मलयालम साहित्य परंपरा के शिरोमणि तुंचत् रामानुजन एड्जुतचन ने केरल और दक्षिण भारत में ईसाइयत के प्रचार और साजिश को कुंद कर लोगों में भरा ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास

    दिनांक 16-जुलाई-2020
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रवि कुमार

तुंचत् रामानुजन एड्जुतचन को मलयालम साहित्य में वही स्थान प्राप्त है,जो हिंदी में गोस्वामी तुलसीदास जी को हासिल है। एड्जुतचन का आगमन उस वक्त हुआ जब केरल और दक्षिण भारत की सामाजिक परिस्थिति उथलपुथल से भरी थी। यूरोपियन्स का आगमन शुरू हो चुका था और वह अपने साथ पादरियों को ला रहे थे, जो कि ईसाइयत के प्रचार प्रसार में जुटे हुए थे। इसने क्षेत्र में सामाजिक, धार्मिक,राजनीतिक षड्यंत्र का अंतहीन सिलसिला शुरू कर दिया। ऐसे वक़्त में एड्जुतचन नई बयार के तौर पर सामने आए और उन्होंने मुक्त छंदों की शैली में महाकाव्य और ग्रंथों के जरिए लोगों के भीतर ईश्वर में बुनियादी विश्वास को दोबारा स्थापित किया

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तुंचत् रामानुजन एड्जुतचन को मलयालम साहित्य में वही स्थान प्राप्त है, जो हिंदी में गोस्वामी तुलसीदास जी को हासिल है। आमतौर पर माना जाता है कि 16वीं शताब्दी में उनका कालखंड रहा।

उल्लूर परमेश्वरा के मुताबिक वे 1495 में पैदा हुए और 1575 में उनका देहावसान हुआ। उनका पूरा नाम तुंचत् रामानुजन एड्जुतचन था। वह मलयालम के भक्ति कवि और भाषाविद थे। उनको मलयालम भाषा का पितामह कहा जाता है। मलयालम केरल और केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप की मुख्य भाषा मानी जाती है। एड्जुतचन का जन्म आज के मल्लापुरम ज़िले के तिरूर के नजदीक त्रिकनदियूर में हुआ। उनके जन्म स्थान को तुंचत परामबु के नाम से जाना जाता है, जो मल्लालपुरम से 25 किलोमीटर और कोझीकोड से 50 किलोमीटर दूर है। उनको एड्जुतचन नाम सम्मान के तौर पर दिया गया। मलयालम में एडजू का अर्थ होता है-लेखन और चन का मतलब गुरु। यानी लेखन का गुरु। हालांकि एड्जुतचन आज केरल में एक सरनेम भी है। उनके माता-पिता के बारे में मुख्य तौर पर ज्ञात नहीं है। एड्जुतचन किस जाति के थे, यह आज भी बहस का विषय है। हालांकि आमतौर पर यह माना जाता है कि वह शूद्र थे। आज एड्जुतचन ग्रामीण स्कूली अध्यापकों की जाति के तौर पर मानी जाती है। कहा जाता है की एड्जुतचन अपनी बेटी के पैदा होने के बाद सन्यासी हो गए थे और पूरे दक्षिण भारत में भ्रमण करते रहे और आखिर में पलक्कड़ के नजदीक खूबसूरत स्थान चित्तूर में बस गए थे। चित्तूर में उन्होंने भगवान राम और शिव का मंदिर बनवाया और अपने रामानंद आश्रम की स्थापना की। आज भी उनकी समाधि यहां स्थित है। अपने आश्रम में उन्होंने शिष्यों को शिक्षा दी और उनको तैयार किया, जिनमें सूर्य नारायण एड्जुतचन, करुणाकरण एड्जुतचन, देवन एड्जुतचन, गोपालन एड्जुतचन जैसे विद्वान शामिल थे।  उनके द्वारा लिखित अध्यात्म रामायण, महाभारतम, देवी भगवतम और हरिनामा संस्कृतिनाम को मलयालम भाषा की अमर कृतियों का दर्जा हासिल है। मलयालम भाषा को एड्जुतचन की देन अद्वितीय मानी जाती है। उन्होंने अपने काम और अपनी भाषा-शैली में बड़े बदलाव किए और मलयालम भाषा को समृद्ध किया।

एड्जुतचन मुख्यत: राम और कृष्ण के भक्त थे और अध्यात्म रामायण भी उन्होंने रघुवंशम, वाल्मीकि रामायण, चंपू रामायण की मदद से लिखी थी। हालांकि इस ग्रंथ का आधार महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित ब्रह्मांड पुराण के आखरी के अंशों पर है। अपनी दूसरी कृति देवी महाकाव्य में एड्जुतचन ने सर्वव्यापी मां दुर्गा की महानता का वर्णन किया है। एड्जुतचन की ज्यादातर कृतियां कलीपट्टू अंदाज में लिखी गई हैं, जिसमें कथानक का वर्णन सन्यासियों के प्रश्नों के तौर पर होता है और जिसका उत्तर पौराणिक पक्षी शुक देता है। उन्होंने अपनी कृतियों में कई छंदों का प्रयोग किया, जैसे— केका, ककाली स्लेथाककाली इत्यादि।

