानता। तीसरे, जो आम आर्थिक नीति होती है उसकी सच्चाई वह किसी को नहीं बताता। कोई इस पर सवाल क्यों नहीं उठाता है? चीन का बहिष्कार क्यों नहीं होता? उसके खिलाफ कोई प्रस्ताव क्यों नहीं पास होते? जिस प्रकार डब्ल्यूएचओ उनके कब्जे में है वैसे ही बहुत सारी चीजें चीन के कब्जे में हैं। दो—तीन वर्ष पहले जब चीन के बाजार में बहुत बड़ी गिरावट आई थी, तो उसने अरबों डॉलर पैसा अपने तंत्र में झोंका। अब कोविड आया है, अब फिर उसने अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में पैसा झोंका है। इसलिए कोई सामान्य आर्थिक मापदंड नहीं है, जो चीन पर लागू होते हों। चीन खुद ही नोट छापता है और खुद ही उनको बांटता है। खुद ही अपने सारे आंकड़े बनाता है। चीन के किसी भी आंकड़े पर विश्वास करना कठिन है। चीन की काट अगर कोई है तो वह अमेरिका ही है। अमेरिका में चुनाव होने वाले हैं। उसके बाद ही पता चलेगा कि अगले 5 साल में चीन के साथ क्या होगा। इन दिनों चीन हमारे स्टार्ट अप को भी कब्जे में कर रहा है। उसने गूगल से भी बड़ा सर्च इंजन बना लिया। शायद आगे आने वाले समय में लोग उसी का इस्तेमाल ज्यादा करें। भारत की कई बड़ी बड़ी कंपनियां हमारे यहां चीन की 'डंपिंग' के कारण बंद हो गयीं। इस सबके बारे में समझने की जरूरत है।

आज फिर से स्वदेशी की चर्चा सुनाई देती है। स्वदेशी के संदर्भ में गांधी जी, पं. दीनदयाल उपाध्याय और दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के स्वदेशी मॉडल की बात होती है। आज ये मॉडल कितने प्रासंगिक हैं? क्या आज गांधी जी के मॉडल पर पूरी तरह बढ़ सकते हैं?

आर्थिक क्षेत्र में कोई मॉडल सतत नहीं चल सकता, क्योंकि देश की आर्थिक परिस्थितियां हर छह महीने में बदलती हैं। आज हमें ध्यान देना होगा कि हम जो भी खरीदें वह स्वदेश निर्मित हो। एक समय टाटा के 90 प्रतिशत उत्पाद अपने ही देश में बिकते थे। चीन ने सोचा कि इस तरह की तकनीक विकसित करने में तो समय लगेगा, इसलिए वह दिवालिये होने की कगार पर खड़ी कंपनी को खरीदता है और उसे नई तकनीक के माध्यम से विकसित कर दुनिया में नाम कमाता है। हमारे यहां केवल 14 प्रतिशत स्वदेशी कारें बिकती हैं बाकी विदेशी कारें बिकती हैं। हमें विश्व स्तर का काम करना होगा। गांधी जी की स्वदेशी की परिभाषा उस काल की थी। आज की आवश्यकता के अनुसार इस विषय पर अलग तरह से सोचना चाहिए।
अगर हम कहें कि पिछले 25 साल में हमारे देश में आर्थिक तंत्र मजबूत करने का प्रयास हुआ तो इस दौरान संप्रग का शासन रहा तो राजग का भी रहा। नीतियों में फर्क आ गया। पिछले 25 सालों से तेल की बढ़ती कीमतों पर विपक्ष के राजनीतिक दल बोलते रहे हैं। पर जब वही दल सरकार के आते हैं तो सच्चाई समझ में आती है कि हमारा तेल आयात होता है। वक्त के साथ आज सभी चीजों में बदलाव आया है।
भारत का तंत्र सहयोग पर आधारित नहीं है। चीन ने नकल की है परंतु ये काम उसने शुरूआत में किया था। बाद के 15 से 20 साल में चीन ने नकल की बजाय सहयोग पर काम किया। अपने यहां के छात्रों को विदेशी संस्थानों में पढ़ने भेजा। इसमें चीन ने बहुत पैसा लगाया है। चीन हर साल लाखों पेटेंट करता है। आज चीन ने बोइंग हवाई जहाज की तकनीक अपनाने का तरीका ढूंढ लिया है। हमें भी प्रयास तेज करने होंगे। इस समय सहयोग आधारित काम करने में ज्यादा लाभ हो सकता है। हमें उद्योग सहायता संघ बनाने की जरूरत है। यह तय करना होगा कि सबसे पहले जरूरी चीज कौन सी बनानी है। एक कन्सोर्टियम बनाकर जितने भी उद्योग हैं, उनके साथ आगे बढ़ सकते हैं।