गेशे जम्पा

    दिनांक 16-जुलाई-2020
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नीरजा माधव

तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी। अपने देश को आजाद कराने की उम्मीद लिए अपनी निर्वासित सरकार को भारत के हिमाचल प्रदेश में पीठासीन किया। भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बने रहे। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की तीसरी कड़ी

book_1  H x W:

चल, आ बेटा। कहानी सुनेगा? दोलमा ताशी को गोद में लेकर बहलाने की चेष्टा करने लगी थीं। ‘नहीं, मैं नहीं सुनूंगा। मुझे मां के पास भेजो। मैं उसके पास सोऊंगा। मां...’। ताशी बिलख पड़ा था। दोलमा ने उसे अपने चीवर में छिपाते हुए कहा-देखो, बाहर कितना कुहरा छाया हुआ है। बहुत ठंड है। धूप निकलने पर चलेंगे। ठीक है? ‘नहीं, मां के पास...’, ताशी मचलकर गोद से उतरने लगा। मैं भी तो मां हूं न। सभी लोग मुझे माई कहते हैं। देखो, तुम्हारी मां जैसी हूं न? ताशी अचकचाकर दोलमा की ओर देखने लगा। कुछ पल उसका रोना रुका तो दोलमा ने उसका ध्यान बंटाया-जब मैं यहां आई थी न, तो यहां के जंगल में इतना बड़ा यॉक था...। ताशी आश्चर्य से उसके मुंह की ओर देखने लगा। अरे बहुत बड़ा...इससे भी ऊंचा...। अरे बाबा, बड़ी ठंड है बाहर। चल, कमरे में चलें। वहीं बताऊंगी कि कितना बड़ा था यॉक। वह उसे अपनी शाल में दुबका कमरे की ओर लपकी। हाथ से इशारा किया गेशे जम्पा को अपने कक्ष में जाने का।

गेशे जम्पा मंथर कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़े। सारनाथ में बिड़ला धर्मशाला के सामने फुटपाथ पर अपनी दुकान लगाए बैठी लोब्जंग सड़क पर आते-जाते देशी-विदेशी पर्यटकों को उम्मीद के साथ देख रही थी। ऊनी शॉल, स्वेटर और टोपियां सजाए ग्राहकों की प्रतीक्षा में आज सुबह से शाम होने जा रही थी, परंतु कोई विशेष बिक्री नहीं हो पाई थी। दोपहर में शहर की कोई महिला भूले-भटके उसकी दुकान पर आई और अपने दस वर्षीय बच्चे के लिए एक स्वेटर का मोलभाव करने लगी।

हुं... इतना, महंगा? गोदौलिया पर तो इसी तरह का स्वेटर सवा सौ रुपए में देने के लिए पीछे पड़ा था। सैकड़ों दुकानें लगी हैं। महिला ने मुंह बिचकाया था। अरे मैदम जी, वो मशीन का काम होगा। ये हाथ से बुना है मैंने। लोब्जंग स्वेटर के फंदे तानकर महिला को दिखाने लगी थी। तो क्या हुआ? महिला निर्विकार थी। मैदम जी हाथ की चीज में और मशीन में फर्क होता है, जैसे घर के खाने और होटल में। देना हो तो, दो। हम डेढ़ सौ से ज्यादा नहीं देंगे। महिला ने अपना अंतिम फैसला सुनाया। लोब्जंग को उम्मीद पर पानी फिरने का एहसास हुआ था। सूखे ओठों पर जीभ फेरते हुए उसने बुझे स्वर में कहा-बोहनी का समय है, मैदम जी। सुबह से नहीं हुई है इसलिए दे रही हूं। उसने स्वेटर महिला के हाथ में पकड़ा दिया था।

पेमा की मोटरसाइकिल पास आकर रुकी तो लोब्जंग ने सिर उठाकर देखा। इस समय वह महिला द्वारा दिए रुपये गिनने में तल्लीन थी। मां, आज मुझे कम्प्यूटर वाले सर को कुछ गिफ्ट करना है। उनकी मैरिज-एनीवर्सरी है आज। पेमा ने लोब्जंग को बताया। तो? लोब्जंग कुछ खिन्न-सी हो उठी। तो क्या? सारे लड़के चंदा लेकर कोई बड़ा-सा गिफ्ट देना चाह रहे हैं। सौ रुपये हर एक को देना है। और यदि तू न जाए फंक्शन में तो? लोब्जंग ने कहा। अरे, क्या बात करती हो, मां? उनकी निगाह में मैं गिर नहीं जाऊंगा? फिर कम्प्यूटर वाली डिग्री लेनी है कि नहीं?