कालांतर में आने वाले कवि एड्जुतचन की इस शैली से काफी प्रभावित रहे। उनसे पूर्व के लेखकों में मानवस्रर्जित अंतर का भाव मौजूद था। एड्जुतचन ने इस तरीके पर प्रहार किया। उन्होंने बताया कि इंसान की मूल पहचान समस्त सृष्टि के उच्च स्रोत से संबंधित है। एड्जुतचन का आगमन उस वक्त हुआ जब केरल और दक्षिण भारत की सामाजिक परिस्थिति उथलपुथल से भरी थी। यूरोपियन्स का आगमन शुरू हो चुका था और वह अपने साथ पादरियों को ला रहे थे, जो कि ईसाइयत के प्रचार प्रसार में जुटे हुए थे। इसने क्षेत्र में सामाजिक,धार्मिक, राजनीतिक षड्यंत्र का अंतहीन सिलसिला शुरू कर दिया।

समाज में नैतिक मूल्यों के उलट धार्मिक परंपराएं हावी हो गईं। ऐसे वक़्त में एड्जुतचन नई बयार के तौर पर सामने आए। उन्होंने मुक्त छंदों की शैली में महाकाव्य और ग्रंथों के नैतिक मूल्यों को बताना शुरू किया। यह शैली लोगों को आसानी से समझ में आने लगी। इस तरीके ने लोकाचार को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कालांतर में लोगों के भीतर ईश्वर में बुनियादी विश्वास को दोबारा स्थापित किया। उनकी यह शैली समाज के हर वर्ग में गहरे तक पहुंची और इसी कार्य ने उनको मलयालम साहित्य परंपरा का शिरोमणि बना दिया।

एड्जुतचन की जीवंत कल्पना अद्भुत थी। मिसाल के तौर पर एक मेंढक का सांप का भोजन बन जाने के बाद भी अपने अगले निवाले के लिए संघर्ष करना जीवन की अनिश्चितता को दिखता है, हालांकि वह निराशावादी नहीं थे। उन्होंने भक्ति भाव और कृति का अद्भुत सम्मिश्रण किया।

"अपने अहंकार को त्यागो और इसे वृहद करते हुए समस्त ब्रह्मांड से जोड़ो" यह संदेश उन्होंने दिया। एड्जुतचन ने हर उस व्यक्ति को राह दिखाई और प्रोत्साहित किया जिसने उनसे मदद मांगी। नारायणीयम के प्रसिद्ध लेखक मेपाथुर नारायणा भट्टाथिरी एड्जुतचन के मित्र थे। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी पुस्तक के लिए एड्जुतचन से सलाह ली थी। एड्जुतचन ने उनको अपने ग्रंथ की शुरुआत मछली यानी मत्स्य अवतार से करने की सलाह दी। नारायणा इस रहस्यपूर्ण संदेश के भाव को समझ गए और अपने इस महान ग्रंथ की रचना गुरुवर मंदिर में शुरू कर दी।

एड्जुतचन द्वारा शुरू किया गया 'तोता गायन' विधा को मलयालम साहित्य में कई बार दोहराया गया। आज केरल सरकार द्वारा सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान एडजुतचन पुरस्कार उनके नाम पर ही दिया जाता है। सूरनंद कुंजन पिल्लई को 1993 में यह पहला पुरस्कार मिला था। 2012 में सरकार द्वारा स्थापित मलयालम विश्वविद्यालय का नाम भी एड्जुतचन के नाम पर कर दिया गया। एड्जुतचन के घर के आंगन की रेत को पवित्र माना जाता है और आज भी उत्तरी केरल में पहली उंगली से उस रेत पर लिखने  की परंपरा है।

चित्तूर गुरु मठ पलक्कड़ के नजदीक स्थित है, जिसके निकट में राम और शिव के मंदिर हैं। पास ही गली में अग्रहरा की कतार है जहां वह ब्राह्मण परिवार रहते हैं, जिनके पूर्वज एड्जुतचन के साथ यहां आए थे। एड्जुतचन की समाधि भी यहीं स्थित है। इस मठ में एड्जुतचन के कुछ अंश को पवित्रता के साथ संजोकर रखा गया है, जिसमें मूल पांडुलिपि और उनकी मोजरी शामिल है। हालांकि 19वीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरुआत में लगी दो बार भयंकर आग में भगवतम और कई कलाकृतियां जलकर नष्ट हो गईं, लेकिन आज भी श्री चक्र और एड्जुतचन की खड़ाऊ और उनके द्वारा पूजी जाने वाली मूर्तियों को दर्शनार्थियों के लिए रखा जाता है।

हर साल 16 जुलाई से लेकर 16 अगस्त तक चलने वाले मलयालम महीने में अध्यात्म रामायण का पाठ करने की परंपरा केरल के हर हिंदू घर में आज भी है। दिल्ली मुंबई या फिर अरब देशों में रह रहे मलयाली लोग आज भी इसका विधि पूर्वक पालन करते हैं। प्रसिद्ध आलोचक के अय्यप्पा कहते हैं कि जो लोग अध्यात्म रामायण को महज एक धार्मिक ग्रंथ मानते हैं, वह एड्जुतचन के काम को कमतर करते हैं। अध्यात्म रामायण ने केरल में भक्ति आंदोलन को प्रतिपादित किया था।