पेमा, तुझे तो मालूम है कि घर की स्थिति क्या है? दावा की ड्रेस नहीं है। बैग भी फट गया है। किरायेदार भी इस समय नहीं है मकान में। लोब्जंग दैन्य भाव से दुहराने लगी थी। मकान की किरायेदारी से एक बंधी-बंधाई राशि मिलती थी, जिससे गृहस्थी किसी तरह खिंच जाती थी। वह तो अच्छा था कि समय रहते लामा जी ने यहीं कालोनी में एक छोटा-सा घर बनवा लिया था। आस-पड़ोस में कई तिब्बती परिवार घर बनवाकर बस गए थे। वैसे उस कालोनी में दूसरे शहरों से तथा बनारस की संकरी गालियों में रहने से ऊबे हुए लोगों ने भी जमीनें खरीदकर घर बनवा लिये थे। भारतीयों और तिब्बतियों की मिश्रित कालोनी थी वह।

लोब्जंग के पति लामा सोनम डक्पा ने विवाह के बाद किस्तों में जमीन खरीदी और धीरे-धीरे तीन-चार कमरे बनवा लिए। अब जब वे वृद्धावस्था और बीमारी के कारण बिस्तर पर थे तो इन्हीं कमरों में से दो को किराये पर उठा दिया। लोब्जंग स्वयं फुटपाथ पर मौसम के अनुसार दुकान लगाने लगी थी। गृहस्थी की गाड़ी चल निकली थी। पेमा को उसी की इच्छा पर कम्प्यूटर का कोर्स करवा रही थी। दस वर्षीय दावा का नाम प्रारंभिक भोट संस्कृति शिक्षा संस्थान में ही लिखवा दिया था। वहां वह नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहा था। पेमा को भी वह उच्च तिब्बती अध्ययन के लिए धर्मशाला के नोरबुलिंग्का इन्स्टीट्यूट में भेजना चाहती थी पर वह सारनाथ छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुआ। लोब्जंग पर बिना दया किए पेमा सौ रुपए लेकर चला गया था। पचास रुपये का नोट अपनी छुपा के पॉकेट में रखे लोब्जंग फुटपाथ पर ही अपनी बगल में बैठे छोटे बेटे दावा को मौखिक पढ़ाने लगी थी। 'सा यानी प्लैनेट यानी हिन्दी में नक्षत्र'। वह दावा को समझा रही थी। तिब्बती भाषा के साथ हिन्दी और अंग्रेजी का ज्ञान भी जरूरी मानती थी लोब्जंग, परंतु तिब्बती बच्चों को स्थानीय लोगों के साथ रहते-रहते हिन्दी तो आ जाती थी, तिब्बती और अंग्रेजी सिखानी पड़ती थी।

हम अंग्रेजी क्यों पढ़ते हैं मां? दावा ने भोलेपन से पूछा। ताकि जब तुम विदेश जाओ तो बोल सको। और तिब्बती क्यों पढ़ते हैं? ताकि अपनी भाषा याद रख सको। लोब्जंग ने समझाया। क्या हमारी भाषा हिन्दी नहीं है? 'नहीं..है।...दोनों हैं। पर हम तिब्बती हैं न, इसलिए...' लोब्जंग अचकचा गई थी नन्हे दावा के प्रश्न पर। क्या हम त्तिबती भाषा सीखकर तिब्बत जाएंगे, मां? दावा की उत्सुकता बढ़ रही थी। हां, हो सकता है..कभी..। लोब्जंग खो सी गई थी। यहां का घर छोड़ देंगे? बगल वाला गोलू भी चलेगा?

अच्छा, अब तू लगा बहकने। पता नहीं। सा-दा-वा यानी सोमवार जिसको मण्डे कहते हैं। लोब्जंग ने आगे पढ़ाया। मेरा नाम दावा है, तो मैं सोमवार हूं? नहीं, तू सोमवार को पैदा हुआ था इसलिए तेरे पिताजी ने यह नाम रखा। अच्छा। और गोलू किस दिन? मेरा सिर। पढ़ाई के समय तेरा दिमाग पूरी दुनिया में नाचता है। ला कॉपी। मैं लिख दूं। कल रटकर सुनाना मुझे। और लोब्जंग दावा की कॉपी में दिनों के तिब्बती नाम लिखने लगी थी-सा-मिक-मार (मंगलवार), सा-लक-पा (बुधवार), सा-फुर-बू (बृहस्पतिवार), सा-पा-संग् (शुक्रवार), सो-पेन-पा (शनिवार)। 'मां, हमारे स्कूल में बहुत-से बच्चे आए हैं। वो हम लोगों से बात नहीं कर पाते। केवल हमारी दोलमा माई और जम्पा गेला से बात करते हैं। दावा ने सूचना दी। लोब्जंग ने पूछा-कहां से आए हैं? तिब्बत से। माई बता रही थीं हम लोगों को। हमारी हिंदी वाली मैडम देवयानी भी बता रही थीं। क्या? यही कि ताशी, मंग्फे, छुंग्ची सब हम लोगों के साथ पढ़ेंगे। ताशी तो कल पूरी रात अपनी मां के लिए रोया था। कितना बड़ा है रे ताशी? लोब्जंग के स्वर में सहानुभूति थी। ‘हमसे छोटा। मेरे यहां तक’, दावा ने दाहिना हाथ अपने कंधे पर टिकाते हुए कहा। ‘च्च च्च। हे तथागत’...लोब्जंग ने सामने बुद्ध मंदिर की ओर दोनों हाथ जोड़कर सिर नवाया।

लोब्जंग दावा कॉपी में दिनों के तिब्बती नाम लिखने लगी थी-सा-मिक-मार (मंगलवार), सा-लक-पा (बुधवार), सा-फुर-बू (बृहस्पतिवार), सा-पा-संग् (शुक्रवार), सो-पेन-पा (शनिवार)। 'मां, हमारे स्कूल में बहुत-से बच्चे आए हैं। वो हम लोगों से बात नहीं कर पाते। केवल हमारी दोलमा माई और जम्पा गेला से बात करते हैं।

अंधेरा बढ़ रहा था। शाम से ही कुहरा छाने लगा था। ग्राहकों की अब कोई उम्मीद न थी। उसने कपड़ों का बड़ा-सा गट्ठर बांधा और अपनी पीठ पर लाद लिया था। दावा के साथ वह घर की ओर चल पड़ी थी। काले रंग के छुपा के ऊपर सामने की ओर लटकता धारीदार पांग्छेन उसके वैवाहिक होने का प्रमाण था। खुले बालों को लपेटकर एक रिबन से कसकर बांध लिया था लोब्जंग ने। आज लामा जी के लिए अनार नहीं ले जाओगी क्या, लोब्जंग दीदी? चौराहे पर फल वाले ठेले के सामने से गुजरते हुए रामधारी पटेल की पत्नी फुलवा ने पूछा था। नहीं फुलवा, आज है अभी घर में। लोब्जंग ने थोड़ा ठमकते हुए उत्तर दिया।

ले लो दीदी। आज ही पहड़िया मंडी से लेकर आई हूं। एकदम ताजा है। फलवा ने दो अनार हाथों में उठाकर दिखाए थे। लोब्जंग रुककर उसके हाथों से अनार लेकर देखने लगी थी।

कैसे दोगी? उसने भाव पूछा। अरे दीदी, आपसे कभी मोल-भाव किया है? सबको चालीस रुपये किलो देती हूं। तुमको पैंतीस लगा दूंगी। लोब्जंग को याद आया कि जेब में मात्र पचास रुपये ही हैं। अभी घर के लिए चावल और आलू, टमाटर भी खरीदने हैं। उसने अनार ठेले पर रखते हुए कहा-अभी रहने दो, फुलवा। कल ले जाऊंगी। अरे दीदी, ले जाओ। पैसे बाद में देती रहना। यह कहते हुए उसने एक किलो अनार तोलकर लोब्जंग को पकड़ा दिये। लोब्जंग ने संकोच के साथ जेब से पैसे निकालकर दे दिए थे। आज तक उसने किसी से उधार नहीं लिया था सारनाथ में। अनेक मुसीबतें झेल जाने के बाद भी उसका आत्मसम्मान सुरक्षित था।

पेमा के पैदा होने के बाद ही पहला पति उसे छोड़कर न जाने कहा भाग गया था। तब से लेकर आज तक वह अपने और बच्चों के जीवन की सुरक्षा के लिए संघर्षरत थी। बचपन में मां-बाप से बिछुड़ी लोब्जंग ने अधेड़ तेनजिन के साथ विवशता में विवाह कर लिया था। उस समय तेनजिन एक मठ में चौकीदार था। समाज में अनेक कुदृष्टियों का सामना करने से बेहतर समझा था लोब्जंग ने किसी एक के साथ स्वयं को जोड़ लेना। उसके मद्यपान से लेकर शारीरिक यंत्रणा तक को चुपचाप सहती रही थी। मठ के परिसर में ही निर्मित फूस के झोंपड़े में वह तेनजिन के साथ रहती थी। कभी-कभी पति-पत्नी की मारपीट में मठ के लामा सोनम डक्पा हस्तक्षेप करते। उस समय लामा सोनम डक्पा की उम्र लगभग पैंतीस-चालीस वर्ष के आसपास रही होगी। लोब्जंग उस समय मात्र उन्नीस वर्ष की युवती थी। (जारी...)